एससीओ सम्मेलन में सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ साझा प्रस्ताव पर हस्ताक्षर के पीछे पाकिस्तान की कूटनीतिक रणनीति का विश्लेषण शंघाई सहयोग संगठन के बिश्केक सम्मेलन में सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ कड़े प्रस्ताव को मंजूरी मिली है। इस वैश्विक मंच पर भारत के साथ पाकिस्तान की सहमति के पीछे इस्लामाबाद की रणनीतिक मजबूरियां और बलूचिस्तान से जुड़े अपने नैरेटिव को आगे बढ़ाने का छिपा मकसद उजागर हुआ है। शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ के बिश्केक शिखर सम्मेलन में जारी संयुक्त घोषणापत्र को कूटनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सदस्य देशों ने एक स्वर में आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद के खिलाफ अपनी साझा प्रतिबद्धता दोहराई है। इस घोषणापत्र में सीमा पार से संचालित होने वाले आतंकवाद की स्पष्ट निंदा की गई है, जिसे नई दिल्ली के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत माना जा रहा है। भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करता रहा है। हालांकि, इस वैश्विक सहमति के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि पाकिस्तान, जिस पर खुद सीमा पार आतंकवाद को पनाह देने के आरोप लगते रहे हैं, वह इस मंच पर भारत की भाषा का समर्थन करने के लिए क्यों तैयार हुआ। इस निर्णय के पीछे इस्लामाबाद की अपनी सुरक्षा चिंताएं और कूटनीतिक चालें छिपी हुई हैं। एससीओ घोषणापत्र में आतंकवाद पर कड़े रुख का प्रावधान बिश्केक में आयोजित एससीओ शिखर सम्मेलन के बाद जारी संयुक्त वक्तव्य में आतंकवाद के हर स्वरूप की तीखी आलोचना की गई है। सदस्य राष्ट्रों ने सर्वसम्मति से यह स्पष्ट किया है कि आतंकवाद के मुद्दे पर किसी भी प्रकार का दोहरा मापदंड या 'डबल स्टैंडर्ड' स्वीकार्य नहीं किया जाएगा। इस दस्तावेज में संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानून के बुनियादी सिद्धांतों का हवाला देते हुए वैश्विक आतंकवाद विरोधी रणनीति को पूरी तरह लागू करने की बात कही गई है। इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के तहत आतंकियों की सीमा पार आवाजाही पर पूर्ण रोक लगाने और सभी आतंकवादी संगठनों के खिलाफ एकजुट होकर निर्णायक कार्रवाई करने का संकल्प व्यक्त किया गया है। यह पूरी शब्दावली भारत की उस स्थापित नीति से मेल खाती है जिसे नई दिल्ली वैश्विक मंचों पर लगातार उठाती रही है। पाकिस्तान की सहमति के पीछे सुरक्षा चिंताओं का गणित भारत हमेशा से यह रुख अपनाता आया है कि आतंकवाद और प्रायोजित हिंसा के खिलाफ कोई समझौता नहीं किया जा सकता। ऐसे में पाकिस्तान द्वारा इस सख्त दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने के पीछे उसकी आंतरिक सुरक्षा स्थिति मुख्य कारण मानी जा रही है। पिछले कई वर्षों से पाकिस्तान बलूचिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर यानी पीओके में जारी असंतोष तथा हिंसक घटनाओं के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश करता रहा है। इस्लामाबाद का दावा रहता है कि भारतीय खुफिया एजेंसियां बलूच विद्रोहियों और अन्य अलगाववादी गुटों को समर्थन देकर उसके घरेलू ढांचे को अस्थिर कर रही हैं। इसी आरोप की आड़ लेकर पाकिस्तान एससीओ जैसे बहुपक्षीय मंच पर आतंकवाद और अलगाववाद के खिलाफ इस्तेमाल की गई सख्त भाषा को अपने पक्ष में मोड़ने की फिराक में है। एक तरफ जहां पाकिस्तान खुद सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देने के वैश्विक आरोपों का सामना कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ वह इसी शब्दावली का सहारा लेकर बलूचिस्तान और पीओके के हालातों को 'भारत प्रायोजित आतंकवाद' के रूप में पेश करने की चाल चल रहा है। 