{
  "type": "article",
  "title": "ओडिशा तट पर प्रलय का नया परीक्षण, हवा में रास्ता बदलकर दुश्मन के रडार को चकमा देने में सक्षम",
  "summary": "रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ने ओडिशा तट पर अपनी अत्याधुनिक सतह से सतह पर मार करने वाली क्वासी-बैलिस्टिक मिसाइल प्रलय का सफल परीक्षण पूरा किया। ठोस प्रणोदक आधारित यह स्वदेशी हथियार 150 से 500 किलोमीटर के दायरे में स्थित सैन्य प्रतिष्ठानों पर भारी पारंपरिक विस्फोटकों के साथ सटीक प्रहार करने में सक्षम है।",
  "content": "ओडिशा के तटीय परीक्षण केंद्र से भारत ने स्वदेशी सामरिक मिसाइल प्रलय की क्षमताओं को परखने के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षण सफलतापूर्वक संपन्न किया। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की देखरेख में हुआ यह युद्धाभ्यास देश की रक्षा पंक्ति को सशक्त करने की दिशा में बड़ा मील का पत्थर माना जा रहा है। ठोस प्रणोदक मोटर के सहारे उड़ान भरने वाली यह अत्याधुनिक प्रणाली सीमा पार 500 किलोमीटर तक की परिधि में मौजूद सैन्य ढांचों को तबाह करने की पूरी ताकत रखती है। अपनी अनूठी क्वासी-बैलिस्टिक प्रक्षेपवक्र क्षमता के कारण यह मिसाइल अपेक्षाकृत कम ऊंचाई पर आगे बढ़ती है और बीच हवा में अपना मार्ग बदलने का सामर्थ्य रखती है, जिससे विरोधी सेना की वायु रक्षा प्रणालियों के लिए इसे ट्रैक करना अथवा नष्ट करना बेहद जटिल साबित होता है।\n\nसुरक्षा बंदोबस्त और अभ्यास की रूपरेखा\nइस महत्वपूर्ण परीक्षण को अंजाम देने से पहले संबंधित अधिकारियों ने सुरक्षा के कड़े प्रोटोकॉल लागू किए थे। इसके तहत नागरिक और सैन्य विमानन सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से 595 किलोमीटर लंबे विस्तृत गलियारे के लिए NOTAM यानी नोटिस टू एयरमैन जारी किया गया था। केवल हवाई क्षेत्र ही नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर भी पूरी सतर्कता बरती गई। परीक्षण स्थल के दो किलोमीटर के दायरे में रहने वाले स्थानीय निवासियों को सुरक्षा कारणों से एहतियातन अस्थायी रूप से अन्य सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया था। हथियार के सफलतापूर्वक लक्ष्य की ओर प्रक्षेपित होने के बाद विशेषज्ञ दल मिसाइल के विभिन्न सेंसर डेटा, गतिशीलता और अन्य तकनीकी मानकों के प्रदर्शन का गहन विश्लेषण करने में जुटे हैं।\n\nमारक दूरी, ईंधन और पेलोड क्षमता का ब्योरा\nप्रलय पूर्ण रूप से स्वदेशी तकनीक पर आधारित सतह से सतह पर मार करने वाली कम दूरी की सामरिक मिसाइल है। इसमें ठोस ईंधन आधारित रॉकेट मोटर लगाई गई है, जो इसे बेहद कम चेतावनी समय में तेजी से लॉन्च करने की क्षमता प्रदान करती है। इसकी प्रभावी स्ट्राइक रेंज 150 किलोमीटर से लेकर 500 किलोमीटर तक मापी गई है। पेलोड ले जाने के मामले में यह प्रणाली असाधारण क्षमता प्रदर्शित करती है, जहां यह 500 किलोग्राम से लेकर 1,000 किलोग्राम वजन तक के विभिन्न प्रकार के पारंपरिक वारहेड को अपने साथ ले जा सकती है। यह भारी वजनदार पेलोड क्षमता इसे रणनीतिक रूप से दुश्मन के बड़े केंद्रों पर अत्यंत विनाशकारी प्रहार करने के योग्य बनाती है।