{
  "type": "article",
  "title": "पाकिस्तान को बढ़ावा देकर डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के लिए बुला रहे नया 9/11 जैसा खतरा",
  "summary": "एक नई रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि पाकिस्तान को लेकर डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की नरमी अमेरिका के लिए 9/11 जैसे खतरे को फिर बुला सकती है. भू-राजनीतिक विशेषज्ञ सर्जियो रेस्टेली ने कहा कि इतिहास खुद को दोहरा रहा है और पाकिस्तान को बढ़ावा देना भारी पड़ेगा.",
  "content": "पाकिस्तान को लेकर अमेरिका इन दिनों जिस तरह नरम रुख अपनाए हुए है, वह आने वाले समय में उसी के लिए मुसीबत बन सकता है. एक ताजा विश्लेषण में यह आशंका जताई गई है कि रणनीतिक अहमियत रखने वाले देशों की सरकारों को अक्सर उनकी घरेलू नाकामियों के बावजूद बाहरी दबाव का सामना नहीं करना पड़ता, और पाकिस्तान के मामले में यही पैटर्न एक बार फिर दोहराया जा रहा है.\n\nअमेरिका की नरमी और यूरोपीय संघ का साथ\nरिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के प्रति अमेरिका का ढीला रवैया अकेला उदाहरण नहीं है. मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों के बावजूद यूरोपीय संघ ने भी पाकिस्तान को जीएसपी-प्लस का दर्जा जारी रखा है. कई अंतरराष्ट्रीय साझेदार इस्लामाबाद की खुलकर आलोचना करने से बचते दिख रहे हैं, क्योंकि क्षेत्रीय रणनीति में पाकिस्तान का महत्व उन्हें रोक देता है. रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यह ढील लंबे समय तक चली तो इसके नतीजे राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तर पर गंभीर हो सकते हैं, जिनकी जद में राजनीतिक विरोधी, जातीय अल्पसंख्यक समुदाय और पूरे क्षेत्र की स्थिरता आ सकती है.\n\nइतिहास फिर दोहराने की आशंका\nइटली के राजनीतिक सलाहकार, लेखक और भू-राजनीतिक विशेषज्ञ सर्जियो रेस्टेली ने टाइम्स ऑफ इजरायल में लिखे अपने लेख में कहा है, \"इतिहास अक्सर खुद को दोहराता है और दूरदृष्टि की कमी वाले नेता अपने पूर्ववर्तियों की गलतियों को दोहराते हैं. ट्रंप सरकार का पाकिस्तान को प्रोत्साहन देना ऐसी ही एक भूल है, जिसकी भारी कीमत अमेरिका को चुकानी पड़ेगी.\" उन्होंने याद दिलाया कि 1979 में अमेरिका और सऊदी अरब ने जनरल जिया-उल-हक के नेतृत्व वाले पाकिस्तान का इस्तेमाल अफगानिस्तान में सोवियत संघ के खिलाफ प्रॉक्सी युद्ध छेड़ने के लिए किया था. इसके बाद के दशकों में पाकिस्तान ने दोनों पक्षों से अपने फायदे साधे, और इसी रणनीतिक चूक का नतीजा 11 सितंबर 2001 का आतंकी हमला बनकर सामने आया.\n\nआतंकवाद के खिलाफ जंग की कीमत\nरेस्टेली के मुताबिक, आतंक के खिलाफ लड़ाई के दौरान अमेरिका की पाकिस्तान पर लगातार निर्भरता ने काबुल को तालिबान के हवाले कर दिया, और इसकी भारी कीमत खुद अमेरिका को भी चुकानी पड़ी. यानी जिस रणनीति से फायदा मिलने की उम्मीद थी, वह आखिरकार अमेरिका के लिए नुकसानदेह साबित हुई.\n\nअफगान सीमा पर बढ़ता टकराव\nविशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलने के बावजूद पाकिस्तान ने अफगान सीमा पर सैन्य कार्रवाई जारी रखी है, जिससे तालिबान अधिकारियों के साथ तनाव लगातार बढ़ रहा है. सीमा पार हमलों और हथियारबंद मुठभेड़ों की बढ़ती घटनाओं ने इस आशंका को हवा दी है कि इस्लामाबाद अपने पड़ोस में डिप्लोमैटिक बातचीत के लिए दबाव और ताकत के इस्तेमाल पर उतर आया है.\n\nसेना के हाथ में सियासी कमान?\nपाकिस्तान के घरेलू हालात भी बिगड़ते नजर आ रहे हैं. रेस्टेली के अनुसार, आलोचक अब खुलकर कहने लगे हैं कि देश की राजनीति पर सेना का दखल इतना बढ़ चुका है कि असल राजनीतिक ताकत पाकिस्तानी आर्मी चीफ मुनीर के नेतृत्व वाली सेना के ही हाथों में केंद्रित हो गई है.