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  "title": "उत्तराखंड के काशीपुर में द्रोणासागर पर फिर शुरू हुई एएसआई की खुदाई, महाभारत काल के इतिहास की हो रही पड़ताल",
  "summary": "उत्तराखंड के काशीपुर स्थित द्रोणासागर में गुरु द्रोणाचार्य के आश्रम की मान्यता की सच्चाई जानने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने दोबारा उत्खनन कार्य शुरू कर दिया है।",
  "content": "उत्तराखंड के काशीपुर में स्थित ऐतिहासिक द्रोणासागर में एक बार फिर से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की टीम ने खुदाई का काम शुरू कर दिया है। इस पूरी कवायद का मुख्य मकसद इस बात की प्रमाणिकता की गहराई से जांच करना है कि क्या वाकई यहां महाभारत काल में गुरु द्रोणाचार्य का आश्रम हुआ करता था या नहीं। पुरातत्वविदों का मानना है कि इस वैज्ञानिक और व्यवस्थित उत्खनन से इस प्राचीन स्थल से जुड़े अनछुए पहलुओं, इसके इतिहास और सांस्कृतिक क्रम को पूरी स्पष्टता के साथ समझने में काफी मदद मिलेगी। स्थानीय स्तर पर लंबे समय से यह मान्यता चली आ रही है कि यह वही भूमि है जहां कौरव और पांडव राजकुमारों के गुरु द्रोण निवास करते थे।\n\n \n\nपहले भी कई दशकों में हो चुकी है यहां खुदाई\n भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के देहरादून सर्किल के प्रभारी Superintending Archaeologist मोहन चंद्र जोशी ने इस बारे में विस्तार से जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि द्रोणासागर एक बेहद महत्वपूर्ण और प्राचीन पुरातात्विक स्थल है, जहां अतीत में भी कई बार उत्खनन कार्य किए जा चुके हैं। इतिहास के पन्नों को खंगालने के लिए सबसे पहले वर्ष 1965 में जाने-माने Archaeologist वाईडी शर्मा ने यहां औपचारिक तौर पर खुदाई का काम कराया था। इसके बाद के वर्षों में यानी 1970 से 1971 के दौरान भी इस स्थान पर उत्खनन अभियान चलाया गया था। इन तमाम पुराने अभियानों के दौरान जमीन के भीतर से कई तरह की प्राचीन संरचनाएं और अवशेष बरामद हुए थे। मोहन चंद्र जोशी के मुताबिक, इस पूरे पुरातात्विक स्थल का इतिहास लगभग 2,000 वर्षों के लंबे कालखंड तक फैला हुआ है। इसके अलावा, यहां से चित्रित धूसर मृदभांड (Painted Grey Ware-PGW) के पुख्ता साक्ष्य भी खुलकर सामने आए हैं। इन्हीं तमाम अवशेषों और साक्ष्यों के आधार पर देश के कई विद्वान और शोधकर्ता इस प्राचीन स्थल को सीधे तौर पर महाभारत काल के साथ जोड़कर देखते आए हैं।\n\n \n\nखुदाई के दौरान मिल रही हैं प्राचीन संरचनाएं\n मौजूदा समय में चल रहे उत्खनन कार्य के बारे में बात करते हुए अधिकारियों ने बताया कि पिछले 20 से 25 दिनों से लगातार खुदाई का काम जमीन पर चल रहा है। हालांकि इस दौरान मौसम की बेरुखी और बारिश के कारण कुछ दिनों के लिए खुदाई के काम में मामूली रुकावटें भी आई हैं, लेकिन काम फिर से जारी है। शुरुआती निष्कर्षों और खोजबीन के दौरान विशेषज्ञों को शुंग-कुषाण काल का एक छोटा ईंट का टुकड़ा हाथ लगा है। इसके साथ ही, जमीन की ऊपरी परतों में ईंटों से तैयार की गई एक गोलाकार संरचना भी देखने को मिली है, जिसे फिलहाल के लिए एक संभावित कुएं के रूप में देखा जा रहा है। अधिकारियों ने इस बात पर खास तौर पर जोर दिया है कि इस खास गोलाकार संरचना के बारे में पूरी और पुख्ता जानकारी तभी सामने आ सकेगी जब इसकी पूरी तरह से और गहराई तक खुदाई कर इसे जमीन के अंदर से पूरी तरह बाहर निकाला जाएगा।\n\n \n\nप्राचीन स्थल के सांस्कृतिक क्रम को समझने की कोशिश\n भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का इस बार का मुख्य लक्ष्य प्राकृतिक मिट्टी की परत तक पूरी तरह व्यवस्थित और वैज्ञानिक तरीके से खुदाई करना है। ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि इस स्थल के पूरे सांस्कृतिक क्रम, इसके फैलाव और इसकी असली उत्पत्ति के बारे में सटीक जानकारी मिल सके। विशेषज्ञ इस बात का भी बारीकी से पता लगाने का प्रयास कर रहे हैं कि आखिर इस गोलाकार संरचना की नींव किस स्तर पर टिकी हुई है और क्या अलग-अलग ऐतिहासिक कालखंडों में इस जगह पर ईंटों से अलग-अलग प्रकार के निर्माण कार्य करवाए गए थे। फिलहाल खुदाई का यह दौर पूरी गति से जारी है। हालांकि पुरातत्वविदों का यह भी साफ कहना है कि अब तक जितने भी साक्ष्य मिले हैं, वे इस स्थल के प्राचीन इतिहास की पड़ताल करने में तो मददगार साबित हो रहे हैं, लेकिन केवल इनके आधार पर ही इस जगह का सीधा संबंध महाभारत काल से होने की अंतिम पुष्टि अभी तक नहीं की जा सकती है।\n\nइसका आप पर असर\nकाशीपुर के द्रोणासागर में चल रही इस पुरातात्विक खुदाई का असर स्थानीय स्तर पर पर्यटन, इतिहास और संस्कृति से जुड़े मामलों पर सीधा पड़ता है।\n\n• भारत में: देश भर के ऐतिहासिक और पौराणिक स्थलों के वैज्ञानिक अध्ययन को एक नई दिशा मिलती है। इससे प्राचीन धरोहरों के संरक्षण और उनके ऐतिहासिक महत्व को आधिकारिक मान्यता मिलने की उम्मीद बढ़ती है।\n\n• काशीपुर में: स्थानीय निवासियों और पर्यटन कारोबार से जुड़े लोगों के लिए इस क्षेत्र का ऐतिहासिक महत्व और बढ़ जाता है। स्थल की प्रमाणिकता सिद्ध होने पर भविष्य में धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन को बड़ा बढ़ावा मिल सकता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nकाशीपुर के द्रोणासागर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा यह खुदाई लंबे समय से चली आ रही स्थानीय लोक मान्यताओं और पुरातात्विक साक्ष्यों के बीच की कड़ी का पता लगाने के लिए शुरू की गई है।\n\n• ऐतिहासिक मान्यता: स्थानीय जनजीवन में यह लंबे समय से माना जाता रहा है कि महाभारत काल के दौरान गुरु द्रोणाचार्य का आश्रम इसी क्षेत्र में स्थित था।\n\n• पूर्व के साक्ष्य: वर्ष 1965 और 1970-71 के पिछले उत्खनन अभियानों में मिले लगभग 2,000 वर्ष पुराने इतिहास और चित्रित धूसर मृदभांड के साक्ष्यों ने पुरातत्वविदों को आगे की जांच के लिए प्रेरित किया है।\n\n• सांस्कृतिक क्रम की जांच: साइट की मूल उत्पत्ति और विभिन्न कालों में हुए निर्माण कार्यों की सटीक जानकारी हासिल करने के लिए प्राकृतिक मिट्टी की परत तक व्यवस्थित वैज्ञानिक खुदाई जरूरी मानी गई है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. काशीपुर में एएसआई द्वारा कौन सी जगह पर खुदाई की जा रही है?\nभारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा काशीपुर के द्रोणासागर में खुदाई की जा रही है।\n\n2. इस खुदाई का मुख्य उद्देश्य क्या है?\nइस खुदाई का उद्देश्य यह जांचना है कि क्या महाभारत काल में यहां गुरु द्रोणाचार्य का आश्रम था।\n\n3. इससे पहले इस स्थल पर कब-कब खुदाई की गई थी?\nइससे पहले वर्ष 1965 और 1970-71 के दौरान इस पुरातात्विक स्थल पर उत्खनन कार्य किया गया था।\n\n4. इस स्थल का इतिहास कितने साल पुराना बताया गया है?\nविशेषज्ञों के मुताबिक इस पुरातात्विक स्थल का इतिहास लगभग 2,000 वर्षों तक फैला हुआ है।\n\n5. हालिया खुदाई में शुरुआती दौर में क्या चीजें मिली हैं?\nशुरुआती खुदाई में शुंग-कुषाण काल का एक छोटा ईंट का टुकड़ा और एक गोलाकार संरचना मिली है।",
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  "category": "भारत",
  "publishedAt": "2026-10-26",
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