जम्मू-कश्मीर विधानसभा की वो चौबीस सीटें जो आज भी पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की वापसी की याद दिलाती हैं जम्मू-कश्मीर विधानसभा में आज भी चौबीस सीटें पाकिस्तान के कब्जे वाले हिस्से के लिए रिक्त छोड़ी जाती हैं। यह व्यवस्था केवल एक प्रशासनिक नियम नहीं, बल्कि पूरे देश का वह दृढ़ संकल्प है जो अटूट दावे को रेखांकित करता है। भारतीय नक्शे का मुकुट कहे जाने वाले कश्मीर का एक बड़ा भूभाग पड़ोसी देश के अवैध नियंत्रण में है, जिसे आम बोलचाल में पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर कहा जाता है। इतिहास के दस्तावेजों में इसके साक्ष्य मौजूद हैं, किंतु इसका सबसे जीवंत और मुखर प्रमाण हमारे विधायी सदन में मौजूद वे चौबीस रिक्त पद हैं जो उस क्षेत्र के लिए छोड़े गए हैं। ये केवल लकड़ी के खाली आसन या कागजी आंकड़े नहीं हैं, बल्कि यह देश के करोड़ों नागरिकों की उस प्रतिबद्धता का प्रतीक हैं जो यह मानती है कि वह भूभाग हमेशा से हमारा अभिन्न हिस्सा रहा है और रहेगा। उन्नीस सौ सैंतालीस का संकट और घुसपैठ इस पूरी व्यवस्था की पृष्ठभूमि को समझने के लिए देश की स्वतंत्रता के तुरंत बाद अक्टूबर महीने में हुई घटनाओं पर नजर डालनी होगी। पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालीस को भारत को आजादी मिली और ब्रिटिश हुकूमत ने रियासतों को यह विकल्प दिया कि वे अपनी इच्छा से किसी भी राष्ट्र के साथ जुड़ सकती हैं या स्वतंत्र रह सकती हैं। रियासत के शासक महाराजा हरि सिंह ने आरंभ में स्वतंत्र रहने का निर्णय लिया था। लेकिन पड़ोसी मुल्क के इरादों में खोट था और उसने एक सैन्य योजना के तहत पश्तून हमलावरों के वेश में सैनिकों को घाटी में भेज दिया। हमलावरों ने भारी तबाही मचाते हुए मुजफ्फराबाद और बारामूला से होते हुए श्रीनगर की तरफ कदम बढ़ाए। जब स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई, तब महाराजा हरि सिंह ने मदद के लिए गुहार लगाई और छब्बीस अक्टूबर उन्नीस सौ सैंतालीस को विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए। इसके साथ ही कानूनी रूप से संपूर्ण भूभाग भारत का हिस्सा बन गया। सेना ने तुरंत मोर्चा संभालते हुए घुसपैठियों को खदेड़ना शुरू कर दिया, लेकिन संपूर्ण क्षेत्र को मुक्त कराने से पहले ही मामला संयुक्त राष्ट्र में चला गया। वैश्विक संस्था की मध्यस्थता से युद्ध विराम लागू हो गया और सेनाएं जहां थीं, वहीं रुक गईं। इसके परिणामस्वरूप कश्मीर का लगभग एक तिहाई हिस्सा अवैध नियंत्रण में रह गया। संविधान में प्रावधान और सीटों का गणित जब पचास के दशक में राज्य का अपना संविधान बना, तो इस ऐतिहासिक यथार्थ को उसमें विधिवत स्थान दिया गया। धारा अडतालीस के अंतर्गत यह तय किया गया कि जब तक अवैध नियंत्रण समाप्त नहीं होता, तब तक निर्धारित सीटें रिक्त रखी जाएंगी। परिसीमन के बाद जब कुल संख्या एक सौ ग्यारह हुई, तो उनमें से चौबीस सीटें सीधे तौर पर उसी क्षेत्र के लिए सुरक्षित कर दी गईं। दो हजार बाईस में अनुच्छेद तीन सौ सत्तर हटने के बाद जब नया आयोग बना, तब भी इन चौबीस सीटों के स्वरूप को नहीं बदला गया। विधानसभा की कुल संख्या बढ़ाकर एक सौ चौदह कर दी गई, जिनमें से नब्बे सीटों पर चुनाव होते हैं और शेष चौबीस सीटें आज भी उसी तरह आरक्षित और सुरक्षित रखी गई हैं। यह कदम पूरी दुनिया को यह स्पष्ट संदेश देता है कि देश ने अपनी भूमि पर से कभी अपना दावा नहीं छोड़ा है। पाकिस्तान के नियंत्रण वाले भूगोल की हकीकत जिसे सामान्य रूप से पीओके कहा जाता है, उसे पड़ोसी प्रशासन ने दो अलग-अलग हिस्सों में विभाजित कर रखा है। पहला हिस्सा तथाकथित आजाद जम्मू और कश्मीर है, जो एक पतली पट्टी के समान है और जिसकी राजधानी मुजफ्फराबाद है। इसे एक स्वतंत्र क्षेत्र के रूप में प्रदर्शित किया जाता है, लेकिन वहां की प्रशासनिक बागडोर वास्तव में केंद्रीय नियंत्रण और सेना के निर्देशों पर चलती है। दूसरा बड़ा हिस्सा गिलगित-बाल्टिस्तान है, जो कुल क्षेत्रफल का लगभग पचासी