विधान परिषद सदस्य का चयन कैसे किया जाता है और उन्हें कितना वेतन मिलता है चार राज्यों की आठ विधान परिषद सीटों के नतीजों के बाद जानिए उच्च सदन के प्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली, उनकी मतदान प्रक्रिया और अलग-अलग राज्यों में तय वेतन और भत्तों का पूरा लेखा-जोखा। हाल ही में देश के चार अलग-अलग राज्यों की आठ विधान परिषद सीटों पर चुनावी प्रक्रिया पूरी हुई, जिसके नतीजे भी सामने आ चुके हैं। चुनावी नतीजों में विभिन्न दलों को मिला-जुला जनसमर्थन मिला है। इस घटनाक्रम ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में विधान परिषद के गठन, उसके महत्व और कार्यप्रणाली को लेकर व्यापक चर्चा छेड़ दी है। कई नागरिकों के लिए यह समझना दिलचस्प होता है कि आम विधानसभा चुनावों से अलग इस उच्च सदन में नुमाइंदे कैसे पहुंचते हैं, उनका प्राथमिक दायित्व क्या होता है और सरकार की तरफ से उन्हें क्या पारिश्रमिक तथा लाभ दिए जाते हैं। संसदीय लोकतंत्र में जिस तरह राष्ट्रीय स्तर पर संसद के दो सदन होते हैं और राज्यसभा उच्च सदन की भूमिका निभाती है, ठीक उसी तर्ज पर राज्यों में द्विसदनीय व्यवस्था के तहत विधान परिषद को उच्च सदन का दर्जा हासिल है। इस सदन के सदस्य को एमएलसी यानी मेंबर ऑफ लेजिस्लेटिव काउंसिल कहा जाता है, जिसे हिंदी में विधान परिषद सदस्य के नाम से जाना जाता है। राज्यों में विधान परिषद की मौजूदगी भारत के सभी प्रांतों में द्विसदनीय व्यवस्था लागू नहीं है। अधिकतर राज्यों में केवल एक ही सदन यानी विधानसभा काम करती है, जहां सिर्फ विधायक निर्वाचित होते हैं। मौजूदा समय में देश के केवल 6 राज्यों के पास यह दो सदनों वाली व्यवस्था मौजूद है। इनमें उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना शामिल हैं। इन छह राज्यों में विधानसभा निचला सदन कहलाती है और विधान परिषद को वरिष्ठ या उच्च सदन माना जाता है। शेष सभी प्रांतों में केवल एक सदन होने की वजह से वहां विधान पार्षद की व्यवस्था नहीं है। चुनावी प्रक्रिया और निर्वाचक मंडल का ढांचा एमएलसी बनने के लिए प्रत्याशी का चयन आम मतदाताओं द्वारा सीधे मतदान से नहीं होता। इसके लिए एक विशिष्ट अप्रत्यक्ष चुनावी प्रक्रिया तय की गई है, जिसमें अलग-अलग सामाजिक और संस्थागत समूहों को मताधिकार दिया गया है। सदन के कुल सदस्यों के अलग-अलग हिस्सों का चुनाव विभिन्न श्रेणियों से होता है • विधायकों की भागीदारी: कुल निर्धारित संख्या का एक-तिहाई हिस्सा संबंधित राज्य के विधानसभा सदस्यों यानी विधायकों द्वारा वोट डालकर चुना जाता है। • स्थानीय प्रशासन की भूमिका: अन्य एक-तिहाई सदस्यों का निर्वाचन स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों के जरिए होता है, जिनमें नगर पालिकाओं और जिला पंचायतों के प्रतिनिधि हिस्सा लेते हैं। • शिक्षक वर्ग का प्रतिनिधित्व: कुल सदस्यों में से 1/12 भाग का चुनाव ऐसे अध्यापकों द्वारा किया जाता है, जो न्यूनतम 3 वर्ष से माध्यमिक स्तर के स्कूल या उससे ऊपर की कक्षाओं