\n\nबलूचिस्तान में गहराता असंतोष\nरेस्टेली ने बताया कि यह सियासी घटनाक्रम बलूचिस्तान में बढ़ती अशांति के साथ-साथ चल रहा है. एक अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ने जानी-मानी बलूच कार्यकर्ता महरंग बलूच समेत कई अन्य कार्यकर्ताओं को सुनाई गई सजा की कड़ी आलोचना की है. संगठन का आरोप है कि शांतिपूर्ण राजनीतिक असहमति को तेजी से अपराध की श्रेणी में डाला जा रहा है. पाकिस्तानी अधिकारी इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं और दावा करते हैं कि हर मामला कानून के मुताबिक ही चलाया जाता है. बावजूद इसके, राजनीतिक विरोध और जातीय शिकायतों को मुख्य रूप से दबाव के जरिए दबाने की यह प्रवृत्ति बलूच समुदायों को और ज्यादा अलग-थलग कर सकती है.\n\nदक्षिण एशिया में नई तानाशाही का साया\nरेस्टेली ने आगाह किया कि विदेशों में पाकिस्तान की मौजूदा कूटनीतिक स्थिति देश के भीतर लोकतांत्रिक गिरावट को राजनीतिक कवर मुहैया करा सकती है. उनकी चेतावनी है कि यही रुझान आगे चलकर दक्षिण एशिया में एक नई तानाशाही व्यवस्था की जमीन तैयार कर सकता है.\n\nइसका आप पर असर\n• क्षेत्रीय सुरक्षा: पाकिस्तान में सेना का बढ़ता दबदबा और बलूचिस्तान जैसी अशांति गहराने का सीधा असर भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया की सुरक्षा और सीमा-पार आतंकवाद के खतरे पर पड़ सकता है.\n• वैश्विक कूटनीति: अमेरिका और यूरोपीय संघ का पाकिस्तान के प्रति नरम रुख आगे भी जारी रहा, तो आतंकवाद विरोधी वैश्विक नीतियों और मानवाधिकार मानकों पर सवाल उठते रहेंगे.\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सर्जियो रेस्टेली कौन हैं?\nवे इटली के राजनीतिक सलाहकार, लेखक और भू-राजनीतिक विशेषज्ञ हैं, जिन्होंने टाइम्स ऑफ इजरायल के लिए यह विश्लेषण लिखा है.\n\n2. रेस्टेली ने 1979 की किस घटना का हवाला दिया?\n1979 में अमेरिका और सऊदी अरब ने जनरल जिया-उल-हक के नेतृत्व वाले पाकिस्तान का इस्तेमाल अफगानिस्तान में सोवियत संघ के खिलाफ प्रॉक्सी युद्ध के लिए किया था, जिसका अंतिम नतीजा 9/11 का हमला रहा.\n\n3. रिपोर्ट में बलूचिस्तान को लेकर क्या कहा गया है?\nएक अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ने बलूच कार्यकर्ता महरंग बलूच समेत कई अन्य कार्यकर्ताओं को सुनाई गई सजा की आलोचना करते हुए कहा है कि शांतिपूर्ण असहमति को अपराध बनाया जा रहा है.\n\n4. पाकिस्तान में सत्ता किसके हाथों में केंद्रित बताई जा रही है?\nरिपोर्ट के मुताबिक आलोचकों का कहना है कि असल राजनीतिक ताकत पाकिस्तानी आर्मी चीफ मुनीर के नेतृत्व वाली सेना के हाथों में है.\n\n5. यूरोपीय संघ ने पाकिस्तान को लेकर क्या रुख अपनाया है?\nमानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों के बावजूद यूरोपीय संघ ने पाकिस्तान का जीएसपी-प्लस दर्जा जारी रखा है.\n\n6. अफगान सीमा पर तनाव क्यों बढ़ रहा है?\nपाकिस्तान द्वारा अफगान सीमा पर सैन्य कार्रवाई जारी रखने और सीमा पार हमलों की बढ़ती घटनाओं से तालिबान अधिकारियों के साथ तनाव बढ़ा है.",
  "url": "https://trendkia.com/pakistan/pakistana-ko-barhava-dekara-donald-trump-amerika-ke-lie-bula-rahe-naya-9-11-jaisa-khatara-4783",
  "category": "पाकिस्तान",
  "publishedAt": "2026-07-04",
  "tags": [
    "पाकिस्तान",
    "अमेरिका",
    "डोनाल्ड ट्रंप",
    "सर्जियो रेस्टेली",
    "बलूचिस्तान",
    "तालिबान",
    "9/11",
    "पाकिस्तान सेना"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia"
}