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  "type": "article",
  "title": "हिमाचल में चेनाब का पानी ब्यास में मोड़ने की तैयारी, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं से पाकिस्तान में बढ़ी चिंता",
  "summary": "हिमाचल प्रदेश में 2,532 करोड़ रुपये की लागत वाली चेनाब-ब्यास लिंक टनल और जम्मू-कश्मीर के सलाल डैम में सेडीमेंट मैनेजमेंट टनल के निर्माण से जल प्रबंधन तंत्र मजबूत हो रहा है, जिससे पड़ोसी देश में जल संकट की आशंका बढ़ गई है।",
  "content": "जम्मू-कश्मीर में चेनाब नदी के तल से 359 मीटर की ऊंचाई पर निर्मित 1,315 मीटर लंबे रेलवे आर्च ब्रिज के बाद अब उत्तर भारत में जल प्रबंधन से जुड़ी नई बुनियादी ढांचा योजनाओं पर काम तेज हो गया है। उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेलवे लिंक परियोजना के केंद्र में स्थित यह रेलवे आर्च ब्रिज जहां कश्मीर घाटी को देश के अन्य हिस्सों से बारहमासी कनेक्टिविटी देता है, वहीं दूसरी तरफ जल संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए नई सुरंग परियोजनाओं की रूपरेखा तैयार की गई है। इन नई पहलों में हिमाचल प्रदेश की लाहुल घाटी में प्रस्तावित चेनाब-ब्यास लिंक टनल परियोजना और जम्मू-कश्मीर में सलाल बांध का नया ढांचा मुख्य रूप से शामिल हैं।\n\nपर्यटन केंद्र के रूप में विकसित हो रहा चेनाब रेलवे आर्च ब्रिज\nकश्मीर घाटी को हर मौसम में रेल नेटवर्क से जोड़े रखने के उद्देश्य से उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेलवे लिंक परियोजना का निर्माण किया गया है। इस पूरे रेल मार्ग का सबसे महत्वपूर्ण और तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण हिस्सा चेनाब रेलवे ब्रिज है। नदी तल से 359 मीटर ऊंचा यह विशाल स्टील स्ट्रक्चर अपनी इंजीनियरिंग गुणवत्ता की वजह से वैश्विक स्तर पर पहचान बना चुका है और पेरिस के एफिल टॉवर से भी अधिक ऊंचाई पर स्थित है।\n\nरेलवे के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, आम नागरिकों, पर्यटकों और इंजीनियरिंग के विद्यार्थियों के लिए इस ब्रिज के समीप एक विशेष व्यूइंग डेक और एक अत्याधुनिक म्यूजियम की स्थापना की जा रही है। इस नए म्यूजियम को जल्द ही आगंतुकों के लिए खोलने की तैयारी है। म्यूजियम के भीतर विस्तृत तस्वीरों, डिजिटल प्रेजेंटेशन और विशेष स्केल मॉडल्स के माध्यम से प्रदर्शित किया जाएगा कि किस तरह विषम भौगोलिक परिस्थितियों, भीषण हवाओं और दुर्गम चट्टानी ढलानों के बीच 467 मीटर लंबे सेंट्रल स्टील आर्च का निर्माण पूरा किया गया।\n\nइस स्थान के पर्यटन केंद्र के रूप में उभरने से स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बड़ा सहारा मिलने की उम्मीद है। व्यूइंग डेक और म्यूजियम के शुरू होने से जम्मू-कश्मीर के स्थानीय टैक्सी चालकों, छोटे दुकानदारों, टूरिस्ट गाइडों और होटल कारोबारियों की आजीविका तथा दैनिक आय में उल्लेखनीय विस्तार देखने को मिलेगा।\n\nचेनाब-ब्यास लिंक टनल परियोजना की तकनीकी रूपरेखा\nजल प्रबंधन के क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश की लाहुल घाटी में 2,532 करोड़ रुपये के अनुमानित बजट से एक व्यापक जल डायवर्जन योजना तैयार की गई है, जिसे 'लिंक-3 प्रोजेक्ट' अथवा चेनाब-ब्यास लिंक टनल प्रोजेक्ट का नाम दिया गया है। इस परियोजना के तहत हिमाचल प्रदेश के कोकसर गांव के समीप चंद्रा नदी पर 19 मीटर ऊंचे बैराज का निर्माण किया जाएगा। भौगोलिक रूप से चंद्रा नदी ही आगे चलकर चेनाब नदी का मुख्य स्वरूप लेती है।