मुशाहिद हुसैन का सनसनीखेज बयान, 5 अरब डॉलर के अफगान जिहाद और लादेन की ट्रेनिंग की खुली हकीकत पाकिस्तान के सीनेटर मुशाहिद हुसैन ने खुलासा किया है कि 1980 के दशक में सीआईए और सऊदी अरब के 5 अरब डॉलर के गुप्त फंड से ओसामा बिन लादेन और 1.20 लाख लड़ाकों को तैयार किया गया था। इसी अफगान जंग की आड़ में इस्लामाबाद ने गुपचुप तरीके से अपने परमाणु हथियार भी विकसित कर लिए। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दशकों से आतंकवाद से पीड़ित होने का दावा करने वाले पाकिस्तान के भीतर से ही उसके सबसे काले इतिहास की पुष्टि हो गई है। 1980 के दशक में सोवियत संघ के खिलाफ छेड़े गए तथाकथित अफगान जिहाद की पूरी संरचना, फंडिंग और प्रशिक्षण तंत्र को लेकर इस्लामाबाद के एक वरिष्ठ राजनेता ने बेहद चौंकाने वाला खुलासा किया है। पाकिस्तान-चीन इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष और पूर्व सूचना मंत्री सीनेटर मुशाहिद हुसैन ने स्वीकार किया है कि अल-कायदा के सरगना ओसामा बिन लादेन और उसके उत्तराधिकारी अयमन अल-जवाहिरी को पाकिस्तानी जमीन पर बाकायदा शरण दी गई और उन्हें हथियारों का पूरा प्रशिक्षण दिलाया गया। मुशाहिद हुसैन के बयानों से साफ होता है कि पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान और खुफिया एजेंसी आईएसआई ने वैश्विक ताकतों के गुप्त एजेंडे के तहत लड़ाकों की पूरी फौज तैयार की थी। यह कोई अनौपचारिक या छोटी गतिविधि नहीं थी, बल्कि भारी विदेशी वित्तीय मदद से संचालित एक सुव्यवस्थित नेटवर्क था जिसने दक्षिण एशिया सहित पूरी दुनिया की सुरक्षा व्यवस्था को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। सीआईए और सऊदी अरब का 5 अरब डॉलर का वित्तीय गठजोड़ 1980 के दशक में जब सोवियत सेना ने अफगानिस्तान में प्रवेश किया, तो शीत युद्ध के उस दौर में अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए और सऊदी अरब ने मॉस्को को उलझाने के लिए एक साझा गुप्त योजना बनाई। इस परियोजना को जमीन पर उतारने के लिए पाकिस्तान को प्रमुख मोहरे के रूप में चुना गया। सीनेटर मुशाहिद हुसैन के अनुसार, अमेरिका और सऊदी अरब ने इस अभियान के लिए पाकिस्तान को लगभग 5 अरब डॉलर की भारी भरकम धनराशि मुहैया कराई थी। इस भारी बजट का मुख्य प्रबंधन पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई को सौंपा गया था। इस धन का इस्तेमाल केवल पारंपरिक मोर्चे पर लड़ने के लिए नहीं हुआ, बल्कि पाकिस्तान के विभिन्न इलाकों में मदरसों और गुप्त ठिकानों का एक विस्तृत जाल बिछाया गया। इन प्रशिक्षण केंद्रों के जरिए हजारों युवाओं का वैचारिक ब्रेनवॉश किया गया और उन्हें अत्याधुनिक हथियारों से लैस करके युद्ध के मैदान में झोंकने की पूरी रूपरेखा तैयार की गई। 1.20 लाख लड़ाकों का जमावड़ा और लादेन-जवाहिरी को विशेष प्रशिक्षण खुलासे के मुताबिक विदेशी वित्तीय मदद से तैयार इस तंत्र के तहत पाकिस्तानी धरती पर करीब 1,00,000 अफगान लड़ाकों और 20,000 अरब मूल के चरमपंथियों को खतरनाक युद्ध तकनीकों का प्रशिक्षण दिया गया। इस पूरे अभियान का सबसे घातक पहलू यह था कि इन 20,000 अरब लड़ाकों में ओसामा बिन लादेन और अयमन अल-जवाहिरी भी सीधे तौर पर शामिल थे। सीनेटर के अनुसार, अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के औपचारिक अनुरोध पर आईएसआई ने अल-कायदा के