# रावलपिंडी में लियाकत अली खान के कत्ल की अनसुलझी पहेली, पचहत्तर बरस बाद भी क्यों नहीं खुला साजिश का राज

> पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की सोलह अक्टूबर उन्नीस सौ इक्यावन को हुई हत्या का रहस्य कई जांचों के बावजूद आज तक पूरी तरह नहीं सुलझ सका है।

**Type:** article · **Category:** पाकिस्तान · **Published:** 2026-10-16 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/pakistan/rawalpindi-men-liaquat-ali-khan-ke-katla-ki-anasulajhi-paheli-pachahattara-barasa-bada-bhi-kyon-nahin-khula-sajisha-ka-raja-48385 · **Language:** Hindi
**Tags:** लियाकत अली खान, रावलपिंडी, लियाकत बाग, पाकिस्तान इतिहास, राजनीतिक हत्या, सईद अकबर

पाकिस्तान के वजूद में आने के महज चार साल बाद, सोलह अक्टूबर उन्नीस सौ इक्यावन को रावलपिंडी के कंपनी बाग में एक ऐसा खूनी वाकया पेश आया जिसने मुल्क की आने वाली सियासत की दिशा हमेशा के लिए बदल दी। देश के पहले वजीरे आजम लियाकत अली खान एक विशाल जनसभा को संबोधित करने मंच पर पहुंचे थे। उन्होंने माइक संभालते ही जैसे ही अपने भाषण की शुरुआत में 'बरादरान-ए-मिल्लत' यानी कौम के भाइयों का संबोधन उच्चारित किया, ठीक उसी वक्त सामने बैठी भीड़ में मौजूद एक शख्स उठा और उसने अपनी बंदूक से उन पर दो गोलियां दाग दीं। गोलियां लगते ही सभा में अफरातफरी मच गई और खून से लथपथ प्रधानमंत्री वहीं गिर पड़े।

छप्पन साल के लियाकत अली खान को बेहद नाजुक हालत में फौरन रावलपिंडी के कंबाइंड मिलिट्री हॉस्पिटल पहुंचाया गया। वहां डॉक्टरों ने उन्हें बचाने की हर मुमकिन कोशिश की, मगर अत्यधिक खून बह जाने की वजह से उन्होंने दम तोड़ दिया। पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना के सबसे भरोसेमंद और करीबी सहयोगियों में गिने जाने वाले लियाकत अली खान ने आजादी के बाद नवगठित मुल्क के प्रशासनिक, राजनीतिक और संवैधानिक ढांचे की नींव रखने में बेहद केंद्रीय भूमिका निभाई थी। उनकी इस तरह सरेआम हत्या ने पूरे देश को गहरे सदमे में डाल दिया और मुल्क की हुकूमत के सामने कई अनसुलझे सवाल खड़े कर दिए।

## हमलावर की तुरंत मौत और दफन हुआ सबसे बड़ा सुराग

सभा स्थल पर प्रधानमंत्री पर गोली चलाने वाले शख्स की शिनाख्त अफगान मूल के सईद अकबर बाबरक के रूप में हुई। हमला होते ही मौके पर तैनात पुलिस के आला अधिकारी खान नजफ खान ने कार्रवाई का फरमान सुनाया। उनके निर्देश पर इंस्पेक्टर मोहम्मद शाह ने अपनी पिस्तौल निकालकर तुरंत सईद अकबर पर गोलियों की बौछार कर दी और उसे मौके पर ही ढेर कर दिया। पुलिस की इस त्वरित जवाबी कार्रवाई ने उसी क्षण उस सबसे बड़े और सीधे गवाह को हमेशा के लिए खामोश कर दिया, जो इस पूरे हत्याकांड की असली साजिश का पर्दाफाश कर सकता था।

सईद अकबर की फौरी मौत के बाद यह मौका हमेशा के लिए हाथ से निकल गया कि उससे हिरासत में पूछताछ की जाती। जांच एजेंसियां कभी यह नहीं जान सकीं कि उसने यह घातक कदम खुद अपनी मर्जी से उठाया था या फिर इसके पीछे कोई संगठित गिरोह, ताकतवर राजनीतिक धड़ा अथवा विदेशी साजिश काम कर रही थी। बाद के दिनों में गठित जांच आयोगों ने सुरक्षा व्यवस्था की खामियों के साथ-साथ पुलिस अधिकारियों के उस फैसले पर भी तीखे सवाल खड़े किए कि आखिर मुख्य हमलावर को जिंदा दबोचने की संजीदा कोशिश क्यों नहीं की गई। इसके अलावा घटना के बाद विभिन्न पुलिसकर्मियों द्वारा दिए गए बयानों में भारी विरोधाभास ने भी संदेह को और ज्यादा गहरा कर दिया।

