विपक्ष के विरोध के बीच चर्चा में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार: जानें कब तक संभालेंगे पद और कितनी चुनावी परीक्षाएं हैं बाकी संसद में महाभियोग की सियासी चर्चाओं के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का कार्यकाल जनवरी 2029 तक निर्धारित है। इस दौरान उन पर 22 राज्यों के विधानसभा चुनाव और राष्ट्रपति चुनाव कराने का जिम्मा रहेगा। देश के मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर आसीन ज्ञानेश कुमार को लेकर इस समय सियासी हलकों में तीखी बहस छिड़ी हुई है। विपक्षी दल लामबंद होकर उनके पद छोड़ने का दबाव बना रहे हैं और संसद के भीतर महाभियोग की पहल करने की तैयारी में जुटे हैं। हालांकि भारतीय संवैधानिक ढांचे के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को पदमुक्त करने का रास्ता बेहद जटिल है। देश की शीर्ष अदालत या सरकार के समर्थन के बिना विपक्षी खेमा उन्हें सीधे नहीं हटा सकता। इस संवैधानिक पद से किसी को हटाने का एकमात्र कानूनी जरिया संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाना ही है। संसद में महाभियोग की प्रक्रिया पूरी करने के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई सांसदों के समर्थन की अनिवार्य शर्त होती है। मौजूदा संख्याबल को देखते हुए विपक्षी पार्टियां अकेले दम पर ऐसा कोई प्रस्ताव पारित करवाने की स्थिति में नहीं हैं। जब तक स्वयं आयुक्त अपनी मर्जी से पद छोड़ने का फैसला न करें, तब तक उन्हें हटाया जाना लगभग नामुमकिन है। ऐसे राजनीतिक माहौल में यह जानना बेहद अहम हो जाता है कि उनका सेवाकाल कब समाप्त होगा और उनके एजेंडे में कौन-से महत्वपूर्ण चुनावी इम्तिहान शामिल हैं। जनवरी 2029 तक रहेगा कार्यकाल संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार ज्ञानेश कुमार का मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में कार्यकाल जनवरी 2029 तक प्रभावी रहने वाला है। इसका सीधा अर्थ यह है कि वर्ष 2029 के लोकसभा चुनावों की आधिकारिक रूपरेखा तय होने से चंद महीने पूर्व ही वे सेवानिवृत्त हो जाएंगे। यदि केंद्र सरकार उनके सेवाकाल में विस्तार की मंजूरी देती है, तभी वे उस वर्ष के राष्ट्रीय आम चुनाव की निगरानी कर सकेंगे। उन्होंने 19 फरवरी 2025 को इस शीर्ष संवैधानिक पद की बागडोर संभाली थी। प्रशासनिक सेवा के क्षेत्र में उनका लंबा अनुभव रहा है। जनवरी 2024 में वे नागरिक सेवाओं से सेवानिवृत्त हुए थे, जिसके दो माह से भी कम अंतराल में उन्हें चुनाव आयुक्त की जिम्मेदारी सौंप दी गई थी। उनकी यह प्रारंभिक नियुक्ति वर्ष 2024 के आम चुनाव की आधिकारिक घोषणा से ठीक एक दिन पहले अमल में लाई गई थी। इसके पश्चात फरवरी 2025 में उन्हें पदोन्नत कर आयोग का सर्वोच्च दायित्व सौंपा गया। उनके नेतृत्व की देखरेख में बिहार, दिल्ली तथा पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव पहले ही संपन्न कराए जा चुके हैं। 22 राज्यों के चुनाव और राष्ट्रपति निर्वाचन की जिम्मेदारी अपने संपूर्ण कार्यकाल के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त के समक्ष कम से कम 22 राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव कराने की विशाल प्रशासनिक चुनौती रहेगी। इसके अतिरिक्त वर्ष 2027 में होने वाला देश का अगला राष्ट्रपति चुनाव भी उन्हीं की निगरानी में संपन्न कराया जाना है। चुनावी कैलेंडर के मुताबिक विभिन्न राज्यों में मतदान की तिथियां अलग-अलग वर्षों में बंटी हुई हैं। साल दर साल राज्यों में चुनावी कार्यक्रम वर्ष 2027 के दौरान सात राज्यों में विधानसभा के गठन हेतु मतदान होना है। इन राज्यों में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, पंजाब, मणिपुर, गुजरात तथा हिमाचल प्रदेश सम्मिलित हैं। राजनीतिक दृष्टिकोण से उत्तर प्रदेश और गुजरात जैसे बड़े राज्यों के चुनाव राष्ट्रीय स्तर पर काफी संवेदनशील माने जाते हैं। इसके अगले वर्ष यानी 2028 में कुल नौ राज्यों के चुनावी दंगल प्रस्तावित हैं। इस सूची में मध्य प्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, मिजोरम, नागालैंड, मेघालय और त्रिपुरा शामिल हैं। एक साथ इतने बड़े भूभाग और अलग-अलग राजनीतिक समीकरणों वाले राज्यों में निष्पक्ष मतदान कराना आयोग के लिए बड़ा परीक्षण होगा। अपने कार्यकाल के अंतिम वर्ष यानी 2029 में भी ज्ञानेश कुमार के सामने आठ राज्यों के चुनाव कराने का कार्यक्रम रहेगा। इनमें जम्मू और कश्मीर, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। लंबा प्रशासनिक अनुभव और मौजूदा सियासी तनाव ज्ञानेश कुमार तीन दशक से भी