\n\nसड़क मार्ग से तैनाती और मोबाइल लॉन्चर की सुविधा\nरणनीतिक संचालन को ध्यान में रखते हुए इस मिसाइल प्रणाली को मोबाइल लॉन्चर पर स्थापित किया गया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि सुरक्षा बल इसे भारी वाहनों के जरिए सामान्य सड़क मार्गों से किसी भी दुर्गम या अग्रिम सीमावर्ती मोर्चे पर आसानी से पहुंचा सकते हैं। पहियों पर तैनात होने की इस खूबी के चलते सैन्य कमांडरों को किसी आपात स्थिति में लॉन्चिंग स्थल को तुरंत बदलने की रणनीतिक छूट मिलती है। इससे न केवल विरोधी जासूसी उपग्रहों और रडार की नजर से हथियार को सुरक्षित रखा जा सकता है, बल्कि जवाबी कार्रवाई की तैयारी को भी कुछ ही मिनटों में पूरा किया जा सकता है।\n\nक्वासी-बैलिस्टिक उड़ान प्रणाली की तकनीकी बारीकियां\nप्रलय की सामरिक ताकत का सबसे बड़ा आधार इसकी क्वासी-बैलिस्टिक उड़ान तकनीक है। साधारण बैलिस्टिक मिसाइलें एक पूर्व-निर्धारित परवलयाकार चाप यानी फिक्स्ड ट्रेजेक्टरी पर चलती हैं, जिनका गणितीय अनुमान कंप्यूटर और ट्रैकिंग रडार आसानी से लगा लेते हैं। इसके विपरीत, क्वासी-बैलिस्टिक मिसाइल वायुमंडल की निचली परतों में अपेक्षाकृत कम ऊंचाई बनाए रखते हुए आगे बढ़ती है। उड़ान के दौरान यह मिसाइल लगातार अपनी दिशा और कोण में हेरफेर कर सकती है।\n\nउड़ान के आखिरी चरण में दिशा बदलने की यह गतिशीलता दुश्मन के रडार नेटवर्क और एयर डिफेंस मिसाइल इंटरसेप्टर को पूरी तरह भ्रमित कर देती है। इंटरसेप्टर सिस्टम जब तक इसकी गति और प्रक्षेपवक्र का सटीक आकलन करते हैं, तब तक यह दिशा बदलकर अपने टारगेट की ओर गोता लगा चुकी होती है।\n\nहवाई पट्टियों, रडार नेटवर्क और बेस पर सीधा वार\nप्रलय को मुख्य रूप से युद्धक्षेत्र में रणनीतिक रूप से संवेदनशील ठिकानों पर अचूक सर्जिकल प्रहार करने के उद्देश्य से डिजाइन किया गया है। इसके जरिए विरोधी पक्ष के कम्युनिकेशन सेंटर, रडार प्रतिष्ठान, कमांड एंड कंट्रोल बंकर और अग्रिम लड़ाकू एयरबेस को एक ही वार में ध्वस्त किया जा सकता है। विभिन्न प्रकार के मिशनों के अनुरूप इसमें अलग-अलग पारंपरिक विस्फोटक वारहेड लगाए जा सकते हैं\n\n• हाई एक्सप्लोसिव प्री-फॉर्म्ड फ्रैगमेंटेशन (HEPF): यह वारहेड हवा में फटकर हजारों तीखे धातु के टुकड़ों की बारिश करता है, जिससे सतह पर मौजूद उपकरण, खुले वाहन और रडार पूरी तरह निष्क्रिय हो जाते हैं।\n• पेनेट्रेशन-कम-ब्लास्ट (PCB): कंक्रीट के मोटे बंकरों और भूमिगत कमांड सेंटरों को भेदकर उनके भीतर जाकर महाविस्फोट करने के लिए इस वारहेड का इस्तेमाल किया जाता है।\n• रनवे डिनायल पेनेट्रेशन सबम्यूनिशन (RDPS): यह वारहेड विरोधी के हवाई अड्डों की पट्टियों में गहरे गड्ढे बनाकर उन्हें पूरी तरह अनुपयोगी कर देता है, ताकि उनके लड़ाकू विमान उड़ान न भर सकें।\n\nसटीक प्रहार के लिए इनर्शियल नेविगेशन और आरएफ सीकर\nप्रलय में उच्चतम सटीकता सुनिश्चित करने के लिए सबसे आधुनिक गाइडेंस एवं नेविगेशन तकनीक का समावेश किया गया है। इसमें एडवांस्ड इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम (INS) के साथ-साथ रेडियो फ्रीक्वेंसी (RF) सीकर मौजूद है। इनर्शियल नेविगेशन प्रणाली मिसाइल को बिना किसी बाहरी जीपीएस सिग्नल पर निर्भर रहे उड़ान के दौरान अपनी सटीक स्थिति, गति और दिशा की निरंतर गणना करने में मदद करती है। वहीं, इसका रेडियो फ्रीक्वेंसी सीकर अंतिम क्षणों में लक्ष्य को सटीकता से खोजकर उस पर केंद्रित होने का काम करता है, जिससे मिसाइल तीव्र गति में भी अपने तयशुदा बिंदु पर सटीक प्रहार करती है।