जुल्फिकार अली भुट्टो ने खुद चुना जिस सेनाध्यक्ष को, उसी ने पलट दी पाकिस्तान की सत्ता 1971 में राष्ट्रपति बने जुल्फिकार अली भुट्टो कैसे अपनी ही बनाई सुरक्षा फोर्स, अपने ही चुने सेनाध्यक्ष जिया-उल-हक के हाथों सत्ता और आखिरकार जान तक गंवा बैठे, यह है उस सियासी उठापटक की पूरी कहानी. साल 1971 खत्म होते-होते पाकिस्तान दो हिस्सों में बंट चुका था. बांग्लादेश अलग हुए महज 4 दिन बीते थे कि 20 दिसंबर को तात्कालिक राष्ट्रपति याह्या खान को सैन्य जुंटा के दबाव में कुर्सी छोड़नी पड़ी. जंग में करारी हार झेल चुकी सेना उस वक्त राजनीति से दूरी बनाकर अपनी ताकत फिर से खड़ी करने में जुटी थी, और इसी खाली जगह को भरने के लिए देश के कद्दावर नेता जुल्फिकार अली भुट्टो राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठे और एक नई सरकार बनाने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली. भुट्टो ने मुल्क को एक नए पाकिस्तान का सपना दिखाया, नए संविधान और नई व्यवस्था का वादा किया. उनकी बातों ने समाज के अलग-अलग तबकों को एक सूत्र में पिरोया और टूटे हुए देश को एक उम्मीद दी. लेकिन यह एकजुटता ज्यादा दिन टिक नहीं पाई, क्योंकि भुट्टो का काम करने का तरीका, उनका व्यवहार और रवैया किसी जननेता जैसा कम और सत्ता पर पूरी पकड़ बनाने वाले शासक जैसा ज्यादा नजर आने लगा. राष्ट्रपति की कुर्सी छोड़ प्रधानमंत्री की गद्दी संभाली साल 1973 में भुट्टो और उनकी टीम ने जो नया संविधान तैयार किया, उसे देश ने अपना लिया. इस संविधान ने पाकिस्तान में संसदीय व्यवस्था बहाल कर दी. नई व्यवस्था में भुट्टो के लिए राष्ट्रपति पद अब सिर्फ एक रस्मी ओहदा बनकर रह गया था, इसलिए उन्होंने वह कुर्सी छोड़ दी और उससे कहीं ज्यादा ताकतवर प्रधानमंत्री पद अपने हाथ में ले लिया. सत्ता के नशे में डूबते भुट्टो प्रधानमंत्री बनते ही भुट्टो के भीतर निरंकुश सत्ता की भूख तेजी से बढ़ने लगी. अपने आसपास मौजूद करीबियों पर भी उनका भरोसा लगातार कम होता गया. इसी बढ़ते अविश्वास ने उन्हें 'फेडरल सिक्योरिटी फोर्स' यानी FSF खड़ी करने पर मजबूर किया, जिसका मकसद शुरुआत में सिर्फ भुट्टो की निजी सुरक्षा करना था. लेकिन वक्त के साथ यही बल एक अर्धसैनिक ढांचे में तब्दील हो गया. भुट्टो की सुरक्षा को लेकर यह बढ़ती जिद उनके शासन करने के तरीकों पर गंभीर सवाल खड़े करने लगी. इसका असर उनकी अपनी पार्टी पीपीपी के भीतर भी दिखा और वहां दरारें पड़नी शुरू हो गईं. आरोप है कि इसी दौर में भुट्टो ने अपने सबसे भरोसेमंद साथियों की जुबान बंद करानी शुरू कर दी और कई साथियों को जेल भेज दिया. वह युवा पीढ़ी, जो कभी भुट्टो को अपना आदर्श मानती थी, अब पुलिस और FSF की सख्ती का शिकार बनने लगी. इसका नतीजा यह निकला कि कई बार यूनिवर्सिटियों में पढ़ाई-लिखाई पूरी तरह ठप हो जाती थी. 1977 का चुनाव और नौ दलों का गठबंधन साल 1977 में भुट्टो ने देश का दूसरा राष्ट्रीय चुनाव कराने का फैसला किया. पीपीपी को टक्कर देने के लिए नौ विपक्षी दल एक साथ आए और पाकिस्तान नेशनल एलायंस यानी पीएनए नाम का एक बड़ा गठबंधन बनाया. सभी दल एक ही ब्लॉक की तरह चुनाव मैदान में उतरने पर राजी हो गए. पीएनए की इस एकजुटता से घबराकर भुट्टो और उनके साथियों ने एक ऐसी चुनावी रणनीति बनाई जिसमें विपक्ष को डराने-धमकाने के लिए FSF का खुलकर इस्तेमाल किया गया. इसके बावजूद पीएनए के नेता डरे नहीं, बल्कि उन्होंने भुट्टो और पीपीपी पर अपने हमले और तेज कर दिए. गठबंधन ने एक खास धार्मिक मंच का सहारा लेते हुए आरोप लगाया कि भुट्टो ने इस्लामी तौर-तरीकों के साथ धोखा किया है. पीएनए ने राजनीति के शुद्धिकरण और बुनियादी इस्लामी सिद्धांतों की ओर लौटने की मांग उठाई. चुनावी जीत जो दंगों में बदल गई तमाम कोशिशों के बावजूद पीएनए चुनाव में बुरी तरह हार गया, लेकिन यह चुनाव उतना शांतिपूर्ण नहीं रहा जितना दिखाया गया. नतीजे आते ही बड़े पैमाने पर धांधली और धोखाधड़ी के आरोप लगने लगे. मतदाताओं का यह गुस्सा जल्द