# बच्चे का संकोच और झिझक दूर करने के असरदार पेरेंटिंग तरीके

> अगर आपका बच्चा अपनी बात रखने से कतराता है या नजरें चुराता है, तो सही परवरिश के इन उपायों से उसका खोया आत्मविश्वास वापस लौटाया जा सकता है।

**Type:** article · **Category:** पेरेंटिंग · **Published:** 2026-09-23 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/parenting/bachche-ka-snkocha-aura-jhijhaka-dura-karane-ke-asaradara-parenting-tarike-37396 · **Language:** Hindi
**Tags:** पेरेंटिंग टिप्स, बच्चे का आत्मविश्वास, शर्मीले बच्चे, बच्चों की परवरिश, आत्मविश्वास बढ़ाएं, चाइल्ड केयर

अक्सर देखा जाता है कि कई बच्चे किसी के सामने आते ही असहज हो जाते हैं और अपनी बात कहने में भारी झिझक महसूस करते हैं। यह संकोच केवल घर के सदस्यों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि शिक्षकों और सहपाठियों के सामने भी वे नजरें चुराने लगते हैं। माता-पिता के लिए अपने बच्चे का ऐसा व्यवहार स्वाभाविक रूप से चिंता की वजह बन जाता है। उन्हें लगने लगता है कि यह झिझक आगे चलकर बच्चे के भविष्य और सामाजिक विकास में रुकावट न बन जाए। हालांकि, मनोवैज्ञानिक और पारिवारिक स्तर पर यह कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसे सुलझाया न जा सके। सकारात्मक और समझदारी भरी पेरेंटिंग के जरिए बच्चों के भीतर यह भरोसा जगाया जा सकता है कि उनकी आवाज भी उतनी ही अहम है।

## संवाद का दायरा बढ़ाएं और राय को सम्मान दें
संकोची स्वभाव को बदलने की पहली सीढ़ी रोजाना की खुली बातचीत है। जब माता-पिता अपने व्यस्त दिनचर्या में से वक्त निकालकर बच्चे के साथ मित्रवत चर्चा करते हैं, तो बच्चे का मानसिक तनाव कम होने लगता है। उससे यह जानने का प्रयास करें कि स्कूल में उसका दिन कैसा रहा, दोस्तों के साथ कौन से खेल खेले गए या उसे किन चीजों में आनंद आता है। बातचीत केवल एकतरफा उपदेश न हो, बल्कि बच्चे को भी अपनी पूरी बात रखने की पूरी आजादी मिलनी चाहिए। उसकी छोटी-छोटी बातों को धैर्य से सुनें और उसकी राय को भी अहमियत दें। जब बच्चे को यह एहसास होता है कि उसकी बातों को ध्यानपूर्वक सुना जा रहा है, तो उसका संकोच अपने आप दूर होने लगता है।

## परिणाम से ज्यादा मेहनत और कोशिशों को सराहें
आमतौर पर जब बच्चा किसी परीक्षा में अच्छे अंक लाता है या खेल में जीत दर्ज करता है, तभी उसकी प्रशंसा की जाती है। लेकिन झिझक दूर करने के लिए जरूरी है कि माता-पिता उसके प्रयासों और कड़ी मेहनत की भी खुलकर तारीफ करें। यदि बच्चे ने किसी काम के लिए ईमानदारी से कोशिश की है, तो परिणाम चाहे जो भी रहा हो, उसकी लगन को पहचानें। जब आप बच्चे को यह सिखाते हैं कि सिर्फ जीतना ही सब कुछ नहीं है बल्कि सीखने की ललक अधिक महत्वपूर्ण है, तो उसमें असफलता का डर खत्म हो जाता है और खुद पर भरोसा मजबूत होता है।

## गलती होने पर डांटने के बजाय सुधार का अवसर दें
गलतियों पर मिलने वाली तीखी डांट या फटकार बच्चे को अंदर से डरा देती है, जिससे वह अगली बार कुछ भी नया करने या बोलने से पीछे हटने लगता है। जब भी बच्चे से कोई भूल हो, तो उस पर गुस्सा निकालने के बजाय यह समझाएं कि गलतियां सीखने की प्रक्रिया का एक सामान्य हिस्सा हैं। उसे यह विश्वास दिलाएं कि गलती सुधारने का रास्ता हमेशा खुला रहता है। जब घर का माहौल ऐसा होगा जहां गलतियों पर सजा नहीं बल्कि मार्गदर्शन मिलता है, तो बच्चा बिना किसी भय के अपनी बात सामने रखना शुरू कर देगा।

