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  "type": "article",
  "title": "अफगानिस्तान से लाकर खैबर पख्तूनख्वा में आतंकियों को बसाने की बात शहबाज शरीफ ने मानी, इमरान खान पर मढ़ा दोष",
  "summary": "पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने बयान दिया है कि 2019 और 2020 के दौरान अफगानिस्तान से आतंकवादियों को लाकर खैबर पख्तूनख्वा में दोबारा बसाया गया था। उन्होंने इस संवेदनशील कदम के लिए पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की तत्कालीन सरकार को जिम्मेदार ठहराया है।",
  "content": "पाकिस्तान की धरती पर सक्रिय चरमपंथियों की मौजूदगी को लेकर इस्लामाबाद के मौजूदा नेतृत्व ने एक चौंकाने वाला बयान सामने रखा है। वजीरे आजम शहबाज शरीफ ने औपचारिक रूप से स्वीकार किया है कि वर्ष 2019 तथा 2020 के दौरान अफगान सरजमीं से आतंकियों को देश के भीतर लाया गया और उन्हें अशांत खैबर पख्तूनख्वा सूबे में फिर से आबाद किया गया। शीर्ष स्तर से आए इस कबूलनामे ने पड़ोसी मुल्क की आंतरिक सुरक्षा प्राथमिकताओं, रणनीतिक फैसलों और आतंकवाद निरोधक दावों के खोखलेपन को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है।\n\nइस्लामाबाद में पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) से ताल्लुक रखने वाले खैबर पख्तूनख्वा के सांसदों एवं प्रमुख पदाधिकारियों को 31 अक्टूबर के रोज संबोधित करते हुए शहबाज शरीफ ने यह बात कही। उनका दावा था कि नवाज शरीफ के पिछले कार्यकाल के दौरान किए गए मुकम्मल प्रयासों की बदौलत चरमपंथ के उभार को प्रभावी ढंग से थाम लिया गया था। सुरक्षा हालात में 2017-18 तक उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया जा चुका था, मगर उसके ठीक बाद सीमा पार से लड़ाकों को वापस लाने और उन्हें स्थानीय बस्तियों में बसाने के कदम ने हालात को एक बार फिर खूनी भंवर में धकेल दिया।\n\nतत्कालीन सत्ता प्रतिष्ठान और खुफिया तंत्र पर उठते सवाल\n\nअपने विस्तृत भाषण में शहबाज शरीफ ने आतंकवादियों के इस पुनर्वास की पूरी तोहमत अपने सियासी प्रतिद्वंद्वी और पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के नेतृत्व वाली तत्कालीन हुकूमत के मत्थे मढ़ दी। उनका सीधा इल्जाम है कि गुजरे दौर के प्रशासनिक फैसलों ने ही हिंसक संगठनों को अपनी जड़ें दोबारा जमाने का खुला रास्ता मुहैया कराया। हालांकि, इस राजनीतिक छींटाकशी के बीच कई बुनियादी राज अनसुलझे ही छूट गए। शरीफ ने अपने संबोधन में यह कतई साफ नहीं किया कि अफगानिस्तान से कितने लड़ाकों को सीमा पार कराई गई, इस विवादास्पद प्रक्रिया को किस स्तर पर औपचारिक हरी झंडी मिली थी और पाकिस्तानी फौज तथा गुप्तचर एजेंसियों की इस पूरी कवायद में क्या हिस्सेदारी थी।\n\nपड़ोसी मुल्क के सियासी ढांचे में सैन्य प्रतिष्ठान की दखलंदाजी और व्यापक असर किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में सरहद पार से कट्टरपंथियों को लाकर देश के संवेदनशील प्रांत में फिर से पनाह देने जैसे बेहद नाजुक मामले का सारा ठीकरा महज एक पूर्व हुकूमत पर फोड़ देना सुरक्षा विश्लेषकों के गले नहीं उतर रहा है। क्या सेना के आला कमान और जासूसी तंत्र को इस योजना की भनक नहीं थी, या फिर यह पूरी मुहिम किसी सोची-समझी नीति का हिस्सा थी, इन अहम बिंदुओं पर प्रधानमंत्री पूरी तरह खामोश रहे।\n\nसुरक्षा कोष के 800 अरब रुपये कहां गए?