# मौजूदा 4 सूबों को 160 टुकड़ों में बांटने की तैयारी में पाकिस्तानी सेना, आसिम मुनीर के प्रशासनिक बदलाव के पीछे का असली खेल

> पाकिस्तान के चारों पारंपरिक प्रांतों को समाप्त कर उन्हें 12 से 15 नए राज्यों या 160 छोटी इकाइयों में विभाजित करने की योजना सामने आई है, जिसे नागरिक राजनीति पर सेना का शिकंजा कसने की रणनीति माना जा रहा है।

**Type:** article · **Category:** पाकिस्तान · **Published:** 2026-10-10 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/pakistan/maujuda-4-subon-ko-160-tukaron-men-bantane-ki-taiyari-men-pakistani-sena-asim-munir-ke-prashasanika-badalava-ke-pichhe-ka-asali-kh-46022 · **Language:** Hindi
**Tags:** पाकिस्तान सेना, आसिम मुनीर, शहबाज शरीफ, पाकिस्तान प्रांत, प्रशासनिक सुधार, आसिफ अली जरदारी

प्राचीन काल में मैसेडोनियाई साम्राज्य के शासक फिलिप ने विभाजन और शासन की जिस रणनीति की नींव रखी थी, इतिहास गवाह है कि सत्ता पर काबिज होने वाले निरंकुश हुक्मरान अपनी ताकत को चिरस्थाई बनाने के लिए सदियों से उसी रास्ते पर चलते रहे हैं। पाकिस्तान के मौजूदा हालात भी इसी ऐतिहासिक रणनीति के नए दौर की गवाही दे रहे हैं। इस्लामाबाद के हुकूमत गलियारों में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और देश की संसद को दरकिनार करते हुए वास्तविक सत्ता की बागडोर फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के हाथों में केंद्रित हो चुकी है। अब सेना के शीर्ष नेतृत्व की ओर से एक ऐसा प्रशासनिक नक्शा तैयार किया जा रहा है, जो मुल्क की भौगोलिक और राजनीतिक संरचना को बुनियादी रूप से बदलकर रख सकता है।

कागजों और संवैधानिक पदों के हिसाब से राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ देश के सर्वोच्च पदों पर आसीन हैं। हालांकि, ज़मीनी हकीकत यह है कि इन निर्वाचित पदों की हैसियत अब केवल नाममात्र की रह गई है। बड़े राष्ट्रीय फैसलों से लेकर आंतरिक नीतियों तक, पर्दे के पीछे से सारे निर्देश सीधे सैन्य नेतृत्व की तरफ से तय हो रहे हैं। सेना के इस दबदबे के बीच अब 1947 में देश के गठन के समय से चले आ रहे चारों ऐतिहासिक प्रांतों के अस्तित्व को समाप्त करने की एक महत्वाकांक्षी रूपरेखा सामने लाई गई है।

## चार बड़े प्रांतों को खत्म कर 160 प्रशासनिक इकाइयां बनाने की तैयारी
इस नई योजना के तहत पाकिस्तान के चार प्रमुख प्रांतों को भंग करके उनकी जगह 12 या 15 नए राज्य गठित करने का विकल्प विचाराधीन है। इतना ही नहीं, इस खाके में एक कदम और आगे बढ़कर पूरे मुल्क को 160 बहुत छोटी और कम शक्तिशाली प्रशासनिक इकाइयों में बांटने का प्रस्ताव भी शामिल है। इन छोटी इकाइयों के संचालन की व्यवस्था कैसी होगी, इसको लेकर अभी कई विवरण स्पष्ट होना बाकी हैं। इन इकाइयों का प्रशासन चुनी हुई जिला परिषदों और प्रांतीय विधानसभाओं के माध्यम से चलाया जाएगा या फिर केंद्र सरकार यानी फील्ड मार्शल मुनीर द्वारा सीधे नामित प्रशासकों के हवाले किया जाएगा, यह तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं हुई है।

प्रशासनिक ढांचे को इस तरह विखंडित करने से सीधे तौर पर किसे लाभ पहुंचेगा, यह समझना कतई मुश्किल नहीं है। राजनीतिक विश्लेषक इसे सत्ता पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करने और पारंपरिक प्रांतीय राजनीति की कमर तोड़ने के एक विवादास्पद सैन्य प्रयास के रूप में देख रहे हैं। जब प्रांत छोटे और संसाधनविहीन होंगे, तो वे इस्लामाबाद के केंद्रीय सैन्य प्रतिष्ठान के सामने अपनी स्वायत्तता की रक्षा करने की स्थिति में नहीं रहेंगे।

