चीनी राष्ट्रपति की संभावित भारत यात्रा से पूर्व नई दिल्ली का कड़ा संदेश, एलएसी गतिरोध सुलझाने के लिए रखीं तीन पूर्वशर्तें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के सिलसिले में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के संभावित भारत आगमन से पहले नई दिल्ली ने बीजिंग को साफ कर दिया है कि सीमा पर मुकम्मल शांति और तीन प्रमुख शर्तों के पूरा हुए बिना द्विपक्षीय रिश्ते सामान्य नहीं हो सकते। भारत में आयोजित होने जा रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संभावित यात्रा को लेकर राजनयिक हलचल बेहद तेज हो गई है। सात वर्षों के लंबे अंतराल के बाद किसी चीनी शीर्ष नेता के इस संभावित दौरे से ठीक पहले नई दिल्ली ने सीमा विवाद पर अपना रुख और सख्त कर लिया है। विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों और चीनी प्रतिनिधियों के बीच हुई उच्चस्तरीय वार्ता के दौरान भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी प्रकार के स्वागत से पहले चीन को वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तीन ठोस जिम्मेदारियों को निभाना होगा। द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में आगे बढ़ने से पहले भारत ने सीमा सुरक्षा और प्रादेशिक संप्रभुता से जुड़े इन मुद्दों पर बेहद बेबाक अंदाज में अपनी बात रखी है। डब्ल्यूएमसीसी की 36वें दौर की बैठक में कूटनीतिक तल्खी सीमा मामलों पर परामर्श और समन्वय के लिए गठित कार्यकारी तंत्र अर्थात डब्ल्यूएमसीसी की 36वें दौर की वार्ता में भारत और चीन के प्रतिनिधियों ने एक बार फिर आमने-सामने बैठकर जटिल विवादों पर मंथन किया। इस उच्चस्तरीय वार्ता में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव सुजीत घोष ने किया, जबकि चीनी विदेश मंत्रालय की ओर से महानिदेशक हाऊ यानकी ने अपने दल की कमान संभाली। बैठक का मुख्य केंद्र बिंदु वास्तविक नियंत्रण रेखा के आसपास स्थाई शांति बहाल करना, विवादित सीमा क्षेत्रों का पारदर्शी सीमांकन खोजना और ट्रांस-बॉर्डर नदियों के जल बंटवारे से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर तकनीकी सहमति बनाना था। भारतीय पक्ष ने दोटुक शब्दों में रेखांकित किया कि जब तक सरहद पर तनाव पूरी तरह खत्म नहीं होता, तब तक दोनों देशों के बीच व्यापारिक या कूटनीतिक संबंधों का स्वाभाविक होना असंभव है। भारत द्वारा चीन के समक्ष प्रस्तुत तीन प्रमुख शर्तें डब्ल्यूएमसीसी की इस महत्वपूर्ण बैठक में भारत ने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा की प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए चीन की मेज पर तीन स्पष्ट मांगें रखीं। इन तीनों शर्तों का सीधा संबंध सीमा की सुरक्षा और देश के सामरिक हितों से है • एलएसी पर पूर्ण शांति और उकसावे से परहेज: दोनों देशों ने सीमावर्ती क्षेत्रों की वर्तमान स्थिति का गहराई से अवलोकन किया। भारतीय दल ने चीन को स्पष्ट संदेश दिया कि द्विपक्षीय संबंधों में सुधार की पहली और अनिवार्य शर्त वास्तविक नियंत्रण रेखा पर स्थिरता बनाए रखना है। चीन को कड़ी हिदायत दी गई है कि वह सीमा पर किसी भी प्रकार के एकतरफा सैन्य बदलाव या उकसाने वाली गतिविधियों से पूरी तरह दूर रहे। • ट्रांस-बॉर्डर नदियों का पारदर्शी तकनीकी डेटा