## भावनाओं को नजरअंदाज न करें और सुरक्षा का माहौल दें
यदि बच्चा कभी उदास, क्रोधित या डरा हुआ महसूस कर रहा हो, तो उसकी मनःस्थिति को सामान्य मानकर खारिज न करें। बच्चों के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि नकारात्मक भावनाएं भी इंसानी स्वभाव का हिस्सा हैं। उन्हें आश्वस्त करें कि वे अपनी हर चिंता और परेशानी बिना किसी संकोच के आपके साथ साझा कर सकते हैं। जब बच्चों को माता-पिता से पूरा भावनात्मक सहारा और सुरक्षा का माहौल मिलता है, तो वे बाहरी दुनिया के सामने भी खुलकर और निडर होकर पेश आने लगते हैं।

## इसका आप पर असर
इन आसान पेरेंटिंग उपायों को अपनाकर आप अपने संकोची बच्चे को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से अधिक आत्मविश्वासी और मुखर बना सकते हैं।

- **रोजमर्रा के व्यवहार में बदलाव:** घर में रोजाना 15 से 20 मिनट बिना किसी रोक-टोक के बच्चे की बात सुनने से उसकी झिझक कुछ ही हफ्तों में कम होने लगती है। इससे बच्चा स्कूल और बाहरी गतिविधियों में खुद आगे बढ़कर भाग लेना शुरू कर देता है।
- **पढ़ाई और स्कूल में फायदा:** जब बच्चे के मन से गलती करने पर डांट पड़ने का डर खत्म होता है, तो वह कक्षा में अध्यापकों से सवाल पूछने और जवाब देने में संकोच नहीं करता। यह खुलापन उसकी सीखने की गति और शैक्षणिक प्रदर्शन को बेहतर बनाता है।
- **मानसिक तनाव में राहत:** अपनी भावनाओं को खुलकर साझा करने की आजादी मिलने से बच्चा आंतरिक तनाव और हीनभावना से बचा रहता है। माता-पिता को चाहिए कि वे छोटी-छोटी कोशिशों की नियमित सराहना कर इस भरोसे को लगातार बनाए रखें।
- **सामाजिक दायरा:** जब बच्चे में खुद पर भरोसा जागता है, तो वह नए दोस्त बनाने और लोगों से नजरें मिलाकर बात करने में सहज महसूस करता है। अभिभावकों को किसी भी सामाजिक कार्यक्रम या महफिल में बच्चे पर तुरंत बोलने का अत्यधिक दबाव डालने से बचना चाहिए।

## ऐसा क्यों हुआ
बच्चों में संकोच, डर और झिझक का व्यवहार अचानक पैदा नहीं होता, बल्कि इसके पीछे पारिवारिक परिवेश, डांट का डर और संवाद की कमी जैसे कारण जिम्मेदार होते हैं।

- **गलतियों पर कठोर प्रतिक्रिया:** जब बच्चों को छोटी-छोटी भूलों पर लगातार डांट या फटकार का सामना करना पड़ता है, तो वे गलती के डर से अपने विचार व्यक्त करना ही बंद कर देते हैं। यही भय आगे चलकर उनके स्वभाव में स्थायी झिझक का रूप ले लेता है।
- **सिर्फ नतीजों पर जोर:** समाज और घर में जब बच्चे की पहचान केवल उसकी जीत या अव्वल अंकों से तय की जाती है, तो वह असफलता के डर से सहम जाता है। कोशिशों की उपेक्षा बच्चे के आत्मसम्मान को कमजोर करती है।
- **संवाद का अभाव:** माता-पिता की व्यस्तता या बच्चे की बातों को अनसुना करने की आदत से बच्चा अकेलापन महसूस करने लगता है। अपनी बात का महत्व न दिखने पर वह धीरे-धीरे बाहरी दुनिया से भी दूरी बना लेता है।

## सवाल-जवाब

### 1. अगर बच्चा दूसरों से बात करते समय आंखें चुराए तो क्या करना चाहिए?
उसे डांटने या जबरदस्ती करने के बजाय घर पर रोजाना खुलकर बात करें और उसकी राय को महत्व देकर उसका आत्मविश्वास धीरे-धीरे बढ़ाएं।

### 2. बच्चे की कोशिशों की सराहना करना क्यों जरूरी है?
सिर्फ नतीजों के बजाय मेहनत और प्रयासों की तारीफ करने से बच्चे का खुद पर भरोसा मजबूत होता है और असफलता का डर खत्म होता है।

### 3. गलती होने पर माता-पिता को कैसा व्यवहार अपनाना चाहिए?
गुस्सा करने या फटकार लगाने के बजाय शांत रहकर समझाएं कि गलती सीखने का हिस्सा है और उसे दोबारा प्रयास करने के लिए प्रेरित करें।

### 4. अगर बच्चा दुखी या डरा हुआ हो तो क्या करें?
उसकी भावनाओं को अनदेखा न करें, बल्कि समझाएं कि हर भावना सामान्य है ताकि वह बिना किसी डर के अपनी परेशानी साझा कर सके।

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