ओडिशा में सरकारी खजाने और संसाधनों के प्रबंधन पर सीएजी की ऑडिट में बड़े खुलासे, कई विभागों में सामने आईं गंभीर खामियां भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की ताज़ा अनुपालन ऑडिट में ओडिशा के विभिन्न विभागों में वित्तीय नियमों की अनदेखी, अवैध कब्जों और प्रक्रियागत खामियों की विस्तृत सूची सामने आई है। ओडिशा सरकार के विभिन्न प्रशासनिक विभागों में सार्वजनिक धन के आवंटन, अधोसंरचना निर्माण, खनिज संपदा के दोहन, ग्रामीण सड़कों, शिक्षा सुविधाओं और जल संसाधनों से जुड़ी कार्यप्रणाली में कई गंभीर प्रक्रियागत और वित्तीय विसंगतियां दर्ज की गई हैं। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी सीएजी की अनुपालन ऑडिट रिपोर्ट में 31 मार्च 2024 तक की स्थिति का विस्तृत परीक्षण किया गया है। इस समीक्षा के अंतर्गत वित्त वर्ष 2023-24 के दौरान किए गए टेस्ट-चेक नमूनों के अलावा पिछले वर्षों के उन जरूरी मामलों को भी समाहित किया गया है, जो पूर्व की वार्षिक समीक्षाओं में दर्ज होने से छूट गए थे। इस पड़ताल में मुख्य रूप से मत्स्य पालन और पशु संसाधन विकास विभाग, वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन विभाग, इस्पात और खान विभाग, जल संसाधन विभाग तथा निर्माण कार्य विभाग के कामकाज की गहन पड़ताल की गई है। पेयजल आपूर्ति ठप होने से हजारों नागरिक सुविधा से वंचित बरगढ़ और ढेंकानाल जिलों की छह ग्राम पंचायतों में किए गए भौतिक सत्यापन के दौरान यह तथ्य सामने आया कि वर्ष 2019 से 2021 के मध्य करीब 43.30 लाख रुपये का व्यय करके तैयार की गईं नौ सोलर वाटर सप्लाई परियोजनाएं पूरी तरह निष्क्रिय पाई गईं। योजना के धरातल पर क्रियान्वित न होने और इन संयंत्रों के निरंतर बंद रहने के कारण लगभग 28,820 स्थानीय निवासियों को स्वच्छ पेयजल की बुनियादी सुविधा से वंचित रहना पड़ा। सार्वजनिक संपत्तियों पर अवैध दखल और राजस्व क्षति बरगढ़ और ढेंकानाल जिलों के अंतर्गत आने वाली एक पंचायत समिति और 17 ग्राम पंचायतों में निर्मित 25 महत्वपूर्ण सार्वजनिक संपत्तियों पर अनधिकृत कब्जे पाए गए। इन निर्माणों में तीन सुसज्जित मार्केट कॉम्प्लेक्स और 22 कल्याण मंडप शामिल हैं, जिनका निर्माण लगभग 2.59 करोड़ रुपये की सार्वजनिक धनराशि खर्च करके पूरा किया गया था। जांच के अनुसार इन संपत्तियों के अनधिकृत आधिपत्य में चले जाने के कारण स्थानीय त्रिस्तरीय पंचायती राज संस्थाओं को उस नियमित आय से हाथ धोना पड़ा, जो इनके वैधानिक संचालन और किराए से प्राप्त हो सकती थी। बिना विस्तृत कार्ययोजना के परियोजनाओं पर अग्रिम खर्च बरगढ़, ढेंकानाल, खुर्दा और नबरंगपुर जिलों की नौ पंचायत समितियों तथा 10 ग्राम पंचायतों के स्तर पर 3.73 करोड़ रुपये की कुल लागत से 35 अलग-अलग विकास योजनाएं प्रारंभ की गईं। ऑडिट जांच में यह स्पष्ट हुआ कि इन निर्माण कार्यों की विस्तृत कार्ययोजना और समग्र दायरा आरंभिक स्तर पर निर्धारित ही नहीं किया गया था। इस योजनागत विफलता का सीधा परिणाम यह रहा कि काम पूर्ण होने से पूर्व ही आवंटित वित्तीय बजट समाप्त हो गया। इसके अतिरिक्त ढेंकानाल जिले में 1.39 करोड़ रुपये के सीएफसी अनुदान का उपयोग उन कार्यों में कर