साझा करना: भारत ने नदियों के जल प्रबंधन से जुड़े विशेषज्ञ स्तरीय तंत्र की आगामी बैठक तुरंत आयोजित करने पर बल दिया। विशेष रूप से ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदियों के ऊपरी बहाव वाले क्षेत्रों में चीन द्वारा निर्मित विशाल जलविद्युत परियोजनाओं का पूरा तकनीकी विवरण भारत के साथ साझा करने की मांग की गई, ताकि पूर्वोत्तर भारतीय राज्यों में अचानक बाढ़ या जल संकट की स्थिति उत्पन्न न हो। • पारस्परिक संचार तंत्र की निरंतरता: वास्तविक नियंत्रण रेखा पर किसी भी संभावित गलतफहमी, सैन्य भूल या स्थिति के गलत आकलन को रोकने के लिए स्थापित राजनयिक एवं सैन्य माध्यमों को चालू रखने का निर्णय लिया गया। स्थानीय कमांडर स्तर की बैठकों और सीधे संवाद तंत्र को बिना किसी रुकावट के जारी रखने पर जोर दिया गया है। डोभाल-वांग यी वार्ता से निर्मित रणनीतिक खाका डब्ल्यूएमसीसी की यह 36वीं बैठक दरअसल उस व्यापक रणनीति का विस्तार है जो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच आयोजित 24वें दौर की विशेष प्रतिनिधि वार्ता के दौरान तय हुई थी। अगस्त 2025 में संपन्न हुई उस उच्चस्तरीय मुलाकात में दोनों पक्षों ने सीमा विवाद के स्थाई समाधान के लिए तीन-स्तरीय कार्ययोजना पर सहमति जताई थी, जिसे अब धरातल पर उतारने का प्रयास किया जा रहा है • सीमा रेखा तय करने हेतु विशेषज्ञ समूह: विवादित सीमावर्ती हिस्सों का सही तरीके से निर्धारण करने के लिए दोनों देशों के तकनीकी विशेषज्ञों का एक विशेष दल गठित किया जाएगा जो सीमांकन के व्यावहारिक रास्तों की पहचान करेगा। • सीमा प्रबंधन हेतु समर्पित कार्य समूह: वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सैन्य तनातनी रोकने और रोजमर्रा के अभियानों में शांति बनाए रखने के लिए एक विशेष वर्किंग ग्रुप काम करेगा, जो ग्राउंड मैनेजमेंट की जिम्मेदारी संभालेगा। • सैन्य कमांडरों की वार्ता का विस्तार: लद्दाख से जुड़े पश्चिमी क्षेत्र के अलावा अब पूर्वी सेक्टर (जिसमें अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम शामिल हैं) तथा मध्य सेक्टर (उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश) में भी सेना के शीर्ष जनरलों के स्तर पर नियमित वार्ता का नया तंत्र क्रियान्वित किया जाएगा। वर्ष 2020 के गलवान संघर्ष के बाद का रणनीतिक परिदृश्य जून 2020 में गलवान घाटी में चीनी सेना की आक्रामकता के कारण हुए हिंसक टकराव के बाद भारत और चीन के रिश्ते वर्ष 1962 के युद्ध के बाद के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए थे। उस दुखद घटना में भारत के 20 शूरवीर जवान शहीद हुए थे, जिसके पश्चात पूर्वी लद्दाख सीमा पर वर्षों तक हजारों सैनिकों की भारी तैनाती और गतिरोध बना रहा। लंबे दौर की सैन्य और कूटनीतिक वार्ताओं के बाद अक्टूबर 2024 में दोनों देश लद्दाख के विवादित बिंदुओं से अपनी सेनाओं को पीछे हटाने पर सहमत हुए। सैन्य वापसी के इस समझौते के परिणामस्वरूप रूस में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच बहुप्रतीक्षित द्विपक्षीय वार्ता संभव हो सकी थी। यद्यपि उस मुलाकात के बाद शीर्ष अधिकारियों और राजनीतिक स्तर पर बातचीत का सिलसिला पुनः बहाल हो चुका है, लेकिन वास्तविक नियंत्रण रेखा पर अविश्वास और तनाव पैदा करने वाले