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  "type": "article",
  "title": "वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने के नियमों में बदलाव, कई राज्यों में फॉर्म-6 से हटी एसआईआर घोषणा",
  "summary": "चुनाव आयोग ने उन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में फॉर्म-6 से एसआईआर से जुड़ा अतिरिक्त घोषणा पत्र हटा दिया है जहां स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन पूरा हो चुका है। अब इन क्षेत्रों में नए मतदाताओं को सिर्फ 1960 के नियमों के तहत तय मूल फॉर्म ही भरना होगा।",
  "content": "मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने की प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग ने एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम उठाया है। नए मतदाताओं द्वारा भरे जाने वाले फॉर्म-6 के साथ जुड़े विशेष गहन संशोधन यानी एसआईआर (SIR) संबंधी अतिरिक्त घोषणा पत्र को अब उन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से हटा दिया गया है, जहां यह संशोधन प्रक्रिया पूरी की जा चुकी है। बुधवार रात तक आयोग के आधिकारिक डिजिटल प्लेटफॉर्म ईसीआईनेट पोर्टल और संबंधित राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की आधिकारिक वेबसाइटों पर यह तकनीकी बदलाव प्रभावी रूप से दिखने लगा। इसके तहत अब संबंधित क्षेत्रों के नए आवेदकों को केवल वही मानक फॉर्म-6 भरना पड़ेगा, जिसे मतदाता पंजीकरण नियम 1960 के तहत कानूनी रूप से निर्धारित किया गया है।\n\nहालांकि, यह व्यवस्था पूरे देश में एक समान रूप से लागू नहीं की गई है। जिन राज्यों में अभी भी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की कवायद जारी है, वहां नए मतदाताओं के ऑनलाइन आवेदन में यह अतिरिक्त घोषणा पत्र पहले की तरह ही दिखाई दे रहा है। व्यवस्था में आए इस चुनिंदा बदलाव के बाद निर्वाचन प्रणाली के भीतर इस बात को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है कि आखिर डिजिटल फॉर्म में शामिल इस व्यवस्था को कुछ राज्यों से वापस क्यों लिया गया और इसका 26 सितंबर को आयोजित पूर्ण चुनाव आयोग की अहम बैठक से क्या सीधा ताल्लुक है।\n\nऑनलाइन आवेदन में एसआईआर घोषणा पत्र जुड़ने की पृष्ठभूमि\nमतदाता सूची के फॉर्म-6 को लेकर शुरू हुआ यह पूरा मामला उस समय चर्चा के केंद्र में आया, जब डिजिटल पोर्टल पर नए पंजीकरण फॉर्म के साथ एसआईआर का एक अतिरिक्त खंड अनिवार्य रूप से जोड़ दिया गया था। इस नए खंड के माध्यम से पहली बार नाम जुड़वाने वाले आवेदकों से यह ब्योरा मांगा जा रहा था कि क्या उनका स्वयं का नाम, अथवा उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली बार संपन्न हुई एसआईआर प्रक्रिया की मतदाता सूची में दर्ज था या नहीं। यदि आवेदक का उनके पूर्वजों के नाम का पिछला रिकॉर्ड मौजूद था, तो उन्हें उससे संबंधित मतदान केंद्र (बूथ) और क्रम संख्या की पूरी जानकारी भी फॉर्म में दर्ज करने को कहा जा रहा था।\n\nइस अतिरिक्त व्यवस्था के लागू होने के बाद निर्वाचन आयोग के शीर्ष स्तर पर कानूनी और प्रक्रियात्मक सवाल उठने लगे। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से इस नए प्रारूप पर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई गईं। दोनों आयुक्तों ने सवाल उठाया कि जब मतदाता पंजीकरण नियम 1960 के तहत फॉर्म का एक कानूनी ढांचा पहले से तय है, तो फिर नियमों में औपचारिक संशोधन किए बिना डिजिटल स्तर पर ऐसा कोई अतिरिक्त प्रारूप कैसे जोड़ा जा सकता है। इसके बाद सुखबीर सिंह संधू ने ऑनलाइन फॉर्म में जोड़े गए इस नए हिस्से को अनधिकृत और गैरकानूनी करार देते हुए इसे तत्काल प्रभाव से हटाने की पुरजोर मांग रखी थी।