'डबल स्टैंडर्ड' और 'क्रॉस-बॉर्डर टेररिज्म' पर जोर देकर इस्लामाबाद अपनी आंतरिक विफलताओं का ठीकरा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत पर फोड़ना चाहता है। शहबाज शरीफ की कूटनीतिक रणनीति और भारत का पक्ष शहबाज शरीफ के नेतृत्व में पाकिस्तान की यह कोशिश किसी वास्तविक नीतिगत बदलाव का संकेत नहीं है, बल्कि यह उसकी कूटनीतिक मजबूरी का हिस्सा है। पाकिस्तान एससीओ के भीतर चीन और रूस जैसे शक्तिशाली साझेदारों के साथ अपनी प्रासंगिकता बनाए रखना चाहता है। आतंकवाद विरोधी भाषा का समर्थन करके वह अपने ऊपर बने अंतरराष्ट्रीय दबाव को हल्का करने का प्रयास कर रहा है, जबकि अपनी पुरानी रणनीतियों पर वह अब भी कायम है। पाकिस्तान की योजना आतंकवाद की व्यापक परिभाषा का दुरुपयोग करके भारत की ओर उंगली उठाने की है। इसके विपरीत भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने यह बात मजबूती से रखी है कि बलूचिस्तान का मुद्दा पाकिस्तान का अपना आंतरिक मामला है। यह संकट वहां दशकों से जारी राजनीतिक, आर्थिक और मानवाधिकारों के दमन का परिणाम है। नई दिल्ली किसी भी अलगाववादी समूह को समर्थन नहीं देती। इसके इतर, पाकिस्तान की सरजमीं से संचालित होने वाले आतंकी नेटवर्क भारत के लिए लगातार खतरा बने हुए हैं। पठानकोट, उरी और पुलवामा में हुए भीषण आतंकी हमले तथा सीमा पर लगातार होने वाली घुसपैठ की कोशिशें भारत की चिंताओं को पूरी तरह जायज ठहराती हैं। खैबर पख्तूनख्वा और अफगानिस्तान सीमा पर बढ़ता तनाव पाकिस्तान इस एससीओ घोषणापत्र का इस्तेमाल अपने उत्तर-पश्चिमी प्रांत खैबर पख्तूनख्वा में की जा रही सैन्य कार्रवाइयों को सही ठहराने के लिए भी करना चाहता है। इस्लामाबाद काफी समय से पड़ोसी देश अफगानिस्तान पर यह आरोप लगाता आया है कि वह तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी टीटीपी के आतंकियों को सुरक्षित ठिकाने मुहैया करा रहा है। इस मुद्दे को लेकर पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सीमा पर अक्सर हिंसक झड़पें और तनाव देखा जाता है। एससीओ के मंच से आतंकवाद विरोधी रुख अपनाकर पाकिस्तान टीटीपी के खिलाफ अपनी कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय समर्थन दिलाने की कोशिश में जुटा है। नई दिल्ली के लिए कूटनीतिक लाभ और भविष्य की चुनौतियां बिश्केक घोषणापत्र भारत के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक हथियार बनकर उभरा है। इस दस्तावेज में सीमा पार आतंकवाद और दोहरे मापदंडों का स्पष्ट जिक्र होने से नई दिल्ली को पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाने का मजबूत आधार मिल गया है। भारत अब इस्लामाबाद से अपनी जमीन का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों के लिए बंद करने की मांग को और अधिक आक्रामकता से दोहरा सकता है। इसके साथ ही भारतीय कूटनीति को इस बात के प्रति सतर्क रहना होगा कि पाकिस्तान इस घोषणापत्र की आड़ लेकर बलूचिस्तान और पीओके के आंतरिक