वर्ष 2006 के संयुक्त राष्ट्र महासचिव चुनाव और सुरक्षा परिषद वीटो पर शशि थरूर का अहम बयान वर्ष 2006 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में बहुमत मिलने के बावजूद शशि थरूर ने सुरक्षा परिषद वीटो के कारण महासचिव पद की दौड़ से हटने के फैसले की वजह बताई। उन्होंने स्पष्ट किया कि पी-5 देशों के सहयोग के बिना संयुक्त राष्ट्र प्रमुख प्रभावी ढंग से काम नहीं कर सकता। संयुक्त राष्ट्र महासचिव पद के चयन की प्रक्रिया और वैश्विक कूटनीति को लेकर एक बार फिर चर्चा शुरू हो गई है, जब शशि थरूर ने वर्ष 2006 के चुनाव से जुड़ा अपना अनुभव साझा किया। उन्होंने खुलासा किया कि महासभा में स्पष्ट समर्थन होने के बावजूद सुरक्षा परिषद में वीटो का सामना करने के बाद उन्होंने इस दौड़ को आगे न बढ़ाने का निर्णय लिया था। 2006 का संयुक्त राष्ट्र चुनाव और वीटो का प्रभाव वर्ष 2006 में संयुक्त राष्ट्र महासचिव पद के चयन के दौरान शशि थरूर को सुरक्षा परिषद में वीटो का सामना करना पड़ा था, जबकि महासभा में उन्हें बहुमत प्राप्त था। उस समय उन्हें महासभा के जरिए अपनी उम्मीदवारी आगे बढ़ाने का सुझाव दिया गया था, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया। शशि थरूर के अनुसार, पांच स्थायी सदस्यों यानी पी-5 के सक्रिय सहयोग के बिना कोई भी महासचिव संगठन को सुचारू रूप से नहीं चला सकता। उन्होंने कहा, "मैंने वह रास्ता चुनने से इनकार कर दिया क्योंकि पी-5 के सहयोग के बिना कोई भी संयुक्त राष्ट्र महासचिव प्रभावी ढंग से काम नहीं कर सकता।" संयुक्त राष्ट्र संरचना में पी-5 की भूमिका संयुक्त राष्ट्र की कार्यप्रणाली में सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों के पास विशेष वीटो अधिकार होता है। महासभा पूरे विश्व संगठन के सदस्य देशों का प्रतिनिधित्व करती है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और प्रशासनिक निर्णयों में सुरक्षा परिषद की सहमति अत्यंत अनिवार्य मानी जाती है। पी-5 देशों के विरोध के बीच यदि कोई महासचिव पद संभालता भी है, तो संस्थागत गतिरोध उत्पन्न होना तय माना जाता है। जनता की प्रतिक्रिया सोशल मीडिया पर शशि थरूर की इस टिप्पणी के बाद व्यापक चर्चा देखने को मिली। कई लोगों ने सुरक्षा परिषद के वीटो अधिकार को शक्ति के असमान संतुलन का प्रतीक बताया, जबकि अन्य उपयोगकर्ताओं ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति की व्यावहारिक वास्तविकताओं पर अपनी सहमति जताई। इसका आप पर असर • वैश्विक समझ: यह मामला दर्शाता है कि संयुक्त राष्ट्र में प्रमुख नेतृत्व पदों के लिए केवल महासभा का बहुमत काफी नहीं है, बल्कि सुरक्षा परिषद की पांच स्थायी शक्तियों का समर्थन आवश्यक होता है। • कूटनीतिक सीख: अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी वैश्विक संस्था को चलाने के लिए बड़े देशों के साथ सामंजस्य और सहमति कितनी महत्वपूर्ण होती है। सवाल-जवाब 1. शशि थरूर ने 2006 के संयुक्त राष्ट्र महासचिव चुनाव के बारे में क्या बताया? उन्होंने बताया कि 2006 में महासभा में बहुमत मिलने के बावजूद सुरक्षा परिषद में वीटो का सामना करने पर उन्होंने उम्मीदवार के रूप में आगे न बढ़ने का निर्णय लिया था। 2. शशि थरूर ने महासभा का बहुमत होने के बावजूद हटने का निर्णय क्यों लिया? उनका मानना था कि सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों (पी-5) के सक्रिय सहयोग और सहमति के बिना कोई भी महासचिव प्रभावी ढंग से कार्य नहीं कर सकता। 3. संयुक्त राष्ट्र में पी-5 वीटो क्या है? पी-5 संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य हैं, जिनमें से प्रत्येक के पास किसी भी फैसले या प्रस्ताव पर वीटो लगाकर उसे रोकने का विशेष अधिकार होता है। 4. इस बयान पर जनता की क्या प्रतिक्रिया रही? सोशल मीडिया पर लोगों ने मिश्रित प्रतिक्रियाएं दीं; कुछ ने वीटो पावर को असमान शक्ति संतुलन बताया, जबकि अन्य ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की व्यावहारिक सच्चाइयों को स्वीकार किया। नेता परिचय: शशि थरूर • पद: सांसद, तिरुवनंतपुरम • जन्म: 9 मार्च 1956, लंदन, यूके • पार्टी: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस • शिक्षा: फ्लेचर स्कूल, टफ्ट्स से पीएचडी 2009 से तिरुवनंतपुरम से कांग्रेस सांसद, संयुक्त राष्ट्र के पूर्व अवर महासचिव और 25 से अधिक पुस्तकों के पुरस्कृत लेखक। राजनीतिक सफ़र और उपलब्धियां • संयुक्त राष्ट्र अवर महासचिव (2002–2007) • सांसद, तिरुवनंतपुरम (2009 से) • विदेश राज्य मंत्री (2009–2010) • विदेश मामलों की संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष • 25+ पुस्तकों के लेखक; साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता रोचक तथ्य • 2006 में संयुक्त राष्ट्र महासचिव की दौड़ में दूसरे स्थान पर रहे। • 22 वर्ष की आयु में पीएचडी पूरी की — फ्लेचर स्कूल के इतिहास में सबसे कम उम्र में। https://trendkia.com/neta-ji/varsha-2006-ke-snyukta-rashtra-mahasachiva-chunava-aura-suraksha-parishada-vito-para-shashi-tharura-ka-ahama-bayana-12985 TrendKia — Har trend, sabse pehle.