\n\nपरियोजना की शुरुआत और विकास में शामिल संस्थान\nइस सामरिक हथियार को विकसित करने की औपचारिक शुरुआत मार्च 2015 में हुई थी, जब रक्षा मंत्रालय ने ‘प्रोजेक्ट प्रलय’ को औपचारिक मंजूरी दी थी। डीआरडीओ के तत्वावधान में हैदराबाद स्थित रिसर्च सेंटर इमारत (RCI) ने इस प्रणाली के निर्माण में मुख्य भूमिका निभाई। इस विशाल परियोजना को सफल बनाने में डीआरडीओ की कई प्रमुख वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं ने अपना साझा योगदान दिया\n\n• डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेटरी (DRDL) और एडवांस्ड सिस्टम्स लेबोरेटरी (ASL): मिसाइल के प्रणोदन, एयरोडायनामिक्स और रॉकेट मोटर के विकास से जुड़े प्रमुख केंद्र।\n• आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (ARDE) और हाई एनर्जी मैटेरियल्स रिसर्च लेबोरेटरी (HEMRL): घातक पारंपरिक विस्फोटकों, वारहेड संरचना और विशेष रासायनिक प्रणोदक सामग्री के विशेषज्ञ।\n• डिफेंस मेटलर्जिकल रिसर्च लेबोरेटरी (DMRL) और टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेटरी (TBRL): उन्नत मिश्र धातुओं, थर्मल शील्ड और टर्मिनल चरण के विस्फोट प्रभावों का विश्लेषण करने वाले संस्थान।\n• रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (इंजीनियर्स) और इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज (ITR): मोबाइल लॉन्चर प्लेटफॉर्म के इंजीनियरिंग समाधान और ओडिशा तट पर वास्तविक परीक्षण संचालन के संचालक।\n\nऔद्योगिक उत्पादन के स्तर पर सरकारी उपक्रम भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) को डेवलपमेंट-कम-प्रोडक्शन पार्टनर बनाया गया, जिन्होंने इस हथियार प्रणाली को एकीकृत किया। इस सफल परीक्षण के साक्षी के रूप में डीआरडीओ के शीर्ष वैज्ञानिकों के अतिरिक्त भारतीय थलसेना, भारतीय वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारी और संबंधित विनिर्माण उद्योगों के प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे।\n\nचीन और पाकिस्तान के मिसाइल शस्त्रागार का मुकाबला\nप्रलय को दक्षिण एशियाई भू-राजनीतिक परिदृश्य में शक्ति संतुलन साधने वाले एक अनिवार्य हथियार के रूप में आंका जा रहा है। सैन्य विश्लेषक इसकी सीधी तुलना चीन की DF-12 और पाकिस्तान की नस्र जैसी छोटी दूरी की सामरिक मिसाइलों से करते हैं। भविष्य की सैन्य योजनाओं के अनुसार, प्रलय को देश की प्रस्तावित इंटीग्रेटेड रॉकेट फोर्स में प्रमुख आधार स्तंभ के तौर पर शामिल किया जाएगा। इस एकीकृत रॉकेट फोर्स के तहत ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल, लंबी दूरी की निर्भय सबसोनिक क्रूज मिसाइल और पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर को एक साझा ऑपरेशनल कमांड के तहत संगठित किया जाना है, जिससे युद्ध के मैदान में पारंपरिक हथियारों से समन्वित भारी गोलाबारी की जा सके।\n\nइसका आप पर असर\nयह सफल मिसाइल परीक्षण देश की पारंपरिक निवारक क्षमता को मजबूत करता है और रणनीतिक सुरक्षा परिदृश्य को अधिक सक्षम बनाता है।