में अध्यापन कार्य कर रहे हों। • पंजीकृत स्नातकों का कोटा: अन्य 1/12 सदस्यों को चुनने का अधिकार राज्य के ऐसे पंजीकृत ग्रेजुएट युवाओं को मिलता है, जिन्होंने अपनी डिग्री कम से कम 3 वर्ष पूर्व हासिल कर ली हो। • राज्यपाल द्वारा मनोनयन: शेष बचे लगभग 1/6 सदस्यों का निर्वाचन नहीं होता, बल्कि राज्य के राज्यपाल उन्हें साहित्य, विज्ञान, कला तथा सामाजिक सेवा जैसे विशिष्ट क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान के आधार पर सीधे उच्च सदन के लिए नामांकित करते हैं। कार्यकाल और सदन का स्वरूप विधान परिषद कभी भंग नहीं होने वाला एक स्थायी सदन है। इसका कार्यकाल अनवरत चलता रहता है, लेकिन इसके प्रत्येक सदस्य का निजी कार्यकाल 6 वर्ष की अवधि के लिए तय होता है। निरंतरता बनाए रखने के लिए हर 2 वर्ष के अंतराल पर कुल सदस्यों में से एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त हो जाते हैं और उनके स्थान पर नए सदस्यों का आगमन होता है। इस उच्च सदन की सदस्यता हासिल करने के लिए उम्मीदवार की न्यूनतम आयु 30 वर्ष तय की गई है। उच्च सदन का मूल उद्देश्य और अधिकार क्षेत्र राज्य स्तर पर विधान परिषद की स्थापना का मुख्य उद्देश्य कानून निर्माण की प्रक्रिया में परिपक्वता, गहराई और अतिरिक्त विचार-मंथन जोड़ना है। इसके माध्यम से समाज के बुद्धिजीवी वर्गों, तकनीकी विशेषज्ञों, शिक्षकों, कला, विज्ञान और सामाजिक सेवा से जुड़े प्रतिष्ठित लोगों को शासन के नीति-निर्माण में आवाज मिलती है। सदन के भीतर एक विधान परिषद सदस्य विधायी कार्यों में सक्रिय भागीदारी निभा सकता है। वह सत्ता पक्ष से प्रश्न पूछने, प्रशासनिक नीतियों की समीक्षा करने और राज्यहित के गंभीर विषयों पर सार्थक बहस करने का अधिकार रखता है। किसी साधारण विधेयक को विधानसभा अथवा विधान परिषद में से किसी भी पटल पर प्रस्तुत किया जा सकता है। यद्यपि कुछ वित्तीय और विशेषाधिकार मामलों में विधानसभा की स्थिति ज्यादा प्रभावी होती है, फिर भी कानून के रूप में अंतिम मंजूरी मिलने से पूर्व दोनों सदनों की संवैधानिक प्रक्रिया अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। वेतन, भत्ते और मिलने वाली सरकारी सुविधाएं विधान परिषद सदस्यों को उनके पदीय दायित्वों के निर्वहन हेतु निश्चित वेतन के अलावा कई तरह के भत्ते और संसाधन मुहैया कराए जाते हैं। इन वित्तीय लाभों और सुविधाओं का दायरा हर राज्य के विधायी नियमों के अनुसार भिन्न हो सकता है • मासिक वेतन और क्षेत्र भत्ते: सदस्यों को एक तय मूल वेतन मिलता है। साथ ही अपने क्षेत्र और कार्यालयीन कार्यों के खर्च निपटाने हेतु मासिक निर्वाचन क्षेत्र भत्ता और सचिवीय सहायता राशि भी दी जाती है। • आवास और दैनिक बैठक व्यवस्था: सत्र के दौरान राजधानी में विधायकों के लिए तय विश्राम गृह, आधिकारिक आवास या उसके बदले आवास भत्ता प्रदान किया जाता है। सदन और विभिन्न विधायी समितियों की बैठकों में शामिल होने पर निर्धारित दरों पर दैनिक भत्ता भी उपलब्ध कराया जाता है। • यात्रा और