बलूचिस्तान में बलोच विद्रोहियों के प्रहार से घबराई पाकिस्तानी सेना, अपने ही मारे गए सैनिकों की पार्थिव देह छोड़कर भागी बलूचिस्तान में बलोच विद्रोहियों के बढ़ते हमलों के बीच पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा अपने ही साथियों के शव लावारिस छोड़ने का मामला सामने आया है। वर्ष 2026 में अब तक सात सौ से अधिक सुरक्षाकर्मियों की जान जा चुकी है, जबकि सेना नेतृत्व सवालों के घेरे में है। दक्षिण एशिया के अशांत क्षेत्र बलूचिस्तान के बंजर रेगिस्तानी इलाकों में पाकिस्तानी सैन्य टुकड़ियों की एक बेहद हैरान करने वाली स्थिति देखने को मिल रही है। बलोच लिबरेशन आर्मी के निरंतर और सुनियोजित छापों के सम्मुख पाकिस्तानी सुरक्षा बल इस कदर दबाव में आ चुके हैं कि वे झड़पों के दौरान मारे जाने वाले अपने ही साथियों के पार्थिव शरीर वहीं लावारिस स्थिति में छोड़कर पीछे हट रहे हैं। सुरक्षा मोर्चे पर खड़े सैनिकों को इस तरह छोड़ देने की नीति रावलपिंडी के शीर्ष सैन्य नेतृत्व, विशेष रूप से सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर के प्रशासनिक रवैये पर कड़े सवाल खड़े कर रही है। युद्धक्षेत्र में साथियों को पीछे न छोड़ने की सैन्य परंपरा की अनदेखी संसार भर के पेशेवर सैन्य बलों का यह बुनियादी सिद्धांत रहा है कि किसी भी परिस्थिति में अपने गिरे हुए साथी को रणभूमि में अकेला नहीं छोड़ा जाता। इसके विपरीत, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा के दूरदराज चौकियों पर तैनात पाकिस्तानी सैनिकों और रेंजर्स का व्यवहार पेशेवर नियमों के विपरीत दिख रहा है। जब बलोच लिबरेशन आर्मी के सशस्त्र दस्ते सैन्य छावनियों या गश्ती दलों को घेरते हैं, तो भीषण गोलीबारी के बीच जवान अपने हताहत हुए साथियों को संभालने के बजाय अपनी जान बचाने के लिए पीछे हटने को प्राथमिकता देते हैं। इतिहास के पन्नों को पलटें तो यह रवैया नया नहीं लगता। वर्ष 1999 के कारगिल संघर्ष के समय भी पाकिस्तानी सेना के शीर्ष अधिकारियों ने अपनी ही नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री के सैकड़ों मृत सैनिकों को स्वीकार करने अथवा उनकी शिनाख्त करने से साफ मना कर दिया था। उस ऐतिहासिक घटनाक्रम में भारतीय सेना ने स्थापित मानवीय और सैन्य मूल्यों का पालन करते हुए पाकिस्तानी सैनिकों का पूरे सैनिक सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया था। दशकों बाद आज बलूचिस्तान के गर्म रेत में ठीक उसी मानसिकता की पुनरावृत्ति देखी जा रही है, जहां अपने ही वर्दीधारी कर्मियों के सम्मान की रक्षा करने में नेतृत्व असमर्थ नजर आ रहा है। सामरिक दृष्टिकोण और रणनीतिक कमजोरियों का विश्लेषण सैन्य विश्लेषक अभिजीत अय्यर-मित्रा के सामरिक आकलन का उल्लेख करते हुए रक्षा विशेषज्ञ मेजर गौरव आर्या ने पाकिस्तानी सेना की संचालन पद्धति की बुनियादी खामियों को रेखांकित किया है। विश्लेषण के अनुसार, पाकिस्तानी सेना छोटी टुकड़ियों द्वारा अचानक घुसपैठ करने या गुप्त रूप से घात लगाने जैसी टैक्टिकल गतिविधियों में चालाकी अवश्य दिखाती है, किंतु