छोटे बच्चों को फलों का रस पिलाना कितना सुरक्षित, जानिए सही उम्र और 120 मिलीलीटर की सीमा का नियम छोटे बच्चों के पोषण में जूस और साबुत फल के बीच बड़ा अंतर होता है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स और बाल रोग विशेषज्ञ के अनुसार एक साल से छोटे बच्चों को जूस नहीं देना चाहिए। शिशु जब मां के दूध या फॉर्मूला मिल्क के अलावा ठोस आहार की दुनिया में कदम रखता है, तब अक्सर माता-पिता के मन में यह सवाल उठता है कि बच्चे की थाली में फलों का रस कब शामिल किया जाए। अधिकांश अभिभावकों को लगता है कि रस निकालने से फल के सभी जरूरी पोषक तत्व बच्चे को आसानी से और बिना चबाने की मशक्कत के मिल जाएंगे। हकीकत इसके बिल्कुल उलट है, क्योंकि साबुत फल खाने और उसका रस पीने में जमीन-आसमान का फर्क होता है। बच्चों के शारीरिक विकास और खानपान की आदतों के मामले में सही उम्र और सही मात्रा का चयन करना बेहद संवेदनशील मामला है। इस विषय पर बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर रवि मलिक ने बेहद अहम जानकारियां साझा की हैं, जिन्हें हर माता-पिता को समझना जरूरी है। बच्चों के खानपान में किसी भी पेय पदार्थ को शामिल करने से पहले यह जानना जरूरी है कि शिशु का पाचन तंत्र उस विशेष खाद्य पदार्थ के लिए तैयार है या नहीं। यदि आप भी अपने नन्हे बच्चे के आहार में फलों का रस जोड़ने की योजना बना रहे हैं, तो चिकित्सकीय दिशा-निर्देशों और विशेषज्ञों के सुझावों की अनदेखी बिल्कुल न करें। एक वर्ष से कम उम्र के शिशुओं को रस न देने की सख्त सलाह अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (AAP) के आधिकारिक दिशा-निर्देशों के अनुसार, बारह महीने से कम उम्र के शिशुओं को किसी भी प्रकार का फलों का रस देने से पूरी तरह परहेज करना चाहिए। जीवन के पहले वर्ष में बच्चे की शारीरिक वृद्धि और पोषण का मुख्य आधार केवल मां का दूध या फॉर्मूला मिल्क ही होता है। जब किसी साबुत फल को निचोड़कर रस तैयार किया जाता है, तो फल का ठोस हिस्सा और उसमें मौजूद महत्वपूर्ण फाइबर पूरी तरह बाहर निकल जाता है। फाइबर की कमी के कारण यह पेय बच्चे के पाचन तंत्र पर अलग तरह का प्रभाव डालता है। इसके अलावा, रस में मौजूद प्राकृतिक मिठास का गाढ़ा स्तर छोटे बच्चों की स्वाद ग्रंथियों को बहुत तेजी से प्रभावित करता है। कम उम्र में मीठे तरल पदार्थों का स्वाद चखने के बाद बच्चे अन्य सामान्य और पौष्टिक चीजों के प्रति अरुचि दिखाने लगते हैं। यही कारण है कि बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर रवि मलिक भी छोटे बच्चों के लिए रस को एक आदर्श और पौष्टिक विकल्प मानने से इनकार करते हैं। एक से छह वर्ष तक के बच्चों के लिए 120 मिलीलीटर का नियम जब बच्चा एक वर्ष की दहलीज पार कर लेता है, तब भी रस को उसकी दैनिक दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा बनाने की आवश्यकता नहीं होती। बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर रवि मलिक का स्पष्ट कहना है कि एक से छह वर्ष की आयु वर्ग वाले बच्चों को एक बार में लगभग 4 आउंस यानी करीब 120 मिलीलीटर से अधिक फलों का रस नहीं दिया जाना चाहिए। माता-पिता को इस बात का स्पष्ट अंतर समझना होगा कि