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  "type": "article",
  "title": "विशाखापत्तनम से सिंगापुर तक 1500 करोड़ रुपये का हवाला सिंडिकेट बेनकाब, दिल्ली और कोलकाता में तलाशी",
  "summary": "प्रवर्तन निदेशालय ने आंध्र प्रदेश, दिल्ली और कोलकाता से जुड़े 1,500 करोड़ रुपये के अंतरराष्ट्रीय मनी लॉन्ड्रिंग सिंडिकेट का भंडाफोड़ किया है। फर्जी सॉफ्टवेयर इनवॉइस और मुखौटा कंपनियों के जरिए सिंगापुर, हांगकांग और चीन में सैकड़ों करोड़ रुपये की हेराफेरी पकड़ी गई है।",
  "content": "अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैले एक जटिल हवाला और मनी लॉन्ड्रिंग सिंडिकेट पर प्रवर्तन निदेशालय ने बड़ा प्रहार किया है। इस संगठित रैकेट के तार आंध्र प्रदेश से शुरू होकर दिल्ली, कोलकाता और विदेशों में सिंगापुर, हांगकांग तथा चीन तक जुड़े पाए गए हैं। केंद्रीय जांच एजेंसी के विशाखापत्तनम उपक्षेत्रीय कार्यालय की टीमों ने धन शोधन निवारण अधिनियम के तहत दिल्ली और कोलकाता के सात अहम परिसरों में सघन तलाशी अभियान चलाया। जांचकर्ताओं के शुरुआती विश्लेषण में इस पूरे वित्तीय घोटाले का आकार लगभग 1,500 करोड़ रुपये आंका गया है।\n\nविशाखापत्तनम में दर्ज पुरानी प्राथमिकी से खुली परतें\nइस बहुस्तरीय वित्तीय नेटवर्क की जड़ें वर्ष 2017 के एक पुराने मामले से जुड़ी हैं। उस समय आयकर विभाग की ओर से दी गई औपचारिक शिकायत के बाद विशाखापत्तनम के एम.वी.पी. पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी संख्या 181/2017 दर्ज की गई थी। इस कानूनी कार्रवाई के केंद्र में मुख्य आरोपी वद्दी महेश और उसके कई करीबी सहयोगी थे। इसी पुलिस प्राथमिकी को आधार बनाकर जांच एजेंसी ने वित्तीय धांधली और अवैध विदेशी लेनदेन की कड़ियों को जोड़ना शुरू किया।\n\nनकली कंपनियों के जरिए 569 करोड़ रुपये का विदेशी प्रेषण\nजांच में खुलासा हुआ कि वद्दी महेश ने अपने पिता और अन्य साझेदारों के साथ मिलकर एक सुनियोजित साजिश रची। आरोपियों ने सबसे पहले जाली दस्तावेजों की मदद से कोलकाता के पतों पर कई कागजी मुखौटा कंपनियां पंजीकृत कराईं। इसके बाद अलग-अलग वाणिज्यिक बैंकों में इन कंपनियों के नाम से चालू खाते खोले गए। इन खातों के माध्यम से धड़ल्ले से भारी-भरकम विदेशी प्रेषण बाहर भेजा गया।\n\nबैंक रिकॉर्ड से स्पष्ट हुआ कि इन मुखौटा खातों से सिंगापुर, हांगकांग और चीन की पांच कंपनियों को कुल 569.03 करोड़ रुपये भेजे गए। बैंकों में यह दावा किया गया कि यह भारी रकम विशेष कस्टम सॉफ्टवेयर खरीदने के बदले दी जा रही है। आरोपियों ने भुगतान को जायज दिखाने के लिए विदेशी संस्थाओं के नाम से केवल जाली इनवॉइस बैंकों में जमा कराए, जबकि हकीकत में किसी भी प्रकार का कोई सॉफ्टवेयर भारत में आयात ही नहीं किया गया था। इस मामले की पड़ताल के दौरान जांच एजेंसी ने श्रावंथी समूह से जुड़ी वित्तीय कड़ियों पर भी कानूनी शिकंजा कसा।