समग्र रणनीतिक स्तर पर भारी अदूरदर्शिता की शिकार रहती है। जब कोई सशस्त्र विपक्षी ताकत मजबूती से पलटवार करती है और लड़ाई लंबी खिंचती है, तो पाकिस्तानी सैन्य ढांचा दबाव बर्दाश्त करने में पूरी तरह असमर्थ साबित होता है। विश्लेषकों ने इसकी तुलना पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के ढहने के ढर्रे से की है, जहां शीर्ष क्रम के दो विकेट गिरते ही पूरी बल्लेबाजी ताश के पत्तों की तरह बिखर जाती है। वर्ष 1971 के युद्ध से लेकर कारगिल संघर्ष और अब बलूचिस्तान के मौजूदा संकट तक, जरा सा गहरा सामरिक दबाव पड़ते ही यह बल संगठित प्रतिरोध जारी रखने के बजाय मैदान छोड़ने का रास्ता अपनाता रहा है। वर्ष 2026 में हताहतों का भयावह पैमाना मौजूदा वर्ष 2026 पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के लिए बलूचिस्तान के मोर्चे पर बेहद घातक साबित हुआ है। बलोच लिबरेशन आर्मी के सुनियोजित हमलों के चलते प्रतिदिन औसतन तीन पाकिस्तानी सैनिक जान गंवा रहे हैं। इस वर्ष के प्रारंभिक महीनों से लेकर अगस्त और सितंबर 2026 तक के समग्र आंकड़ों पर नजर डालें तो अब तक 700 से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिक और अर्धसैनिक रेंजर्स बलूचिस्तान में जारी हिंसक संघर्षों में मारे जा चुके हैं। केवल अगस्त महीने के दौरान ही 50 से अधिक सैनिकों के मारे जाने की पुष्टि हुई है, जबकि कुछ क्षेत्रों के अंतिम आंकड़े जुटाए जाने शेष हैं। इतने व्यापक नुकसान के बावजूद रावलपिंडी स्थित सैन्य मुख्यालय की ओर से कोई सुधारात्मक कदम नहीं उठाया जा रहा है। सैन्य नेतृत्व की उदासीनता और प्रशासनिक प्राथमिकताएं पाकिस्तानी सेना के पूर्व अधिकारी मेजर आदिल राजा के खुलासे इस प्रशासनिक संवेदनहीनता को और अधिक उजागर करते हैं। पूर्व सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा के कार्यकाल में कई प्रशासनिक खामियां होने के बावजूद वे कम से कम हताहत सैनिकों के परिजनों से भेंट करने और संवेदना प्रकट करने उनके घर जाया करते थे। इसके विपरीत, मौजूदा सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर अपने सैनिकों के प्रति घोर उदासीनता दर्शाते हैं और बलूचिस्तान में गिरती लाशों पर कोई जमीनी प्रतिक्रिया नहीं देते। यही गैर-जिम्मेदारी नागरिक प्रशासन में भी दिखाई देती है। देश की आंतरिक सुरक्षा के प्रभारी गृह मंत्री मोहसिन नकवी अपने मुख्य कर्तव्यों पर ध्यान देने के स्थान पर दुबई में क्रिकेट मैचों का लुत्फ उठाने और तेहरान सहित अन्य विदेशी यात्राओं में उलझे रहते हैं। जिस समय सीमावर्ती और अशांत प्रांतों में सैनिकों के शव बिना अंतिम संस्कार के लावारिस पड़े रहते हैं, उस समय सत्ता के शीर्ष गलियारों में बैठे लोग अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय दौरों में व्यस्त रहते हैं। अग्रिम मोर्चे के अनुभव का अभाव और आंतरिक दमन जनरल आसिम मुनीर के पेशेवर सैन्य प्रशिक्षण और पृष्ठभूमि पर भी सैन्य हलकों में बहस छिड़ी हुई है। वे वास्तविक युद्धक्षेत्र में सैनिकों का नेतृत्व करके या अग्रिम मोर्चों पर सीधे टकराव