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  "type": "article",
  "title": "सऊदी अरब में फौज उतारने की तैयारी में पाकिस्तान, संसद को दरकिनार कर आसिम मुनीर ने लिया फैसला",
  "summary": "पाकिस्तान की सेना ने संसद में बिना किसी चर्चा या मतदान के सऊदी अरब में हजारों सैनिकों की तैनाती को हरी झंडी दे दी है। फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के इस कदम से देश के लोकतांत्रिक ढांचे और क्षेत्रीय संतुलन पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।",
  "content": "पाकिस्तान के रक्षा और विदेश नीति से जुड़े फैसलों पर सेना की पकड़ इस कदर मजबूत हो चुकी है कि अब मुल्क की संसद को भी विश्वास में लेने की जरूरत महसूस नहीं की जा रही है। फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के नेतृत्व में सेना ने सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए हजारों पाकिस्तानी सैनिकों को भेजने का निर्णय लिया है। संसद में किसी भी बहस या मतदान के बिना उठाया गया यह कदम साफ दर्शाता है कि पाकिस्तान की चुनी हुई व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं के मुकाबले सेना का प्रभाव किस स्तर तक बढ़ चुका है। मक्का रक्षा समझौते के तहत उठाए जा रहे इस कदम से पाकिस्तान के भीतर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं।\n\nमक्का रक्षा समझौता और सेना की सीधी तैनाती\nसऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच अगस्त के महीने में ‘मक्का रक्षा समझौता’ हुआ था, जिसे अब औपचारिक तौर पर अमल में लाया जा रहा है। यमन में सक्रिय और ईरान का समर्थन पाने वाले हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के ठिकानों पर लगातार किए जा रहे हमलों के मद्देनजर यह समझौता जमीन पर उतारा जा रहा है। हालात की समीक्षा के लिए रियाध में बुलाई गई एक आपातकालीन बैठक में खुद आसिम मुनीर शामिल हुए थे।\n\nइस उच्चस्तरीय बैठक के बाद तीनों मुल्कों ने संयुक्त रूप से ऐलान किया कि समझौते की प्रतिबद्धताओं के तहत निर्धारित सैन्य टुकड़ियों को तत्काल प्रभाव से तैनात किया जाएगा। इस बड़े अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मिशन में पाकिस्तान की संसद या निर्वाचित सरकार की भूमिका न के बराबर नजर आई है। सारा फैसला सेना के शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर ही ले लिया गया।\n\n2015 की नजीर और 2026 की हकीकत\nपाकिस्तानी हुकूमत के इस रुख की तुलना ठीक ग्यारह साल पहले के घटनाक्रम से की जा रही है। साल 2015 में जब सऊदी अरब ने यमन के हूती संकट के दौरान पाकिस्तान से सैन्य टुकड़ियों की मांग की थी, तब तत्कालीन नवाज शरीफ सरकार ने मामले को संसद के सामने रखा था। उस समय पाकिस्तानी संसद में गंभीर चर्चा हुई, मतदान कराया गया और सांसदों ने सर्वसम्मति से फैसला लिया कि पाकिस्तान इस जंग में तटस्थ रहेगा।\n\nदक्षिण एशिया मामलों के विश्लेषक माइकल कुगेलमैन के अनुसार, एक दौर वह भी था जब संसद फौज न भेजने का फैसला करती थी और सेना उस फैसले को स्वीकार करती थी। आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। संसद में न कोई प्रस्ताव पेश किया गया और न ही जनप्रतिनिधियों से कोई राय ली गई। जब पाकिस्तान के सूचना मंत्रालय से यह सवाल किया गया कि क्या इस तैनाती के लिए कैबिनेट या संसद की मंजूरी ली गई, तो मंत्रालय ने ब्योरे को ऑपरेशनल गोपनीयता का हवाला देकर टाल दिया और केवल इतना कहा कि सभी जरूरी सरकारी प्रक्रियाएं पूरी कर ली गई हैं।