\n\nतस्करी सिंडिकेट और आदतन अपराधी भीमेंद्र कुमार गोयल की भूमिका\nवित्तीय लेनदेन की पड़ताल जैसे-जैसे आगे बढ़ी, इस पूरे प्रकरण में भीमेंद्र कुमार गोयल नामक एक बड़े खिलाड़ी की संलिप्तता उजागर हुई। जांच के अनुसार, गोयल कोई सामान्य कारोबारी नहीं बल्कि एक आदतन वित्तीय अपराधी है, जिसे विदेशी मुद्रा संरक्षण और तस्करी निवारण अधिनियम (COFEPOSA) के कड़े प्रावधानों के तहत पहले भी तीन बार हिरासत में लिया जा चुका है।\n\nगोयल नेपाल जाने वाले माल के लिए निर्धारित कस्टम्स ट्रांजिट डिक्लेरेशन व्यवस्था की खामियों का दुरुपयोग कर रहा था। वह भारत सरकार के लागू सीमा शुल्क की खुली चोरी करते हुए भारी मात्रा में सौंदर्य प्रसाधन सामग्री, आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स और कपड़े के थानों की भारत में बड़े पैमाने पर तस्करी कराता था। इस तस्करी से पैदा होने वाली भारी नकदी को सफेद बनाना और विदेशी सप्लायरों को गोपनीय तरीके से भुगतान पहुंचाना एक बड़ी चुनौती थी, जिसके लिए उसने वद्दी महेश के बैंकिंग नेटवर्क का सहारा लिया।\n\nफर्जी फर्मों और विदेशी खातों के जरिए लेयरिंग का खेल\nभीमेंद्र कुमार गोयल ने अपने साथी पवन कुमार राल्ली के साथ मिलकर नई दिल्ली में जाली नामों और काल्पनिक पतों पर मेसर्स महक ओवरसीज, मेसर्स करण ओवरसीज और मेसर्स गीत एंटरप्राइजेज नामक फर्जी व्यापारिक संस्थाएं खड़ी की थीं। तस्करी के माल की नकद बिक्री से जमा होने वाले काले धन को कानूनी रूप देने के लिए गोयल ने वद्दी महेश से हाथ मिलाया। वर्ष 2014 से 2017 की अवधि के दौरान इन फर्जी कंपनियों के बैंक खातों में मोटी रकम जमा कराई गई, जिसे गोयल के सीधे निर्देशों पर विदेशी संस्थाओं को ट्रांसफर किया गया।\n\nहवाला की यह रकम सीधे तौर पर सिंगापुर और हांगकांग में बनी उन निष्क्रिय अथवा नई कंपनियों में रखी गई, जिन्हें केवल कागजी तौर पर नाममात्र के निदेशकों द्वारा संचालित दिखाया जा रहा था। इसके बाद रकम को पूरी तरह वैध दिखाने के लिए उसे भीमेंद्र कुमार गोयल और उसके पारिवारिक सदस्यों द्वारा नियंत्रित कंपनियों, जैसे मेसर्स स्विफ्ट फॉक्स प्राइवेट लिमिटेड और मेसर्स भव टेक्नोलॉजी चाइना लिमिटेड के बैंक खातों में ट्रांसफर कर दिया गया। इस तरह विदेशी धरती पर धन के स्रोत को पूरी तरह मिटा दिया गया।