इन दोनों शीर्ष नेताओं को आधुनिक हथियार चलाने, इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस यानी आईईडी बनाने और गुरिल्ला युद्ध के दांव-पेच सिखाए। आगे चलकर इसी ओसामा बिन लादेन ने 9/11 हमलों के जरिए अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर भीषण हमला बोला, जिसकी नींव वास्तव में उसी दौर में पाकिस्तान के ट्रेनिंग कैंपों में पड़ चुकी थी। अफगान युद्ध की आड़ में पाकिस्तान का गुप्त परमाणु कार्यक्रम इस पूरे प्रकरण का दूसरा सबसे गंभीर पहलू पाकिस्तान का गुप्त परमाणु हथियार कार्यक्रम था। जिस समय वॉशिंगटन, रियाद और पश्चिमी जगत का पूरा ध्यान अफगानिस्तान में सोवियत संघ को हराने पर केंद्रित था, उस समय इस्लामाबाद के रणनीतिकार अपनी अलग महत्वाकांक्षा पूरी करने में जुटे थे। सीनेटर मुशाहिद हुसैन ने स्पष्ट किया कि जब अमेरिका सोवियत सेना को खदेड़ने के लिए पाकिस्तान पर पूरी तरह निर्भर था, तब पाकिस्तानी हुक्मरानों ने इस स्थिति का भरपूर फायदा उठाया। अमेरिका को उस दौर में पाकिस्तान के सहयोग की इतनी सख्त जरूरत थी कि उसने इस्लामाबाद के तेजी से बढ़ रहे परमाणु हथियार कार्यक्रम को देखकर भी जानबूझकर अनदेखा कर दिया। पाकिस्तान ने एक तरफ तो जिहाद के नाम पर पश्चिमी और खाड़ी देशों से अरबों डॉलर बटोरे, और दूसरी तरफ उसी दौरान गुपचुप तरीके से अपनी परमाणु बम क्षमता हासिल कर ली। तैयार फौज का कश्मीर की ओर रुख और वैश्विक नतीजों का जाल सोवियत संघ की वापसी के बाद जब विदेशी ताकतें अफगानिस्तान से हट गईं, तो पाकिस्तान के पास अत्याधुनिक हथियारों से लैस और पूरी तरह प्रशिक्षित 1 लाख से अधिक लड़ाकों का एक विशाल जमावड़ा बचा रह गया। अफगानिस्तान में मोर्चा खाली होते ही पाकिस्तानी सुरक्षा प्रतिष्ठान ने इस तैयार नेटवर्क की बंदूकों का रुख भारत और जम्मू-कश्मीर की ओर मोड़ दिया, जिसने सीमा पार आतंकवाद के एक लंबे और खूनी दौर को जन्म दिया। इसके साथ ही इसी तंत्र से निकले चरमपंथियों ने आगे चलकर पश्चिमी देशों को भी अपना निशाना बनाया, जिसका चरम 9/11 के रूप में सामने आया। पाकिस्तान के अपने वरिष्ठ राजनेता का यह बयान दुनिया के सामने इस सच्चाई को पुख्ता करता है कि इस्लामाबाद स्वयं को केवल आतंकवाद का शिकार बताकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता, क्योंकि इन खूंखार नेटवर्कों की स्थापना और संचालन में उसकी अपनी संस्थाओं की केंद्रीय भूमिका रही है। इसका आप पर असर पाकिस्तानी सीनेटर के इस आधिकारिक कबूलनामे से अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और क्षेत्रीय सुरक्षा विमर्श पर सीधा असर पड़ेगा। • भारत में: भारत की सीमाओं पर पिछले कई दशकों से जारी सीमा पार आतंकवाद को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नई दिल्ली के पक्ष को बड़ा नैतिक और कूटनीतिक संबल मिलेगा। अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने यह साबित करना आसान होगा कि पाकिस्तान में आतंकी नेटवर्क किसी स्थानीय विफलता का नहीं बल्कि सरकारी तंत्र की सोची-समझी नीति का हिस्सा रहे हैं। • वैश्विक सुरक्षा कूटनीति: पश्चिमी देशों के साथ पाकिस्तान के सुरक्षा संबंधों और रक्षा समझौतों पर नए सिरे से सवाल खड़े होंगे। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय निगरानी संस्थाओं के समक्ष पाकिस्तान के पुराने रिकॉर्ड की जांच और वित्तीय जवाबदेही तय करने का दबाव बढ़ सकता है। • ऐतिहासिक रिकॉर्ड: शीत युद्ध के दौरान आतंकवाद के पोषण में अमेरिका और खाड़ी देशों की भूमिका पर शैक्षणिक और कूटनीतिक विमर्श गहराएगा। इससे भविष्य में किसी भी क्षेत्रीय संघर्ष के दौरान छद्म लड़ाकों को खड़ा करने की नीतियों पर रोक लगाने में मदद मिल सकती है। • नागरिक सुरक्षा: चरमपंथी ढांचों की वास्तविक जड़ों की पहचान होने से भविष्य के आतंकी गठजोड़ों को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय खुफिया एजेंसियों की सतर्कता बढ़ेगी। यह पारदर्शी स्वीकारोक्ति आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई को अधिक स्पष्ट दिशा दे सकती है। ऐसा क्यों हुआ यह बड़ा खुलासा सोवियत-अफगान युद्ध के समय के गुप्त गठबंधनों और रणनीतिक प्राथमिकताओं के दस्तावेजीकरण के दौरान सामने आया है। • सोवियत संघ का अफगानिस्तान में प्रवेश: 1980 के दशक में सोवियत सेना के अफगानिस्तान पहुंचने पर अमेरिका और सऊदी अरब ने मॉस्को को हराने के लिए पाकिस्तान को आधार बनाकर छद्म युद्ध छेड़ने का निर्णय लिया। इस अभियान के लिए भारी फंडिंग और हथियारों की आपूर्ति की गई। • 5 अरब डॉलर का वित्तीय नेटवर्क: सीआईए और सऊदी अरब ने इस साझा रणनीति को धरातल पर उतारने के लिए 5 अरब डॉलर का गुप्त फंड दिया, जिसे आईएसआई ने ट्रेनिंग कैंपों और मदरसों के जरिए संचालित किया। • परमाणु कार्यक्रम को सुरक्षा कवच: अमेरिका के लिए पाकिस्तान का सहयोग उस समय इतना अनिवार्य था कि वॉशिंगटन ने इस्लामाबाद के गुप्त परमाणु हथियार विकास की ओर से आंखें मूंद लीं, जिससे पाकिस्तान अपनी सामरिक ताकत बढ़ाने में सफल रहा। सवाल-जवाब 1. सीनेटर मुशाहिद हुसैन ने किस बारे में खुलासा किया है? उन्होंने खुलासा किया कि 1980 के दशक में सीआईए और सऊदी अरब के 5 अरब डॉलर के फंड से पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन और 1.20 लाख लड़ाकों को प्रशिक्षित किया गया था। 2. अफगान जिहाद के लिए कुल कितना फंड दिया गया था? अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए और सऊदी अरब ने मिलकर इस अभियान के लिए लगभग 5 अरब डॉलर की धनराशि पाकिस्तान को दी थी। 3. इस फंड से कुल कितने लड़ाकों को ट्रेनिंग दी गई थी? इस वित्तीय सहायता से लगभग 1,00,000 अफगान लड़ाकों और 20,000 अरब लड़ाकों को हथियारों और गुरिल्ला युद्ध की ट्रेनिंग दी गई। 4. क्या ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान में ट्रेनिंग मिली थी? हां, सीनेटर के अनुसार सीआईए के अनुरोध पर आईएसआई ने ओसामा बिन लादेन और अयमन अल-जवाहिरी को हथियार और आईईडी बनाने का प्रशिक्षण दिया था। 5. अफगान युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने अपना कौन सा गुप्त मकसद पूरा किया? अमेरिका का ध्यान सोवियत संघ को हराने पर होने का फायदा उठाकर पाकिस्तान ने उसी दौरान गुप्त रूप से अपने परमाणु हथियार विकसित कर लिए। 6. सोवियत सेना के जाने के बाद इन लड़ाकों का क्या हुआ? सोवियत संघ की वापसी के बाद पाकिस्तान की आईएसआई ने इन प्रशिक्षित लड़ाकों की बंदूकों का रुख भारत और जम्मू-कश्मीर की ओर मोड़ दिया। https://trendkia.com/pakistan/mushahid-hussain-ka-sanasanikheja-bayana-5-araba-dolara-ke-afghan-jihada-aura-laden-ki-treninga-ki-khuli-hakikata-38558 TrendKia — Har trend, sabse pehle.