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  "type": "article",
  "title": "पहलगाम हमले के बाद चेनाब-ब्यास टनल पर तेज हुआ काम, पाकिस्तान में खलबली",
  "summary": "पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु समझौते को स्थगित कर भारत ने चेनाब-ब्यास लिंक टनल परियोजना की गति बढ़ा दी है, जिससे इस्लामाबाद में भारी चिंता देखी जा रही है।",
  "content": "पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत द्वारा सिंधु जल समझौते को स्थगित करने का कड़ा फैसला लिया गया, जिसके बाद से ही इस्लामाबाद में भारी बेचैनी का माहौल है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान लगातार जल बंटवारे का मुद्दा उठा रहा है, लेकिन वैश्विक स्तर पर उसकी अपीलों पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जा रहा। इस पूरे घटनाक्रम के बीच चेनाब नदी से ब्यास नदी के बेसिन की ओर प्रस्तावित 8.7 किलोमीटर लंबी चेनाब-ब्यास लिंक टनल को लेकर पाकिस्तान के भीतर तीव्र आशंकाएं पैदा हो गई हैं। पाकिस्तानी तंत्र को यह अंदेशा सता रहा है कि भारत अब पश्चिमी नदियों के प्रवाह को पूर्वी जल नेटवर्क की ओर मोड़ने की ठोस शुरुआत कर चुका है, हालांकि इस संपूर्ण इंजीनियरिंग योजना के वास्तविक तकनीकी पहलुओं में कई महत्वपूर्ण आयाम शामिल हैं।\n\nपरियोजना की रूपरेखा और तकनीकी स्वरूप\nहिमाचल प्रदेश के ऊंचे पर्वतीय इलाके लाहौल-स्पीति में बहने वाली चंद्र नदी वस्तुतः चेनाब नदी की मुख्य जलधारा है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के अंतर्गत कोकसर के समीप एक मजबूत बैराज का निर्माण करने की योजना तय की गई है। इस बैराज के जरिए नियंत्रित जलराशि को एक 8.7 किलोमीटर लंबी भूमिगत सुरंग के माध्यम से ब्यास नदी के बेसिन में मोड़ा जाएगा।\n\nचालू वर्ष के जुलाई महीने में इस संपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को लेकर एक अहम प्रगति दर्ज की गई थी। केंद्र सरकार ने इस लिंक परियोजना से जुड़े प्री-फिजिबिलिटी सर्वे, विस्तृत इंजीनियरिंग डिजाइन और सटीक मैपिंग की पूरी प्रक्रिया को बहुत तेजी से पूरा करने के स्पष्ट निर्देश जारी किए थे। सिंधु जल समझौते के तहत पाकिस्तान के साथ होने वाली नियमित बैठकों तथा हाइड्रोलॉजिकल डेटा के आदान-प्रदान पर रोक लगाए जाने के बाद से ही इस सुरंग के तकनीकी और दस्तावेजी कार्यों को धरातल पर क्रियान्वित करने की गति में अभूतपूर्व तेजी आई है। जुलाई के इस घटनाक्रम के तुरंत बाद पाकिस्तान के जल संसाधन मंत्रालय और वहां के मीडिया जगत में भारी हलचल मच गई कि भारत बिना किसी अनावश्यक विलंब के इस सुरंग के निर्माण कार्य को जमीन पर उतारने में जुट चुका है।\n\nजल प्रवाह के आंकड़े और पाकिस्तान का मूल अंदेशा\nपाकिस्तानी अधिकारियों का दावा है कि भारत इस सुरंग मार्ग से चेनाब नदी का लगभग 1.9 मिलियन एकड़ फीट (MAF) पानी हर साल ब्यास बेसिन में मोड़ने की तैयारी में है। इसके विपरीत कई जल विशेषज्ञों का यह आकलन है कि वास्तव में इस संरचना से डाइवर्ट होने वाली पानी की मात्रा इस अनुमान से काफी कम रह सकती है।