दिया गया, जो निर्धारित मार्गदर्शिकाओं के अनुसार अनुमन्य नहीं थे। इस गैर-स्वीकार्य व्यय में प्रशासनिक कार्यालय भवनों का निर्माण, विलासिता अथवा इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की खरीद तथा स्थानीय सांस्कृतिक आयोजनों पर किए गए खर्च शामिल पाए गए। नियम विरुद्ध बिना निविदा के करोड़ों के विकास कार्य सार्वजनिक खरीद और निर्माण प्रक्रियाओं में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए निविदा प्रक्रिया अनिवार्य मानी जाती है। इसके विपरीत बरगढ़, ढेंकानाल, खुर्दा और नबरंगपुर जिलों में दो पंचायत समितियों और आठ ग्राम पंचायतों के अधिकार क्षेत्र में 3.30 करोड़ रुपये के कुल 14 कार्य बिना कोई खुली निविदा आमंत्रित किए ही करा दिए गए। इन सभी प्रकरणों में प्रत्येक कार्य की लागत 10 लाख रुपये की निर्धारित सीमा से अधिक थी, जिसके लिए नियमानुसार पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया का पालन किया जाना अनिवार्य था। पेंशन मद की लाखों की धनराशि का अनधिकृत नियंत्रण सामाजिक सुरक्षा तंत्र से जुड़े मामलों की समीक्षा में निमापाड़ा पंचायत समिति का गंभीर प्रकरण सामने आया। वर्ष 2017 से 2020 के बीच 21 पंचायत समिति अधिकारियों और 26 ग्राम पंचायत अधिकारियों ने विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के पात्र लाभार्थियों को वितरित की जाने वाली 77.80 लाख रुपये की अवितरित पेंशन राशि को वैधानिक रूप से सरकारी खाते में लौटाने के बजाय अनधिकृत तौर पर अपने पास रोके रखा। लैंड बैंक की विफलता से सैकड़ों एकड़ भूमि पर कब्जा ओडिशा के भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन नियमों में प्रत्येक गांव के स्तर पर भू-बैंक यानी लैंड बैंक स्थापित करने की स्पष्ट व्यवस्था दी गई है। सरकारी तंत्र द्वारा ऐसा प्रभावी लैंड बैंक तैयार न किए जाने के कारण 668.893 एकड़ सरकारी भूमि अनधिकृत कब्जे की भेंट चढ़ गई। इस अतिक्रमित भूमि का अनुमानित बाजार मूल्य करीब 597.87 करोड़ रुपये आंका गया है। इसके अलावा 24 चयनित तहसीलों के रिकॉर्ड की जांच करने पर 504.768 एकड़ उपजाऊ कृषि भूमि का उपयोग गैर-कृषि प्रयोजनों में होता पाया गया। इस जमीन का डायवर्जन शैक्षणिक संस्थानों, औद्योगिक इकाइयों और विभिन्न धार्मिक न्यासों की गतिविधियों के लिए नियमों की अनदेखी करके किया गया था। वन संरक्षण कानूनों का उल्लंघन और अभयारण्य भूमि की अवैध बिक्री पर्यावरण और वन संरक्षण के क्षेत्र में छह चयनित तहसीलों की जांच में यह तथ्य उजागर हुआ कि 568.876 एकड़ संरक्षित वन भूमि को बिना केंद्र सरकार की पूर्व वैधानिक स्वीकृति के ही गैर-वानिकी गतिविधियों में झोंक दिया गया। इससे भी अधिक गंभीर मामला वन्यजीव संरक्षण से जुड़े कानूनों की खुली अवहेलना का है, जहां संरक्षित वन्यजीव अभयारण्य क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली 13.65 एकड़ जमीन को भूमाफियाओं द्वारा 156 अलग-अलग भूखंडों में काटकर बाजार में बेच दिया गया। ग्रामीण सड़क संपर्क और ठेका प्रबंधन में वित्तीय लापरवाही ग्रामीण क्षेत्रों को हर मौसम में मुख्य मार्गों से जोड़ने के उद्देश्य से भारत सरकार द्वारा