\n\n• भारत में: सीमावर्ती क्षेत्रों में पारंपरिक तोपखाने और मिसाइल प्रणालियों की मारक दूरी में भारी वृद्धि होगी। इससे तीनों सेनाओं की साझा रॉकेट फोर्स को बिना परमाणु हथियारों के भी दुश्मन के अग्रिम सैन्य ठिकानों पर त्वरित हमले की ताकत मिलेगी।\n• ओडिशा में: चांदीपुर और तटीय रक्षा परीक्षण केंद्रों के आसपास सुरक्षा प्रोटोकॉल और एहतियाती ड्रिल का अभ्यास सुचारू रूप से पूरा हुआ। परीक्षण के दौरान स्थानांतरित किए गए स्थानीय निवासियों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित की गई।\n• रक्षा उद्योग पर: सार्वजनिक क्षेत्र की बीईएल और बीडीएल जैसी कंपनियों के लिए घरेलू उत्पादन और रोजगार के नए अवसर बनेंगे। रक्षा खरीद में आत्मनिर्भरता बढ़ने से विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम होगी।\n• रणनीतिक संतुलन पर: पड़ोसी देशों के रडार और एयर डिफेंस इंटरसेप्टर नेटवर्क के खिलाफ भारत की मारक सटीकता कई गुना बढ़ जाएगी। इससे भविष्य के सैन्य टकरावों में सीमा पार कमांड सेंटरों को तेजी से निष्क्रिय किया जा सकेगा।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह परीक्षण भारत की सामरिक सीमाओं पर आधुनिक एयर डिफेंस प्रणालियों के विस्तार के जवाब में एक फुर्तीले पारंपरिक हथियार की आवश्यकता के चलते किया गया।\n\n• सीधे कारण: मिसाइल के प्रणोदन, इनर्शियल नेविगेशन और पैंतरेबाजी की पुष्टि के लिए वास्तविक तटीय वातावरण में उड़ान मानकों का सत्यापन करना आवश्यक था। वैज्ञानिकों ने उड़ान के अंतिम चरण में दिशा बदलने और लक्ष्य साधने की क्षमता का लाइव टेस्ट किया।\n• क्षेत्रीय स्थितियां: सीमा पार चीन की डीएफ-12 और पाकिस्तान की नस्र जैसी छोटी दूरी की मिसाइलों की तैनाती के कारण एक सटीक और मोबाइल पारंपरिक विकल्प तैयार करना अनिवार्य हो गया था। पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइलें आधुनिक एंटी-मिसाइल प्रणालियों की नजर में आसानी से आ जाती हैं, जिसके तोड़ के रूप में क्वासी-बैलिस्टिक तकनीक चुनी गई।\n• पिछली पृष्ठभूमि: मार्च 2015 में प्रोजेक्ट प्रलय को हरी झंडी मिलने के बाद से डीआरडीओ की कई प्रयोगशालाओं ने इसके विभिन्न उप-प्रणालियों और ठोस मोटर का निरंतर परीक्षण किया है। प्रारंभिक उड़ानों की सफलता के बाद अब इसे औद्योगिक उत्पादन और सेना में शामिल करने की दिशा में आगे बढ़ाया जा रहा है।\n• आगामी कदम: विस्तृत टेलीमेट्री डेटा के मूल्यांकन के बाद सेना और वायुसेना के साथ मिलकर यूजर ट्रायल्स की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। इसके बाद एकीकृत रॉकेट फोर्स के तहत इसकी बड़े पैमाने पर तैनाती की जाएगी।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. प्रलय मिसाइल का सफल परीक्षण कहां आयोजित किया गया?\nप्रलय मिसाइल का यह परीक्षण ओडिशा तट के पास स्थित एक रक्षा परीक्षण केंद्र से सफलतापूर्वक संपन्न किया गया।\n\n2. प्रलय मिसाइल की अधिकतम मारक दूरी कितनी है?\nइस सतह से सतह पर मार करने वाली सामरिक मिसाइल की स्ट्राइक रेंज 150 से 500 किलोमीटर तक है।\n\n3. यह मिसाइल कितना वजनदार पेलोड ले जाने में सक्षम है?\nप्रलय मिसाइल 500 से 1,000 किलोग्राम वजन तक के विभिन्न प्रकार के पारंपरिक विस्फोटक वॉरहेड ले जा सकती है।