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  "type": "article",
  "title": "ओडिशा में एंबुलेंस के लिए राशन कार्ड गिरवी रखने पर मजबूर हुआ शोकाकुल परिवार",
  "summary": "नबरंगपुर के एक दंपती को सरकारी शव वाहन न मिलने पर निजी गाड़ी का किराया चुकाने के लिए राशन कार्ड गिरवी रखना पड़ा। बच्चे की मौत के बाद अस्पताल प्रशासन से मदद न मिलने पर परिजनों ने खुद साधन जुटाया।",
  "content": "ओडिशा के नबरंगपुर जिले से स्वास्थ्य तंत्र की संवेदनहीनता को उजागर करने वाली एक अत्यंत हृदयविदारक घटना सामने आई है। अपने नवजात शिशु को खोने के गहरे सदमे के बीच एक निर्धन परिवार को अंतिम संस्कार के लिए पार्थिव शरीर गांव ले जाने हेतु अपना राशन कार्ड गिरवी रखकर कर्ज जुटाना पड़ा। राज्य सरकार की ओर से शवों को सम्मानपूर्वक घर तक पहुंचाने के लिए चलाई जाने वाली महाप्रयाण सेवा ऐन वक्त पर उपलब्ध नहीं कराई गई, जिसके चलते बेबस परिजनों को 5,000 रुपये का भारी भरकम खर्च उठाकर एक निजी एंबुलेंस का सहारा लेना पड़ा।\n\nस्वास्थ्य केंद्रों के चक्कर और नवजात का संघर्ष\nइस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत नबरंगपुर के डालेगुड़ा गांव से हुई, जहां की निवासी अंबिका नायक ने बीते 29 सितंबर को पापड़ाहांडी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में एक बालक को जन्म दिया था। जन्म के समय नवजात का वजन सामान्य से काफी कम था, जिससे उसकी शारीरिक स्थिति नाजुक बनी हुई थी। स्थानीय डॉक्टरों ने स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए उसे नबरंगपुर जिला मुख्यालय अस्पताल ले जाने का निर्देश दिया। इसके उपरांत भी बच्चे के स्वास्थ्य में अपेक्षित सुधार न होने पर चिकित्सकों ने उसे कोरापुट में स्थापित शहीद लक्ष्मण नायक मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल स्थानांतरित कर दिया।\n\nइलाज के दौरान तोड़ा दम और शुरू हुई परेशानी\nविशिष्ट चिकित्सा इकाई में सघन निगरानी के बावजूद बालक की हालत बिगड़ती चली गई और गुरुवार देर रात उसने अंतिम सांस ली। अपनी कोख उजड़ने के वज्रपात से माता-पिता संभल भी नहीं पाए थे कि उनके सामने पार्थिव शरीर को करीब 60 किलोमीटर दूर पैतृक गांव तक पहुंचाने की विकट चुनौती खड़ी हो गई। अस्पताल में मौजूद चिकित्सा दल ने परिजनों को शव परिवहन हेतु राज्य समर्थित महाप्रयाण योजना का लाभ उठाने का परामर्श दिया था। शोकाकुल पिता और संबंधियों ने अस्पताल के संबंधित कर्मचारियों से संपर्क साधकर तुरंत वाहन की मांग की।\n\nतकनीकी खराबी का हवाला और घंटों का लंबा इंतजार\nअस्पताल कर्मियों ने परिजनों की गुहार पर वाहन देने से हाथ खड़े कर दिए और तर्क दिया कि महाप्रयाण वैन के इंजन में तकनीकी खराबी आ गई है, जिससे वह 60 किलोमीटर की लंबी दूरी तय करने में असमर्थ है। मृत बालक के संबंधी पुष्टा भतरा के अनुसार, कर्मचारियों ने पहले उन्हें ढांढस बंधाया था कि रात करीब 1 बजे तक कोई वैकल्पिक गाड़ी पहुंच जाएगी। इसी उम्मीद के सहारे पूरा परिवार शव के पास बैठकर पूरी रात जागता रहा। अगली सुबह के 10 बज गए, मगर कोई भी सरकारी गाड़ी उनकी सुध लेने नहीं पहुंची।\n\nअमानवीय सलाह और निजी वाहन की विवशता\nपरिजनों का कहना है कि जब वे बार-बार वाहन के लिए गिड़गिड़ा रहे थे, तब कुछ कर्मचारियों ने उन्हें बच्चे को अस्पताल परिसर के निकट ही दफनाने या फिर शव को दोपहिया मोटरसाइकिल पर रखकर ले जाने जैसी संवेदनहीन सलाह तक दे डाली। हालांकि, परिजन अपने सामाजिक रीति-रिवाजों और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार गांव में ही बच्चे का अंतिम संस्कार करने पर अडिग थे। अपनी जेब में पैसे न होने के कारण परिवार ने अंततः अपना राशन कार्ड गिरवी रखकर 5,000 रुपये की व्यवस्था की। इसके बाद एक निजी एंबुलेंस बुक की गई, जिसने नवजात के पार्थिव शरीर को डालेगुड़ा गांव पहुंचाया, जहां उसका अंतिम संस्कार संपन्न हुआ।