## कौन था हमलावर सईद अकबर बाबरक

जांच के दौरान हमलावर के अतीत की पड़ताल की गई तो कई जानकारियां सामने आईं। सईद अकबर मूल रूप से अफगानिस्तान के खोस्त इलाके के जदरान कबायली समुदाय से ताल्लुक रखता था। उसका परिवार और कबीला अफगानिस्तान के भीतर तत्कालीन शाही सत्ता के खिलाफ चले संघर्षों और बगावतों में सक्रिय रूप से शामिल रहा था। इन राजनीतिक और कबायली उथल-पुथलों के बाद वह सरहद पार करके पाकिस्तान आ गया था और एबटाबाद शहर में रिहाइश अख्तियार किए हुए था।

एबटाबाद में उसके प्रवास के दौरान उसकी कोई ऐसी असाधारण या बेहद चर्चित पहचान नहीं थी जिससे उस पर किसी बड़े राजनेता की हत्या की साजिश का शक तुरंत जाता। उसके कबायली संपर्कों, पुराने राजनीतिक विवादों और पाकिस्तान में उसकी दिनचर्या की बारीकी से छानबीन की गई। तमाम कोशिशों और एजेंसियों की दौड़-धूप के बावजूद जांचकर्ता उसके इन कबायली या पुराने संपर्कों से हत्या के असली मकसद को जोड़ने वाला कोई भी निर्णायक और अकाट्य सबूत नहीं जुटा पाए।

## जांच के दायरे में आई कश्मीर नीति

इस सनसनीखेज हत्याकांड की पड़ताल केवल स्थानीय पुलिस तक सीमित नहीं रही। पाकिस्तान की हुकूमत द्वारा बिठाए गए आधिकारिक जांच आयोग के अलावा ब्रिटेन की मशहूर जांच एजेंसी स्कॉटलैंड यार्ड को भी मामले की गुत्थी सुलझाने के लिए बुलाया गया। कई कोणों पर माथापच्ची हुई, जिनमें सबसे प्रमुख बिंदु मुल्क की कश्मीर नीति थी। साल उन्नीस सौ सैंतालीस में भारत के बंटवारे के फौरन बाद जम्मू-कश्मीर को लेकर दोनों मुल्कों के बीच सैन्य संघर्ष भड़क उठा था, जो एक जनवरी उन्नीस सौ उनचास को लागू हुए औपचारिक सीजफायर के बाद थमा।

पाकिस्तान के भीतर एक ऐसा आक्रामक तबका मौजूद था जो उस वक्त संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में हुए युद्धविराम से सख्त नाराज था। उनका मानना था कि पाकिस्तानी सेना को अपनी कार्रवाई जारी रखकर श्रीनगर तक आगे बढ़ना चाहिए था। जांच में यह तथ्य भी सामने आया कि हमलावर सईद अकबर कश्मीर के मसले में काफी दिलचस्पी रखता था। आयोग ने इस संभावना पर विचार किया कि क्या वह लियाकत अली खान की अपेक्षाकृत संयमित कश्मीर नीति से आक्रोशित था और उसी गुस्से में उसने यह जानलेवा हमला किया। हालांकि, गहन विचार-विमर्श के बाद जांच आयोग ने इस दलील को भी पूरी तरह विश्वसनीय या पुख्ता नहीं माना।

## जीवनशैली और हिजाब से जुड़े दावों की हकीकत

जांच के दौरान एक और पहलू समाज के कुछ रूढ़िवादी हलकों की तरफ से उछाला गया। यह दावा किया गया कि हमलावर वजीरे आजम लियाकत अली खान और उनके परिवार की आधुनिक जीवनशैली से चिढ़ा हुआ था। प्रधानमंत्री की बेगम राना लियाकत अली खान उस दौर में सार्वजनिक जीवन और सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय रहती थीं और पर्दा या हिजाब नहीं करती थीं। रूढ़िवादी सोच रखने वाले तत्वों ने यह अटकलबाजी शुरू कर दी कि हमलावर को प्रधानमंत्री के पश्चिमी तौर-तरीकों और उनकी पत्नी के सार्वजनिक व्यवहार से सख्त आपत्ति थी।

जब आधिकारिक जांच आयोग ने इस दावे की पड़ताल की, तो इसके पक्ष में कोई भी ठोस दस्तावेज, गवाही या साक्ष्य सामने नहीं आया। किसी भी जांच दल को ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि सईद अकबर ने धार्मिक कट्टरता या व्यक्तिगत जीवनशैली की नाराजगी की वजह से इस हत्याकांड को अंजाम दिया था। लिहाजा, आयोग ने इस थ्योरी को भी पूरी तरह तथ्यहीन और आधारहीन करार देकर खारिज कर दिया।