\n\nजल विज्ञान के व्यावहारिक आंकड़ों के आधार पर यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या 1.9 MAF पानी मोड़े जाने से चेनाब नदी के अस्तित्व पर कोई संकट आएगा। वास्तविकता यह है कि चेनाब नदी में सालाना औसतन 36 MAF से अधिक जल प्रवाह दर्ज किया जाता है। इस विशाल प्रवाह की तुलना में 1.9 MAF जलराशि कुल वार्षिक बहाव का बेहद सीमित अंश है। इसके बावजूद पाकिस्तान की बेचैनी किसी तात्कालिक सूखे से कहीं अधिक इस परियोजना द्वारा स्थापित होने वाली नई नजीर को लेकर है। सिंधु जल समझौते के छह दशक से लंबे इतिहास में यह पहला अवसर होगा जब समझौते के तहत पाकिस्तान के लिए निर्धारित की गई पश्चिमी नदियों के पानी को मोड़कर भारत के पूर्ण नियंत्रण वाली पूर्वी नदियों के तंत्र में समाहित किया जाएगा। पाकिस्तान का मुख्य डर यह है कि यदि भारत 8.7 किलोमीटर लंबी सुरंग के जरिए सीमित मात्रा में पानी मोड़ने का मार्ग प्रशस्त कर लेता है, तो आने वाले समय में इसी इंजीनियरिंग तकनीक और भौगोलिक मार्ग के आधार पर व्यापक स्तर की अन्य परियोजनाएं भी आकार ले सकती हैं।\n\nपारंपरिक कानूनी अड़ंगों का खात्मा\nऐतिहासिक रूप से जब भी भारत चेनाब अथवा झेलम नदी पर किसी जलविद्युत या भंडारण ढांचे की योजना बनाता था, तब पाकिस्तान तुरंत सिंधु आयोग के मंच पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज करा देता था। इसके अलावा वह तटस्थ विशेषज्ञों की नियुक्ति की मांग करने अथवा अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालतों का दरवाजा खटखटाने जैसे कदमों से भारतीय परियोजनाओं को वर्षों तक कानूनी विवादों में उलझाए रखता था।\n\nवर्तमान में समझौते के स्थगन के चलते भारत ने पाकिस्तान के साथ दैनिक व मौसमी जल डेटा साझा करने की व्यवस्था बंद कर दी है। इसके परिणामस्वरूप पाकिस्तान अब अपने पुराने कूटनीतिक और कानूनी हथकंडों के जरिए भारतीय निर्माण कार्यों में रुकावट डालने में पूरी तरह असमर्थ साबित हो रहा है। यही मूलभूत कारण है कि चेनाब-ब्यास टनल जैसी रणनीतिक परियोजनाएं अब किसी भी सीमापार अवरोध के बिना निरंतर आगे बढ़ रही हैं।\n\nपाकिस्तान का आंतरिक जल संकट और बाहरी मदद की तलाश\nपाकिस्तान के कृषि और ऊर्जा क्षेत्र में गहराते जल संकट के लिए केवल सीमापार घटनाक्रम को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि उसकी अपनी व्यवस्थागत खामियां अत्यंत गंभीर हैं\n\n• जल परिवहन में भारी बर्बादी: पाकिस्तान में दशकों पुरानी और जर्जर नहर प्रणालियों के टूटने तथा निरंतर रिसाव के कारण करोड़ों लीटर उपयोगी पानी बिना उपयोग के नष्ट हो जाता है।\n• जलाशयों में गाद का जमाव: पाकिस्तान के दो सबसे प्रमुख जलाशयों तरबेला और मंगला में बड़े पैमाने पर तलछट और मिट्टी जमा हो चुकी है, जिसके चलते उनकी प्रभावी जल भंडारण क्षमता काफी घट गई है।\n• प्रांतीय स्तर पर गंभीर राजनीतिक गतिरोध: पाकिस्तान के विभिन्न प्रांतों विशेषकर पंजाब और सिंध के बीच पानी के बंटवारे को लेकर इतना गहरा अविश्वास रहा है कि पिछले 60 वर्षों में कालाबाग डैम जैसी अत्यंत आवश्यक परियोजना भी राजनीतिक कलह की भेंट चढ़कर अधर में लटकी रही।