## जनसांख्यिकीय असंतुलन और प्रशासनिक विफलता के तर्क
सैन्य हलकों की तरफ से इस पुनर्गठन के समर्थन में बुनियादी प्रशासनिक आंकड़े पेश किए जा रहे हैं। वर्तमान समय में पाकिस्तान के चारों प्रांतों के बीच आबादी और संसाधनों का भारी असंतुलन मौजूद है। सबसे घनी आबादी वाले पंजाब प्रांत में 12.8 करोड़ नागरिक रहते हैं, जो देश की कुल आबादी के आधे से अधिक हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसके विपरीत, भौगोलिक रूप से सबसे बड़े लेकिन सबसे कम आबादी वाले बलूचिस्तान प्रांत में महज 1.5 करोड़ लोग निवास करते हैं, जो मुल्क की समूची जनसंख्या का लगभग 6 फीसदी हिस्सा है।

प्रशासनिक स्तर पर पंजाब जैसे विशाल प्रांत में सुशासन की स्थिति बेहद निराशाजनक बनी हुई है। समस्या सिर्फ प्रशासनिक भ्रष्टाचार तक सीमित नहीं है, बल्कि बुनियादी जनसुविधाओं की उपलब्धता भी चरमराई हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों को अपने सामान्य सरकारी कामकाज के लिए घंटों लंबी यात्राएं करनी पड़ती हैं। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पंजाब के निवासियों में से एक चौथाई से भी कम लोगों के पास अपने घरों में सुरक्षित और साफ पेयजल की पाइपलाइन आपूर्ति मौजूद है।

## आर्थिक तंगहाली और सेना के व्यावसायिक साम्राज्य का सच
सैन्य नेतृत्व का दावा है कि प्रांतों का अत्यधिक बड़ा आकार ही उनके सुचारू संचालन में सबसे बड़ी बाधा है और देश की वर्तमान दुर्दशा के लिए यही प्रशासनिक बनावट जिम्मेदार है। पाकिस्तान की आर्थिक हालत वाकई बदहाल है, जहां आर्थिक विकास की दर पड़ोसी देश भारत की तुलना में आधी से भी कम रह गई है। महंगाई दर लगातार दो अंकों में बनी हुई है और अंतरराष्ट्रीय कर्जों के भुगतान का बोझ देश के राजस्व के लिए पूरी तरह असहनीय हो चुका है। हालांकि, इन समस्याओं की असली जड़ केवल प्रांतों का क्षेत्रफल नहीं है।

मुल्क के इस आर्थिक और सामाजिक संकट का एक बड़ा हिस्सा सीधे तौर पर सेना के आचरण और उसकी प्राथमिकताओं से जुड़ा है। सेना देश के आम करदाताओं के पैसे पर ऐशो-आराम करती है और मुल्क के सबसे महंगे और कीमती भूखंडों के बड़े हिस्सों पर काबिज है। इसके अलावा, फौज बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक व्यवसायों का संचालन करती है, जो बाज़ार में अपने प्रतिस्पर्धी निजी कारोबारियों को डराते-धमकाते हैं और निष्पक्ष आर्थिक प्रतिस्पर्धा को पनपने नहीं देते।

## फ्रेयडियन विश्लेषण और सत्ता संतुलन को खत्म करने का मंसूबा
अपने पूरे इतिहास के दौरान पाकिस्तान ने अपने वजूद का लगभग 20 फीसदी समय प्रत्यक्ष सैन्य तानाशाही के साए में गुजारा है। वहीं शेष समय में भी सत्ता की बागडोर ऐसी नागरिक सरकारों के हाथ रही हैं जो हमेशा सेना को नाराज करने के खौफ में जीती रहीं। इसके साथ ही सेना का संस्थागत हित भारत के साथ दुश्मनी और कड़वाहट को लगातार बनाए रखने में रहा है, ताकि रक्षा बजट में भारी-भरकम राशि पहुंचती रहे और समाज में वर्दी का रसूख कायम रहे। यह नीति सेना के खजाने के लिए भले ही मुफीद रही हो, लेकिन पाकिस्तान के भविष्य और आम जनता के लिए पूरी तरह विनाशकारी साबित हुई है।