\n\nप्रस्तावित योजना के अनुसार, कोकसर बैराज से 8.7 किलोमीटर लंबी भूमिगत सुरंग खोदी जाएगी। यह 8.7 किलोमीटर लंबी टनल चेनाब बेसिन में मौजूद अतिरिक्त पानी को मोड़कर ब्यास नदी के जल प्रवाह में समाहित करेगी। यह पूरी सुरंग पीर पंजाल पर्वत श्रृंखला के नीचे से गुजरेगी और इसका भौगोलिक संरेखण प्रसिद्ध अटल टनल के निकटवर्ती क्षेत्र में स्थित होगा।\n\nइस महत्वाकांक्षी निर्माण कार्य की जिम्मेदारी नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन (NHPC) को सौंपी गई है। इस डायवर्जन टनल के माध्यम से जल बहाव को ब्यास नदी में शामिल करने के साथ ही हिमाचल प्रदेश को 4,000 मेगावॉट अतिरिक्त हाइड्रोपावर बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित होगी। केंद्र सरकार ने इस परियोजना के लिए स्पष्ट समयसीमा निर्धारित की है, जिसके तहत निर्माण कार्य 1 अगस्त 2026 से आरंभ होगा और इसे 31 जुलाई 2029 तक पूरा करने का लक्ष्य तय किया गया है।\n\nसलाल डैम पर सेडीमेंट मैनेजमेंट टनल को मंजूरी\nहिमाचल प्रदेश के साथ ही जम्मू-कश्मीर के रियासी जिले में स्थित सलाल डैम पर भी जल प्रवाह और गाद प्रबंधन से जुड़ी एक महत्वपूर्ण परियोजना को हरी झंडी दी गई है। भारत सरकार ने सलाल बांध पर 268 करोड़ रुपये की लागत से एक नई सेडीमेंट मैनेजमेंट टनल बनाने की आधिकारिक स्वीकृति प्रदान कर दी है।\n\nइस विशेष सुरंग का मुख्य उद्देश्य सलाल डैम के जलाशय में लंबे समय से जमा हो रही भारी गाद यानी सिल्ट को व्यवस्थित रूप से बाहर निकालना है। इसके अलावा, आवश्यकता पड़ने पर अथवा आपातकालीन परिस्थितियों में यह टनल जलाशय के जल बहाव को नियंत्रित और डायवर्ट करने की तकनीकी सुविधा भी उपलब्ध कराएगी, जिससे बांध की परिचालन क्षमता और जल भंडारण दक्षता में सुधार होगा।\n\nसिंधु जल समझौते की पृष्ठभूमि और भारत का कड़ा रुख\nनदियों के जल उपयोग को लेकर दोनों देशों के बीच 1960 में सिंधु जल समझौता संपन्न हुआ था। इस ऐतिहासिक संधि के तहत छह प्रमुख नदियों को दो अलग-अलग हिस्सों में विभाजित किया गया था। पूर्वी नदियों के समूह में शामिल रावी, ब्यास और सतलुज के समूचे जल उपयोग का पूर्ण अधिकार भारत को सौंपा गया था। वहीं पश्चिमी नदियों के वर्ग में आने वाली सिंधु, झेलम और चेनाब नदियों का 80 प्रतिशत पानी पाकिस्तान के उपयोग के लिए निर्धारित किया गया था, जबकि भारत को इन पश्चिमी नदियों के केवल 20 प्रतिशत जल के गैर-उपभोग्य इस्तेमाल जैसे रन-ऑफ-द-रिवर पनबिजली उत्पादन और सीमित सिंचाई का सीमित अधिकार मिला था।\n\nसीमा पार से लगातार जारी सुरक्षा चुनौतियों और पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत सरकार ने कड़ा नीतिगत रुख अख्तियार किया था। सरकार ने स्पष्ट किया था कि 'खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते' और इसी परिप्रेक्ष्य में सिंधु जल समझौते को स्थगित रखने का फैसला लिया गया था। इसके बाद से भारत अपने वैध अधिकारों के तहत उपलब्ध जल संसाधनों के अधिकतम और कुशलतम उपयोग की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है।