प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना संचालित की जा रही है, जिसके अंतर्गत मौजूदा रास्तों के उन्नयन हेतु वर्ष 2019 में पीएमजीएसवाई-3 की शुरुआत की गई थी। वर्ष 2019 से 2024 तक की अवधि की समीक्षा में यह पाया गया कि कई महत्वपूर्ण सड़क निर्माण कार्य अयोग्य और अक्षम संवेदकों को सौंप दिए गए। संविदा शर्तों की अनदेखी के चलते 127 निर्माण कार्यों में 40.55 करोड़ रुपये की लिक्विडेटेड डैमेज की अनिवार्य वसूली संवेदकों से नहीं की गई। इसी प्रकार 30 अलग-अलग सड़क परियोजनाओं में समयानुसार अनिवार्य रखरखाव न कराए जाने की वजह से 23.02 करोड़ रुपये का अतिरिक्त और टालने योग्य खर्च सरकारी खजाने पर आ पड़ा। स्कूलों के फंड में हेराफेरी और बुनियादी ढांचे की बदहाली शिक्षा क्षेत्र में सरकारी वित्तीय सहायता के दुरुपयोग के कई उदाहरण सामने आए। बड़चना महिला उच्च माध्यमिक विद्यालय में एचएसटीपी कोष से 57.95 लाख रुपये खर्च किए गए, जबकि जांच में यह स्पष्ट हुआ कि यह कक्षा 11वीं और 12वीं की पढ़ाई कराने वाला एक निजी शिक्षण संस्थान था जो इस वित्तीय सहायता के दायरे में आता ही नहीं था। वहीं कटक जिले के रानीहाट हाई स्कूल में एचएसटीपी और मो स्कूल अभियान की अनुदान राशि में से लगभग 12.48 लाख रुपये के संदिग्ध गबन का मामला सामने आया। इसी प्रकार दशरथपुर ब्लॉक स्थित नंदीपुर हाई स्कूल के बैंक खाते से चेक के माध्यम से 30 लाख रुपये की राशि एक बाहरी तीसरे पक्ष के निजी बैंक खाते में भेज दी गई, जबकि यह राशि सीधे ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर के आधिकारिक खाते में हस्तांतरित की जानी थी। जलेश्वर में बीडीओ कार्यालय द्वारा छात्र उपयोग के ड्युअल डेस्क की मरम्मत के नाम पर 4.95 लाख रुपये का संदिग्ध भुगतान दर्ज किया गया। जाजपुर जिले में ओसेपा और स्थानीय जिला प्रशासन के बीच प्रशासनिक समन्वय न होने से ई-कंटेंट की दोहरी खरीद कर ली गई। ओसेपा और एडसिल दोनों से एक जैसी सामग्री खरीदे जाने के चलते 430 विद्यालयों के लिए किया गया 7.39 करोड़ रुपये का सार्वजनिक खर्च पूरी तरह निष्प्रभावी और व्यर्थ साबित हुआ। इसके अतिरिक्त 54 सरकारी विद्यालयों के भौतिक निरीक्षण में स्मार्ट क्लासरूम, विज्ञान प्रयोगशालाएं और इंटरनेट संपर्क पूरी तरह निष्क्रिय मिले, जहां प्रयोगशालाओं में पानी और गैस कनेक्शन तक मौजूद नहीं थे तथा अनिवार्य रसायन व प्रायोगिक उपकरण नदारद थे। सरकारी चार्टर्ड विमान और हेलीकॉप्टर सेवाओं पर अनुचित व्यय अप्रैल 2019 से मार्च 2024 के मध्य राज्य सरकार द्वारा उपयोग में लाए गए आधिकारिक विमानों और हेलीकॉप्टरों की जांच में गंभीर पारदर्शिता संकट सामने आया। विमानन सेवाएं प्रदान करने के लिए निजी कंपनी ओएसएस एयर मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड का चयन बिना किसी स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के किया गया, क्योंकि सरकार ने केवल एकल बोलीदाता होने के बावजूद अनुबंध दे दिया और सबसे प्रतिस्पर्धी बाजार दर प्राप्त करने का प्रयास नहीं किया। इसके बाद भी इस कंपनी का अनुबंध समय-समय पर बढ़ाकर अगस्त 2024 तक जारी रखा गया। जनवरी 2019 से नवंबर 2023 के दौरान राज्य सरकार ने लंबी दूरी की