बीसवीं सदी के प्रसिद्ध विचारक और न्यूरोलॉजिस्ट सिगमंड फ्रायड के मनोविश्लेषण के सिद्धांतों के परिप्रेक्ष्य में देखें तो पाकिस्तानी सेना असल में खुद वही बीमारी है जिसका इलाज करने का वह सार्वजनिक रूप से ढोंग रचती है। मौजूदा प्रांतीय व्यवस्था में प्रशासनिक सुधारों की दरकार से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन फील्ड मार्शल की इस ताजा योजना को लेकर बेहद सतर्क रहने की दो ठोस वजहें मौजूद हैं।

पहली वजह यह है कि सीमित विविधता और कमजोर बहुलतावाद वाले देश में पंजाब और सिंध जैसे बड़े राज्य हमेशा से केंद्र की निरंकुश ताकत के खिलाफ एक जरूरी संतुलन या काउंटरवेट की भूमिका निभाते रहे हैं। कराची वाला सिंध प्रांत पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का गढ़ रहा है, जबकि पंजाब पर पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) का प्रभाव रहा है। पूर्व सैन्य तानाशाहों के दौर में भी इन दोनों सूबों ने वैकल्पिक राजनीतिक सत्ता के केंद्रों को जिंदा रखा। फील्ड मार्शल मुनीर के इस नए नक्शे का असल निशाना भी भुट्टो और शरीफ परिवारों की इसी प्रांतीय सियासत को जड़ से खत्म करना है।

दूसरी वजह यह है कि इस पूरी योजना का मसौदा खुद फील्ड मार्शल की निगरानी में तैयार हुआ है, जिन्होंने सत्ता को पूरी तरह अपनी मुट्ठी में रखने के लिए लगातार निर्मम रुख अपनाया है। चूंकि मौजूदा प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति अपने नेतृत्व में कमजोर साबित हुए हैं, इसलिए सेना ने इन दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों को भी अपने पूर्ण नियंत्रण में लेने की व्यापक तैयारी कर ली है।

## इसका आप पर असर
पाकिस्तान के प्रांतों को छोटे टुकड़ों में बांटने की इस योजना से पूरे देश की प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था पर सीधा असर पड़ेगा।

- **भारत में:** सीमा पार स्थिरता और सुरक्षा की स्थिति सीधे तौर पर प्रभावित हो सकती है। अगर पाकिस्तान में आंतरिक राजनीतिक असंतोष भड़कता है, तो सीमावर्ती क्षेत्रों में सैन्य सतर्कता और चौकसी बढ़ाने की आवश्यकता होगी।
- **पाकिस्तान में:** आम नागरिकों के लिए प्रशासनिक सीमाओं और स्थानीय पहचान में बड़ा उलटफेर देखने को मिलेगा। 160 नई इकाइयों के गठन से सरकारी दफ्तरों के अधिकार क्षेत्र बदलेंगे, जिससे दैनिक प्रशासनिक सेवाओं और पहचान से जुड़े दस्तावेजों के नियमों में भारी फेरबदल होगा।
- **क्षेत्रीय राजनीति:** पारंपरिक राजनीतिक दलों का आधार कमजोर होने की संभावना है। प्रांतीय विधानसभाओं की स्वायत्तता समाप्त होने से स्थानीय नेताओं की ताकत छिन जाएगी और सभी निर्णय केंद्रीय सैन्य प्रशासकों के हाथों में चले जाएंगे।
- **आर्थिक व्यवस्था:** नए राज्यों के गठन पर भारी प्रशासनिक खर्च होने का अनुमान है। पहले से ही कर्ज और दोहरे अंकों की महंगाई से जूझ रहे देश में नए बुनियादी ढांचे के निर्माण से आम जनता पर टैक्स का बोझ और बढ़ सकता है।

## ऐसा क्यों हुआ
पाकिस्तान में चार ऐतिहासिक प्रांतों को खत्म करके छोटी प्रशासनिक इकाइयों में बदलने की योजना के पीछे गहरे राजनीतिक और ढांचागत कारण मौजूद हैं। यह कदम सिर्फ प्रशासनिक सुगमता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे सत्ता पर पूर्ण नियंत्रण हासिल करने की मंशा काम कर रही है।

