विशेष गहन पुनरीक्षण पर शीर्ष अदालत अपने आदेश की समीक्षा करे, वी. गोपाल गौड़ा ने उठाया सवाल पूर्व न्यायाधीश वी. गोपाल गौड़ा ने निर्वाचन आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया को बरकरार रखने वाले अदालती आदेश को वापस लेने की मांग उठाई है। निर्वाचन आयोग द्वारा संचालित विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर चल रही कानूनी व राजनीतिक खींचतान के बीच एक नया रुख सामने आया है। शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश वी. गोपाल गौड़ा ने निर्वाचन आयोग की इस कवायद को वैध ठहराने वाले अदालती आदेश को वापस लेने का आग्रह किया है। उनके अनुसार, यह समूची प्रक्रिया पूरी तरह से असंवैधानिक, गैर-कानूनी और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विपरीत है। अदालत में इस कवायद को निरस्त करने के लिए पहले से ही कई याचिकाएं लंबित हैं, जिन पर आने वाले समय में सुनवाई होनी है। प्रक्रियात्मक सहमति और आधिकारिक रिकॉर्ड की जांच की मांग बृहस्पतिवार, 8 अक्टूबर 2026 को दिए गए अपने बयान में वी. गोपाल गौड़ा ने कहा कि उच्चतम न्यायालय को निर्वाचन आयोग के पास मौजूद सभी आंतरिक फाइलों और मूल दस्तावेजों को अपने पास तलब करना चाहिए। उनका तर्क है कि इन कागजातों के परीक्षण से ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि एसआईआर को लागू करने का संकल्प दोनों निर्वाचन आयुक्तों की औपचारिक मंजूरी और सहमति से पारित हुआ था अथवा नहीं। प्रक्रियागत पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने इस न्यायिक जांच को अत्यंत अनिवार्य करार दिया। सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के बयान और विपक्ष का विरोध प्रदर्शन यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब ठीक उसी दिन 42 सेवानिवृत्त जजों के एक समूह ने एसआईआर के समर्थन में बयान जारी किया था। उस समूह ने इसे पूरी तरह से विधि सम्मत और नियमित कानूनी प्रक्रिया निरूपित किया था। दूसरी ओर, कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दल इस मसले पर लगातार आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं। विपक्षी खेमा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग तक उठा रहा है और इस बाबत न्यायिक हस्तक्षेप की गुहार भी लगा चुका है। बेंगलुरु में कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) की ओर से मतदाता सूची से नाम काटे जाने के विरोध में एक प्रदर्शन का आयोजन किया गया था। इस सभा को संबोधित करते हुए पूर्व जज ने 27 मई को आए फैसले का हवाला दिया और कहा, “एसआईआर की संवैधानिक वैधता को सही ठहराने वाला उच्चतम न्यायालय का 27 मई का फैसला गैर-कानूनी और अलोकतांत्रिक है, जिसे तुरंत रद्द किया जाना चाहिए।” न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां के रुख का समर्थन शीर्ष अदालत के मौजूदा न्यायाधीश उज्जल भुइयां ने हाल ही में बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने पर सख्त आपत्ति जताई थी। न्यायमूर्ति भुइयां ने रविवार को कहा था कि लाखों नागरिकों को उनके वोट देने के अधिकार से बेदखल करने वाला कोई भी प्रशासनिक कदम हमारे संविधान के मूलभूत ढांचे के खिलाफ है। पूर्व जज वी. गोपाल गौड़ा ने न्यायमूर्ति भुइयां की इस टिप्पणी का पूरी तरह समर्थन किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि नागरिकों को मताधिकार से वंचित किए जाने जैसी गंभीर विसंगति पर सवाल खड़ा करके मौजूदा न्यायाधीश ने किसी भी तरह की न्यायिक मर्यादा या आचार संहिता का उल्लंघन नहीं किया है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की है। इसका आप पर असर मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण पर उठे विवाद और कानूनी चुनौतियों का सीधा असर नागरिकों के वोट देने के अधिकार और चुनावी प्रक्रिया पर पड़ता है। • राष्ट्रीय स्तर पर: निर्वाचन आयोग की मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया पर अदालती फैसले से पूरे देश में सूची से नाम जुड़ने और कटने के नियम प्रभावित होंगे। नागरिकों को चुनाव से पहले मतदाता सूची में अपना नाम सत्यापित करने के लिए सजग रहना होगा। • बेंगलुरु में: स्थानीय स्तर पर राजनीतिक दलों के विरोध प्रदर्शनों के बीच मतदाताओं के लिए अपने नाम की जांच करना जरूरी हो गया है। हालिया पुनरीक्षण में हटाए गए नामों की जांच के लिए स्थानीय निर्वाचन कार्यालयों में दावों और आपत्तियों का दायरा बढ़ सकता है। • मतदाताओं की सक्रियता: अपने मताधिकार की सुरक्षा के लिए नागरिकों को समय रहते चुनाव आयोग के पोर्टल पर पंजीकरण स्थिति देखनी होगी। किसी भी त्रुटि या नाम कटने की स्थिति में समय रहते सुधार हेतु आवेदन करना आवश्यक होगा। • प्रशासनिक जवाबदेही: निर्वाचन आयोग पर दोनों आयुक्तों की औपचारिक सहमति और दस्तावेजों के खुलासे का दबाव बढ़ेगा। इससे भविष्य में मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और कड़ी हो सकती है। ऐसा क्यों हुआ यह विवाद निर्वाचन आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण के तहत लाखों मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने के आरोपों और शीर्ष अदालत के पुराने आदेश के बाद उपजा है। • अदालती फैसले को चुनौती: उच्चतम न्यायालय ने 27 मई को दिए अपने फैसले में निर्वाचन आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया था। याचिकाकर्ताओं और पूर्व न्यायाधीश वी. गोपाल गौड़ा का तर्क है कि यह निर्णय जमीनी स्तर पर नागरिकों के अधिकारों का हनन करता है। • प्रक्रियागत सहमति का अभाव: पूर्व न्यायाधीश का आरोप है कि निर्वाचन आयोग द्वारा यह फैसला दोनों निर्वाचन आयुक्तों की उचित सहमति से नहीं लिया गया था। इसी वजह से आयोग के सभी मूल रिकॉर्ड मंगाकर न्यायिक समीक्षा की मांग उठाई जा रही है। • न्यायिक और राजनीतिक मतभेद: जहां 42 सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने प्रक्रिया का समर्थन किया है, वहीं विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। इसके अलावा मौजूदा जज न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां द्वारा लाखों नागरिकों के मताधिकार छिनने पर जताई गई चिंता ने इस बहस को और तेज कर दिया है। सवाल-जवाब 1. पूर्व जज वी. गोपाल गौड़ा ने उच्चतम न्यायालय से क्या मांग की है? उन्होंने शीर्ष अदालत से निर्वाचन आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को वैध ठहराने वाले 27 मई के फैसले को वापस लेने और आयोग के सभी दस्तावेज तलब करने की मांग की है। 2. पूर्व न्यायाधीश ने एसआईआर प्रक्रिया को लेकर क्या आरोप लगाए हैं? उनका कहना है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह से गैर-कानूनी, असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक है, जिससे बड़े पैमाने पर लोगों का मताधिकार प्रभावित हुआ है। 3. 42 सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के समूह का इस मामले पर क्या रुख था? 42 सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के समूह ने विशेष गहन पुनरीक्षण का बचाव करते हुए इसे पूरी तरह से एक कानूनी प्रक्रिया बताया था। 4. न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां ने इस मुद्दे पर क्या टिप्पणी की थी? न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां ने कहा था कि लाखों नागरिकों को उनके मताधिकार से वंचित करने वाली कोई भी कवायद संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ है। 5. विपक्षी दल निर्वाचन आयोग को लेकर क्या मांग कर रहे हैं? कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की हैं। https://trendkia.com/national/vishesha-gahana-punarikshana-para-shirsha-adalata-apane-adesha-ki-samiksha-kare-v-gopala-gowda-ne-uthaya-savala-45039 TrendKia — Har trend, sabse pehle.