अंतर-राज्यीय उड़ानों के लिए 22 अवसरों पर चार्टर्ड विमान किराए पर लिए, जिस पर कुल 6.91 करोड़ रुपये खर्च किए गए। यह भारी-भरकम व्यय तब किया गया जब उसी अवधि में सरकार द्वारा पहले से लीज पर लिए गए विमान के 751.34 उड़ान घंटे पूरी तरह अप्रयुक्त पड़े थे। इसी तरह इसी निजी एजेंसी से 29 अवसरों पर 100.90 उड़ान घंटों के लिए हेलीकॉप्टर सेवाएं लेकर 1.30 करोड़ रुपये चुकाए गए, जबकि अनुबंध के तहत पूर्व-निर्धारित विमान के 566.44 उड़ान घंटे बिना उपयोग के शेष थे। पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्रों में अवैध निर्माण और सुरक्षा मानकों की अनदेखी वन संरक्षण अधिनियम 1980 और सरकारी दिशा-निर्देशों की अवहेलना करते हुए रामचंडी में बीच फ्रंट प्रोमेनेड, पुरी-कोणार्क मरीन ड्राइव की संपर्क सड़क का चौड़ीकरण और तालसारी में पंथशाला जैसे पक्के निर्माण अभयारण्यों, राष्ट्रीय उद्यानों और प्रस्तावित आरक्षित वनों में करा दिए गए। इन निर्माण कार्यों पर 28.84 करोड़ रुपये का अनधिकृत व्यय किया गया। आतिथ्य क्षेत्र में अग्नि सुरक्षा की पड़ताल करने पर राज्य के 20 सरकारी पंथनिवास अनिवार्य फायर सेफ्टी सर्टिफिकेट के बिना ही धड़ल्ले से संचालित होते पाए गए। परिवहन चालान में ढिलाई और सिंचाई तंत्र की अधूरी योजनाएं वाहनों के प्रवर्तन अभियान में यह पाया गया कि एक ही वाहन द्वारा यातायात के कई नियमों का उल्लंघन किए जाने के बावजूद प्रवर्तन अधिकारियों ने चालान काटते समय केवल एक या दो उल्लंघनों को ही कागजों पर दर्ज किया। इस प्रक्रियागत शिथिलता के कारण राज्य सरकार को देय लगभग 640.87 करोड़ रुपये के संभावित जुर्माने की वसूली से वंचित रहना पड़ा। जल संसाधन विभाग की लघु सिंचाई परियोजनाओं में पर्याप्त प्राथमिक सर्वेक्षण, भू-गर्भीय जांच और व्यवहार्यता अध्ययन के अभाव में सात परियोजनाएं भूमि अधिग्रहण और वन अनापत्ति न मिलने से बीच में ही बंद करनी पड़ीं। आरआईडीएफ-24 के तहत मंजूर 40 परियोजनाओं में से तीन परियोजनाएं तय कृषि कमान क्षेत्र का लक्ष्य हासिल नहीं कर सकीं। इसके अलावा 311 परियोजना प्रस्तावों में से 271 यानी 87 प्रतिशत प्रस्तावों को उच्चाधिकार प्राप्त समिति का वैधानिक अनुमोदन प्राप्त ही नहीं था। कुल 38 लघु सिंचाई परियोजनाएं आवश्यक मंजूरी के बिना ही ठेकेदारों को सौंप दी गईं, जहां हेडवर्क्स और जल वितरण नहरें न बन पाने से 91.57 करोड़ रुपये का निवेश व्यर्थ चला गया। पुराने ढांचों पर नवीन निर्माण दिखाकर फर्जी भुगतान की आशंका मुख्यमंत्री आदिबंध तिआरी योजना के अंतर्गत चार प्रभागों के अधीक्षण अभियंताओं ने चेक डैम निर्माण के लिए सात औपचारिक अनुबंध निष्पादित किए और अप्रैल 2023 से जनवरी 2025 के दौरान इन पर 4.26 करोड़ रुपये खर्च किए गए। जब गूगल अर्थ प्रो के उपग्रह चित्रों और विभागीय जियो-टैग डेटा का मिलान किया गया, तो यह उजागर हुआ कि जिन चिन्हित स्थलों पर नए चेक डैम निर्माण के दावे किए गए थे, वहां पुराने चेक डैम पहले से मौजूद थे। इस आधार पर 4.26 करोड़ रुपये के फर्जी भुगतान किए जाने की गंभीर आशंका व्यक्त की गई है। खनन क्षेत्र में पर्यावरणीय अनापत्ति के बिना अंधाधुंध उत्पादन ओडिशा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से