# विदेश में मिला तलाक भारत में अपने आप नहीं होगा वैध, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका

> सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भारत में हिंदू रीति-रिवाजों से हुई शादी का विदेश में हुआ तलाक स्वतः मान्य नहीं होगा। ब्रिटेन से तलाक लेकर दूसरी शादी करने वाले व्यक्ति के खिलाफ द्विविवाह का मामला बरकरार रहेगा।

**Type:** article · **Category:** भारत · **Published:** 2026-11-03 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/national/videsha-men-mila-talaka-india-men-apane-apa-nahin-hoga-vaidha-supreme-court-ne-kharija-ki-yachika-55908 · **Language:** Hindi
**Tags:** सुप्रीम कोर्ट, विदेशी तलाक, हिंदू विवाह, द्विविवाह, सीपीसी धारा 13, आईपीसी धारा 494

भारत में संपन्न हुए विवाह को विदेशी अदालत से मिले तलाक के आधार पर समाप्त मान लेना अब आसान नहीं रहेगा। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में व्यवस्था दी है कि यदि किसी विदेशी अदालत ने वैवाहिक संबंधों में सुधार की गुंजाइश न होने के आधार पर विवाह विच्छेद का फैसला सुनाया है, तो वह आदेश भारतीय क्षेत्राधिकार में स्वतः प्रभावी नहीं माना जाएगा। शीर्ष अदालत ने रेखांकित किया कि किसी भी विदेशी तलाक की डिक्री को भारत में वैधानिक मान्यता प्राप्त करने के लिए देश के घरेलू कानूनों और कानूनी प्रक्रियाओं की शर्तों पर खरा उतरना अनिवार्य है।

## ब्रिटेन में तलाक और द्विविवाह का विवाद
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने यह व्यवस्था उस व्यक्ति की याचिका की सुनवाई करते हुए दी, जिसने अपने विरुद्ध दर्ज दो शादियों और आपराधिक षड्यंत्र के मुकदमे को निरस्त करने का अनुरोध किया था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि इंग्लैंड की एक अदालत से तलाक का आदेश प्राप्त हो जाने के बाद उसकी दूसरी शादी को भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत द्विविवाह का अपराध नहीं ठहराया जा सकता। हालांकि, शीर्ष अदालत की पीठ ने याचिकाकर्ता के इस तर्क को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया और कानूनी प्रावधानों के तहत राहत देने से मना कर दिया।

## सत्तेनपल्ली से ब्रिटेन तक का घटनाक्रम
इस पूरे मामले की शुरुआत 18 अप्रैल 2003 को हुई थी, जब उस व्यक्ति का विवाह आंध्र प्रदेश के सत्तेनपल्ली में हिंदू रीति-रिवाजों और पारंपरिक संस्कारों के साथ हुआ था। वैवाहिक बंधन में बंधने के पश्चात दोनों पति-पत्नी हैदराबाद में रहने लगे। उस दौरान पति उस्मानिया मेडिकल कॉलेज में अपनी उच्च चिकित्सा शिक्षा यानी पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी कर रहा था। इसके बाद 4 फरवरी 2005 को वह एक चिकित्सक के रूप में करियर संवारने के उद्देश्य से ब्रिटेन चला गया। कुछ समय बीतने के बाद उसकी पत्नी भी ब्रिटेन में उसके पास पहुंच गई।

अगस्त 2007 में स्थिति उस समय बदली जब पत्नी अपने पहले बच्चे को जन्म देने के लिए भारत में अपने मायके लौट आई। पति का आरोप था कि उसने पत्नी से वापस लौटने के कई आग्रह किए, लेकिन पत्नी ब्रिटेन नहीं आई। इसी गतिरोध के बाद दोनों के वैवाहिक रिश्तों में तनाव गहराता गया और दूरियां बढ़ती चली गईं।

## भारतीय अदालतों में अर्जी और विदेशी नागरिकता
विवाद बढ़ने पर पति ने आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के अंतर्गत नरसारावपेट की सक्षम अदालत में तलाक और बच्चे के संरक्षण की मांग करते हुए अर्जी दायर की थी। हालांकि, स्थानीय अदालत ने उसकी याचिका को खारिज कर दिया था। इसके बाद उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन बाद में उस अपील को भी वापस ले लिया गया। इस कानूनी प्रक्रिया के बीच पति को 1 फरवरी 2013 को ब्रिटेन की नागरिकता प्राप्त हो गई।

नागरिकता मिलने के तुरंत बाद उसने इंग्लैंड की कैम्ब्रिज काउंटी कोर्ट में अपनी पहली पत्नी के खिलाफ विवाह विच्छेद की कार्यवाही आरंभ की। ब्रिटेन की अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए वर्ष 2014 में तलाक का फरमान सुना दिया। बाद में इसी विदेशी डिक्री को आधार बनाकर पति ने भारत में अपने खिलाफ चल रहे द्विविवाह के आपराधिक मामले को चुनौती दी थी।

## सीपीसी की धारा 13 और आईपीसी की धारा 494
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब पहली शादी भारत में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी, तो उस पर भारतीय पारिवारिक कानून पूरी तरह प्रभावी होते हैं। ऐसे में भारतीय कानूनों की अनदेखी करके किसी विदेशी मंच से प्राप्त किया गया तलाक भारत में अपने आप कानूनी मान्यता हासिल नहीं कर सकता। पीठ ने रेखांकित किया कि विदेशी अदालत ने जिस आधार पर विवाह विच्छेद का फैसला दिया था, उसे भारतीय कानून के तहत मान्यता प्राप्त नहीं थी।