\n\nसंवैधानिक प्रावधान और मुनीर को मिली असीमित ताकत\nसंसद की अनदेखी पर उठ रहे सवालों के बीच अगर कानूनी ढांचे पर नजर डालें तो स्थिति काफी अलग दिखाई देती है। पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 243 के तहत सशस्त्र बलों की कमान और नियंत्रण संघीय सरकार के पास होता है, जहां राष्ट्रपति केवल औपचारिक प्रमुख की भूमिका में होते हैं। संविधान में ऐसा कोई स्पष्ट नियम नहीं है कि विदेशों में सैनिक भेजने या रक्षा समझौतों को लागू करने के लिए हर बार संसद से वोटिंग कराना अनिवार्य हो।\n\nवर्ष 2015 में संसद के जरिए फैसला लेना एक राजनीतिक परंपरा और आपसी सहमति का हिस्सा था, न कि कोई संवैधानिक मजबूरी। बीते साल हुए संवैधानिक संशोधनों के बाद आसिम मुनीर की स्थिति बेहद मजबूत हो चुकी है। इन संशोधनों के जरिए उन्हें 2030 तक तीनों सेनाओं का सुप्रीम कमांडर नियुक्त किया गया है, फील्ड मार्शल की आजीवन रैंक दी गई है और किसी भी प्रकार के आपराधिक मुकदमे से पूर्ण छूट प्रदान की गई है। ऐसे में सेना और मौजूदा सरकार के बीच ऐसा तालमेल है जहां कैबिनेट की औपचारिक मुहर को ही पर्याप्त मानकर संसद को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया है।\n\nघरेलू राजनीतिक संकट और सेना का बढ़ता दायरा\nसऊदी अरब में फौज उतारने का यह फैसला ऐसे वक्त में सामने आया है जब पाकिस्तान की अंदरूनी राजनीति में भारी तनाव है। जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ इस्लामाबाद की ओर एक बड़ा मार्च निकाल रही है। पार्टी का सीधा आरोप है कि सेना देश के लोकतंत्र और राजनीतिक ढांचे को कमजोर कर अपनी सत्ता चला रही है। इस संवेदनशील मुद्दे पर मौजूदा प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने चुप्पी साध रखी है, जबकि पीटीआई प्रवक्ता जुल्फी बुखारी ने संसद में बिना किसी राजनीतिक सहमति के इतने बड़े फैसले पर ऐतराज जताया है।\n\nकिंग्स कॉलेज लंदन के एसोसिएट प्रोफेसर एंड्रियास क्रैग का मानना है कि विदेशी ताकतें पाकिस्तान की सेना को ही असल शक्ति मानकर सीधे संवाद कर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय साझेदार सेना को अनिवार्य ताकत के रूप में देख रहे हैं, जिससे मुल्क के भीतर सेना का दावा और मजबूत होता जा रहा है। उन्होंने सचेत किया कि बिना संवैधानिक नियंत्रण वाली व्यवस्था ऐसे अंतरराष्ट्रीय समझौते करने में तो जल्दबाजी दिखाती है, लेकिन जब उन फैसलों की भारी कीमत चुकानी पड़ती है, तब स्थिति को सुधारना बेहद मुश्किल हो जाता है।\n\nईरान के साथ रिश्तों में दरार और हूती विद्रोहियों का खतरा\nपाकिस्तानी सेना के इस कदम से सबसे बड़ा खतरा विदेश नीति के मोर्चे पर खड़ा हो सकता है। हूती विद्रोहियों को ईरान का खुला समर्थन हासिल है, जबकि पाकिस्तान एक तरफ अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ बनने का दावा करता रहा है। यदि पाकिस्तानी सैनिक सऊदी अरब में तैनात होकर हूती विद्रोहियों के खिलाफ किसी सीधी कार्रवाई में उलझते हैं, तो तेहरान और इस्लामाबाद के संबंध बिगड़ सकते हैं।\n\nहूती लड़ाकों ने जुलाई के महीने से सऊदी जहाजों और तेल प्रतिष्ठानों पर हमले तेज कर रखे हैं। हाल ही में मदीना में पैगंबर की मस्जिद को बिजली पहुंचाने वाले पावर स्टेशन पर भी हमला करने का आरोप लगा है। ऐसे तनावपूर्ण माहौल में पाकिस्तानी सैनिकों की सीधी मौजूदगी उन्हें ईरान समर्थित सशस्त्र गुटों के निशाने पर ला सकती है, जिससे पाकिस्तान एक नए अंतरराष्ट्रीय टकराव के दलदल में फंस सकता है।\n\nइसका आप पर असर\nपाकिस्तानी सेना द्वारा सऊदी अरब में सैन्य तैनाती के फैसले का सीधा असर क्षेत्रीय स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर पड़ेगा।