का अनुभव लेकर शीर्ष कमान तक नहीं पहुंचे हैं, बल्कि उनका अधिकांश करियर कागजी प्रबंधन और स्टाफ ऑफिसर के प्रशासनिक पदों पर बीता है। विश्लेषकों का मानना है कि इसी कारण उनमें अग्रिम पंक्ति के सैनिकों के साथ खड़े होने वाले पारंपरिक फौजी ऑनर की कमी दिखती है। आलोचकों का कहना है कि सैन्य नेतृत्व अपनी ताकत केवल निहत्थे नागरिकों, राजनीतिक विरोधियों और महिलाओं पर आजमाता है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की तीन बुजुर्ग बहनों, अलीमा खान, नोरीन नियाजी और डॉ उजमा खान को गिरफ्तार कराकर सत्ता तंत्र अपनी धौंस जमाता है। परंतु जब बलोच लिबरेशन आर्मी के सशस्त्र लड़ाकों से सीधा मुकाबला होता है, तो वही बल बैकफुट पर चला जाता है। यहां तक कि विद्रोही संगठन का भी यह कहना रहा है कि यदि पाकिस्तानी सेना आकर अपने मारे गए कर्मियों के शव ले जाना चाहे तो उन्हें कोई बाधा नहीं पहुंचाई जाएगी, फिर भी सेना में आगे बढ़कर अपने जवानों की पार्थिव देह वापस मांगने तक का साहस नहीं दिख रहा है। इसका आप पर असर बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना को मिल रही निरंतर असफलताओं से क्षेत्रीय सुरक्षा और भू-राजनीतिक स्थिरता पर गहरा प्रभाव पड़ने वाला है। • भारत की सीमाओं पर: इस आंतरिक संकट के चलते भारतीय सीमाओं पर पाकिस्तानी सेना की पारंपरिक आक्रामकता पर दबाव बना रहेगा। जब किसी देश की सेना अपने ही आंतरिक मोर्चे पर भारी जनहानि उठाती है, तो उसकी बाह्य सैन्य आक्रामकता सीमित हो जाती है। • क्षेत्रीय सुरक्षा और नागरिकों पर: बलूचिस्तान के मुख्य व्यापारिक और ऊर्जा मार्गों पर संघर्ष तेज होने से सामान्य नागरिकों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। इस मार्ग पर यात्रा करने वाले नागरिकों और मालवाहक वाहनों को लगातार अवरोधों और जोखिम का सामना करना पड़ रहा है। • आर्थिक गलियारों पर प्रभाव: चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे से जुड़े प्रोजेक्ट्स की सुरक्षा पर भी इसका सीधा असर पड़ रहा है। इन परियोजनाओं में लगे कामगारों और विदेशी इंजीनियरों की सुरक्षा के लिए पाकिस्तानी सेना को अतिरिक्त संसाधन जुटाने पड़ रहे हैं। • सैनिक परिवारों की चिंता: लगातार हो रही मौतों और शवों की अनदेखी से आम पाकिस्तानी सैनिकों के परिवारों में आक्रोश बढ़ सकता है। अपने बच्चों को मोर्चे पर भेजने वाले परिवारों में सैन्य नेतृत्व की कार्यप्रणाली को लेकर गहरा अविश्वास पैदा हो रहा है। ऐसा क्यों हुआ बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा अपने ही साथियों के शव छोड़ने और लगातार हो रही मौतों के पीछे स्थानीय असंतोष, सामरिक विफलताएं और नेतृत्व की संवेदनहीनता मुख्य कारण हैं। • स्थानीय विद्रोह की मजबूती: बलोच लिबरेशन आर्मी के गुरिल्ला लड़ाके स्थानीय भूगोल से भली-भांति परिचित हैं और वे अचानक घात लगाकर सटीक हमले करते हैं। पाकिस्तानी सैनिक इस दुर्गम और अपरिचित रेगिस्तानी इलाके में उनके तेज हमलों का सामना नहीं कर पाते हैं। • रणनीतिक अदूरदर्शिता: पाकिस्तानी सैन्य तंत्र छोटे स्तर पर घुसपैठ या हमले करने में तत्पर रहता है, लेकिन गंभीर विरोध होने पर दबाव नहीं झेल पाता। जैसा कि कारगिल में देखा गया था, करारा पलटवार होते ही उनकी पूरी योजना बिखर जाती है। • शीर्ष नेतृत्व की उदासीनता: मौजूदा सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर फील्ड कमांडर न होकर स्टाफ ऑफिसर के प्रशासनिक पदों से आए हैं। इस कारण उनमें सैनिकों के साथ जमीनी स्तर पर जुड़ने और फौजी परंपराओं का पालन करने की इच्छाशक्ति का अभाव देखा जा रहा है। • नागरिक प्रशासन का भटकाव: देश के गृह मंत्री मोहसिन नकवी जैसे शीर्ष अधिकारी आंतरिक सुरक्षा के बजाय अंतरराष्ट्रीय दौरों और क्रिकेट आयोजनों में व्यस्त रहते हैं। राजनीतिक प्राथमिकताओं के कारण अग्रिम मोर्चे पर तैनात जवानों की सुरक्षा और उनके सम्मान को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है। सवाल-जवाब 1. बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना के खिलाफ कौन सा संगठन सक्रिय है? बलूचिस्तान में बलोच लिबरेशन आर्मी नामक सशस्त्र संगठन पाकिस्तानी सुरक्षा बलों और चौकियों पर लगातार हमले कर रहा है। 2. वर्ष 2026 में अब तक कितने पाकिस्तानी सैनिक मारे जा चुके हैं? वर्ष 2026 में जनवरी से लेकर अगस्त-सितंबर तक 700 से अधिक पाकिस्तानी सैनिक और रेंजर्स बलूचिस्तान के संघर्ष में मारे जा चुके हैं। 3. अगस्त 2026 के महीने में कितने पाकिस्तानी सैनिकों की जान गई? अगस्त 2026 के दौरान बलूचिस्तान में 50 से अधिक पाकिस्तानी सैनिक मारे गए, जबकि अंतिम आधिकारिक आंकड़े अभी आने बाकी हैं। 4. कारगिल युद्ध 1999 के दौरान पाकिस्तानी सेना ने क्या किया था? कारगिल युद्ध के समय पाकिस्तानी सेना ने नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री के अपने ही सैकड़ों मृत जवानों के शवों को पहचानने और लेने से इनकार कर दिया था। 5. कारगिल में लावारिस छोड़े गए पाकिस्तानी सैनिकों का अंतिम संस्कार किसने किया था? भारतीय सेना ने सैन्य सम्मान और मानवीय परंपराओं का निर्वहन करते हुए कारगिल में मृत पाकिस्तानी सैनिकों का अंतिम संस्कार किया था। 6. वर्तमान में पाकिस्तान के सेना प्रमुख कौन हैं? वर्तमान में पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर हैं, जिनकी नीतियों पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। 7. पूर्व सैन्य अधिकारी मेजर आदिल राजा ने जनरल मुनीर के बारे में क्या कहा? मेजर आदिल राजा के अनुसार, पूर्व प्रमुख बाजवा सैनिकों के परिवारों से मिलने जाते थे, जबकि आसिम मुनीर अपने सैनिकों के प्रति पूरी तरह बेपरवाह हैं। 8. पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी पर क्या आरोप लगाए जा रहे हैं? गृह मंत्री मोहसिन नकवी पर आरोप है कि वे आंतरिक सुरक्षा संभालने के बजाय दुबई में क्रिकेट देखने और तेहरान के दौरों में व्यस्त रहते हैं। https://trendkia.com/pakistan/balochistan-men-baloch-vidrohiyon-ke-prahara-se-ghabarai-pakistan-sena-apane-hi-mare-gae-sainikon-ki-parthiva-deha-chhorakara-bhag-36650 TrendKia — Har trend, sabse pehle.