\n\nइसका आप पर असर\nयह घटना सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के जमीनी स्तर पर लड़खड़ाने और निर्धन परिवारों की आर्थिक लाचारी को उजागर करती है।\n\n• भारत में: सार्वजनिक स्वास्थ्य कल्याणकारी योजनाओं की जमीनी निगरानी पर सवाल खड़े होते हैं। आपातकालीन सेवाओं के अभाव में आम जनता पर अनुचित वित्तीय दबाव पड़ता है।\n• ओडिशा में: दूरदराज के आदिवासी और ग्रामीण जिलों में शव वाहन सेवाओं की विश्वसनीयता की कमी साफ दिखती है। जरूरतमंद परिवारों को अपने बुनियादी अधिकार गिरवी रखकर आपातकालीन व्यवस्था करनी पड़ रही है।\n• मरीजों के परिजनों के लिए: अस्पताल स्तर पर वैकल्पिक साधनों की अनुपस्थिति संकट को कई गुना बढ़ा देती है। ऐसी विवशताओं के कारण शोकाकुल परिवारों को भारी मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना झेलनी पड़ती है।\n• प्रशासनिक जवाबदेही पर: आवश्यक वाहनों के रख-रखाव में लापरवाही सीधे तौर पर बुनियादी सेवाओं को पंगु बना देती है। समय पर तकनीकी खामियां न सुधारने का खामियाजा गरीब जनता को भुगतना पड़ता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह संकट प्राथमिक तौर पर सरकारी शव वाहन के खराब होने और आपातकालीन स्थिति में अस्पताल प्रबंधन द्वारा किसी वैकल्पिक साधन की व्यवस्था न करने के कारण पैदा हुआ।\n\n• सीधा कारण: अस्पताल कर्मियों ने बताया कि उपलब्ध महाप्रयाण वाहन के इंजन में गंभीर तकनीकी खराबी थी। इस कारण वाहन 60 किलोमीटर की दूरी तय करने में असमर्थ बताया गया।\n• प्रशासनिक विफलता: रात 1 बजे गाड़ी उपलब्ध कराने का आश्वासन देकर परिजनों को सुबह 10 बजे तक प्रतीक्षा में रखा गया। आपातकालीन स्थिति के लिए कोई दूसरा सरकारी वाहन उपलब्ध नहीं कराया गया।\n• आर्थिक लाचारी: परिवार के पास 5,000 रुपये का निजी किराया तुरंत चुकाने के साधन नहीं थे। अपनी सामाजिक मान्यताओं के तहत गांव में अंतिम संस्कार करने की जिद के चलते उन्हें राशन कार्ड गिरवी रखना पड़ा।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. यह मामला किस स्थान और जिले से जुड़ा है?\nयह घटना ओडिशा के नबरंगपुर जिले के डालेगुड़ा गांव के एक परिवार के साथ घटी, जिनका बच्चा कोरापुट के अस्पताल में भर्ती था।\n\n2. बच्चे को किस अस्पताल में भर्ती कराया गया था?\nनवजात को कोरापुट स्थित शहीद लक्ष्मण नायक मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में रेफर किया गया था, जहां उसकी मौत हो गई।\n\n3. परिवार को राशन कार्ड क्यों गिरवी रखना पड़ा?\nसरकारी महाप्रयाण वाहन न मिलने पर निजी एंबुलेंस का 5,000 रुपये किराया चुकाने के लिए परिवार को राशन कार्ड गिरवी रखना पड़ा।\n\n4. सरकारी कर्मचारियों ने वाहन देने से क्यों मना किया?\nकर्मचारियों ने कहा कि महाप्रयाण वाहन के इंजन में खराबी है और वह 60 किलोमीटर दूर गांव तक नहीं जा सकता।",
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  "category": "ओडिशा",
  "publishedAt": "2026-10-10",
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    "ओडिशा",
    "नबरंगपुर",
    "महाप्रयाण सेवा",
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