## सेना और रावलपिंडी षड्यंत्र का साया

लियाकत अली खान की हत्या से कुछ ही महीने पहले, मार्च उन्नीस सौ इक्यावन में देश में एक बड़ा राजनीतिक और सैन्य भूचाल आया था। उस वक्त लियाकत सरकार का तख्तापलट करने की एक गुप्त सैन्य साजिश पकड़ी गई थी, जिसे इतिहास में रावलपिंडी षड्यंत्र के नाम से दर्ज किया गया। इस घटनाक्रम ने सेना, नागरिक सरकार और नौकरशाही के बीच पनप रहे गंभीर तनाव को जगजाहिर कर दिया था।

यही वजह थी कि जब अक्टूबर में प्रधानमंत्री की हत्या हुई, तो मुल्क के राजनीतिक हलकों में यह सुगबुगाहट तेज हो गई कि कहीं इस हत्या की तारें उस षड्यंत्र के बचे हुए तत्वों या सत्ता के गलियारों में मौजूद ताकतवर धड़ों से तो नहीं जुड़ी हैं। हालांकि, तमाम पड़तालों के बावजूद जांच एजेंसियां औपचारिक रूप से किसी सैन्य या प्रशासनिक गुट की सीधी संलिप्तता का कानूनी प्रमाण अदालत या जनता के सामने पेश नहीं कर सकीं।

## कंपनी बाग से लियाकत बाग तक, खूनी तारीखों का गवाह

जिस बाग में लियाकत अली खान को गोलियों से भूना गया था, उस ऐतिहासिक कंपनी बाग का नाम बाद में बदलकर लियाकत बाग कर दिया गया। मगर यह मैदान आगे चलकर भी पाकिस्तान की हिंसक और रक्तरंजित सियासत का केंद्र बना रहा। मार्च उन्नीस सौ तिहत्तर में इसी लियाकत बाग में अवामी नेशनल पार्टी के कद्दावर नेता अब्दुल वली खान की अगुवाई में आयोजित एक विशाल रैली पर अंधाधुंध गोलीबारी हुई थी, जिसमें कई निर्दोष कार्यकर्ताओं की जान चली गई थी।

इस मैदान पर सबसे बड़ा सियासी वज्रपात सत्ताईस दिसंबर दो हजार सात को हुआ। पाकिस्तान की पहली महिला प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो अपनी चुनावी जनसभा को संबोधित करने के बाद जब लियाकत बाग से बाहर निकल रही थीं, तब हमलावरों ने उन पर पहले गोलीबारी की और फिर भयानक आत्मघाती बम धमाका कर उनकी जान ले ली। इस तरह एक ही पार्क ने देश के पहले प्रधानमंत्री और बाद में एक पूर्व महिला प्रधानमंत्री के कत्ल का मंजर देखा।

## पचहत्तर साल बाद भी कायम अनुत्तरित सवाल

लियाकत अली खान की शहादत को पचहत्तर बरस बीत चुके हैं, लेकिन इतिहास के पन्नों में यह हत्याकांड आज भी एक रहस्यमयी गुत्थी बना हुआ है। गोली चलाने वाले हमलावर की पहचान तो हो गई, मगर उस उंगली के पीछे दिमाग किसका था, यह कभी साफ नहीं हो सका। क्या यह किसी अकेले सिरफिरे का काम था, या फिर नवजात पाकिस्तान की हुकूमत पर काबिज होने की होड़ में किसी ताकतवर आंतरिक गिरोह ने इसे अंजाम दिलवाया था, इसके जवाब आज तक नदारद हैं।

उनकी मौत के बाद पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था में जो अस्थिरता का दौर शुरू हुआ, उसने सेना और गैर-निर्वाचित ताकतों को लोकतांत्रिक ढांचे पर हावी होने का खुला रास्ता दे दिया। रावलपिंडी की उस दोपहर चली दो गोलियों ने न सिर्फ एक प्रधानमंत्री की जिंदगी छीनी, बल्कि पाकिस्तान के राजनीतिक भविष्य को भी एक ऐसे अंधेरे मोड़ पर धकेल दिया जिसके साए से वह मुल्क आज तक पूरी तरह उबर नहीं पाया है।

## इसका आप पर असर
इस ऐतिहासिक राजनीतिक हत्याकांड की पड़ताल से पाठकों को पड़ोसी मुल्क की अस्थिर शासन प्रणाली और सत्ता संघर्ष की ऐतिहासिक जड़ों को समझने में सीधी मदद मिलती है।

