छोटे बच्चों के बार-बार रोने के पीछे हो सकती हैं अभिभावकों की ये पांच बड़ी भूलें यदि आपका बच्चा छोटी-छोटी बातों पर रोने लगता है, तो इसके पीछे परवरिश से जुड़ी कुछ आम गलतियां हो सकती हैं। आइए जानते हैं कि बच्चों के इस व्यवहार को कैसे समझें और स्थिति को बेहतर कैसे बनाएं। अक्सर देखा गया है कि जब बच्चे रोना शुरू करते हैं, तो घर के बड़े उन्हें तुरंत चुप कराने या डांटने लगते हैं। इस तरह का रवैया अपनाने के बजाय अभिभावकों को यह समझना चाहिए कि बच्चों के लिए डर, गुस्सा या निराशा जैसी भावनाओं को शब्दों में ढालना काफी कठिन होता है। ऐसी स्थिति में रोना ही उनके पास अपनी बात कहने का एकमात्र जरिया बचता है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चे के करीब बैठकर बेहद शांत लहजे में उससे बात करें और उसकी तकलीफ की असली वजह जानें। इससे बच्चे के मन में यह विश्वास पैदा होता है कि कोई उसकी बात को गंभीरता से सुन रहा है और समझ रहा है। भावनाओं को छोटा न समझें कई बार लोग बच्चों के रोने पर कह देते हैं कि इसमें रोने जैसी कोई बात नहीं है या इतनी सी बात पर कौन परेशान होता है। बड़ों की नजर में भले ही वह बात मामूली हो, लेकिन उस छोटे बच्चे की दुनिया के हिसाब से वह बहुत बड़ी समस्या हो सकती है। इसलिए बच्चे की परेशानी को तवज्जो न देना गलत है। अगर उसका खिलौना टूट गया है और वह रो रहा है, तो उसकी इस भावना को स्वीकार करें और कहें कि आप समझ सकते हैं कि उसे इस बात से दुख हुआ है। इस तरह के छोटे प्रयासों से बच्चे धीरे-धीरे अपनी भावनाओं को पहचानना और समझना शुरू कर देते हैं। अपनी बात शब्दों में कहना सिखाएं यदि बच्चा अपनी हर जरूरत को पूरा करवाने के लिए केवल रोने का सहारा लेता है, तो उसे धीरे-धीरे बोलकर अपनी बात रखना सिखाना बहुत जरूरी है। मिसाल के तौर पर, यदि वह किसी विशेष वस्तु के लिए जिद करते हुए रो रहा है, तो उससे नरमी से पूछें कि क्या उसे वास्तव में वही चीज चाहिए। उसे यह समझाएं कि रोने चिल्लाने के बजाए वह सीधे तौर पर अपनी मांग रख सकता है। हालांकि, इसका यह बिल्कुल अर्थ नहीं है कि बच्चा रोए तो उसकी पूरी तरह उपेक्षा की जाए। उसे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के अन्य तरीके सिखाने के साथ-साथ पूरा स्नेह और भावनात्मक समर्थन देना भी उतना ही आवश्यक है। घर के माहौल और बड़ों के आचरण का असर बच्चे अपने आस-पास के परिवेश और लोगों को देखकर ही बहुत कुछ सीखते हैं। यदि माता-पिता खुद जरा-जरा सी बात पर आपा खो देते हैं या घर में अक्सर गुस्सा और चिल्लाहट का माहौल रहता है, तो बच्चा भी वही तौर-तरीके अपनाने लगता है। इसलिए बच्चे के रोने की स्थिति में अभिभावकों को सबसे पहले खुद संयम रखना चाहिए। यदि आप खुद किसी तनाव में हैं, तो कुछ सेकंड के लिए रुककर लंबी सांस लें और उसके बाद ही बच्चे से संवाद स्थापित करें। माता-पिता का यह शांत स्वभाव बच्चों को भी अपनी भावनाओं पर काबू पाना और उन्हें संभालना सिखाता है। कई बार बच्चों में चिड़चिड़ापन और छोटी-छोटी बातों पर रोने की आदत के पीछे शारीरिक कारण भी हो सकते हैं, जैसे कि पूरी नींद न होना, भूख लगना, थकान महसूस होना या फिर बहुत ज्यादा शोर-शराबे वाले माहौल में रहना। ऐसी समस्याओं से बचने के लिए यह जरूरी है कि बच्चे के