\n\nतलाशी अभियान में नकदी, विदेशी मुद्रा और डिजिटल सबूत जब्त\nदिल्ली और कोलकाता में चलाए गए सात ठिकानों के इस संयुक्त तलाशी अभियान में जांच अधिकारियों को पुख्ता भौतिक और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य मिले हैं। मौके से 47 लाख रुपये से अधिक की अघोषित भारतीय मुद्रा बरामद की गई। इसके अतिरिक्त 5,900 अमेरिकी डॉलर, 2,200 संयुक्त अरब अमीरात दिरहम और 5,600 चीनी युआन की विदेशी मुद्रा भी जब्त की गई। टीमों ने भारी मात्रा में आपत्तिजनक बहीखाते, बेनामी संपत्तियों के दस्तावेज और डिजिटल उपकरण भी कब्जे में लिए हैं, जिनका उपयोग शेल नेटवर्क के जरिए रकम को घुमाने और उसकी लेयरिंग करने में किया जाता था।\n\nइसका आप पर असर\nइस बड़े वित्तीय खुलासे से देश की बैंकिंग और आयात-निर्यात निगरानी व्यवस्था में कई कड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।\n\n• भारत में: विदेशी मुद्रा नियमों और आयात इनवॉइस की बैंक स्तर पर जांच अधिक सख्त हो जाएगी। आम व्यापारियों और आयातकों को सॉफ्टवेयर या सेवाओं के विदेशी भुगतान के लिए अतिरिक्त सत्यापन दस्तावेज पेश करने होंगे।\n• आंध्र प्रदेश में: विशाखापत्तनम और आसपास के क्षेत्रों में मुखौटा कंपनियों और संदिग्ध प्रेषणों पर वित्तीय एजेंसियों की विशेष नजर रहेगी। स्थानीय बैंक शाखाओं में बड़े विदेशी ट्रांजैक्शन की ऑडिटिंग तेज कर दी जाएगी।\n• आयातकों और व्यापारिक संस्थाओं पर: कस्टम्स ट्रांजिट डिक्लेरेशन और सीमा शुल्क छूट का इस्तेमाल करने वाले आयातकों की स्क्रूटनी बढ़ेगी। व्यापारिक लेन-देन में पारदर्शी दस्तावेज नहीं होने पर बैंक खातों के फ्रीज होने का जोखिम बना रहेगा।\n• वित्तीय सुरक्षा और राजस्व: सीमा शुल्क चोरी और हवाला लेनदेन पर रोक लगने से सरकारी खजाने को राजस्व की होने वाली चपत पर लगाम लगेगी। अवैध तरीकों से विदेशों में पैसे भेजने वाले सिंडिकेट्स पर कानूनी शिकंजा और कड़ा होगा।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट कस्टम्स छूट के दुरुपयोग और जाली इनवॉइस के जरिए बड़े पैमाने पर टैक्स चोरी और काले धन को सफेद करने के लिए तैयार किया गया था।\n\n• तस्करी और सीमा शुल्क चोरी: भीमेंद्र कुमार गोयल ने नेपाल जाने वाले माल के लिए बने कस्टम्स ट्रांजिट डिक्लेरेशन नियमों की खामियों का फायदा उठाकर महंगे इलेक्ट्रॉनिक्स, कॉस्मेटिक्स और कपड़ों की भारत में बिना टैक्स चुकाए तस्करी की। इस तस्करी से पैदा हुई भारी नकदी को विदेशी सप्लायरों तक पहुंचाने के लिए हवाला रूट की जरूरत पड़ी।\n• कागजी कंपनियों और फर्जी बिलों का सहारा: वद्दी महेश और उसके सहयोगियों ने कोलकाता में मुखौटा कंपनियां बनाकर चालू खाते खोले। इन खातों से किसी वास्तविक उत्पाद के आयात के बिना केवल फर्जी सॉफ्टवेयर बिल दिखाकर 569 करोड़ रुपये सिंगापुर, हांगकांग और चीन भेजे गए।\n• अवैध धन की विदेशी लेयरिंग: तस्करी के पैसे को वैध दिखाने के लिए विदेशों में डमी निदेशकों वाली निष्क्रिय कंपनियों का इस्तेमाल किया गया। वहां से पैसे को गोयल और उसके परिवार से जुड़ी वैध दिखने वाली विदेशी कंपनियों में ट्रांसफर कर मनी लॉन्ड्रिंग का चक्र पूरा किया गया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. इस पूरे मामले में कितने रुपये के घोटाले का अनुमान है?