\n\nपाकिस्तान की चिंताएं और आधिकारिक प्रतिक्रिया\nभारत की इन ढांचागत परियोजनाओं को लेकर पाकिस्तान की तरफ से तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। पाकिस्तान का दावा है कि चेनाब-ब्यास लिंक टनल परियोजना के जरिए भारत चेनाब नदी से 1.9 मिलियन एकड़-फिट पानी को डायवर्ट करने की योजना बना रहा है।\n\nपाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इस संबंध में आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा कि भारत ने इन प्रोजेक्ट्स को लेकर कोई आधिकारिक जानकारी साझा नहीं की है। विदेश मंत्रालय ने आगे कहा कि भारत पानी को हथियार बना रहा है, जिससे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी और यह 1960 की सिंधु जल संधि का सीधा और गंभीर उल्लंघन है।\n\nपाकिस्तान मुख्य रूप से एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था है और उसकी संपूर्ण सिंचाई व्यवस्था का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा सिंधु, झेलम और चेनाब के जल प्रवाह पर निर्भर है। पाकिस्तान के नीति निर्धारकों को आशंका है कि यदि चेनाब का अधिशेष जल ब्यास नदी में मोड़ दिया जाता है, तो पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में पहुंचने वाले जल स्तर में भारी गिरावट दर्ज की जाएगी। इससे वहां की कृषि भूमि के लिए सिंचाई संकट पैदा हो सकता है और जलविद्युत उत्पादन इकाइयों के संचालन में गंभीर रुकावट आ सकती है। इसके साथ ही, सलाल बांध पर 268 करोड़ रुपये की सेडीमेंट मैनेजमेंट टनल के निर्माण से भी जल प्रवाह में अनिश्चितता को लेकर पड़ोसी देश में चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं। दूसरी ओर, भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने भौगोलिक क्षेत्र में पड़ने वाली जल परियोजनाओं के निर्माण और अपने हिस्से के पानी के उपयोग को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध है।\n\nइसका आप पर असर\nहिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में प्रस्तावित जल और रेल परियोजनाओं से उत्तर भारत के ऊर्जा उत्पादन, क्षेत्रीय पर्यटन और स्थानीय रोजगार में बड़ा विस्तार होगा।\n\n• भारत में ऊर्जा सुरक्षा: चेनाब बेसिन के अतिरिक्त पानी को मोड़े जाने से हिमाचल प्रदेश को 4,000 मेगावॉट अतिरिक्त हाइड्रोपावर प्राप्त होगी। इससे राष्ट्रीय ग्रिड में स्वच्छ ऊर्जा की आपूर्ति बढ़ेगी और उत्तरी राज्यों में बिजली की उपलब्धता सुधरेगी।\n• हिमाचल प्रदेश में निर्माण और रोजगार: लाहुल घाटी में 2,532 करोड़ रुपये की लागत वाली टनल का निर्माण 1 अगस्त 2026 से 31 जुलाई 2029 के बीच चलेगा। इस तीन वर्षीय निर्माण अवधि के दौरान स्थानीय स्तर पर तकनीकी व बुनियादी ढांचे से जुड़े नए रोजगार अवसर सृजित होंगे।\n• जम्मू-कश्मीर में पर्यटन को बढ़ावा: चेनाब ब्रिज के पास जल्द ही व्यूइंग डेक और अत्याधुनिक म्यूजियम आगंतुकों के लिए खोला जाएगा। इससे स्थानीय टैक्सी चालकों, गाइडों, दुकानदारों और होटल संचालकों के लिए व्यावसायिक आमदनी में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।\n• सलाल जलाशय की दक्षता: सलाल बांध पर 268 करोड़ रुपये की सेडीमेंट मैनेजमेंट टनल बनने से बांध में जमा गाद की सफाई तेजी से होगी। इससे जलाशय की भंडारण क्षमता सुरक्षित रहेगी और बिजली उत्पादन लगातार सामान्य बना रहेगा।