\n\nअपने घरेलू जल प्रबंधन की विफलता को सुधारने के बजाय पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार शिकायतें दर्ज कराने का प्रयास करता है। हालिया परिस्थितियों में वह इस मुद्दे में चीन की भूमिका तलाशने की चेष्टा कर रहा है। पाकिस्तानी विश्लेषकों का तर्क है कि जिस प्रकार भारत भौगोलिक दृष्टि से पाकिस्तान से ऊपरी तटवर्ती स्थिति में है, उसी प्रकार चीन भारत के मुकाबले ऊपरी भौगोलिक स्थिति रखता है। इसी धारणा के आधार पर पाकिस्तान चाहता है कि चीन ऊपरी स्तर से भारत की ओर बहने वाले पानी को रोके अथवा अमेरिका और वर्ल्ड बैंक इस द्विपक्षीय मसले में हस्तक्षेप करें। हालांकि भौगोलिक यथार्थ यह है कि ब्रह्मपुत्र नदी का अधिकांश जल प्रवाह भारत की सीमा में प्रवेश करने के उपरांत होने वाली मानसूनी वर्षा और स्थानीय सहायक नदियों से निर्मित होता है, जिसके कारण चीन द्वारा ऊपरी प्रवाह को प्रभावित करने की रणनीति भी सीमित ही रह जाती है।\n\nरणनीतिक सुरक्षा और कूटनीतिक संतुलन की आवश्यकता\nचेनाब-ब्यास लिंक टनल भारत की बढ़ती इंजीनियरिंग दक्षता और जल संप्रभुता का स्पष्ट प्रमाण बनकर उभर रही है। इसके साथ ही इस विशाल बुनियादी ढांचे के निर्माण और संचालन में भारत को दो प्रमुख मोर्चों पर निरंतर सतर्कता बरतने की आवश्यकता रेखांकित की गई है\n\n• भौतिक सुरक्षा एवं साइबर रक्षा: दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र में स्थित इस टनल, कोकसर बैराज और संबंधित नियंत्रण कक्षों को ड्रोन हमलों, संभावित तोड़फोड़ तथा उन्नत साइबर हमलों से सुरक्षित रखने के लिए बहुस्तरीय सुरक्षा तंत्र स्थापित करना आवश्यक है।\n• दृढ़ कूटनीतिक संवाद: वैश्विक समुदाय के समक्ष यह तथ्य स्पष्टता से प्रस्तुत करना होगा कि भारत अपने भौगोलिक अधिकार क्षेत्र के भीतर अपने संप्रभु और न्यायसंगत अधिकारों का विधिवत उपयोग कर रहा है, तथा सीमापार आतंकी गतिविधियों के दबाव में अपने विकासात्मक लक्ष्यों को बाधित नहीं होने देगा।\n\nयद्यपि 8.7 किलोमीटर लंबी चेनाब-ब्यास टनल से मोड़ा जाने वाला पानी चेनाब के समग्र बहाव का एक आंशिक हिस्सा ही है, परंतु इस कदम का रणनीतिक संदेश अत्यंत दूरगामी है। यह निर्माण कार्य इस नीति को रेखांकित करता है कि विकास और सुरक्षा की प्राथमिकताओं के बीच अब आतंकी दबाव की अनदेखी नहीं की जाएगी। कानूनी अड़चनों और धमकियों का सहारा लेने के बजाय पाकिस्तान को अपनी सरजमीं पर सक्रिय आतंकी नेटवर्क पर अंकुश लगाना होगा, क्योंकि यह टनल भारत की दीर्घकालिक जल सुरक्षा व्यवस्था में एक निर्णायक मोड़ साबित हो रही है।\n\nइसका आप पर असर\nचेनाब-ब्यास लिंक टनल परियोजना भारत की उत्तरी जल सुरक्षा और बुनियादी ढांचे के विस्तार को मजबूती प्रदान करेगी।\n\n• भारत में: यह परियोजना पूर्वी जल नेटवर्क में अतिरिक्त पानी उपलब्ध कराकर ऊर्जा उत्पादन और कृषि सिंचाई को बढ़ावा देगी। इसके क्रियान्वयन से हिमाचल प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों के जल बेसिन प्रबंधन को नई दिशा मिलेगी।