उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में ढलाई कला से बन रहे पीतल के कछुए, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बढ़ी मांग मुरादाबाद के कारीगर बारीक नक्काशी वाले पीतल के कछुए तैयार कर रहे हैं, जिनकी वास्तु उपयोगिता के चलते केरल, दक्षिण भारत और विदेशों में भारी मांग है। उत्तर प्रदेश का मुरादाबाद शहर अपनी धातु शिल्प कला के लिए पूरी दुनिया में पीतल नगरी के रूप में पहचाना जाता है। यहां पीतल का विशाल स्तर पर व्यापार संचालित होता है, जहां रोजाना अनगिनत कलाकृतियां और उपयोगी वस्तुएं ढाली जाती हैं। इसी कड़ी में स्थानीय कारीगरों ने पीतल के कछुए की एक बेहद आकर्षक और अलंकृत मूर्ति तैयार करना शुरू किया है। इस कछुए की पीठ पर बेहद बारीक नक्काशी की गई है और अलग-अलग शुभ आकृतियों को उभारा गया है। इस खास कलाकारी के चलते इन मूर्तियों की मांग भारत के कोने-कोने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी लगातार देखी जा रही है। विदेशी खरीदारों की ओर से भी इसके बड़े ऑर्डर मिल रहे हैं, क्योंकि वास्तु शास्त्र में इस विशेष धातु शिल्प को अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। कास्टिंग तकनीक और वास्तु शास्त्र से जुड़ाव मुरादाबाद के पीतल कारोबारी राघव खन्ना ने बताया कि शहर में पारंपरिक और सजावटी पीतल के उत्पादों के साथ-साथ वास्तु शास्त्र पर आधारित अनेक वस्तुएं तैयार की जाती हैं। इन्हीं विशेष वस्तुओं में यह नया पीतल का कछुआ शामिल है, जिसे पूरी तरह से मेटल कास्टिंग यानी धातु की ढलाई तकनीक से रूप दिया जाता है। भट्टी में पीतल को पिघलाने और सांचों में ढालने के बाद इसकी सतह पर नक्काशी का काम किया जाता है। राघव खन्ना के अनुसार इस कछुए का मुख्य उपयोग वास्तु नियमों के पालन के लिए होता है। इसे घर की निर्धारित दिशा और वास्तु सिद्धांतों के अनुकूल स्थापित किया जाता है। मान्यताओं के अनुसार पीतल के इस कछुए को निवास स्थान पर रखने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और कई प्रकार के लाभ मिलते हैं, जिससे इसकी लोकप्रियता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। विभिन्न आकार, अंतरराष्ट्रीय बाजार और प्रति किलो कीमत कारीगर इन मूर्तियों को 6 इंच से लेकर 24 इंच तक के विभिन्न आकारों में तैयार कर रहे हैं। क्षेत्रीय स्तर पर इसकी सर्वाधिक मांग दक्षिण भारत और विशेष रूप से केरल राज्य से निकलकर सामने आ रही है। इसके साथ ही विदेशों में रहने वाले सनातन धर्म के अनुयायी भी अपने घरों और प्रतिष्ठानों के लिए इन मूर्तियों के आर्डर दे रहे हैं। मूल्य निर्धारण की बात करें तो यह मूर्ति 2000 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेची जा रही है। कछुए की ऊपरी खोल पर उकेरी गई बारीक नक्काशी सीधे तौर पर वास्तु विधानों से जुड़ी है, जो इसे केवल एक सजावटी वस्तु न बनाकर आध्यात्मिक और वास्तु महत्व का प्रतीक बनाती है। इसका आप पर असर मुरादाबाद में बने वास्तु पीतल के कछुए हस्तशिल्प प्रेमियों और वास्तु शास्त्र में रुचि रखने वाले खरीदारों के लिए विभिन्न आकारों में उपलब्ध हैं। • खरीदारों के लिए: यह मूर्ति 6 इंच से 24 इंच तक के आकारों में उपलब्ध है, जिसे अपनी जगह की जरूरत के अनुसार चुना जा सकता है। इसकी कीमत 2000 रुपये प्रति किलो रखी गई है, जिससे कुल खर्च मूर्ति के वजन पर निर्भर करेगा। • वास्तु अनुपालन: इस कछुए को घर में अनुकूल दिशा के अनुसार स्थापित करने के लिए तैयार किया गया है। मान्यता के अनुसार इसे सही दिशा में रखने से घर के वातावरण में सकारात्मक परिणाम मिलते हैं। • दक्षिण भारत में: केरल और दक्षिण भारतीय राज्यों में रहने वाले लोग इसे आसानी से मंगा सकते हैं। वहां के बाजारों में इसकी मजबूत आपूर्ति श्रृंखला और निरंतर उपलब्धता देखी जा रही है। • प्रवासी भारतीयों के लिए: विदेशों में रहने वाले सनातनी परिवार भी इसे अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर के जरिए प्राप्त कर सकते हैं। इसके जरिए वे अपने विदेशी घरों में पारंपरिक वास्तु नियमों का पालन कर सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ यह धातु उत्पाद पारंपरिक भारतीय वास्तु मान्यताओं और मुरादाबाद के विख्यात पीतल उद्योग के तालमेल के कारण बाजार में प्रमुखता से उभरा है। • वास्तु शास्त्र में मान्यता: घर में कछुए की मूर्ति को स्थापित करना सनातन परंपरा और वास्तु विज्ञान में अत्यंत शुभ माना जाता है। इसी आध्यात्मिक और सकारात्मक प्रभाव के विश्वास ने इसकी मांग को बढ़ाया है। • मुरादाबाद का ढलाई कौशल: मुरादाबाद पीतल के सांचे बनाने और धातु ढलाई तकनीक में विश्वस्तरीय विशेषज्ञता रखता है। इस तकनीकी दक्षता से कारीगर जटिल नक्काशीदार कछुए तैयार करने में सक्षम हुए हैं। • विदेशी मांग में विस्तार: विदेशों में निवास करने वाले भारतीय समुदाय अपनी पारंपरिक वास्तु पद्धतियों को जीवित रखने के लिए प्रामाणिक धातु प्रतिमाएं मंगवा रहे हैं। इस सांस्कृतिक जुड़ाव ने वैश्विक स्तर पर नए ऑर्डर सृजित किए हैं। सवाल-जवाब 1. मुरादाबाद में पीतल का कछुआ किस तकनीक से बनाया जा रहा है? इस कछुए को धातु की ढलाई यानी मेटल कास्टिंग तकनीक के जरिए सांचों में तैयार किया जा रहा है। 2. पीतल के इस कछुए का आकार क्या है? कारीगर इस कछुए को 6 इंच से लेकर 24 इंच तक के अलग-अलग आकारों में बना रहे हैं। 3. इस पीतल के कछुए की कीमत क्या तय की गई है? व्यापारी राघव खन्ना के अनुसार यह मूर्ति 2000 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेची जा रही है। 4. भारत में इस कछुए की सबसे ज्यादा मांग कहां से आ रही है? देश के भीतर इसकी सर्वाधिक मांग दक्षिण भारत और विशेष रूप से केरल राज्य से देखने को मिल रही है। 5. विदेशों में इस उत्पाद की मांग मुख्य रूप से कौन कर रहा है? विदेशों में जहां भी सनातन धर्म से जुड़े लोग निवास कर रहे हैं, वे इस कछुए की मूर्तियां मंगवा रहे हैं। 6. घर में पीतल का कछुआ रखने का क्या महत्व बताया गया है? वास्तु शास्त्र के अनुसार इसे सही दिशा में स्थापित करना अत्यंत शुभ माना जाता है और इससे कई लाभ प्राप्त होते हैं। https://trendkia.com/national/uttar-pradesh-ke-moradabad-men-dhalai-kala-se-bana-rahe-pitala-ke-kachhue-gharelu-aura-antararashtriya-bajaron-men-barhi-manga-42728 TrendKia — Har trend, sabse pehle.