अधिक समय, यानी 36 साल से ज्यादा वक्त तक भारतीय नौकरशाही के अहम पदों पर अपनी सेवाएं दे चुके हैं। चुनाव आयोग में आने से पूर्व वे राज्य प्रशासन के साथ-साथ केंद्र सरकार के कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों में शीर्ष स्तर पर कार्यरत रहे हैं। वर्तमान दौर में वे एसआईआर से जुड़े मामले को लेकर विपक्षी दलों की कड़ी आलोचना का सामना कर रहे हैं। हालांकि महाभियोग के गणित और संवैधानिक सुरक्षा चक्र के चलते उनके कार्यकाल पर तत्काल कोई कानूनी संकट नजर नहीं आता। इसका आप पर असर मुख्य चुनाव आयुक्त के संवैधानिक संरक्षण और लंबे कार्यकाल का सीधा असर देश की चुनावी प्रक्रियाओं और प्रशासनिक स्थिरता पर पड़ता है। • भारत में: देश में अगले चार वर्षों तक होने वाले 22 राज्यों के विधानसभा और राष्ट्रपति चुनाव इसी आयोग की देखरेख में संपन्न होंगे। नागरिकों के लिए इसका अर्थ है कि राजनीतिक विवादों के बावजूद संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पूर्व निर्धारित नियमों के तहत ही जारी रहेगी। • संसदीय राजनीति में: विपक्षी दलों के लिए महाभियोग प्रस्ताव पारित कराना संख्याबल के अभाव में संभव नहीं होगा। इससे चुनावी सुधारों या शिकायतों के समाधान हेतु राजनीतिक दलों को संसद और आयोग के बीच संवाद के कानूनी रास्ते ही अपनाने होंगे। • मतदाताओं के लिए: चुनावी कार्यक्रम और मतदाता सूचियों से जुड़ी प्रक्रियाएं बिना किसी रुकावट के अपने तय कैलेंडर के अनुसार चलेंगी। आम जनता को अपने मताधिकार और चुनावों के समयबद्ध आयोजन में किसी संस्थागत अस्थिरता का सामना नहीं करना पड़ेगा। • प्रशासनिक तंत्र पर: राज्य और केंद्र स्तर पर चुनाव मशीनरी तय समयावधि तक मौजूदा नेतृत्व के दिशा-निर्देशों में काम करेगी। इससे चुनावी सुरक्षा, आचार संहिता और मतदान प्रबंधन से जुड़े मानक लगातार लागू रहेंगे। ऐसा क्यों हुआ विपक्षी दलों की नाराजगी और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ लामबंदी एसआईआर के मुद्दे पर उपजे असंतोष के कारण तेज हुई है। संवैधानिक नियमों के तहत आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया असाधारण रूप से कठिन बनाई गई है ताकि संस्था स्वायत्त बनी रहे। • तात्कालिक विवाद: विपक्षी खेमा एसआईआर के मुद्दे को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहा है। इसी असंतोष के चलते दलों ने संयुक्त विरोध प्रदर्शन और इस्तीफे की सार्वजनिक मांग शुरू की है। • संवैधानिक ढाल: भारतीय संविधान ने मुख्य चुनाव आयुक्त को न्यायिक पद के समान महाभियोग की सुरक्षा प्रदान की है। इसका मकसद किसी भी राजनीतिक दल द्वारा चुनाव प्रमुख पर अनुचित दबाव बनाने या मनमाने तरीके से हटाने पर रोक लगाना है। • महाभियोग की पेचीदगी: पदमुक्त करने के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की अनिवार्य शर्त रखी गई है। इस संख्याबल की कमी के कारण विपक्ष अकेले दम पर यह प्रस्ताव पारित नहीं करा सकता, जिससे आयुक्त का पद सुरक्षित है। सवाल-जवाब 1. ज्ञानेश कुमार का मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में कार्यकाल कब तक है? ज्ञानेश कुमार का कार्यकाल जनवरी 2029 तक निर्धारित है, जिसके बाद वे सेवानिवृत्त होंगे। 2. क्या सुप्रीम कोर्ट या विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त को हटा सकता है? नहीं, भारतीय कानून के तहत न तो सुप्रीम कोर्ट और न ही विपक्ष अकेले उन्हें हटा सकता है; इसके लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत से महाभियोग जरूरी है। 3. ज्ञानेश कुमार ने मुख्य चुनाव आयुक्त का पदभार कब संभाला था? उन्होंने 19 फरवरी 2025 को मुख्य चुनाव आयुक्त का पदभार ग्रहण किया था। 4. अपने कार्यकाल में वे कितने राज्यों के विधानसभा चुनाव कराएंगे? वे अपने पूरे कार्यकाल के दौरान कम से कम 22 राज्यों के विधानसभा चुनाव और 2027 का राष्ट्रपति चुनाव कराएंगे। 5. वर्ष 2027 में किन प्रमुख राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं? वर्ष 2027 में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, पंजाब, मणिपुर, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव प्रस्तावित हैं। 6. चुनाव आयुक्त बनने से पहले उनका प्रशासनिक अनुभव कितना था? वे 36 साल से अधिक समय तक राज्य और केंद्र सरकार के विभिन्न उच्च पदों पर भारतीय नौकरशाही में सेवारत रहे हैं। https://trendkia.com/national/vipaksha-ke-virodha-ke-bicha-charcha-men-chief-election-commissioner-gyanesh-kumar-janen-kaba-taka-snbhalenge-pada-aura-kitani-chu-44305 TrendKia — Har trend, sabse pehle.