ओडिशा की 17 महीने की बच्ची स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी से जूझ रही, 16 करोड़ के इंजेक्शन के लिए पुरी में गुहार ओडिशा के जाजपुर की 17 महीने की त्रिशिका दुर्लभ बीमारी स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी से पीड़ित है। उसके जीवन रक्षक इंजेक्शन की कीमत लगभग 16 करोड़ रुपये बताई गई है, जिसे जुटाने के लिए परिवार ने जनता और सरकार से मदद मांगी है। ओडिशा के जाजपुर जिले से एक मार्मिक मामला सामने आया है, जहां महज 17 महीने की बच्ची त्रिशिका जिंदगी की बेहद नाजुक लड़ाई लड़ रही है। नन्ही त्रिशिका एक अत्यंत दुर्लभ और गंभीर जेनेटिक बीमारी की गिरफ्त में है। चिकित्सकों के अनुसार इस जानलेवा बीमारी से बच्ची को बचाने के लिए जो विशेष इंजेक्शन चाहिए, उसकी कीमत करीब 16 करोड़ रुपये आंकी गई है। इतनी भारी भरकम रकम जुटाना एक साधारण परिवार के लिए संभव नहीं है, जिसके चलते परिजन अब हर संभव सहारे की तलाश कर रहे हैं। स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी के लक्षण और स्वास्थ्य चुनौतियां चिकित्सकों ने पुष्टि की है कि त्रिशिका स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी से ग्रस्त है, जिसे संक्षेप में SMA भी कहा जाता है। यह एक गंभीर आनुवंशिक विकार है, जिसके संकेत अमूमन शिशुओं में 6 महीने से 18 महीने की उम्र के बीच उभरने लगते हैं। यह विकार बच्चे की मांसपेशियों और तंत्रिका तंत्र को कमजोर करने लगता है, जिससे शारीरिक क्षमताएं धीरे-धीरे समाप्त होने लगती हैं। इस बीमारी से जूझने वाले बच्चों की शारीरिक स्थिति तेजी से बिगड़ती है, जिसमें कई प्रकार की दैनिक परेशानियां शामिल हैं • मांसपेशियों की अत्यधिक कमजोरी: इस सिंड्रोम से पीड़ित बच्चे सहारे से बैठ तो सकते हैं, लेकिन वे खुद से अपने पैरों पर खड़े होने या चलने में पूरी तरह लाचार हो जाते हैं। • श्वसन और हड्डियों से जुड़े गंभीर लक्षण: बीमारी के प्रभाव से बच्चों के हाथ और पैर कांपने लगते हैं। इसके साथ ही सांस लेने में भारी तकलीफ, लगातार सर्दी और जुकाम की शिकायत रहना तथा हड्डियों में विकृति आ जाना इसके प्रमुख लक्षणों में शामिल हैं। इलाज में जमा-पूंजी समाप्त, 16 करोड़ के इंजेक्शन की दरकार त्रिशिका के माता-पिता ने अपनी बेटी को बचाने के लिए पिछले कुछ महीनों में कोई कसर नहीं छोड़ी। परिवार ने अपनी जीवन भर की जमा-पूंजी लगाते हुए अब तक लगभग 20 से 25 लाख रुपये शुरुआती जांच और उपचार में खर्च कर दिए हैं। हालांकि, बीमारी की गंभीरता को देखते हुए चिकित्सकों का कहना है कि रोग की प्रगति रोकने और बच्ची का जीवन बचाने के लिए एक खास इंजेक्शन की सख्त जरूरत है। समस्या यह है कि इस एकमात्र इंजेक्शन की लागत लगभग 16 करोड़ रुपये है। किसी भी सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार के लिए इतने कम समय में इतनी बड़ी रकम जुटा पाना नामुमकिन जैसा कार्य है। लगातार बढ़ती लाचारी के बावजूद माता-पिता ने उम्मीद नहीं छोड़ी है। उन्होंने देश भर के नागरिकों और ओडिशा सरकार से आगे आकर वित्तीय सहायता प्रदान करने की गुहार लगाई है। श्री जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार पर लगाई अंतिम गुहार जब चिकित्सीय खर्च जुटाने के तमाम रास्ते बंद होते दिखे, तो माता-पिता अपनी नन्ही बच्ची को लेकर सीधे पुरी पहुंचे। वहां उन्होंने श्री जगन्नाथ मंदिर के प्रसिद्ध सिंहद्वार के सामने पहुंचकर अपनी लाड़ली को महाप्रभु के चरणों में समर्पित कर दिया। बच्ची के पिता का कहना है कि आम जनता से आर्थिक मदद मांगने से पहले वे अपनी बेटी को मंदिर की 22 सीढ़ियों यानी बयासी पाहाचा पर ले गए और उसे भगवान जगन्नाथ को सौंप दिया। उनका पूरा भरोसा अब किसी दैवीय चमत्कार, ओडिशा सरकार के सहयोग और