- **सत्ता का केंद्रीकरण:** केंद्र सरकार के सामने बड़े प्रांत हमेशा से एक सशक्त राजनीतिक चुनौती पेश करते रहे हैं। पंजाब और सिंध जैसे बड़े सूबों को विभाजित करने से प्रांतीय सरकारों का प्रभाव कम हो जाएगा और इस्लामाबाद स्थित सैन्य प्रतिष्ठान के लिए पूरे देश पर सीधा नियंत्रण रखना आसान हो जाएगा।
- **आबादी और संसाधनों का असंतुलन:** वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था में पंजाब अकेले 12.8 करोड़ लोगों के साथ देश की आधी से ज्यादा आबादी रखता है, जबकि बलूचिस्तान की आबादी महज 1.5 करोड़ है। इस भारी असंतुलन के कारण छोटे प्रांतों में असंतोष बढ़ता रहा है और विशाल आकार के चलते ग्रामीण इलाकों तक बुनियादी सेवाएं नहीं पहुंच पा रही हैं।
- **राजनीतिक परिवारों पर शिकंजा:** सिंध और पंजाब लंबे समय से पीपीपी और पीएमएल(एन) के गढ़ रहे हैं, जहां भुट्टो और शरीफ परिवारों का वर्चस्व रहा है। इन प्रांतों को 12 से 15 राज्यों या 160 छोटी इकाइयों में बांटने से इन राजनीतिक वंशों की ज़मीनी पकड़ कमजोर पड़ जाएगी।
- **सेना का आर्थिक वर्चस्व:** मुल्क के आर्थिक संकट और दोहरे अंकों की महंगाई के बीच सेना अपने विशाल व्यावसायिक साम्राज्य और रक्षा खर्चों पर कोई आंच नहीं आने देना चाहती। प्रांतीय स्वायत्तता को कमजोर करके संसाधनों पर केंद्रीय सैन्य नियंत्रण को और मजबूत किया जा सकता है।

## सवाल-जवाब

### 1. फील्ड मार्शल आसिम मुनीर पाकिस्तान के प्रांतों को लेकर क्या योजना बना रहे हैं?
योजना के तहत 1947 से चले आ रहे चारों ऐतिहासिक प्रांतों को समाप्त कर 12 या 15 नए राज्य अथवा 160 छोटी प्रशासनिक इकाइयां बनाने का प्रस्ताव है।

### 2. वर्तमान में पाकिस्तान के प्रांतों में आबादी का क्या संतुलन है?
पंजाब सबसे बड़ा प्रांत है जहां 12.8 करोड़ लोग रहते हैं जो कुल आबादी का आधे से अधिक है, जबकि सबसे कम आबादी वाले बलूचिस्तान में केवल 1.5 करोड़ लोग (लगभग 6 फीसदी) हैं।

### 3. पंजाब प्रांत में बुनियादी सेवाओं की क्या स्थिति बताई गई है?
पंजाब में शासन व्यवस्था कमजोर है, जहां एक चौथाई से भी कम लोगों के पास घर पर सुरक्षित पेयजल की पाइपलाइन उपलब्ध है और ग्रामीणों को दफ्तरों के लिए लंबी यात्राएं करनी पड़ती हैं।

### 4. पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की मौजूदा हालत कैसी है?
पाकिस्तान की आर्थिक विकास दर भारत की तुलना में आधी से भी कम है, महंगाई दर दो अंकों में बनी हुई है और कर्ज चुकाने की लागत असहनीय हो चुकी है।

### 5. सेना के शासन का पाकिस्तान के इतिहास में कितना हिस्सा रहा है?
पाकिस्तान ने अपने वजूद का लगभग 20 फीसदी समय सीधे तौर पर सैन्य तानाशाही के तहत बिताया है, जबकि बाकी समय में भी सरकारें फौज के दबाव में ही काम करती रही हैं।

### 6. सिंध और पंजाब प्रांत राजनीतिक रूप से क्यों महत्वपूर्ण हैं?
ये दोनों प्रांत क्रमशः पीपीपी और पीएमएल(एन) के पारंपरिक गढ़ हैं, जिन्होंने सैन्य तानाशाही के दौर में भी सत्ता के वैकल्पिक केंद्रों के रूप में काम किया था।

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