# वोटर लिस्ट के नियमों में कथित मनमानी पर सुप्रीम कोर्ट पहुंची अर्जी, मुख्य चुनाव आयुक्त पर कानूनी कार्रवाई की मांग

> सुप्रीम कोर्ट में दायर एक नई याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और वरिष्ठ अधिकारियों पर मतदाता सूची संशोधन नियमों के कथित उल्लंघन को लेकर मामला चलाने और बिना बहुमत के लिए गए फैसलों को निरस्त करने की अपील की गई है।

**Type:** article · **Category:** भारत · **Published:** 2026-09-25 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/national/votara-lista-ke-niyamon-men-kathita-manamani-para-supreme-court-pahunchi-arji-mukhya-chunava-ayukta-para-kanuni-karravai-ki-manga-38403 · **Language:** Hindi
**Tags:** चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट, ज्ञानेश कुमार, मतदाता सूची, निर्वाचन आयुक्त

निर्वाचन आयोग के शीर्ष स्तर पर उभरे कथित मतभेदों का मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट पर पहुंच चुका है। सर्वोच्च न्यायालय में एक नई रिट अर्जी दाखिल कर मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ कानूनी कार्यवाही शुरू करने की गुहार लगाई गई है। इस अर्जी में मुख्य रूप से यह आरोप लगाया गया है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़ी वैधानिक जिम्मेदारियों और प्रक्रियागत नियमों की अनदेखी की गई है। हालिया समय में चुनाव आयोग के आंतरिक कामकाज को लेकर सामने आई विभिन्न बातों के बाद यह कानूनी कदम उठाया गया है, जिसने चुनावी तंत्र से जुड़े प्रशासनिक निर्णयों को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।

## संवैधानिक प्रावधानों के तहत दायर की गई याचिका
अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने संविधान के अनुच्छेद 32 का सहारा लेते हुए यह याचिका शीर्ष अदालत में पेश की है। अर्जी में दलील दी गई है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण कार्यों के संचालन के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अपने कानूनी और आधिकारिक दायित्वों का कथित रूप से उल्लंघन किया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि पूर्ण आयोग की औपचारिक अनुमति अथवा दोनों अन्य निर्वाचन आयुक्तों की साझा सहमति के बिना कई प्रशासनिक दिशा-निर्देश तय किए गए, तकनीकी प्रणालियों में बदलाव किए गए और नीतियां लागू की गईं। अदालत से प्रार्थना की गई है कि ऐसे तमाम कदमों और सॉफ्टवेयर परिवर्तनों को अधिकार क्षेत्र से बाहर मानते हुए पूरी तरह अमान्य व असंवैधानिक घोषित किया जाए।

सर्वोच्च न्यायालय में यह कानूनी पहल उन खुलासों के बाद सामने आई है, जिनमें दावा किया गया था कि निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी ने विशेष पुनरीक्षण से जुड़े विभिन्न नीतिगत फैसलों पर कम से कम 14 अलग-अलग अवसरों पर अपनी असहमति और आपत्तियां रिकॉर्ड कराई थीं। इन आपत्तियों में नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े फॉर्म 6 के प्रारूप में बदलाव करने और मतदाता सूची के डाटा प्रबंधन की व्यवस्था को लेकर उठाए गए कदम प्रमुख रूप से शामिल थे। बताया गया है कि इनमें से कुछ निर्णय कथित तौर पर दोनों आयुक्तों को पूर्व जानकारी दिए बगैर अथवा उनके द्वारा दी गई प्रशासनिक सिफारिशों के विपरीत जाकर आगे बढ़ाए गए थे।

## जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत अभियोजन का अनुरोध
याचिकाकर्ता ने अदालत से विशेष तौर पर यह निर्देश जारी करने का अनुरोध किया है कि अधिकृत अधिकारी विधिवत शिकायत दर्ज कराएं। इसके अंतर्गत लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 के नियम संख्या 32 के तहत मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार, वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग, आईटी महानिदेशक सीमा खन्ना और अपने आधिकारिक कर्तव्यों के कथित उल्लंघन में शामिल पाए जाने वाले अन्य संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कानूनी मुकदमा शुरू करने की मांग रखी गई है। उल्लेखनीय है कि यह वैधानिक धारा मतदाता सूची को तैयार करने, उसमें संशोधन करने या सुधार से जुड़े सरकारी कर्तव्यों की जानबूझकर अवहेलना करने पर दंडात्मक कार्रवाई का अधिकार देती है।

दायर अर्जी में कई विशिष्ट प्रशासनिक कदमों को चुनौती दी गई है। इनमें फॉर्म 6 के मौजूदा स्वरूप में कथित तौर पर अनधिकृत फेरबदल करना, मतदाता सूची के डेटाबेस को एक जगह केंद्रीकृत करना और ईसीआईनेट प्रणाली के माध्यम से पात्र वोटरों के नाम बहाल करने में विफलता जैसे बिंदु शामिल हैं। इसके अलावा पश्चिम बंगाल में निर्वाचन आयोग की ओर से मतदाताओं के नाम जोड़ने की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली 16.10 लाख अपीलों के दायर किए जाने के कदम पर भी सवाल उठाए गए हैं और इसे गंभीर प्रक्रियागत चूक बताया गया है।

## बहुमत के सिद्धांत की अनदेखी का आरोप
अदालत से यह भी आग्रह किया गया है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त के कार्यकाल में पूर्ण सहमति के अभाव में लिए गए तमाम निर्देशों, जारी आदेशों और तकनीकी सॉफ्टवेयर संशोधनों को आरंभ से ही निष्प्रभावी घोषित किया जाए। याचिका में रेखांकित किया गया है कि जिन विषयों पर निर्वाचन आयुक्तों के बहुमत की राय भिन्न थी, उन पर लिए गए एकतरफा फैसलों को पूरी तरह से रद्द किया जाना बेहद जरूरी है ताकि संस्थागत शुचिता कायम रह सके।