\n\n• कूटनीतिक असर: पाकिस्तान और ईरान के सीमावर्ती संबंधों में तनाव गहरा सकता है। अगर खाड़ी में हालात बिगड़े तो इसका असर प्रवासी कामगारों की सुरक्षा और तेल आपूर्ति पर सीधे तौर पर दिखाई देगा।\n• आर्थिक जोखिम: मध्य पूर्व के टकराव में उलझने से समुद्री व्यापार मार्गों पर जोखिम बढ़ेगा। इससे ईंधन की ढुलाई लागत बढ़ सकती है जिसका असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।\n• सैनिकों की सुरक्षा: तैनात होने वाले हजारों सैनिकों पर सीधे हमलों का खतरा मंडराएगा। यमन के विद्रोही गुटों द्वारा किए जा रहे ड्रोन और मिसाइल हमलों से सुरक्षा चुनौतियां कई गुना बढ़ जाएंगी।\n• संसदीय मर्यादा: निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की भूमिका सीमित होने से लोकतांत्रिक जवाबदेही घटेगी। भविष्य में बिना व्यापक चर्चा के राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े बड़े फैसले लिए जाने की आशंका बढ़ेगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nसऊदी अरब पर यमन के विद्रोही गुटों के हमलों और त्रिपक्षीय रक्षा वादों के चलते यह कदम उठाया गया है।\n\n• सीधा कारण: यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के बुनियादी ढांचों पर लगातार हमले किए जा रहे हैं। इसी सुरक्षा संकट के जवाब में रियाध की आपातकालीन बैठक में सैन्य तैनाती को हरी झंडी दी गई।\n• मक्का रक्षा समझौता: अगस्त में सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुए त्रिपक्षीय रक्षा करार ने इस तैनाती का रास्ता साफ किया। इसके तहत तीनों देश एक-दूसरे की सुरक्षा में सैन्य योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।\n• संविधान में बदलाव: बीते वर्ष हुए कानूनी और संवैधानिक संशोधनों ने आसिम मुनीर को 2030 तक सुप्रीम कमांडर बना दिया है। इन अधिकारों के बल पर सैन्य नेतृत्व को संसद से औपचारिक अनुमति लेने की जरूरत नहीं पड़ी।\n• राजनीतिक पृष्ठभूमि: वर्ष 2015 में नवाज शरीफ सरकार ने संसद में मतदान कराकर तटस्थ रहने का रास्ता चुना था। मौजूदा समय में सेना का घरेलू दबदबा इतना मजबूत है कि उसने संसदीय प्रक्रिया की जगह सीधे फैसले को प्राथमिकता दी।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. पाकिस्तानी सेना सऊदी अरब में सैनिक क्यों तैनात कर रही है?\nअगस्त में हुए मक्का रक्षा समझौते के तहत यमन के हूती विद्रोहियों के हमलों से निपटने के लिए यह तैनाती की जा रही है।\n\n2. क्या इस तैनाती के लिए पाकिस्तानी संसद से मंजूरी ली गई?\nनहीं, संसद में इस फैसले पर कोई चर्चा या मतदान नहीं कराया गया और इसे सेना के स्तर पर ही तय कर लिया गया।\n\n3. साल 2015 में संसद का क्या फैसला था?\n2015 में पाकिस्तानी संसद ने सर्वसम्मति से वोटिंग करके यमन युद्ध में तटस्थ रहने और सेना न भेजने का फैसला किया था।\n\n4. आसिम मुनीर को कौन से विशेष संवैधानिक अधिकार मिले हैं?\nसंशोधनों के जरिए उन्हें 2030 तक सुप्रीम कमांडर बनाया गया है, फील्ड मार्शल की आजीवन रैंक दी गई है और कानूनी मुकदमों से छूट मिली है।\n\n5. सऊदी अरब में हूती विद्रोहियों ने हाल ही में किन ठिकानों को निशाना बनाया है?\nहूतियों ने सऊदी जहाजों, तेल ठिकानों और मदीना में मस्जिद को बिजली देने वाले पावर स्टेशन पर हमले किए हैं।",
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  "category": "पाकिस्तान",
  "publishedAt": "2026-10-08",
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