\n\nआयोग का पक्ष और न्यायिक संदर्भ\nविवाद गहराने के बीच चुनाव आयोग ने इस मामले पर अपना आधिकारिक दृष्टिकोण सार्वजनिक किया था। आयोग का स्पष्ट कहना रहा कि मूल फॉर्म-6 में किसी भी तरह का संशोधन या फेरबदल नहीं किया गया था। आयोग के अनुसार, स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की विशेष प्रक्रिया के संचालन के लिए एक अतिरिक्त घोषणा पत्र की तकनीकी आवश्यकता थी, इसीलिए इसे ऑनलाइन आवेदन की प्रक्रिया के साथ एक पूरक दस्तावेज के रूप में जोड़ा गया था।\n\nअपने रुख के समर्थन में आयोग ने न्यायिक नजीर का भी हवाला दिया था। आयोग ने स्पष्ट किया कि बिहार में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन को लेकर उच्च न्यायालय के एक फैसले में भी इस तरह के अतिरिक्त घोषणा पत्र को कानूनी रूप से बरकरार रखा गया था। आयोग का तर्क था कि यह आम मतदाता पंजीकरण फॉर्म में कोई स्थायी बदलाव नहीं था, बल्कि केवल एसआईआर अभियान की तात्कालिक प्रशासनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए बनाया गया एक पूरक तंत्र था।\n\n26 सितंबर की बैठक और आयोग का आधिकारिक रुख\nडिजिटल पोर्टल पर दिखाई देने वाला यह ताजा बदलाव 26 सितंबर को आयोजित मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की पूर्ण आयोग बैठक के ठीक बाद सामने आया है। इस उच्चस्तरीय बैठक के समापन पर आयोग ने स्पष्ट किया था कि फॉर्म-6 के साथ नत्थी अतिरिक्त घोषणा पत्र केवल एसआईआर अवधि के लिए ही सीमित था। आयोग ने तय किया कि जिस क्षेत्र में एसआईआर नहीं चल रहा होगा, वहां गैर-एसआईआर अवधि के दौरान केवल मतदाता पंजीकरण नियम 1960 के तहत अधिसूचित मूल फॉर्म का ही उपयोग किया जाएगा।\n\nउस पूर्ण बैठक के निर्णय के महज चार दिन बाद उन तमाम राज्यों में ईसीआईनेट पोर्टल और स्थानीय मुख्य निर्वाचन अधिकारी के ऑनलाइन पोर्टल से यह अतिरिक्त घोषणा पत्र पूरी तरह हटा दिया गया, जहां संशोधन कार्य संपन्न हो चुका था। इससे पूर्व पिछले 10 महीनों के दौरान स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन से जुड़े प्रशासनिक निर्णयों और आदेशों पर आंतरिक आपत्तियों की बातें सामने आई थीं। हालांकि, आयोग ने 26 सितंबर के अपने बयान में यह रेखांकित किया था कि एसआईआर से जुड़े सभी आदेशों को तीनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मत मंजूरी प्राप्त थी।\n\nवर्तमान स्थिति और मतदाताओं के लिए प्रक्रिया\nवर्तमान व्यवस्था के तहत देश के राज्यों को दो अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित करके देखा जा रहा है। जिन राज्यों में एसआईआर की समयावधि पूरी हो चुकी है, वहां नए मतदाताओं के लिए फॉर्म-6 अब अपने सरल और मूल वैधानिक स्वरूप में उपलब्ध है। वहां के नागरिकों को पुराने पारिवारिक रिकॉर्ड, पिछले बूथ नंबर या क्रम संख्या जैसी जटिल अतिरिक्त जानकारियां दर्ज करने की बाध्यता से पूरी तरह मुक्त कर दिया गया है।\n\nइसके विपरीत, जिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की प्रक्रिया अभी धरातल पर चल रही है, वहां नए आवेदकों को ऑनलाइन फॉर्म भरते समय अभी भी यह घोषणा पत्र भरना पड़ रहा है। ऐसे क्षेत्रों में आवेदकों को अपने या अपने परिजनों के पुराने एसआईआर रिकॉर्ड से जुड़े विवरण साझा करने होते हैं। आयोग की ताजा कार्रवाई को 26 सितंबर की पूर्ण बैठक में तय की गई व्यवस्था के क्रमिक क्रियान्वयन के रूप में देखा जा रहा है, जिससे स्पष्ट है कि जैसे-जैसे अन्य राज्यों में भी एसआईआर का काम पूरा होगा, वहां से भी इस अतिरिक्त घोषणा पत्र को हटा लिया जाएगा।\n\nइसका आप पर असर\nमतदाता सूची में नाम जुड़वाने जा रहे नागरिकों के लिए यह निर्णय ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया को बेहद आसान और तेज बनाता है।