- **नागरिक समझ पर असर:** यह घटना स्पष्ट करती है कि राजनीतिक नेतृत्व की असमय हत्या कैसे किसी देश के लोकतांत्रिक ढांचे को दशकों तक कमजोर कर सकती है। पाठक समझ सकते हैं कि पाकिस्तान में सेना और नौकरशाही के बढ़ते प्रभाव की शुरुआत इसी दौर से हुई थी।
- **इतिहास और राजनीति के छात्रों के लिए:** यह मामला राजनीतिक जांच प्रक्रियाओं में आने वाली प्रशासनिक खामियों और गवाहों के नष्ट होने के परिणामों का क्लासिक उदाहरण है। इससे निष्पक्ष जांच और कानून के शासन का महत्व भलीभांति समझा जा सकता है।
- **सुरक्षा प्रोटोकॉल की सीख:** मुख्य संदिग्ध को जिंदा पकड़ने में विफलता ने सुरक्षा एजेंसियों के लिए हमेशा के लिए एक बड़ी सीख छोड़ी है। ऐसी परिस्थितियों में संदिग्ध से पूछताछ न हो पाना पूरी साजिश पर हमेशा के लिए पर्दा डाल देता है।
- **क्षेत्रीय स्थिरता की दृष्टि:** दक्षिण एशियाई भू-राजनीति में रुचि रखने वाले लोगों के लिए यह जानना जरूरी है कि कश्मीर नीति पर असहमति मुल्क के भीतर कितनी गहरी थी। यह इतिहास आज भी दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों के विश्लेषण में प्रासंगिक है।

## ऐसा क्यों हुआ
लियाकत अली खान की हत्या के पीछे की वजहों को लेकर कई राजनीतिक, सैन्य और वैचारिक सिद्धांत सामने आए, लेकिन आधिकारिक जांचें किसी एक ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकीं।

- **हमलावर की तुरंत हत्या:** हमले के तुरंत बाद पुलिस द्वारा सईद अकबर को गोली मार देने से पूछताछ का रास्ता बंद हो गया। मुख्य संदिग्ध की मौत की वजह से साजिशकर्ताओं और वास्तविक मकसद से जुड़े सभी प्रत्यक्ष प्रमाण उसी क्षण नष्ट हो गए।
- **कश्मीर नीति पर असंतोष:** वर्ष उन्नीस सौ उनचास में भारत के साथ हुए सीजफायर को लेकर पाकिस्तान के उग्रवादी और सैन्य हलकों में गहरा रोष था। हमलावर के इस मुद्दे से जुड़े होने के शक के आधार पर इसे एक संभावित वजह माना गया था।
- **आंतरिक तख्तापलट के प्रयास:** हत्या से महज सात महीने पहले सामने आए रावलपिंडी षड्यंत्र ने सरकार और सेना के बीच गहरे मतभेद उजागर कर दिए थे। इससे यह संदेह पैदा हुआ कि सत्ता के गलियारों की आंतरिक प्रतिद्वंद्विता इस कत्ल के पीछे हो सकती है।
- **जांच निष्कर्षों का अभाव:** स्कॉटलैंड यार्ड और स्थानीय न्यायिक आयोगों द्वारा की गई जांचों के बावजूद ठोस सबूत न मिलने से वास्तविक कारण आज तक आधिकारिक रूप से अनिर्णीत बना हुआ है।

## सवाल-जवाब

### 1. लियाकत अली खान की हत्या कब और कहां हुई थी?
उनकी हत्या 16 अक्टूबर 1951 को रावलपिंडी के कंपनी बाग में एक सार्वजनिक रैली के दौरान की गई थी।

### 2. गोली चलाने वाले हमलावर का क्या नाम था?
हमलावर का नाम सईद अकबर बाबरक था, जो मूल रूप से अफगानिस्तान के खोस्त इलाके का रहने वाला था।

### 3. हमलावर को जिंदा क्यों नहीं पकड़ा जा सका?
हमले के फौरन बाद पुलिस अधिकारी खान नजफ खान के आदेश पर इंस्पेक्टर मोहम्मद शाह ने सईद अकबर पर गोलियां चलाकर उसे वहीं मार गिराया था।

### 4. कंपनी बाग का नाम बदलकर क्या रखा गया?
इस मैदान का नाम बदलकर लियाकत अली खान के सम्मान में 'लियाकत बाग' रख दिया गया था।

### 5. लियाकत बाग में बाद में कौन सी अन्य बड़ी राजनीतिक हत्या हुई थी?
इसी बाग में 27 दिसंबर 2007 को पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की गोलीबारी और आत्मघाती बम धमाके में हत्या कर दी गई थी।

### 6. क्या इस हत्याकांड की जांच विदेशी एजेंसी से कराई गई थी?
हां, स्थानीय पुलिस और सरकारी जांच आयोग के अलावा ब्रिटेन की स्कॉटलैंड यार्ड को भी इस मामले की जांच में शामिल किया गया था।

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