अदालत ने कहा कि किसी विदेशी फैसले को भारत में वैध मानने के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 13 में निर्धारित कानूनी मानकों और कसौटियों को पूरा करना आवश्यक होता है। शीर्ष अदालत ने यह भी दो टूक कहा कि जब पहला विवाह भारत में संपन्न हुआ था, तो दूसरी शादी विदेश में कर लेने मात्र से भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 494 के तहत लगे द्विविवाह के आरोप निष्प्रभावी नहीं होते। अदालत के अनुसार, अपराध का निर्धारण करते समय केवल दूसरी शादी का स्थान देखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पहले से वैध वैवाहिक संबंध का अस्तित्व भी देखना अनिवार्य है।

## इसका आप पर असर
यह फैसला विदेश में रहने वाले उन भारतीय नागरिकों और प्रवासियों को सीधे प्रभावित करता है जिनकी शादी भारत में हुई है।

- **विदेश में रहने वाले भारतीयों पर:** भारत में हुई शादी का विदेश में एकतरफा या भारतीय कानून से इतर आधारों पर तलाक लेना अब कानूनी सुरक्षा नहीं देगा। दूसरी शादी करने पर भारत लौटने पर द्विविवाह और आपराधिक मुकदमे का सामना करना पड़ सकता है।
- **घरेलू पत्नियों के अधिकारों पर:** भारत में रहने वाली उन पत्नियों के कानूनी अधिकार सुरक्षित रहेंगे जिनके पति विदेश जाकर एकतरफा तलाक का आदेश ले लेते हैं। विदेशी डिक्री को अब भारतीय अदालत में आसानी से चुनौती दी जा सकेगी।
- **कानूनी प्रक्रियाओं के अनुपालन पर:** प्रवासियों को तलाक लेने के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 13 की शर्तों का पालन करना होगा। ऐसा न करने पर उनकी दूसरी शादी भारत में अमान्य और गैर-कानूनी मानी जाएगी।
- **पारिवारिक और संपत्ति मामलों पर:** पहली शादी के वैध रहने से भरण-पोषण, बच्चे की कस्टडी और संपत्ति के उत्तराधिकार पर पुराने अधिकार बने रहेंगे। विदेशी फैसले के दम पर इन दायित्वों से छुटकारा नहीं पाया जा सकेगा।

## ऐसा क्यों हुआ
यह निर्णय उस समय आया जब ब्रिटेन की अदालत से तलाक हासिल करने वाले एक व्यक्ति ने भारत में अपने खिलाफ दर्ज द्विविवाह के आपराधिक मामले को रद्द कराने की मांग की थी।

- **मामले की प्रत्यक्ष पृष्ठभूमि:** याचिकाकर्ता ने आंध्र प्रदेश में हिंदू रीति-रिवाजों से विवाह करने के बाद ब्रिटेन जाकर वहां की अदालत से तलाक लिया और दूसरी शादी कर ली। भारत में पहली पत्नी की शिकायत पर दर्ज द्विविवाह के मुकदमे से बचने के लिए उसने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई थी।
- **कानूनी टकराव का कारण:** ब्रिटेन की अदालत ने जिस आधार पर तलाक दिया था, वह भारतीय वैवाहिक कानून के तहत मान्य नहीं था। भारतीय कानून के अनुसार यहां हुई शादियों के विघटन के लिए घरेलू वैधानिक प्रक्रियाओं और सीपीसी की धारा 13 की शर्तों का पालन जरूरी है।
- **अदालत का स्पष्ट रुख:** सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल दूसरे विवाह का स्थल विदेश होने से द्विविवाह का अपराध समाप्त नहीं हो जाता। अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए दोहराया कि विदेशी आदेश स्वतः भारतीय कानूनों का स्थान नहीं ले सकते।

## सवाल-जवाब

### 1. सुप्रीम कोर्ट ने विदेशी तलाक की डिक्री को लेकर क्या फैसला दिया?
अदालत ने स्पष्ट किया कि भारत में हिंदू रीति-रिवाजों से हुई शादी का विदेश में हुआ तलाक स्वतः मान्य नहीं होगा, उसे भारतीय कानूनी शर्तों पर खरा उतरना होगा।

### 2. यह मामला किस पीठ के समक्ष विचार के लिए आया था?
यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने सुनाया।

### 3. विदेशी डिक्री की मान्यता के लिए किस कानूनी प्रावधान का पालन आवश्यक है?
विदेशी अदालत के आदेश को भारत में वैध मानने के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 13 में निर्धारित कानूनी कसौटियों पर खरा उतरना अनिवार्य है।

### 4. याचिकाकर्ता की शादी कब और कहां हुई थी?
याचिकाकर्ता की पहली शादी 18 अप्रैल 2003 को आंध्र प्रदेश के सत्तेनपल्ली में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी।

### 5. पति ने ब्रिटेन में तलाक का आदेश कब प्राप्त किया था?
ब्रिटेन की नागरिकता मिलने के बाद उसने इंग्लैंड की कैम्ब्रिज काउंटी कोर्ट से वर्ष 2014 में तलाक का आदेश हासिल किया था।

### 6. क्या विदेश में दूसरी शादी करने पर आईपीसी की धारा 494 से राहत मिलेगी?
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, पहली शादी वैध रहने तक विदेश में दूसरी शादी करने पर भी द्विविवाह (आईपीसी धारा 494) के आरोप समाप्त नहीं होते।

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