\n\n4. क्वासी-बैलिस्टिक मिसाइल की क्या विशेषता होती है?\nयह मिसाइल तय परवलयाकार रास्ते पर उड़ने के बजाय कम ऊंचाई पर चलती है और हवा में अपनी दिशा बदल सकती है, जिससे रडार चकमा खा जाते हैं।\n\n5. परीक्षण से पहले हवाई सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाया गया था?\nउड़ान सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए 595 किलोमीटर लंबे इलाके के लिए नॉटम (NOTAM) नोटिस जारी किया गया था।\n\n6. इस मिसाइल परियोजना को आधिकारिक मंजूरी कब मिली थी?\nडीआरडीओ की इस परियोजना को रक्षा मंत्रालय की ओर से मार्च 2015 में औपचारिक मंजूरी दी गई थी।\n\n7. प्रलय मिसाइल में किन कंपनियों ने निर्माण साझेदार के रूप में काम किया?\nसार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) इसके विकास और उत्पादन साझेदार हैं।\n\n8. प्रलय में किस तरह के पारंपरिक वॉरहेड इस्तेमाल किए जा सकते हैं?\nइसमें हाई एक्सप्लोसिव फ्रैगमेंटेशन, पेनेट्रेशन-कम-ब्लास्ट और एयरबेस की पट्टियां तबाह करने वाले रनवे डिनायल वॉरहेड लगाए जा सकते हैं।",
  "url": "https://trendkia.com/odisha/odisha-tata-para-pralay-ka-naya-parikshana-hava-men-rasta-badalakara-dushmana-ke-radara-ko-chakama-dene-men-sakshama-55722",
  "category": "ओडिशा",
  "publishedAt": "2026-11-03",
  "tags": [
    "प्रलय मिसाइल",
    "डीआरडीओ",
    "ओडिशा परीक्षण",
    "क्वासी बैलिस्टिक",
    "भारतीय सेना",
    "इंटीग्रेटेड रॉकेट फोर्स",
    "रक्षा तकनीक"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia",
  "whatItMeansForYou": "यह सफल मिसाइल परीक्षण देश की पारंपरिक निवारक क्षमता को मजबूत करता है और रणनीतिक सुरक्षा परिदृश्य को अधिक सक्षम बनाता है।\n\n• भारत में: सीमावर्ती क्षेत्रों में पारंपरिक तोपखाने और मिसाइल प्रणालियों की मारक दूरी में भारी वृद्धि होगी। इससे तीनों सेनाओं की साझा रॉकेट फोर्स को बिना परमाणु हथियारों के भी दुश्मन के अग्रिम सैन्य ठिकानों पर त्वरित हमले की ताकत मिलेगी।\n• ओडिशा में: चांदीपुर और तटीय रक्षा परीक्षण केंद्रों के आसपास सुरक्षा प्रोटोकॉल और एहतियाती ड्रिल का अभ्यास सुचारू रूप से पूरा हुआ। परीक्षण के दौरान स्थानांतरित किए गए स्थानीय निवासियों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित की गई।\n• रक्षा उद्योग पर: सार्वजनिक क्षेत्र की बीईएल और बीडीएल जैसी कंपनियों के लिए घरेलू उत्पादन और रोजगार के नए अवसर बनेंगे। रक्षा खरीद में आत्मनिर्भरता बढ़ने से विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम होगी।\n• रणनीतिक संतुलन पर: पड़ोसी देशों के रडार और एयर डिफेंस इंटरसेप्टर नेटवर्क के खिलाफ भारत की मारक सटीकता कई गुना बढ़ जाएगी। इससे भविष्य के सैन्य टकरावों में सीमा पार कमांड सेंटरों को तेजी से निष्क्रिय किया जा सकेगा।",