\n• हिमाचल प्रदेश में: लाहौल-स्पीति और कुल्लू-मंडी क्षेत्रों में बेहतर जल प्रबंधन और बुनियादी ढांचे का विकास संभव होगा। स्थानीय स्तर पर नई सुरंग और बैराज के निर्माण से रोजगार और तकनीकी गतिविधियों में तेजी आएगी।\n• किसानों और जल उपभोक्ताओं के लिए: ब्यास बेसिन में पानी का प्रवाह संतुलित होने से सूखे के मौसम में कृषि को सहारा मिलेगा। नहर प्रणालियों में जल की निरंतरता से फसल उत्पादन में अनिश्चितता कम होगी।\n• सीमापार प्रभाव: पाकिस्तान के लिए यह उसकी पुरानी जल नीति और आंतरिक बर्बादी को दुरुस्त करने का कड़ा संदेश है। बिना डेटा शेयरिंग के पाकिस्तान को अपनी जल भंडारण व्यवस्था को खुद ही प्रबंधित करना होगा।\n\nऐसा क्यों हुआ\nपहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत द्वारा सिंधु जल समझौते को स्थगित करने से उत्पन्न परिस्थितियों के चलते इस रणनीतिक टनल परियोजना की गति तेज की गई है। इस कदम ने दशकों पुराने कानूनी और कूटनीतिक गतिरोध को समाप्त कर दिया है।\n\n• पहलगाम आतंकी हमला: सुरक्षा स्थिति बिगड़ने के बाद भारत ने आतंकवाद और जल सहयोग को एक साथ न चलाने का कड़ा फैसला लिया। समझौते के स्थगन ने नई परियोजनाओं के त्वरित तकनीकी मूल्यांकन का मार्ग प्रशस्त किया।\n• डेटा शेयरिंग और बैठकों पर रोक: नियमित बैठकों के रुकने से पाकिस्तानी आपत्तियों के कारण होने वाला प्रशासनिक विलंब समाप्त हो गया। इससे भारतीय एजेंसियों को तकनीकी डिजाइन और मैपिंग को तेजी से आगे बढ़ाने की स्वायत्तता मिली।\n• नदियों का प्राकृतिक दोहन: भारत अपनी सीमा के भीतर बहने वाली नदियों के न्यायसंगत और संप्रभु उपयोग को प्राथमिकता दे रहा है। दशकों तक पाकिस्तानी अदालती याचिकाओं के चलते रुके पड़े जल दोहन को अब कानूनी रूप से गति दी जा रही है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. चेनाब-ब्यास लिंक टनल की कुल लंबाई कितनी है?\nइस प्रस्तावित लिंक टनल की कुल लंबाई 8.7 किलोमीटर है, जो चंद्र नदी से ब्यास बेसिन तक जाएगी।\n\n2. यह टनल परियोजना किस राज्य और क्षेत्र में स्थित है?\nयह परियोजना हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले में कोकसर के समीप विकसित की जा रही है।\n\n3. पाकिस्तान का इस परियोजना को लेकर क्या दावा है?\nपाकिस्तान का दावा है कि भारत इस सुरंग के माध्यम से हर साल लगभग 1.9 मिलियन एकड़ फीट (MAF) पानी मोड़ने की योजना बना रहा है।\n\n4. क्या इस परियोजना से चेनाब नदी पूरी तरह सूख जाएगी?\nबिल्कुल नहीं, क्योंकि चेनाब का वार्षिक जल प्रवाह 36 MAF से अधिक है और प्रस्तावित मोड़ इसका एक बहुत छोटा हिस्सा है।\n\n5. भारत ने सिंधु जल समझौते को किस घटना के बाद स्थगित किया?\nभारत ने पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद सिंधु जल समझौते की नियमित प्रक्रियाओं को स्थगित करने का कदम उठाया।\n\n6. पाकिस्तान में जल संकट के मुख्य आंतरिक कारण क्या हैं?\nपुरानी नहरों से रिसाव, तरबेला और मंगला बांधों में गाद जमना तथा प्रांतों के बीच विवाद मुख्य आंतरिक कारण हैं।",
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  "category": "पाकिस्तान",
  "publishedAt": "2026-10-02",
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