\n\n• दस्तावेजी राहत: जिन राज्यों में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन पूरा हो चुका है, वहां नए मतदाताओं को अब अपने माता-पिता या दादा-दादी के पुराने एसआईआर रिकॉर्ड खोजने की जरूरत नहीं होगी। इससे आवेदन प्रक्रिया में लगने वाला समय काफी घटेगा और पुराने दस्तावेज न मिलने पर फॉर्म अटकने का जोखिम खत्म होगा।\n• सरल फॉर्म भरना: ईसीआईनेट पोर्टल और राज्य निर्वाचन आयोग की वेबसाइटों पर अब केवल मतदाता पंजीकरण नियम 1960 का मूल फॉर्म-6 ही भरना होगा। युवाओं और नए मतदाताओं को पुराने बूथ नंबर या क्रम संख्या की खोजबीन किए बिना सीधे अपनी व्यक्तिगत जानकारी दर्ज करने की सुविधा मिलेगी।\n• एसआईआर वाले राज्यों के लिए नियम: जिन राज्यों में अभी भी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की प्रक्रिया जारी है, वहां नए आवेदकों को अभी भी यह अतिरिक्त घोषणा पत्र भरना पड़ेगा। उन क्षेत्रों के नागरिकों को अपने आवेदन के साथ पूर्वजों के मतदाता रिकॉर्ड का ब्योरा अभी भी साझा करना होगा।\n• प्रशासनिक स्पष्टता: चुनाव आयोग के इस कदम से नए वोटर कार्ड बनने की गति तेज होगी और फॉर्म में तकनीकी खामियों के कारण होने वाले निरस्तीकरण में कमी आएगी। नागरिक अब बिना किसी अतिरिक्त कानूनी असमंजस के सीधे मानक प्रारूप पर अपना पंजीकरण करा सकते हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nचुनाव आयोग द्वारा फॉर्म-6 से अतिरिक्त घोषणा पत्र हटाने का निर्णय प्रशासनिक विवाद और 26 सितंबर की पूर्ण आयोग बैठक में बनी सहमति के बाद लिया गया है।\n\n• कानूनी और प्रक्रियात्मक आपत्तियां: चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इस अतिरिक्त फॉर्म को बिना नियम संशोधन के जोड़े जाने पर आपत्ति जताई थी। संधू ने इस ऑनलाइन घोषणा पत्र को अनधिकृत और गैरकानूनी बताते हुए हटाने की औपचारिक मांग की थी।\n• पूर्ण आयोग की बैठक में सहमति: 26 सितंबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों की बैठक में यह स्पष्ट किया गया कि यह घोषणा पत्र केवल एसआईआर अवधि के लिए ही था। गैर-एसआईआर समय में 1960 के नियमों के तहत सामान्य फॉर्म लागू करने पर सहमति बनी।\n• प्रक्रिया पूरी होने वाले क्षेत्रों में अमल: जिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन का काम पूरा हो चुका था, वहां से इस पूरक प्रारूप को हटाने का व्यावहारिक क्रियान्वयन शुरू कर दिया गया। इसलिए चार दिन के भीतर पोर्टल पर आवश्यक तकनीकी बदलाव कर दिए गए।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. फॉर्म-6 से क्या बदलाव किया गया है?\nजिन राज्यों में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) पूरा हो चुका है, वहां फॉर्म-6 से एसआईआर से जुड़ा अतिरिक्त घोषणा पत्र हटा दिया गया है।\n\n2. इस अतिरिक्त घोषणा पत्र में क्या जानकारी मांगी जा रही थी?\nइसमें आवेदक से पूछा जाता था कि उनका या उनके परिजनों का नाम पिछले एसआईआर में था या नहीं, और यदि था तो उसका बूथ व क्रम संख्या मांगी जाती थी।\n\n3. चुनाव आयुक्तों ने इस पर क्या आपत्ति जताई थी?\nविवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने सवाल उठाया था कि नियमों में बदलाव किए बिना 1960 के नियमों वाले फॉर्म में ऐसा संशोधन कैसे किया जा सकता है, और संधू ने इसे गैरकानूनी बताया था।\n\n4. क्या यह बदलाव पूरे देश में एक साथ लागू हुआ है?\nनहीं, यह बदलाव केवल उन्हीं राज्यों में लागू हुआ है जहां एसआईआर पूरा हो चुका है, जबकि जहां एसआईआर चल रहा है वहां यह घोषणा अभी भी भरनी होगी।\n\n5. इस बदलाव पर चुनाव आयोग का क्या रुख रहा है?\nआयोग का कहना था कि फॉर्म-6 में बदलाव नहीं किया गया था बल्कि एसआईआर के लिए पूरक घोषणा पत्र जोड़ा गया था, जिसे बिहार में उच्च न्यायालय ने भी सही ठहराया था।",
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  "category": "भारत",
  "publishedAt": "2026-09-30",
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