ही सड़कों पर हिंसक प्रदर्शनों और दंगों की शक्ल ले बैठा. भुट्टो और उनकी पार्टी को भारी बहुमत मिला था, लेकिन देश के तमाम बड़े शहरों में भड़के दंगों ने इस जीत को खोखला साबित कर दिया. भुट्टो के इस रवैये से निराश सेना ने एक बार फिर पाकिस्तान की राजनीति में सीधा दखल दे दिया. साल 1971 में सेना जिस राजनीतिक दखल से पीछे हटी थी, वह अब दोबारा लौट आया, और तब से लेकर आज तक पाकिस्तान की सियासत सेना के साये से बाहर नहीं निकल पाई. सेना ने चुनाव के नतीजों को खारिज करते हुए भुट्टो को उनके ही घर में नजरबंद कर दिया और सरकार को भंग कर दिया. जिया-उल-हक के हाथों में सत्ता, लोकतंत्र का गला घोंटा गया इसके बाद आई 5 जुलाई 1977 की वह तारीख, जब जनरल मोहम्मद जिया-उल-हक ने पाकिस्तान की सत्ता पूरी तरह अपने हाथ में ले ली. दिलचस्प बात यह है कि जिया-उल-हक को सेना प्रमुख के पद के लिए खुद भुट्टो ने ही चुना था. शुरुआत में जिया-उल-हक ने ज्यादा निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से नए चुनाव कराने का भरोसा दिलाया, लेकिन जल्द ही यह साफ हो गया कि सेना भुट्टो को दोबारा सत्ता में लौटने का कोई मौका नहीं देना चाहती थी. इसके बाद भुट्टो को एक राजनीतिक विरोधी की हत्या का आदेश देने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया. जनरल जिया ने इस कथित अपराध के लिए उन पर मुकदमा चलाने पर पूरा जोर लगाया, और इसी के साथ भुट्टो के दौर का अंत हो गया. पाकिस्तान में जिया-उल-हक के सैन्य शासन की शुरुआत हो गई. यहीं से पाकिस्तान के हालात बिगड़ते चले गए और सेना की दादागिरी आज तक खत्म नहीं हुई है. वहां लोकतंत्र आज भी घुट-घुटकर दम तोड़ रहा है. इसका आप पर असर यह घटनाक्रम सीधे तौर पर भारतीय पाठकों की जेब या रोजमर्रा की जिंदगी पर असर नहीं डालता, लेकिन पड़ोसी मुल्क की सियासत को समझने में दिलचस्पी रखने वालों, रक्षा-विदेश नीति के जानकारों और पाकिस्तान की स्थिरता से जुड़े मसलों पर नजर रखने वालों के लिए यह अहम है. • पड़ोसी देश पर नजर रखने वालों के लिए: यह समझ में आता है कि पाकिस्तान में 1977 से चली आ रही सेना की सियासी दखलंदाजी की जड़ें कहां से शुरू हुईं, जिसका असर आज भी वहां की राजनीतिक स्थिरता और सीमा से जुड़े मसलों पर दिखता है. सवाल-जवाब 1. जुल्फिकार अली भुट्टो पाकिस्तान के राष्ट्रपति कब बने? 20 दिसंबर 1971 को याह्या खान के इस्तीफे के बाद भुट्टो ने राष्ट्रपति का पद संभाला. 2. भुट्टो ने राष्ट्रपति पद क्यों छोड़ दिया था? 1973 में नया संविधान लागू होने के बाद संसदीय व्यवस्था बहाल हुई और राष्ट्रपति पद सिर्फ औपचारिक रह गया, इसलिए भुट्टो ने ज्यादा ताकतवर प्रधानमंत्री पद संभाल लिया. 3. फेडरल सिक्योरिटी फोर्स यानी FSF क्या थी? यह भुट्टो की निजी सुरक्षा के लिए बनाई गई फोर्स थी, जो बाद में एक अर्धसैनिक संगठन में बदल गई. 4. पाकिस्तान नेशनल एलायंस (पीएनए) किसने बनाया था? 1977 के चुनाव में पीपीपी को टक्कर देने के लिए नौ विपक्षी दलों ने मिलकर पीएनए नाम का गठबंधन बनाया था. 5. 1977 के चुनाव नतीजों के बाद देश में क्या हुआ? भुट्टो की पार्टी भारी बहुमत से जीती, लेकिन धांधली के आरोपों के बाद देश भर के बड़े शहरों में हिंसक दंगे भड़क उठे. 6. भुट्टो की सत्ता किसने खत्म की? जनरल मोहम्मद जिया-उल-हक ने 5 जुलाई 1977 को पूरी सत्ता अपने हाथ में ले ली और भुट्टो को उनके ही घर में नजरबंद कर दिया गया. 7. जिया-उल-हक को सेना प्रमुख किसने बनाया था? जिया-उल-हक को सेना प्रमुख के पद के लिए खुद जुल्फिकार अली भुट्टो ने चुना था. 8. आखिर में भुट्टो पर क्या आरोप लगाकर गिरफ्तार किया गया? भुट्टो को एक राजनीतिक विरोधी की हत्या का आदेश देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, जिसके बाद जनरल जिया ने उन पर मुकदमा चलाया. https://trendkia.com/pakistan/zulfikar-ali-bhutto-ne-khuda-chuna-jisa-senadhyaksha-ko-usi-ne-palata-di-pakistan-ki-satta-4792 TrendKia — Har trend, sabse pehle.