स्वास्थ्य सुरक्षा: आधिकारिक काम, बैठकों और अध्ययन दौरों के लिए तय नियमों के तहत यात्रा खर्च की प्रतिपूर्ति या पास दिए जाते हैं। इसके अतिरिक्त सदस्य और उनके परिवार के लिए सरकारी अस्पतालों अथवा मान्यता प्राप्त संस्थानों में इलाज हेतु चिकित्सा प्रतिपूर्ति की सुविधा दी जाती है। • संचार और कार्यालयीन खर्च: जनसंपर्क और सरकारी कार्यों को सुचारु रखने के लिए टेलीफोन, मोबाइल और इंटरनेट खर्च के बिलों की प्रतिपूर्ति का प्रावधान रहता है। • पेंशन की गारंटी: कार्यकाल पूरा होने के बाद पूर्व सदस्यों के लिए वित्तीय सुरक्षा हेतु मासिक पेंशन का नियम है। उत्तर प्रदेश में विधान परिषद सदस्यों को उत्तर प्रदेश राज्य विधानमंडल (सदस्यों के परिलब्धियां और पेंशन) अधिनियम, 1980 के प्रावधानों के अंतर्गत ताउम्र पेंशन और अन्य लाभ दिए जाते हैं। प्रमुख राज्यों में मिलने वाला वेतन पैकेज राज्यों के अपने-अपने वित्तीय नियमों के कारण विधान परिषद सदस्यों के वेतन और भत्तों में अंतर देखने को मिलता है • उत्तर प्रदेश: यहां 1 अप्रैल 2025 से लागू होने वाले नियमों के तहत मूल वेतन ₹35,000 प्रति माह है। इसके साथ ₹75,000 निर्वाचन क्षेत्र भत्ता, ₹45,000 चिकित्सा भत्ता, ₹30,000 सचिव या कार्यालय भत्ता और ₹9,000 टेलीफोन भत्ता दिया जाता है। समिति की बैठकों में भाग लेने पर प्रति बैठक ₹2,500 का भुगतान होता है। इस प्रकार सभी भत्तों को मिलाकर कुल मासिक पैकेज लगभग ₹2.66 लाख से ₹2.96 लाख के दायरे में बैठता है। • महाराष्ट्र: इस राज्य में विधान परिषद सदस्य को वेतन और समस्त भत्तों को जोड़कर लगभग ₹2.52 लाख प्रति माह की कुल राशि प्राप्त होती है। • बिहार: यहां सदस्यों को कुल मिलाकर करीब ₹1.60 लाख से ₹1.70 लाख का मासिक वेतन-भत्ता पैकेज मिलता है। साथ ही जीवनभर के लिए ₹45,000 की मासिक पेंशन, नि:शुल्क चिकित्सा सेवा, यात्रा कूपन और वाहन ऋण की विशेष सुविधा भी उपलब्ध कराई जाती है। • तेलंगाना: दक्षिण भारतीय राज्य तेलंगाना में विधान परिषद सदस्य को लगभग ₹2.50 लाख का कुल मासिक वेतन और भत्ता दिया जाता है। इसका आप पर असर विधान परिषद चुनाव और इसके सदस्यों के विशेषाधिकार राज्य स्तर पर नीतियों के निर्माण और सार्वजनिक धन के प्रबंधन को सीधे प्रभावित करते हैं। • नागरिकों के लिए प्रतिनिधित्व: राज्य में शिक्षकों और पंजीकृत स्नातकों को अपने प्रतिनिधि सीधे उच्च सदन में भेजने का संवैधानिक अधिकार मिलता है। जिन स्नातकों की डिग्री तीन साल पुरानी हो चुकी है, वे निर्वाचक नामावली में पंजीकरण कराकर कानून निर्माण प्रक्रिया का हिस्सा बन सकते हैं। • करदाताओं पर वित्तीय प्रभाव: छह राज्यों में विधान परिषद सदस्यों के वेतन, आवास, चिकित्सा और आजीवन पेंशन का खर्च राज्य के राजकोष से वहन किया जाता है। जनता के करों से उत्तर प्रदेश में प्रत्येक सदस्य पर मासिक ₹2.66 लाख से ₹2.96 लाख और महाराष्ट्र में करीब ₹2.52 लाख खर्च किए जाते हैं। • कानूनों की समीक्षा: राज्य सरकार द्वारा लाए जाने वाले विधेयकों पर विधान परिषद में दोबारा