प्रतिशत हिस्सा है। यह क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों, विशाल ग्लेशियरों और पर्वतीय श्रृंखलाओं से समृद्ध है। इस भूभाग को सीधे अपने नियंत्रण में रखते हुए इसे अपना पांचवां प्रांत बनाने के प्रयास किए जाते रहे हैं. शारदा पीठ और सांस्कृतिक धरोहर की स्थिति इसी नीलम घाटी के भूभाग में प्राचीन शारदा पीठ अवस्थित है। प्राचीन काल में यह उच्च शिक्षा का प्रमुख केंद्र और प्रमुख शक्तिपीठों में शुमार हुआ करता था। ऐसा माना जाता है कि कश्मीरी संस्कृति और लिपि का उद्गम यहीं से हुआ था। वर्तमान समय में यह पवित्र स्थल अत्यंत जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है और देश के श्रद्धालु बरसों से इसके दर्शन की अभिलाषा संजोए बैठे हैं। घर वापसी की दिशा और वर्तमान परिस्थितियां आज के समय में जब राष्ट्र की सामरिक और आर्थिक ताकत निरंतर बढ़ रही है, तब इस क्षेत्र की चर्चा केवल कागजी बहसों तक सीमित नहीं है। देश के गृह मंत्री से लेकर रक्षा मंत्री तक अनेक अवसरों पर यह स्पष्ट कर चुके हैं कि वह भूभाग हमारा है और उसे वापस लेने के लिए किसी की अनुमति की आवश्यकता नहीं है। ऐसे कई प्रमुख कारक हैं जो इस क्षेत्र के पुनर्जीवन और जुड़ाव की संभावनाओं को मजबूत करते हैं। पड़ोसी देश की चरमराती अर्थव्यवस्था और राजनीतिक अस्थिरता ने वहां के आम जनजीवन को प्रभावित किया है। वहां के निवासी महंगाई, बेरोजगारी और प्रशासनिक दबाव से त्रस्त हो चुके हैं और अक्सर असंतोष के स्वर सुनाई देते हैं। इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति चीन, अफगानिस्तान और मध्य एशिया के बेहद निकट है, जहां से विदेशी गलियारे निकलते हैं। जब स्थानीय जनता देखती है कि भारतीय क्षेत्र में बुनियादी ढांचे और विकास का तेजी से विस्तार हो रहा है, तो उनके भीतर भी बेहतर भविष्य की लालसा उत्पन्न होती है. चौबीस रिक्त कुर्सियां केवल लकड़ी के ढांचे या ईंट-पत्थरों का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे राष्ट्र की अटूट आकांक्षा और स्वाभिमान का जीवंत दस्तावेज हैं। इसका आप पर असर यह विषय देश की संप्रभुता, राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमावर्ती कूटनीति से जुड़ा हुआ है जिसका सीधा प्रभाव देश की रणनीतिक स्थिति पर पड़ता है। • भारत में: यह व्यवस्था हर नागरिक को देश की अखंडता और ऐतिहासिक दावों के प्रति जागरूक रखती है। इससे राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़े मुद्दों पर जनता की वैचारिक एकजुटता मजबूत होती है। • जम्मू और कश्मीर में: स्थानीय स्तर पर परिसीमन और आरक्षित सीटों का यह ढांचा राजनीतिक प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक योजनाओं को सीधे प्रभावित करता है। इससे सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास और सुरक्षा से जुड़ी नीतियां आकार लेती हैं। सवाल-जवाब 1. जम्मू-कश्मीर विधानसभा में कितनी सीटें पीओके के लिए खाली रखी जाती हैं? जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पीओके के लिए कुल चौबीस सीटें खाली रखी जाती हैं। 2. महाराजा हरि सिंह ने विलय पत्र पर कब हस्ताक्षर किए थे? महाराजा हरि सिंह ने छब्बीस अक्टूबर 1947 को विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। 3. पीओके को पाकिस्तान ने कितने प्रशासनिक हिस्सों में बांटा है? पाकिस्तान ने पीओके को दो प्रशासनिक हिस्सों, तथाकथित आजाद जम्मू और कश्मीर तथा गिलगित-बाल्टिस्तान में बांटा है। 4. शारदा पीठ कहां स्थित है? शारदा पीठ पीओके की नीलम घाटी में स्थित है। 5. वर्तमान जम्मू-कश्मीर विधानसभा में कुल कितनी सीटें हैं? वर्तमान में जम्मू-कश्मीर विधानसभा की कुल सीटों की संख्या एक सौ चौदह है, जिनमें से नब्बे सीटों पर चुनाव होते हैं। https://trendkia.com/pakistan/jammu-kashmir-vidhanasabha-ki-vo-chaubisa-siten-jo-aja-bhi-pakistan-ke-kabje-vale-kashmir-ki-vapasi-ki-yada-dilati-hain-23769 TrendKia — Har trend, sabse pehle.