\n\nखैबर पख्तूनख्वा में उग्रवाद से मुकाबले के नाम पर बहाए गए भारी-भरकम बजट पर भी प्रधानमंत्री ने तीखे सवाल खड़े किए। उन्होंने आंकड़ा पेश करते हुए बताया कि 2010 के राष्ट्रीय वित्त आयोग (NFC) पुरस्कार समझौते के प्रावधानों के तहत प्रांत को सालाना एक फीसदी का अतिरिक्त बजटीय हिस्सा आवंटित किया जाता रहा है। इस विशिष्ट वित्तीय व्यवस्था के जरिए अब तक प्रांतीय खजाने को तकरीबन 800 अरब पाकिस्तानी रुपये की विशाल धनराशि हस्तांतरित की जा चुकी है।\n\nशहबाज शरीफ ने बेहद तल्ख लहजे में पूछा कि इस विशाल पूंजी के उपभोग के बावजूद सूबे के कितने शहरों में आधुनिक निगरानी वाले सेफ सिटी प्रोजेक्ट्स धरातल पर उतारे जा सके? उग्रवाद से सीधी टक्कर लेने वाले आतंकवाद निरोधक विभाग (CTD) की क्षमता निर्माण में कितनी तरक्की हुई? उन्होंने प्रांतीय पुलिस बल के जवानों को आधुनिक साजो-सामान, उन्नत हथियार और अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रशिक्षण मुहैया कराने की दिशा में बरती गई सुस्ती पर गहरी नाखुशी जाहिर की। साथ ही, पुलिस महकमे के भीतर हजारों अहम पदों के लंबे समय से खाली पड़े रहने की प्रशासनिक लापरवाही को भी आड़े हाथों लिया।\n\nमानवीय त्रासदियों और भारी वित्तीय क्षति का हवाला\n\nदशकों से जारी इस खूनी संघर्ष का ब्योरा देते हुए प्रधानमंत्री ने रेखांकित किया कि आतंकवाद के खिलाफ टकराव में उनके मुल्क ने करीब 80 हजार इंसानी जिंदगियां गंवाई हैं। इसके साथ ही राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को भी 150 से लेकर 200 अरब डॉलर के बीच भीषण वित्तीय नुकसान झेलना पड़ा है। उन्होंने पेशावर के आर्मी पब्लिक स्कूल में स्कूली बच्चों पर हुए बर्बर कत्लेआम को याद करते हुए उसे इतिहास का सबसे दर्दनाक और काला अध्याय करार दिया। खैबर पख्तूनख्वा के बाशिंदों, आम पुलिसकर्मियों और सरहद पर तैनात फौजियों की कुर्बानियों को नमन करते हुए उन्होंने जोर देकर कहा कि इस खतरे का खात्मा किसी एक गुट का नहीं, बल्कि पूरे मुल्क का साझा दायित्व है।\n\nइमरान खान के खेमे ने आरोपों को सिरे से खारिज किया\n\nप्रधानमंत्री के इन आक्रामक दावों के फौरन बाद पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) की तरफ से कड़ा पलटवार देखने को मिला। पीटीआई के केंद्रीय सूचना सचिव शेख वकास अकरम ने एक बयान में दो टूक कहा कि पीएमएल-एन नेतृत्व के पास सुशासन और लोकतांत्रिक उसूलों पर उपदेश झाड़ने की कोई नैतिक बुनियाद नहीं बची है। विपक्षी दल ने जोर देकर कहा कि इमरान खान के प्रधानमंत्रित्व काल के दौरान खैबर पख्तूनख्वा की कानून-व्यवस्था कहीं अधिक स्थिर और शांतिपूर्ण थी। पीटीआई नेताओं ने उलटे केंद्र की शहबाज सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए आरोप लगाया कि इस्लामाबाद में बैठी हुकूमत जानबूझकर सूबे के पुलिस और सुरक्षा तंत्र को जरूरी साजो-सामान और वित्तीय संसाधन मुहैया नहीं करा रही है।\n\nइसका आप पर असर\nपाकिस्तान में चरमपंथियों की पुनर्वापसी के कबूलनामे से क्षेत्रीय सुरक्षा और सीमावर्ती स्थिरता पर सीधा असर पड़ सकता है।\n\n• सीमा सुरक्षा: भारत और पड़ोसी देशों के सुरक्षा तंत्र सीमा पार आतंकी गतिविधियों और घुसपैठ की आशंकाओं को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरतेंगे। सुरक्षा एजेंसियों द्वारा सीमावर्ती इलाकों में निगरानी तंत्र को और कड़ा किया जाएगा।