चर्चा होती है। इससे जल्दबाजी में बनने वाले कानूनों की कमियां दूर होती हैं और जनता पर लागू होने वाली नीतियों की गुणवत्ता सुधरती है। • विशेषज्ञों की भागीदारी: साहित्य, कला, विज्ञान और समाज सेवा से जुड़े प्रतिष्ठित लोगों को बिना प्रत्यक्ष चुनाव लड़े शासन में सीधे राय रखने का मौका मिलता है। यह व्यवस्था विभिन्न क्षेत्रों के जानकारों की सलाह को प्रशासनिक नीतियों में शामिल करने की राह बनाती है। ऐसा क्यों हुआ विधान परिषद चुनाव और सदस्यों के ढांचे पर चर्चा इसलिए शुरू हुई क्योंकि हाल ही में देश के चार राज्यों की आठ परिषद सीटों के चुनाव परिणाम सामने आए हैं। • द्विसदनीय संवैधानिक अनिवार्यता: भारतीय संविधान में बड़े राज्यों के भीतर जनसांख्यिकीय विविधता और नीतिगत संतुलन के लिए उच्च सदन का प्रावधान किया गया था। यह व्यवस्था छह राज्यों में आज भी निरंतर समीक्षा और विशेषज्ञता सुनिश्चित करने के लिए कायम रखी गई है। • क्रमिक सेवानिवृत्ति नियम: विधान परिषद एक स्थायी सदन है जो कभी एक साथ समाप्त नहीं होता। हर दो वर्ष में एक-तिहाई सदस्यों का कार्यकाल पूरा होने के कारण रिक्त सीटों को भरने के लिए नियमित चुनाव कराना संवैधानिक दायित्व है। • विभिन्न हितधारकों का समावेश: सामान्य विधानसभाओं में सीधे चुनाव न लड़ पाने वाले शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों और स्थानीय निकाय प्रतिनिधियों को शासन से जोड़ने के लिए यह अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली तैयार की गई थी। सवाल-जवाब 1. एमएलसी का पूरा नाम क्या होता है? एमएलसी का पूरा नाम मेंबर ऑफ लेजिस्लेटिव काउंसिल होता है, जिसे हिंदी में विधान परिषद सदस्य कहा जाता है। 2. भारत के किन राज्यों में विधान परिषद की व्यवस्था मौजूद है? वर्तमान में यह व्यवस्था छह राज्यों में लागू है, जिनके नाम उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना हैं। 3. विधान परिषद सदस्य बनने के लिए न्यूनतम आयु सीमा क्या है? विधान परिषद की सदस्यता प्राप्त करने के लिए प्रत्याशी की आयु कम से कम 30 वर्ष होनी अनिवार्य है। 4. एमएलसी का कार्यकाल कितने वर्षों का होता है? एक विधान परिषद सदस्य का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है, और इसके एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक 2 साल बाद सेवानिवृत्त होते हैं। 5. उत्तर प्रदेश में एमएलसी को कुल कितना मासिक वेतन पैकेज मिलता है? उत्तर प्रदेश में 1 अप्रैल 2025 से ₹35,000 मूल वेतन के साथ विभिन्न भत्ते मिलाकर कुल पैकेज लगभग ₹2.66 लाख से ₹2.96 लाख प्रति माह रहता है। 6. बिहार में पूर्व विधान परिषद सदस्यों को कितनी पेंशन दी जाती है? बिहार में पूर्व विधान पार्षदों को प्रतिमाह ₹45,000 की आजीवन पेंशन के साथ चिकित्सा और अन्य सुविधाएं प्रदान की जाती हैं। https://trendkia.com/national/vidhana-parishada-sadasya-ka-chayana-kaise-kiya-jata-hai-aura-unhen-kitana-vetana-milata-hai-53231 TrendKia — Har trend, sabse pehle.