\n\nऐसा क्यों हुआ\nभारत द्वारा हिमालयी जल संसाधनों के पूर्ण दोहन और बुनियादी ढांचा विस्तार के पीछे जल सुरक्षा की रणनीतिक आवश्यकताएं और सीमा पार से उत्पन्न सुरक्षा चुनौतियां प्रमुख कारण हैं।\n\n• पहलगाम आतंकी हमला और नीतिगत बदलाव: पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत सरकार ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया था कि खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते। इसी के मद्देनजर सिंधु जल समझौते को स्थगित रखने और अपने हिस्से के जल का अधिकतम उपयोग करने का निर्णय लिया गया।\n• अधिशेष जल का प्रभावी उपयोग: 1960 की संधि के तहत पश्चिमी नदियों का बड़ा हिस्सा सीमा पार जाने के कारण भारत अपने घरेलू जल संसाधनों का पूरा लाभ नहीं ले पा रहा था। 8.7 किलोमीटर लंबी लिंक टनल के माध्यम से चेनाब बेसिन के अतिरिक्त पानी को ब्यास में मोड़कर ऊर्जा और सिंचाई आवश्यकताओं को पूरा किया जा रहा है।\n• जलाशय की गाद और तकनीकी आवश्यकता: सलाल डैम के जलाशय में लंबे समय से सिल्ट यानी गाद जमा हो रही थी जिससे भंडारण क्षमता प्रभावित हो रही थी। 268 करोड़ रुपये की लागत से सेडीमेंट मैनेजमेंट टनल बनाने की मंजूरी इसी परिचालन चुनौती को हल करने के लिए दी गई है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. चेनाब-ब्यास लिंक टनल परियोजना की कुल अनुमानित लागत कितनी है?\nइस परियोजना के निर्माण पर 2,532 करोड़ रुपये की लागत आने का अनुमान है।\n\n2. प्रस्तावित चेनाब-ब्यास लिंक टनल की लंबाई कितनी होगी?\nयह टनल 8.7 किलोमीटर लंबी होगी और पीर पंजाल पर्वत श्रृंखला के नीचे से गुजरेगी।\n\n3. इस टनल परियोजना का निर्माण कार्य कब से शुरू होगा और कब तक पूरा होगा?\nपरियोजना पर निर्माण कार्य 1 अगस्त 2026 से शुरू होगा और 31 जुलाई 2029 तक पूरा करने का लक्ष्य है।\n\n4. चेनाब-ब्यास टनल से हिमाचल प्रदेश को कितनी अतिरिक्त बिजली मिलेगी?\nइस टनल के तैयार होने से हिमाचल प्रदेश को 4,000 मेगावॉट अतिरिक्त हाइड्रोपावर मिलेगी।\n\n5. सलाल डैम पर बनने वाली सेडीमेंट मैनेजमेंट टनल का क्या उद्देश्य है?\n268 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाली यह टनल सलाल डैम के जलाशय में जमा गाद निकालेगी और जरूरत पड़ने पर पानी के बहाव को मोड़ेगी।\n\n6. चेनाब रेलवे आर्च ब्रिज की ऊंचाई और लंबाई कितनी है?\nयह ब्रिज नदी तल से 359 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और इसकी कुल लंबाई 1,315 मीटर है।\n\n7. चेनाब-ब्यास लिंक टनल को लेकर पाकिस्तान ने क्या आरोप लगाया है?\nपाकिस्तान का आरोप है कि भारत चेनाब से 1.9 मिलियन एकड़-फिट पानी मोड़ने की तैयारी कर रहा है, जो 1960 के सिंधु जल समझौते का उल्लंघन है।",
  "url": "https://trendkia.com/pakistan/himachal-men-chenab-ka-pani-beas-men-morane-ki-taiyari-buniyadi-dhancha-pariyojanaon-se-pakistan-men-barhi-chinta-47400",
  "category": "पाकिस्तान",
  "publishedAt": "2026-10-14",
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    "चेनाब रेलवे ब्रिज",
    "सिंधु जल समझौता",
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    "हिमाचल प्रदेश जलविद्युत"
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