समाज की उदारता पर टिका है। सोशल मीडिया और क्राउडफंडिंग के जरिए इस विशाल राशि को जुटाने के प्रयास शुरू हो गए हैं, ताकि नन्ही त्रिशिका को समय पर जरूरी उपचार मिल सके। इसका आप पर असर यह घटना दुर्लभ आनुवंशिक बीमारियों के अत्यधिक महंगे इलाज और साधारण परिवारों पर पड़ने वाले वित्तीय संकट को रेखांकित करती है। • भारत में: देश भर के नागरिकों को क्राउडफंडिंग और स्वास्थ्य सहायता अभियानों के जरिए ऐसे दुर्लभ मामलों में मदद का अवसर मिलता है। इसके साथ ही यह मामला अत्यंत महंगी जीवन रक्षक दवाओं के लिए राष्ट्रीय नीतिगत सहयोग की आवश्यकता को दर्शाता है। • ओडिशा में: जाजपुर और आसपास के स्थानीय निवासी तथा सामाजिक संगठन नन्ही बच्ची की मदद के लिए अभियान तेज कर सकते हैं। राज्य सरकार से सहायता की गुहार के बाद स्थानीय प्रशासन से विशेष चिकित्सा राहत कोष की उम्मीद बंधी है। • अभिभावकों के लिए: शिशुओं में 6 से 18 महीने की उम्र के दौरान मांसपेशियों की कमजोरी या चलने-फिरने में देरी को अनदेखा न करने की सीख मिलती है। शुरुआती स्तर पर बाल रोग विशेषज्ञ से परामर्श लेकर समय रहते जरूरी आनुवंशिक जांच कराई जा सकती है। • सहयोग के लिए: आम लोग सोशल मीडिया और जन-सहयोग मंचों के जरिए छोटी-बड़ी राशि का योगदान कर सकते हैं। सामूहिक रूप से एकत्रित यह मदद इतनी बड़ी धनराशि जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। ऐसा क्यों हुआ यह स्थिति एक दुर्लभ आनुवंशिक विकार के कारण उत्पन्न हुई है, जिसके प्रभावी उपचार के लिए बेहद उन्नत और महंगी बायोफार्मास्यूटिकल तकनीक की आवश्यकता होती है। • आनुवंशिक विकार का प्रभाव: स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी जन्मजात आनुवंशिक कारणों से मोटर न्यूरॉन्स को प्रभावित करती है, जिससे मांसपेशियों का क्षरण होने लगता है। शरीर में आवश्यक प्रोटीन की कमी के चलते मांसपेशियां सामान्य रूप से कार्य नहीं कर पातीं। • शुरुआती दौर में पहचान: बच्ची की उम्र 17 महीने होने के कारण इसके प्राथमिक लक्षण जैसे खड़े न हो पाना और सांस में रुकावट खुलकर सामने आए। परिजनों ने आरंभिक जांच में 20 से 25 लाख रुपये लगाए, जिसके बाद विशेषज्ञों ने इस गंभीर स्थिति की पुष्टि की। • इलाज की अत्यधिक लागत: इस बीमारी के लिए विकसित जीवन रक्षक इंजेक्शन दुनिया की सबसे महंगी दवाओं में गिना जाता है, जिसकी कीमत लगभग 16 करोड़ रुपये है। अत्यधिक अनुसंधान लागत और सीमित उत्पादन के कारण यह दवा आम परिवार की आर्थिक पहुंच से बाहर हो जाती है। सवाल-जवाब 1. त्रिशिका की उम्र कितनी है और वह कहां की रहने वाली है? त्रिशिका 17 महीने की बच्ची है और उसका परिवार ओडिशा के जाजपुर जिले का रहने वाला है। 2. बच्ची को कौन सी बीमारी हुई है? चिकित्सकों के अनुसार त्रिशिका स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA) नाम की एक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी से पीड़ित है। 3. इलाज के लिए आवश्यक इंजेक्शन की कीमत कितनी है? इस बीमारी से निपटने के लिए जरूरी इंजेक्शन की अनुमानित लागत लगभग 16 करोड़ रुपये है। 4. परिवार ने अब तक बच्ची के इलाज पर कितना खर्च किया है? शुरुआती जांच और प्राथमिक उपचार में परिवार अपनी जमा-पूंजी से लगभग 20 से 25 लाख रुपये खर्च कर चुका है। 5. माता-पिता ने पुरी जाकर क्या कदम उठाया? माता-पिता ने पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर पहुंचकर सिंहद्वार और 22 सीढ़ियों (बयासी पाहाचा) पर अपनी बच्ची को भगवान को समर्पित किया और चमत्कार की प्रार्थना की। https://trendkia.com/odisha/odisha-ki-17-mahine-ki-bachchi-spinal-muscular-atrophy-se-jujha-rahi-16-karora-ke-injekshana-ke-lie-puri-men-guhara-34259 TrendKia — Har trend, sabse pehle.