खाने, सोने और खेलने का एक निश्चित समय तय किया जाए। इसके अलावा, इस बात का भी पूरा ध्यान रखें कि वह दिनभर में पर्याप्त रूप से आराम कर रहा है या नहीं। उसके साथ कुछ वक्त बिताना, उसके साथ खेलना और बिना किसी जल्दबाजी के उसकी बातें सुनना इस समस्या का बहुत बड़ा समाधान हो सकता है। डॉक्टर की सलाह कब लें यह बात सच है कि बच्चों का कभी-कभार रोना एक सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन अगर कोई बच्चा जरूरत से ज्यादा रो रहा है, बहुत देर तक चुप नहीं होता या उसके स्वभाव में अचानक से कोई बड़ा बदलाव आ रहा है, तो इस बात को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि अत्यधिक रोने की वजह से उसकी नींद, खान-पान, स्कूल जाने की आदत या रोजमर्रा के कामों पर बुरा असर पड़ने लगे, तो बिना देर किए किसी अच्छे बाल रोग विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए। जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ माता-पिता को बच्चे की भावनात्मक और मानसिक जरूरतों को बेहतर तरीके से समझने में पूरी मदद कर सकते हैं। इसका आप पर असर बच्चों की भावनाओं को सही तरीके से समझने और संभालने से उनके मानसिक विकास पर सकारात्मक असर पड़ता है। • दैनिक जीवन में: माता-पिता के शांत रहने और बच्चों की बात सुनने से घर का माहौल बेहतर होता है और बच्चों का चिड़चिड़ापन कम होता है। • स्वास्थ्य पर असर: बच्चों की दिनचर्या और नींद का ध्यान रखने से उनकी सेहत में सुधार होता है और अनावश्यक तनाव से बचाव होता है। ऐसा क्यों हुआ बच्चे अपनी भावनाओं को परिपक्व तरीके से व्यक्त करना नहीं जानते हैं, जिसके कारण वे अपनी हर बात और परेशानी को रोकर जाहिर करते हैं। घर का माहौल और शारीरिक जरूरतें भी उनके इस व्यवहार को प्रभावित करती हैं। • कम्युनिकेशन की कमी: छोटे बच्चों का शब्द भंडार सीमित होता है, इसलिए वे अपनी उलझन या मांग को शब्दों में बयां नहीं कर पाते हैं। • वातावरण का प्रभाव: बच्चे अपने आसपास के बड़ों का गुस्सा या तनाव देखकर वही प्रतिक्रिया देना सीख जाते हैं। • शारीरिक थकान: नींद पूरी न होने या भूख लगने पर बच्चों की सहनशक्ति कम हो जाती है, जिससे वे छोटी-छोटी बातों पर रोने लगते हैं। सवाल-जवाब 1. बच्चा हर छोटी बात पर रोए तो सबसे पहले क्या करना चाहिए? बच्चे को डांटने या चुप रहने के लिए मजबूर करने के बजाय शांत आवाज में उसकी परेशानी पूछनी चाहिए। 2. खिलौना टूटने पर बच्चे के रोने पर माता-पिता को क्या कहना चाहिए? माता-पिता को यह स्वीकार करना चाहिए कि उन्हें समझ आ रहा है कि बच्चे को बुरा लग रहा है। 3. रोने के अलावा बच्चा अपनी बात कैसे रख सकता है? अभिभावकों को बच्चों को धीरे-धीरे शब्दों में अपनी जरूरतें और मांगे बताना सिखाना चाहिए। 4. बच्चों के चिड़चिड़ेपन की मुख्य शारीरिक वजहें क्या हो सकती हैं? भूख, थकान, नींद की कमी या ज्यादा शोर और गतिविधियां इसके मुख्य कारण हो सकते हैं। 5. बाल रोग विशेषज्ञ से सलाह कब लेनी चाहिए? जब बच्चा बहुत ज्यादा रोए, लंबे समय तक शांत न हो और उसके रोजमर्रा के कामों पर असर पड़े। https://trendkia.com/parenting/chhote-bachchon-ke-bara-bara-rone-ke-pichhe-ho-sakati-hain-abhibhavakon-ki-ye-pancha-bari-bhulen-51527 TrendKia — Har trend, sabse pehle.