\nप्रवर्तन निदेशालय की प्रारंभिक जांच में इस पूरे मनी लॉन्ड्रिंग और हवाला घोटाले की कुल राशि लगभग 1,500 करोड़ रुपये आंकी गई है।\n\n2. तलाशी अभियान किन शहरों में चलाया गया?\nप्रवर्तन निदेशालय के विशाखापत्तनम उपक्षेत्रीय कार्यालय ने दिल्ली और कोलकाता के सात प्रमुख परिसरों में यह तलाशी अभियान चलाया।\n\n3. विदेशों में किस बहाने से 569 करोड़ रुपये भेजे गए थे?\nआरोपियों ने फर्जी इनवॉइस जमा कर कस्टम सॉफ्टवेयर आयात करने के नाम पर सिंगापुर, हांगकांग और चीन की कंपनियों को 569.03 करोड़ रुपये भेजे, जबकि कोई सॉफ्टवेयर आयात नहीं हुआ था।\n\n4. भीमेंद्र कुमार गोयल पर पहले से क्या आरोप हैं?\nभीमेंद्र कुमार गोयल एक आदतन अपराधी है जिसे विदेशी मुद्रा संरक्षण और तस्करी निवारण अधिनियम (COFEPOSA) के तहत पहले भी तीन बार हिरासत में लिया जा चुका है।\n\n5. तलाशी के दौरान जांच एजेंसी को क्या बरामद हुआ?\nतलाशी में 47 लाख रुपये से अधिक की बेहिसाब नकदी, 5,900 अमेरिकी डॉलर, 2,200 यूएई दिरहम, 5,600 चीनी युआन और आपत्तिजनक दस्तावेज तथा डिजिटल उपकरण जब्त किए गए हैं।",
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  "publishedAt": "2026-11-02",
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  "whyItHappened": "यह अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट कस्टम्स छूट के दुरुपयोग और जाली इनवॉइस के जरिए बड़े पैमाने पर टैक्स चोरी और काले धन को सफेद करने के लिए तैयार किया गया था।\n\n• तस्करी और सीमा शुल्क चोरी: भीमेंद्र कुमार गोयल ने नेपाल जाने वाले माल के लिए बने कस्टम्स ट्रांजिट डिक्लेरेशन नियमों की खामियों का फायदा उठाकर महंगे इलेक्ट्रॉनिक्स, कॉस्मेटिक्स और कपड़ों की भारत में बिना टैक्स चुकाए तस्करी की। इस तस्करी से पैदा हुई भारी नकदी को विदेशी सप्लायरों तक पहुंचाने के लिए हवाला रूट की जरूरत पड़ी।\n• कागजी कंपनियों और फर्जी बिलों का सहारा: वद्दी महेश और उसके सहयोगियों ने कोलकाता में मुखौटा कंपनियां बनाकर चालू खाते खोले। इन खातों से किसी वास्तविक उत्पाद के आयात के बिना केवल फर्जी सॉफ्टवेयर बिल दिखाकर 569 करोड़ रुपये सिंगापुर, हांगकांग और चीन भेजे गए।\n• अवैध धन की विदेशी लेयरिंग: तस्करी के पैसे को वैध दिखाने के लिए विदेशों में डमी निदेशकों वाली निष्क्रिय कंपनियों का इस्तेमाल किया गया। वहां से पैसे को गोयल और उसके परिवार से जुड़ी वैध दिखने वाली विदेशी कंपनियों में ट्रांसफर कर मनी लॉन्ड्रिंग का चक्र पूरा किया गया।",
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