\n• आर्थिक संकट: राजनीतिक अस्थिरता और चरमपंथ के उभार से विदेशी निवेश और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहायता मिलने में पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। इसका असर पाकिस्तानी मुद्रा और वहां की आम जनता की महंगाई दर पर देखने को मिल सकता है।\n• खैबर पख्तूनख्वा में आम जनजीवन: खैबर पख्तूनख्वा के स्थानीय नागरिकों को कानून-व्यवस्था की कमजोरी और आतंकी घटनाओं के कारण निरंतर असुरक्षा का सामना करना पड़ सकता है। प्रांतीय पुलिस में खाली पदों और आधुनिक उपकरणों के अभाव से सामान्य जनजीवन प्रभावित रहेगा।\n• कूटनीतिक साख: अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के आतंकवाद निरोधक दावों की विश्वसनीयता को गहरा झटका लगेगा। वैश्विक वित्तीय निगरानी संस्थाओं के समक्ष मुल्क की नीतियों पर नए सिरे से सवाल उठाए जा सकते हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह राजनीतिक विवाद तब गहराया जब प्रधानमंत्री ने पार्टी मंच से यह माना कि पूर्ववर्ती शासन में चरमपंथियों को अफगानिस्तान से लाकर बसाया गया था। यह बयान आंतरिक सुरक्षा खामियों और राजनीतिक खींचतान के मिले-जुले दबाव के चलते सामने आया।\n\n• राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता: आगामी चुनौतियों के बीच मौजूदा सरकार ने देश में बिगड़ती सुरक्षा स्थिति का सारा दायित्व इमरान खान के पूर्व प्रशासन पर डालने की रणनीति अपनाई है। इसके जरिए सत्तारूढ़ दल ने कानून-व्यवस्था की कमजोरियों पर अपनी जवाबदेही कम करने की कोशिश की।\n• सीमा पार घटनाक्रम: वर्ष 2019 और 2020 के दौरान अफगानिस्तान में बदलते भू-राजनीतिक हालात के बीच चरमपंथी लड़ाकों को वापस लाने और बातचीत के जरिए बसाने का विवादास्पद प्रयास किया गया था। इस पुनर्वास नीति ने चरमपंथियों को फिर से संगठित होने का मौका दे दिया।\n• वित्तीय जवाबदेही पर सवाल: 2010 के राष्ट्रीय वित्त आयोग समझौते के तहत मिले 800 अरब पाकिस्तानी रुपये के सही उपयोग पर सवाल उठाकर प्रधानमंत्री ने प्रांतीय सुरक्षा तंत्र की कमियों को उजागर किया। पुलिस आधुनिकीकरण और निगरानी परियोजनाओं की विफलता ने मौजूदा विवाद को हवा दी।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. शहबाज शरीफ ने आतंकवादियों की वापसी को लेकर क्या स्वीकार किया?\nउन्होंने स्वीकार किया कि 2019 और 2020 के दौरान अफगानिस्तान से आतंकियों को लाकर खैबर पख्तूनख्वा में दोबारा बसाया गया था।\n\n2. शहबाज शरीफ ने इस फैसले का जिम्मेदार किसे ठहराया?\nउन्होंने इस फैसले की जिम्मेदारी पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की तत्कालीन सरकार पर डाली।\n\n3. खैबर पख्तूनख्वा को सुरक्षा के लिए कितनी वित्तीय राशि दी जा चुकी है?\n2010 के राष्ट्रीय वित्त आयोग समझौते के तहत खैबर पख्तूनख्वा को करीब 800 अरब पाकिस्तानी रुपये दिए जा चुके हैं।\n\n4. पाकिस्तान को आतंकवाद के कारण कितना जान-माल का नुकसान हुआ है?\nशहबाज शरीफ के अनुसार मुल्क ने लगभग 80 हजार जानें गंवाई हैं और 150 से 200 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान उठाया है।\n\n5. इमरान खान की पार्टी पीटीआई ने इन आरोपों पर क्या कहा?\nपीटीआई ने कहा कि इमरान खान के दौर में शांति बेहतर थी और केंद्र सरकार ने प्रांत को जरूरी सुरक्षा संसाधन उपलब्ध नहीं कराए।",
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  "publishedAt": "2026-11-02",
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