वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से वायु सेना के विमान द्वारा पश्चिम बंगाल पहुंची बाघिन, 15 घंटे में पूरा हुआ ऐतिहासिक मिशन बिहार के वाल्मीकिनगर स्थित वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से एक बाघिन को भारतीय वायु सेना के विशेष विमान के जरिए पश्चिम बंगाल के बक्सा टाइगर रिजर्व में सुरक्षित स्थानांतरित किया गया है। वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए बिहार के वाल्मीकिनगर स्थित वाल्मीकि टाइगर रिजर्व की एक बाघिन को पश्चिम बंगाल के बक्सा टाइगर रिजर्व में स्थानांतरित किया गया है। यह पहला मौका है जब बिहार ने अपने संरक्षण क्षेत्र से किसी बाघ को देश के किसी दूसरे राज्य के टाइगर रिजर्व में भेजा है। इस जटिल और संवेदनशील प्रक्रिया को भारतीय वायु सेना के विशेष विमान की मदद से अंजाम दिया गया, जिसने गोरखपुर हवाई अड्डे से उड़ान भरी थी। पंद्रह घंटे तक चला बहुस्तरीय अभियान इस पूरे स्थानांतरण अभियान को लगभग 15 घंटे के भीतर योजनाबद्ध तरीके से पूरा किया गया। अभियान की शुरुआत 29 सितंबर की शाम लगभग 5 बजे हुई, जब विशेषज्ञों की देखरेख में वाल्मीकि टाइगर रिजर्व में बाघिन को सुरक्षित रूप से बेहोश किया गया। इसके तुरंत बाद वन्यजीव प्रबंधन प्रोटोकॉल के तहत उसे रेडियो-कॉलर पहनाया गया और जरूरी चिकित्सीय परीक्षण किए गए। सभी अनिवार्य पशु चिकित्सा प्रक्रियाओं को पूरा करने के पश्चात बाघिन को विशेष निगरानी वाले सड़क वाहन से गोरखपुर हवाई अड्डे लाया गया। वहां पहले से तैयार भारतीय वायु सेना के विशेष विमान के जरिए उसे सीधे पश्चिम बंगाल पहुंचाया गया। 30 सितंबर की सुबह करीब 8 बजे बाघिन बक्सा टाइगर रिजर्व में बनाए गए निर्धारित सॉफ्ट-रिलीज एनक्लोजर में सुरक्षित पहुंच गई। स्वास्थ्य और अनुकूलन की हो रही निगरानी बक्सा टाइगर रिजर्व पहुंचने के बाद बाघिन को अभी एक विशेष रूप से तैयार किए गए सॉफ्ट-रिलीज एनक्लोजर में रखा गया है। वन्यजीव विशेषज्ञ और वन विभाग के अधिकारी लगातार उसके खान-पान, शारीरिक स्वास्थ्य, व्यवहार और नए वातावरण के साथ तालमेल पर नजर बनाए हुए हैं। योजना के अनुसार, आवश्यक आकलन पूरा होने के बाद 2 अक्टूबर को बाघिन को इस एनक्लोजर से निकालकर खुले बड़े वन क्षेत्र में विचरण के लिए छोड़ा जाएगा। एजेंसियों का साझा प्रयास और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य इस अंतरराज्यीय अभियान को सफल बनाने में बिहार वन विभाग, पश्चिम बंगाल वन विभाग, भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) तथा भारतीय वायु सेना के बीच करीबी तालमेल रहा। मैदानी वनकर्मियों, पशु चिकित्सकों और तकनीकी जानकारों ने बाघिन को ट्रेंकुलाइज करने से लेकर रेडियो-कॉलर लगाने, सड़क परिवहन, हवाई यात्रा और अंतिम रिलीज तक तय मानकों का कड़ाई से पालन किया। वाल्मीकि टाइगर रिजर्व देश के अत्यंत महत्वपूर्ण तराई वन क्षेत्र का हिस्सा माना जाता है और बिहार में बाघों की सुरक्षा का केंद्रीय ठिकाना है। वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो दुनिया के 70 फीसदी से अधिक बाघों को भारत में संरक्षण मिलता है। इसके लिए सरकार प्रोजेक्ट टाइगर जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं संचालित करती रही है। हालांकि वनों का दायरा घटने के कारण मानव-वन्यजीव संघर्ष की चुनौतियां भी बनी हुई हैं, ऐसे में यह अंतरराज्यीय स्थानांतरण बाघों के नए पर्यावास विस्तार के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। इसका आप पर असर यह अंतरराज्यीय स्थानांतरण देश में घटते पर्यावास के बीच बाघों की आबादी को संतुलित करने और मानव-वन्यजीव संघर्ष को नियंत्रित करने में मददगार होगा। • भारत में: राष्ट्रीय स्तर पर बाघ संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा क्योंकि अतिरिक्त बाघों को कम आबादी वाले जंगलों में बसाया जा सकेगा। इससे प्रजातियों की जेनेटिक विविधता बेहतर होगी और उन क्षेत्रों में बाघों की उपस्थिति फिर से मजबूत हो सकेगी। • बिहार में: वाल्मीकि टाइगर रिजर्व राष्ट्रीय स्तर के संरक्षण अभियानों में एक प्रमुख सहयोगी के रूप में उभरा है। स्थानीय स्तर पर स्वस्थ बाघ आबादी का होना यह दर्शाता है कि राज्य के तराई वनों में संरक्षण के प्रयास प्रभावी साबित हो रहे हैं। • पश्चिम बंगाल में: बक्सा टाइगर रिजर्व में बाघों की उपस्थिति फिर से सशक्त होगी जिससे स्थानीय वन्यजीव पारिस्थितिकी तंत्र संतुलित होगा। यह कदम वन सुरक्षा निगरानी और भविष्य के पर्यावरण संरक्षण को मजबूती प्रदान करेगा। • सीमावर्ती ग्रामीणों के लिए: योजनाबद्ध संरक्षण और रेडियो-कॉलर ट्रैकिंग से आबादी पर नजर रखना आसान होता है। इससे वनों के आसपास रहने वाले स्थानीय लोगों और जंगली जानवरों के बीच टकराव का जोखिम कम करने में सहायता मिलती है। ऐसा क्यों हुआ पश्चिम बंगाल के बक्सा टाइगर रिजर्व में बाघों की आबादी को पुनर्जीवित करने और बिहार के समृद्ध तराई क्षेत्र से वन्यजीवों का संतुलन बनाने के लिए यह कदम उठाया गया। • पर्यावास पुनर्स्थापन: बक्सा टाइगर रिजर्व में लंबे समय से बाघों की संख्या बढ़ाने की योजना पर काम चल रहा था। अनुकूल वातावरण तैयार होने के बाद बाहर से स्वस्थ बाघ लाकर वहां की आबादी को दोबारा सक्रिय करने की आवश्यकता थी। • वाल्मीकि रिजर्व की मजबूत स्थिति: बिहार का वाल्मीकि टाइगर रिजर्व तराई क्षेत्र का एक सक्षम पर्यावास बन चुका है जहां बाघों की संख्या में स्थिरता आई है। इसी वजह से राज्य पहली बार दूसरे अभयारण्य को बाघ उपलब्ध कराने की स्थिति में पहुंचा। • विमान का इस्तेमाल: सड़क मार्ग से लंबा सफर वन्यजीव के लिए अत्यधिक तनावपूर्ण और जानलेवा साबित हो सकता था। इसी जोखिम को समाप्त करने के लिए भारतीय वायु सेना के विशेष विमान से महज 15 घंटे में पूरी प्रक्रिया पूरी की गई। • मानव-वन्यजीव संघर्ष नियंत्रण: जंगलों का दायरा सिकुड़ने से बढ़ते दबाव को कम करने के लिए अतिरिक्त बाघों को सुरक्षित पर्यावासों में स्थानांतरित करना जरूरी माना गया। इससे प्राकृतिक संसाधनों और सुरक्षित क्षेत्र दोनों का सही उपयोग सुनिश्चित होता है। सवाल-जवाब 1. बाघिन को किस टाइगर रिजर्व से कहां भेजा गया है? बाघिन को बिहार के वाल्मीकिनगर स्थित वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से पश्चिम बंगाल के बक्सा टाइगर रिजर्व में स्थानांतरित किया गया है। 2. इस पूरे स्थानांतरण में कुल कितना समय लगा? 29 सितंबर की शाम 5 बजे ट्रेंकुलाइज किए जाने से लेकर 30 सितंबर की सुबह 8 बजे बक्सा पहुंचने तक यह पूरी प्रक्रिया लगभग 15 घंटे में पूरी हुई। 3. बाघिन को ले जाने के लिए किस हवाई अड्डे और विमान का उपयोग किया गया? बाघिन को गोरखपुर हवाई अड्डे लाया गया और वहां से भारतीय वायु सेना के विशेष विमान के जरिए बक्सा भेजा गया। 4. बाघिन को खुले जंगल में कब छोड़ा जाएगा? स्वास्थ्य और व्यवहार की निगरानी के बाद 2 अक्टूबर को बाघिन को सॉफ्ट-रिलीज एनक्लोजर से बड़े वन क्षेत्र में छोड़े जाने की योजना है। 5. इस अभियान में किन प्रमुख संस्थानों ने भाग लिया? इस अभियान में बिहार और पश्चिम बंगाल के वन विभाग, भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) और भारतीय वायु सेना ने मिलकर काम किया। https://trendkia.com/national/valmiki-tiger-reserve-se-vayu-sena-ke-vimana-dvara-west-bengal-pahunchi-baghina-15-ghnte-men-pura-hua-aitihasika-mishana-40713 TrendKia — Har trend, sabse pehle.