मूल कारण अब भी यथावत बने हुए हैं। गहरे अविश्वास के मुख्य कारण और विशेषज्ञ दृष्टिकोण राजनयिक स्तर पर बातचीत जारी रहने के बावजूद दोनों पड़ोसियों के मध्य अविश्वास की गहरी खाई मौजूद है। भारत के इस सख्त रवैये के पीछे चीन की दो प्रमुख गतिविधियां मुख्य रूप से उत्तरदायी मानी जाती हैं • पाकिस्तान को रणनीतिक व सैन्य समर्थन: चीन द्वारा पाकिस्तान को लगातार सैन्य उपकरण और खुफिया जानकारियां मुहैया कराई जाती रही हैं। भारतीय सुरक्षा प्रतिष्ठानों के अनुसार, भारत विरोधी गतिविधियों और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी चीन द्वारा पाकिस्तानी एजेंसियों को रियल-टाइम इंटेलिजेंस साझा करने की जानकारी सामने आई थी। • भारतीय भूभाग पर अवैध कब्जा: चीन वर्तमान में अक्साई चिन के 43,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक विशाल भारतीय क्षेत्र पर अवैध रूप से काबिज है। इसके अतिरिक्त वह लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश पर भारत की क्षेत्रीय संप्रभुता को चुनौती देने का दुस्साहस करता रहता है। चीन मामलों की जाने-माने विशेषज्ञ अनुष्का सक्सेना का विश्लेषण है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा के विवाद को अल्पकालिक वार्ताओं से सुलझाना संभव नहीं है, बल्कि यह एक लंबी कूटनीतिक मैराथन की तरह है। अनुष्का सक्सेना के अनुसार चीन सीमा विवाद का उपयोग एक कूटनीतिक हथियार की तरह करता है, जिसके जरिए वह भारत पर निरंतर दबाव बनाए रखने की रणनीति पर काम करता है। इसका आप पर असर भारत में: सीमा सुरक्षा और जल सुरक्षा का सीधा संबंध राष्ट्रीय सुरक्षा से है, विशेष रूप से ब्रह्मपुत्र नदी के तकनीकी आंकड़े साझा होने से पूर्वोत्तर भारत में बाढ़ प्रबंधन बेहतर हो सकेगा। पूर्वोत्तर भारत एवं लद्दाख में: एलएसी पर शांति कायम होने से सीमावर्ती इलाकों में बुनियादी ढांचे का विकास तेज होगा और स्थानीय आबादी के लिए सुरक्षा का माहौल मजबूत होगा। सवाल-जवाब 1. ब्रिक्स सम्मेलन से पहले भारत ने चीन के सामने क्या शर्तें रखी हैं? भारत ने स्पष्ट किया है कि सीमा पर पूर्ण शांति, ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों का पारदर्शी तकनीकी डेटा साझा करना और सैन्य व राजनयिक संवाद तंत्र को मजबूत करना अनिवार्य है। 2. डब्ल्यूएमसीसी (WMCC) की 36वें दौर की बैठक की अगुवाई किसने की? भारतीय प्रतिनिधिमंडल की कमान विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव सुजीत घोष ने संभाली, जबकि चीनी दल का नेतृत्व वहां के विदेश मंत्रालय के महानिदेशक हाऊ यानकी ने किया। 3. भारत और चीन के बीच सुरक्षा सलाहकारों का नया रोडमैप कब तैयार हुआ था? अगस्त 2025 में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच हुई वार्ता में तीन-स्तरीय रोडमैप तैयार किया गया था। 4. चीन के साथ विवादित अक्साई चिन क्षेत्र का कितना हिस्सा अवैध कब्जे में है? चीन के पास अक्साई चिन का 43,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक का विशाल भारतीय भूभाग अवैध कब्जे में है। https://trendkia.com/national/xi-jinping-ki-snbhavita-india-yatra-se-purva-new-delhi-ka-kara-sndesha-lac-gatirodha-sulajhane-ke-lie-rakhin-tina-purvasharten-14869 TrendKia — Har trend, sabse pehle.