संचालन की अनिवार्य सम्मति लिए बिना 79,535 मीट्रिक टन खनिजों का उत्खनन कर लिया गया, जिससे 45.59 करोड़ रुपये की सरकारी वसूली देनदारी बनी। इसी प्रकार कंथेर-कोइरा मैंगनीज खदान में भी वैधानिक सहमति के अभाव में 10,066 मीट्रिक टन खनिज निकालने से 3.24 करोड़ रुपये की वसूली योग्य राशि तय हुई। सबसे बड़ा मामला कोयला उत्पादन से जुड़ा सामने आया, जहां दो कोयला खदानों से कुल 1,17,96,540 मीट्रिक टन कोयला निकाला गया। इसमें से एक खदान में उत्पादन पर्यावरण स्वीकृति की सीमा से कहीं अधिक था, जबकि दूसरी खदान में बिना किसी पर्यावरण मंजूरी के ही खनन किया गया। इसके परिणामस्वरूप संबंधित पट्टाधारक से खनिज मूल्य के रूप में 975.57 करोड़ रुपये की वसूली की देनदारी दर्ज की गई। खनन प्रभावित क्षेत्रों के डीएमएफ कोष का मनमाना इस्तेमाल खनन प्रभावित आबादी के सामाजिक और आर्थिक पुनरुद्धार के लिए गठित छह जिला खनिज फाउंडेशन यानी डीएमएफ के पास वर्ष 2015-16 से 2023-24 के मध्य कुल 22,568.17 करोड़ रुपये की धनराशि जमा हुई, जिसमें 20,795.51 करोड़ रुपये का अंशदान और 1,772.66 करोड़ रुपये का ब्याज शामिल था। इस अवधि में 17,435 योजनाओं के लिए 20,947.52 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए। इसके बावजूद किसी भी डीएमएफ ने स्थानीय आबादी की आजीविका सुरक्षा के लिए दीर्घकालिक एंडोमेंट फंड का गठन नहीं किया और न ही कोई सुविचारित मास्टर प्लान तैयार किया गया। केओंझर डीएमएफ में 2015 से 2024 के दौरान 9,733.37 करोड़ रुपये की लागत वाली 3,269 परियोजनाओं में से 757 योजनाएं बिना प्रबंध समिति या न्यासी बोर्ड की मंजूरी के लागू कर दी गईं। सुंदरगढ़ डीएमएफ में 102.71 करोड़ रुपये की पांच योजनाएं सक्षम स्वीकृति के बिना मंजूर की गईं। जाजपुर, ढेंकानाल, केओंझर, नबरंगपुर और सुंदरगढ़ डीएमएफ में 679.14 करोड़ रुपये की 317 परियोजनाएं पीएमकेकेकेवाई की प्राथमिकताओं से बाहर जाकर स्वीकृत की गईं। इनमें सुंदरगढ़ में नियमों की अवहेलना करते हुए 136.77 करोड़ रुपये की लागत से हॉकी स्टेडियम का निर्माण शामिल है। सुंदरगढ़ डीएमएफ द्वारा संचालित मोबाइल मेडिकल वैन सेवा में तैनात 78 डॉक्टरों में से 24 डॉक्टर बिना किसी वैध पंजीकरण प्रमाणपत्र के कार्यरत पाए गए, जिनके मानदेय मद में निजी एजेंसी को 7.44 करोड़ रुपये का अनियमित भुगतान किया गया। इसके अतिरिक्त तीन जिलों के डीएमएफ द्वारा निजी अस्पतालों को कोविड मरीजों के लिए अग्रिम तौर पर बेड आरक्षित रखने के नाम पर पीपीपी शर्तों के विपरीत जाकर 145.06 करोड़ रुपये का अनुचित भुगतान किया गया। इसका आप पर असर सार्वजनिक धन और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में प्रक्रियागत खामियों का सीधा असर स्थानीय जनता को मिलने वाली आवश्यक सेवाओं पर पड़ता है। • भारत में: केंद्रीय योजनाओं और खदान फंडों के क्रियान्वयन में प्रक्रियागत निगरानी को सभी राज्यों में कड़ा किया जा सकता है। इससे देश भर में बुनियादी ढांचे की जवाबदेही तय करने के नियमों में सख्त बदलाव देखने को मिल सकते हैं। • ओडिशा में: पेयजल संयंत्रों और अधूरी सिंचाई परियोजनाओं के रुकने से राज्य के ग्रामीण परिवारों