कभी-कभार सीमित मात्रा में कुछ घूंट रस देना और बच्चे को प्रतिदिन रस पीने का आदी बना देना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। यदि घर में ताजे और मौसमी फल सुलभ हैं, तो कटोरी में रस भरकर देने की तुलना में बच्चे के हाथों में फल का टुकड़ा थमाना पोषण और स्वास्थ्य दोनों के लिहाज से कहीं अधिक लाभकारी सिद्ध होता है। साबुत फल और निकाले गए रस के बीच का बुनियादी अंतर जब कोई बच्चा साबुत फल खाता है, तो उसे फल के रस के साथ-साथ उसका गूदा और प्राकृतिक आहारीय फाइबर भी भरपूर मिलता है। इसके विपरीत, रस तैयार करते समय फल का सबसे महत्वपूर्ण ठोस हिस्सा छनकर अलग फेंक दिया जाता है। इसलिए अभिभावकों को केवल इस धारणा पर भरोसा नहीं करना चाहिए कि पेय ताजे फल से ही तो बना है। उदाहरण के लिए, यदि बच्चा संतरा खाने की स्थिति में है, तो उसे संतरे की फांकें चबाने के लिए देना और उसे केवल संतरे का रस निकालकर पिलाना पोषण की दृष्टि से समान नहीं माना जा सकता। साबुत फल खाने से बच्चे के मसूड़ों और दांतों को चबाने का जरूरी अभ्यास मिलता है। इससे बच्चा अलग-अलग बनावट और स्वाद वाले ठोस खाद्य पदार्थों को स्वीकार करना सीखता है। यदि बच्चे को बार-बार मीठे तरल पेय दिए जाएं, तो उसकी भोजन की पसंद बिगड़ सकती है और वह दाल, हरी सब्जियों तथा अन्य सादे पौष्टिक व्यंजनों से मुंह मोड़ने लग सकता है। रस देते समय ध्यान रखने योग्य जरूरी सावधानियां यदि आपका बच्चा उस आयु वर्ग में पहुंच चुका है जहां रस दिया जा सकता है और आप उसे यह पेय देना चाहते हैं, तो बाजार में मिलने वाले डिब्बाबंद या टेट्रा पैक उत्पादों से पूरी तरह दूरी बनाकर रखें। बाल रोग विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार, घर में स्वच्छ तरीके से तैयार किया गया शुद्ध और ताजा रस ही बच्चे के लिए सबसे बेहतर विकल्प होता है। डिब्बाबंद पेय पदार्थों को बच्चे के नियमित भोजन में कभी भी जगह नहीं देनी चाहिए। इसके साथ ही, बच्चे की प्यास बुझाने या पेट भरने के लिए उसे केवल मीठे पेय पदार्थों पर निर्भर न करें। बच्चे की आयु और शारीरिक आवश्यकता के अनुसार उसकी दैनिक थाली में हरी पत्तेदार सब्जियां, दालें, साबुत अनाज और साबुत फल प्रमुखता से शामिल होने चाहिए। यदि पेय के रूप में कुछ नया जोड़ना ही है, तो बच्चे की व्यक्तिगत जरूरत और उम्र के अनुरूप दूध, स्मूदी या ताजा नारियल पानी जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है। संतुलित आहार ही है बेहतर शारीरिक विकास की कुंजी माता-पिता के लिए सबसे बुनियादी नियम यह है कि वे कभी भी फलों के रस को पूरे फल का विकल्प न समझें। शिशु के आहार में किसी भी नई खाने-पीने की वस्तु को जोड़ते समय उसकी उम्र, उसके निगलने व चबाने की क्षमता और उसकी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं को परखना अनिवार्य है। केवल एक ही प्रकार के खाद्य या पेय पर निर्भर रहने के बजाय बचपन से ही विविध प्रकार के फल, दालें और सब्जियां खाने की आदत डालना ही बच्चे के दीर्घकालिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाता है। यदि बच्चे को स्वास्थ्य संबंधी कोई विशेष समस्या हो, तो आहार में कोई भी बड़ा बदलाव करने से पहले हमेशा बाल रोग विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए। इसका आप पर असर छोटे बच्चों को फलों का रस देने से जुड़े यह चिकित्सीय नियम माता-पिता को सही पोषण चुनने और बच्चों की खानपान की गलत आदतें रोकने में मदद करते हैं। • अभिभावकों के लिए: एक साल से कम उम्र के शिशुओं को फलों का रस देने से पूरी तरह बचें। इससे बच्चे के पाचन और पोषण का संतुलन बिगड़ने से सुरक्षित रहेगा। • एक से छह साल के बच्चों के लिए: जूस की दैनिक मात्रा 120 मिलीलीटर यानी करीब 4 आउंस तक ही सीमित रखें। इससे बच्चों में अत्यधिक मीठा पीने की लत नहीं लगेगी और दांतों व वजन पर बुरा असर नहीं पड़ेगा। • साबुत फल की प्राथमिकता: रस निकालने के बजाय बच्चे को फल के टुकड़े या फांकें चबाने के लिए दें। इससे बच्चे को जरूरी फाइबर मिलेगा और चबाने की क्षमता विकसित होगी। • डिब्बाबंद पेय से परहेज: बाजार के टेट्रा पैक या पैकेज्ड जूस को बच्चे के रोजमर्रा के आहार में शामिल न करें। केवल घर पर निकाला गया ताजा रस ही सीमित मात्रा में दें। ऐसा क्यों हुआ फलों के रस और साबुत फल के पोषण में बड़ा अंतर होने तथा छोटे बच्चों के संवेदनशील पाचन तंत्र के कारण बाल रोग विशेषज्ञों ने यह कड़े नियम तय किए हैं। • फाइबर की अनुपस्थिति: रस निकालते समय फल का गूदा और फाइबर बाहर हो जाता है। इसके चलते रस पीने से बच्चे को वह संपूर्ण पोषण नहीं मिल पाता जो साबुत फल खाने से मिलता है। • मीठे की लत का जोखिम: रस में प्राकृतिक शर्करा सघन रूप में होती है जो शिशु की स्वाद ग्रंथियों को प्रभावित करती है। इससे बच्चा बाद में दाल, सब्जियों जैसे सादे और पौष्टिक खाद्य पदार्थों से परहेज करने लगता है। • शिशु पोषण के नियम: अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के अनुसार पहले साल में केवल मां का दूध या फॉर्मूला मिल्क ही बच्चे की मुख्य जरूरत होता है। रस देने से इन प्राथमिक पोषक स्रोतों की मात्रा कम हो सकती है। सवाल-जवाब 1. किस उम्र से पहले बच्चे को फलों का रस नहीं देना चाहिए? अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स और विशेषज्ञों के अनुसार एक साल से कम उम्र के बच्चों को फलों का रस बिल्कुल नहीं देना चाहिए। 2. एक से छह साल के बच्चों के लिए जूस की अधिकतम सुरक्षित मात्रा कितनी है? इस आयु वर्ग के बच्चों को एक बार में लगभग 4 आउंस यानी करीब 120 मिलीलीटर से अधिक रस नहीं देना चाहिए। 3. साबुत फल खाना रस पीने से बेहतर क्यों माना जाता है? साबुत फल खाने से बच्चे को जरूरी फाइबर मिलता है और चबाने की आदत विकसित होती है, जबकि रस में फाइबर निकल जाता है। 4. क्या बच्चों को डिब्बाबंद या टेट्रा पैक जूस देना सुरक्षित है? बच्चों को पैकेज्ड या टेट्रा पैक जूस देने से बचना चाहिए; यदि रस देना ही है तो घर पर बना ताजा रस ही बेहतर विकल्प है। 5. एक साल से छोटे बच्चे के लिए पोषण का सबसे मुख्य स्रोत क्या होना चाहिए? एक वर्ष से कम आयु के शिशुओं के लिए मां का दूध या फॉर्मूला मिल्क ही पोषण का सबसे प्रमुख और जरूरी स्रोत होता है। https://trendkia.com/parenting/chhote-bachchon-ko-phalon-ka-rasa-pilana-kitana-surakshita-janie-sahi-umra-aura-120-ml-ki-sima-ka-niyama-36485 TrendKia — Har trend, sabse pehle.