मुद्दों का अंतरराष्ट्रीयकरण करने में सफल न हो सके। इसका आप पर असर क्षेत्रीय सुरक्षा और कूटनीतिक संतुलन: एससीओ सम्मेलन में पारित यह प्रस्ताव दक्षिण एशिया में आतंकवाद विरोधी प्रयासों को मजबूती प्रदान करता है। • भारत के लिए प्रभाव: नई दिल्ली को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सीमा पार आतंकवाद का मुद्दा उठाने और पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए एक मजबूत कूटनीतिक आधार मिला है। इससे वैश्विक स्तर पर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ भारतीय पक्ष और मजबूत होगा। • सुरक्षा व्यवस्था में सतर्कता: यद्यपि प्रस्ताव में आतंकवाद की कड़ी निंदा की गई है, लेकिन भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को सीमा पर घुसपैठ और पाकिस्तान द्वारा बलूचिस्तान के नाम पर चलाए जाने वाले दुष्प्रचार के खिलाफ लगातार चौकस रहना होगा। ऐसा क्यों हुआ बिश्केक में आयोजित एससीओ सम्मेलन के दौरान आतंकवाद के खिलाफ साझा प्रस्ताव पर सहमति बनने के प्रमुख कूटनीतिक और रणनीतिक कारण निम्नलिखित हैं: • वैश्विक दबाव और कूटनीतिक मजबूरी: पाकिस्तान पर आतंकवाद के मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी दबाव रहा है। एससीओ में चीन और रूस जैसे सहयोगियों के साथ खड़े दिखने के लिए इस्लामाबाद के लिए इस साझा प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करना कूटनीतिक मजबूरी थी। • बलूचिस्तान नैरेटिव को भुनाने की कोशिश: पाकिस्तान एससीओ घोषणापत्र की शब्दावली का इस्तेमाल बलूचिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर में हो रही हिंसक घटनाओं को बाहरी हस्तक्षेप के रूप में पेश करने के लिए करना चाहता है। • टीटीपी और अफगानिस्तान सीमा तनाव: खैबर पख्तूनख्वा में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के बढ़ते हमलों और अफगानिस्तान के साथ सीमा विवाद के चलते पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों से आतंकवाद विरोधी समर्थन हासिल करना चाहता है। सवाल-जवाब 1. एससीओ बिश्केक घोषणापत्र क्या है? यह शंघाई सहयोग संगठन के बिश्केक सम्मेलन में सदस्य देशों द्वारा जारी किया गया संयुक्त दस्तावेज है, जिसमें आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद के खिलाफ एकजुट होकर लड़ने की प्रतिबद्धता जताई गई है। 2. घोषणापत्र में सीमा पार आतंकवाद के बारे में क्या कहा गया है? घोषणापत्र में सीमा पार से होने वाले आतंकवाद की कड़े शब्दों में निंदा की गई है तथा आतंकवाद के खिलाफ किसी भी तरह के दोहरे मापदंड को पूरी तरह से खारिज किया गया है। 3. पाकिस्तान इस प्रस्ताव पर क्यों सहमत हुआ? पाकिस्तान ने अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि को सुधारने, चीन और रूस के साथ संबंध बनाए रखने तथा बलूचिस्तान के मुद्दे पर भारत को घेरने की कूटनीतिक चाल के तहत इस पर सहमति व्यक्त की। 4. भारत ने बलूचिस्तान पर क्या रुख अपनाया है? भारत ने स्पष्ट किया है कि बलूचिस्तान में जारी असंतोष पाकिस्तान का आंतरिक मामला है जो लंबे समय से जारी राजनीतिक और मानवाधिकार संबंधी समस्याओं का नतीजा है। https://trendkia.com/pakistan/sco-sammelan-mein-seema-paar-aatankwad-ke-khilaf-sajha-prastav-par-hastakshar-ke-peeche-pakistan-ki-kootneetik-ranniti-ka-vishlesh-26200 TrendKia — Har trend, sabse pehle.