अपनी इन मांगों के समर्थन में याचिकाकर्ता ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 का संदर्भ प्रस्तुत किया है। यह कानूनी प्रावधान स्पष्ट करता है कि यदि मुख्य आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों के बीच किसी नीतिगत विषय पर मतभिन्नता की स्थिति उत्पन्न होती है, तो अंतिम फैसला अनिवार्य रूप से बहुमत के दृष्टिकोण के आधार पर ही तय होना चाहिए। याचिका में दर्ज विवरण के अनुसार, मई 2026 में निर्वाचन आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने फॉर्म 6 में संशोधन के कदम पर अपनी औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई थी, जिसके बाद यह पूरा प्रशासनिक गतिरोध सार्वजनिक पटल पर आ गया।

## इसका आप पर असर
इस अदालती कार्यवाही और चुनाव आयोग के आंतरिक विवाद का सीधा प्रभाव देश की मतदाता सूची की पारदर्शिता और चुनावी व्यवस्था पर पड़ सकता है।

- **राष्ट्रीय स्तर पर:** मतदाता सूची में नाम जुड़वाने और संशोधन कराने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 तथा तकनीकी नियमों पर न्यायिक समीक्षा हो सकती है। अगर अदालत इन बदलावों पर रोक लगाती है तो नए पंजीकरण और सत्यापन के दिशा-निर्देशों में बदलाव संभव है।
- **पश्चिम बंगाल में:** राज्य में मतदाता सूची में शामिल नामों के खिलाफ आयोग के नाम पर दायर 16.10 लाख अपीलों की वैधता पर सवाल उठ सकते हैं। इससे वहां के हजारों मतदाताओं के नाम की जांच और सत्यापन प्रक्रिया पर सीधा असर पड़ सकता है।
- **संस्थागत जवाबदेही:** चुनाव आयोग के भीतर बहुमत के आधार पर निर्णय लेने की कानूनी बाध्यता को लेकर स्थिति और स्पष्ट होगी। अधिकारियों के खिलाफ वैधानिक कर्तव्यों के उल्लंघन के मामले में सख्त मानक तय हो सकते हैं।
- **नागरिकों के अधिकार:** ईसीआईनेट प्रणाली के माध्यम से योग्य नागरिकों के नाम मतदाता सूची में बहाल करने की व्यवस्था में सुधार की संभावना बनेगी। इससे पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से कटने या रोके जाने की शिकायतों पर रोक लगेगी।

## ऐसा क्यों हुआ
यह कानूनी विवाद निर्वाचन आयोग के शीर्ष नेतृत्व में मतदाता सूची संशोधन प्रक्रियाओं और एकतरफा निर्णय लेने के तौर-तरीकों को लेकर उपजे गंभीर मतभेदों के कारण उत्पन्न हुआ है।

- **मतदाता सूची में बदलाव:** विशेष गहन पुनरीक्षण के तहत फॉर्म 6 के प्रारूप और डेटाबेस प्रबंधन में बदलाव अन्य दो चुनाव आयुक्तों की पूर्ण सहमति के बिना किए जाने के आरोप लगे। इसके चलते आयोग के आंतरिक संवाद में कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराई गईं।
- **बहुमत के नियम की अनदेखी:** कानूनन चुनाव आयोग में किसी भी नीतिगत असहमति की स्थिति में फैसला बहुमत के आधार पर होना अनिवार्य है। आरोप है कि दोनों चुनाव आयुक्तों की सिफारिशों और आपत्तियों को दरकिनार कर प्रशासनिक फैसले लागू किए गए।
- **अदालती दखल की मांग:** आंतरिक स्तर पर सुलझने के बजाय जब यह प्रशासनिक मतभेद सार्वजनिक पटल पर आया, तो अधिवक्ता द्वारा लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 32 और अनुच्छेद 32 के तहत आपराधिक व संवैधानिक जवाबदेही तय करने हेतु अर्जी दी गई।

## सवाल-जवाब

### 1. सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका किसने और किस प्रावधान के तहत दायर की है?
यह याचिका अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की है।

### 2. याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ किस कानून के तहत कार्रवाई की मांग की गई है?
याचिका में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 32 के तहत आपराधिक मुकदमा चलाने की मांग की गई है।

### 3. मुख्य चुनाव आयुक्त के अलावा किन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग है?
याचिका में वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग और आईटी महानिदेशक सीमा खन्ना के खिलाफ भी कार्यवाही की मांग की गई है।

### 4. दोनों चुनाव आयुक्तों ने कितनी बार आपत्तियां दर्ज कराई थीं?
चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने विशेष पुनरीक्षण से जुड़े फैसलों पर कम से कम 14 मौकों पर आपत्तियां दर्ज की थीं।

### 5. याचिका में चुनाव आयोग के किस नियम का हवाला देकर फैसलों को रद्द करने की मांग की गई है?
याचिकाकर्ता ने 2023 के अधिनियम की धारा 18 का हवाला दिया है, जिसके अनुसार मतभेद की स्थिति में फैसला बहुमत से होना चाहिए।

### 6. पश्चिम बंगाल से जुड़ा कौन सा मुद्दा याचिका में उठाया गया है?
याचिका में पश्चिम बंगाल में वोटरों को शामिल करने के खिलाफ आयोग के नाम पर 16.10 लाख अपीलें दायर करने के कदम को चुनौती दी गई है।

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