  "whyItHappened": "यह परीक्षण भारत की सामरिक सीमाओं पर आधुनिक एयर डिफेंस प्रणालियों के विस्तार के जवाब में एक फुर्तीले पारंपरिक हथियार की आवश्यकता के चलते किया गया।\n\n• सीधे कारण: मिसाइल के प्रणोदन, इनर्शियल नेविगेशन और पैंतरेबाजी की पुष्टि के लिए वास्तविक तटीय वातावरण में उड़ान मानकों का सत्यापन करना आवश्यक था। वैज्ञानिकों ने उड़ान के अंतिम चरण में दिशा बदलने और लक्ष्य साधने की क्षमता का लाइव टेस्ट किया।\n• क्षेत्रीय स्थितियां: सीमा पार चीन की डीएफ-12 और पाकिस्तान की नस्र जैसी छोटी दूरी की मिसाइलों की तैनाती के कारण एक सटीक और मोबाइल पारंपरिक विकल्प तैयार करना अनिवार्य हो गया था। पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइलें आधुनिक एंटी-मिसाइल प्रणालियों की नजर में आसानी से आ जाती हैं, जिसके तोड़ के रूप में क्वासी-बैलिस्टिक तकनीक चुनी गई।\n• पिछली पृष्ठभूमि: मार्च 2015 में प्रोजेक्ट प्रलय को हरी झंडी मिलने के बाद से डीआरडीओ की कई प्रयोगशालाओं ने इसके विभिन्न उप-प्रणालियों और ठोस मोटर का निरंतर परीक्षण किया है। प्रारंभिक उड़ानों की सफलता के बाद अब इसे औद्योगिक उत्पादन और सेना में शामिल करने की दिशा में आगे बढ़ाया जा रहा है।\n• आगामी कदम: विस्तृत टेलीमेट्री डेटा के मूल्यांकन के बाद सेना और वायुसेना के साथ मिलकर यूजर ट्रायल्स की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। इसके बाद एकीकृत रॉकेट फोर्स के तहत इसकी बड़े पैमाने पर तैनाती की जाएगी।",
  "questionsAndAnswers": [
    {
      "question": "प्रलय मिसाइल का सफल परीक्षण कहां आयोजित किया गया?",
      "answer": "प्रलय मिसाइल का यह परीक्षण ओडिशा तट के पास स्थित एक रक्षा परीक्षण केंद्र से सफलतापूर्वक संपन्न किया गया।"
    },
    {
      "question": "प्रलय मिसाइल की अधिकतम मारक दूरी कितनी है?",
      "answer": "इस सतह से सतह पर मार करने वाली सामरिक मिसाइल की स्ट्राइक रेंज 150 से 500 किलोमीटर तक है।"
    },
    {
      "question": "यह मिसाइल कितना वजनदार पेलोड ले जाने में सक्षम है?",
      "answer": "प्रलय मिसाइल 500 से 1,000 किलोग्राम वजन तक के विभिन्न प्रकार के पारंपरिक विस्फोटक वॉरहेड ले जा सकती है।"
    },
    {
      "question": "क्वासी-बैलिस्टिक मिसाइल की क्या विशेषता होती है?",
      "answer": "यह मिसाइल तय परवलयाकार रास्ते पर उड़ने के बजाय कम ऊंचाई पर चलती है और हवा में अपनी दिशा बदल सकती है, जिससे रडार चकमा खा जाते हैं।"
    },
    {
      "question": "परीक्षण से पहले हवाई सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाया गया था?",
      "answer": "उड़ान सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए 595 किलोमीटर लंबे इलाके के लिए नॉटम (NOTAM) नोटिस जारी किया गया था।"
    },
    {
      "question": "इस मिसाइल परियोजना को आधिकारिक मंजूरी कब मिली थी?",
      "answer": "डीआरडीओ की इस परियोजना को रक्षा मंत्रालय की ओर से मार्च 2015 में औपचारिक मंजूरी दी गई थी।"
    },
    {
      "question": "प्रलय मिसाइल में किन कंपनियों ने निर्माण साझेदार के रूप में काम किया?",
      "answer": "सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) इसके विकास और उत्पादन साझेदार हैं।"
    },
    {
      "question": "प्रलय में किस तरह के पारंपरिक वॉरहेड इस्तेमाल किए जा सकते हैं?",
      "answer": "इसमें हाई एक्सप्लोसिव फ्रैगमेंटेशन, पेनेट्रेशन-कम-ब्लास्ट और एयरबेस की पट्टियां तबाह करने वाले रनवे डिनायल वॉरहेड लगाए जा सकते हैं।"
    }
  ]
}