और किसानों को बुनियादी जल संकट का सामना करना पड़ा है। स्थानीय जनता को समय पर पेंशन मिलने में देरी और स्कूलों में अधूरी सुविधाओं के कारण सीधे तौर पर असुविधा हुई है। • राजस्व वसूली पर असर: मोटर वाहन चालान और अवैध खनन पर करोड़ों रुपये की बकाया वसूली न होने से राज्य के बजट पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। यदि संबंधित विभाग इन देनदारियों की समय पर वसूली करते हैं, तो विकास कार्यों के लिए अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध हो सकते हैं। • पर्यावरण और स्थानीय बस्तियां: संरक्षित वन क्षेत्रों में अवैध निर्माण और बिना मंजूरी के खनन से स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचता है। इससे खनन प्रभावित इलाकों में रहने वाले नागरिकों की आजीविका सुरक्षा और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। ऐसा क्यों हुआ यह ऑडिट समीक्षा राज्य के विभिन्न प्रशासनिक विभागों में वैधानिक प्रक्रियाओं के अभाव, अपर्याप्त निगरानी तंत्र और नियमों की अनदेखी के कारण सामने आई है। • योजनागत सर्वेक्षण की कमी: सिंचाई और अवसंरचना परियोजनाओं को शुरू करने से पहले पर्याप्त व्यवहार्यता अध्ययन और वन अनुमतियों की जांच नहीं की गई। इसके कारण जमीन विवाद और मंजूरी न मिलने से दर्जनों योजनाएं बीच में ही ठप हो गईं। • पारदर्शिता और निविदा नियमों का उल्लंघन: कार्य आवंटन और विमानन सेवाओं के अनुबंध में खुली प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। एकल बोलीदाता को बार-बार विस्तार देने और बिना टेंडर के काम कराने से नियमों का उल्लंघन हुआ। • पर्यावरण और खनन निगरानी में ढिलाई: प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और पर्यावरण मंत्रालय की अनिवार्य अनुमतियों के बिना खदानों में उत्पादन जारी रहा। संबंधित प्राधिकरणों द्वारा समय पर उत्पादन की सीमा तय न किए जाने से करोड़ों की वित्तीय देनदारी बनी। सवाल-जवाब 1. यह ऑडिट रिपोर्ट किस अवधि तक के मामलों को कवर करती है? यह अनुपालन ऑडिट रिपोर्ट 31 मार्च 2024 तक के मामलों और वित्त वर्ष 2023-24 के दौरान की गई जांच पर आधारित है। 2. पेयजल योजनाओं के बंद रहने से कितने लोग प्रभावित हुए? बरगढ़ और ढेंकानाल में नौ सोलर वाटर सप्लाई प्रोजेक्ट बंद रहने से लगभग 28,820 लोगों को पीने के पानी की सुविधा नहीं मिल सकी। 3. कोयला उत्पादन में कितनी वित्तीय देनदारी आंकी गई है? पर्यावरण मंजूरी के बिना या तय सीमा से अधिक 1,17,96,540 मीट्रिक टन कोयला खनन करने पर 975.57 करोड़ रुपये की देनदारी तय की गई है। 4. डीएमएफ फंड से हॉकी स्टेडियम के निर्माण पर कितना खर्च किया गया? सुंदरगढ़ डीएमएफ ने नियमों से बाहर जाकर हॉकी स्टेडियम के निर्माण पर 136.77 करोड़ रुपये खर्च किए। 5. चेक डैम निर्माण को लेकर किस तरह की आशंका जताई गई है? उपग्रह चित्रों की जांच में पहले से मौजूद चेक डैम के स्थानों पर नया निर्माण दिखाकर 4.26 करोड़ रुपये के संदिग्ध भुगतान की बात सामने आई है। https://trendkia.com/odisha/odisha-men-cag-riporta-men-bare-khulase-kai-vibhagon-men-samane-ain-gnbhira-khamiyan-40154 TrendKia — Har trend, sabse pehle.