पेरेंट्स की ये 5 गलतियां घर में बढ़ाती हैं भाई-बहनों के बीच मनमुटाव, ताउम्र रिश्तों में आ जाती है कड़वाहट घरों में भाई-बहनों के बीच छोटी-मोटी नोंकझोंक आम है, लेकिन माता-पिता की कुछ अनजाने आदतें इस तनाव को और गहरा कर देती हैं। आइए जानते हैं उन पांच प्रमुख बातों के बारे में जो भाई-बहनों के बीच हमेशा के लिए दूरियां पैदा कर सकती हैं। घरों में दो बच्चे होने पर खिलौनों को लेकर खींचतान, टीवी के रिमोट पर बहस या इस बात पर नोंकझोंक होना कि मम्मी-पापा किसे ज्यादा प्यार करते हैं, बहुत सामान्य बात है। भाई-बहनों के बीच ऐसे मतभेद अक्सर देखने को मिलते हैं। हालांकि, कई बार माता-पिता के व्यवहार और कुछ खास आदतें बच्चों के इन झगड़ों को बदतर बना देती हैं। धीरे-धीरे यही छोटी-छोटी बातें बच्चों के मन में जलन, नाराजगी और रिश्तों में हमेशा के लिए दूरियां पैदा कर देती हैं। बच्चों की लगातार तुलना करना माता-पिता अक्सर बच्चों को प्रेरित करने के लिए उनकी आपस में तुलना कर देते हैं जैसे कि भाई से कुछ सीखो या बहन कितना अच्छा लिखती है। लेकिन हर बच्चे की अपनी क्षमता, कमजोरियां और सीखने की गति अलग होती है। बार-बार तुलना किए जाने से बच्चे को यह लगने लगता है कि वह अपने भाई या बहन से किसी भी मामले में कमतर है। इससे दूसरे बच्चे के प्रति मन में ईर्ष्या और हीनभावना घर करने लगती है। तुलना करने के बजाय बच्चों की अपनी मेहनत और प्रगति की सराहना करनी चाहिए ताकि हर बच्चा अपनी एक अलग पहचान महसूस कर सके। हमेशा एक ही बच्चे का पक्ष लेना जब भी घर में बच्चों के बीच कोई विवाद होता है, तो कई बार माता-पिता पूरी बात सुने बिना ही बड़े बच्चे को गलत ठहरा देते हैं या छोटे का साथ देने लगते हैं। इस तरह के रवैये से दूसरे बच्चे के मन में गहरी नाराजगी घर कर जाती है और उसे लगता है कि उसकी बात का कोई मोल नहीं है। यह समझना जरूरी है कि उम्र में छोटा होने का मतलब यह कतई नहीं है कि वह हर बार सही हो और बड़े होने का अर्थ यह नहीं है कि हर गलती की जिम्मेदारी उसी की बने। एक बच्चे पर सारी जिम्मेदारियां लादना अक्सर घरों में बड़े बच्चे पर इस बात का दबाव होता है कि वह छोटे भाई-बहन का ख्याल रखे, अपनी हर चीज बांटे और हर परिस्थिति में समझदारी का परिचय दे। बच्चों को जिम्मेदार बनाना अच्छी बात है, लेकिन यदि हमेशा उसी बच्चे से समझौते की उम्मीद की जाए, तो वह खुद को उपेक्षित महसूस करने लगता है। वहीं दूसरी ओर, छोटे बच्चे को हर गलती पर माफ कर देना भी उचित नहीं है क्योंकि इससे उसे अपनी जिम्मेदारी का अहसास नहीं हो पाता। घर के नियम सभी के लिए समान होने चाहिए और उम्र के हिसाब से काम बांटने चाहिए। मामले की तह तक जाए बिना तुरंत फैसला सुनाना बच्चों के बीच हल्की-फुल्की बहस शुरू होते ही कई बार माता-पिता बिना पूरी बात सुने बीच में ही फैसला थोप देते हैं। इससे हालांकि उस वक्त विवाद टल जाता है, लेकिन बच्चे कभी भी खुद से अपनी समस्याओं को सुलझाना नहीं सीख पाते हैं। यदि झगड़े से किसी प्रकार का नुकसान नहीं हो रहा है, तो दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का पूरा मौका देना चाहिए। उनसे खुद ही ऐसा समाधान निकलवाना चाहिए जिससे किसी के साथ अन्याय न हो, हालांकि मारपीट की स्थिति में तुरंत दखल देना जरूरी है। बच्चों के सामने एक-दूसरे को अपमानित करना यदि माता-पिता बच्चों के सामने किसी एक की गलती पर उसका मजाक उड़ाते हैं या उसे दूसरों के सामने नीचा दिखाते हैं, तो इससे उनके आत्मसम्मान को भारी ठेस पहुंचती है। बच्चे अपने घर के बड़ों से ही सीखते हैं कि किसी विवाद या असहमति के समय कैसे प्रतिक्रिया दी जानी चाहिए। बच्चे को गलत कहने के बजाय यह समझाना चाहिए कि उसका कौन सा कदम गलत था और भविष्य में उसे क्या तरीका अपनाना चाहिए। भाई-बहनों के बीच आपसी तालमेल कैसे बढ़ाएं यह अपेक्षा करना गलत है कि भाई-बहन हर समय आपस में प्रेम से रहें और उनमें कभी मतभेद न हो। छिटपुट लड़ाइयां होना स्वभाविक है, लेकिन अहम यह है कि वे मतभेदों के बावजूद एक-दूसरे का सम्मान करना सीखें। बच्चों को एक-से-बढ़कर-एक दोस्त बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, लेकिन उन्हें ऐसा सुरक्षित माहौल जरूर दिया जा सकता है जहां वे खुलकर अपनी भावनाएं व्यक्त कर सकें और गलतियां स्वीकार कर सकें। इसका आप पर असर माता-पिता के व्यवहार का बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और आपसी रिश्तों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। • घर का माहौल: बच्चों के साथ समान व्यवहार करने से घर में तनाव कम होता है और आपसी सौहार्द बढ़ता है। • मानसिक विकास: लगातार तुलना से बच्चों में हीनभावना पनप सकती है, जिससे उनका आत्मविश्वास प्रभावित होता है। • पारिवारिक रिश्ते: बचपन के अनसुलझे मनमुटाव बड़े होने पर स्थायी दूरियों में बदल सकते हैं। • व्यवहार में सुधार: निष्पक्ष फैसले लेने से बच्चों में न्याय की भावना और एक-दूसरे के प्रति सम्मान विकसित होता है। ऐसा क्यों हुआ बच्चों के बीच आपसी कलह और ईर्ष्या के पीछे अक्सर परवरिश के कुछ अनजाने तरीके और घरेलू माहौल जिम्मेदार होते हैं। • तुलना का प्रभाव: लगातार तुलना बच्चों के मन में असुरक्षा की भावना पैदा करती है, जो बाद में गुस्से या ईर्ष्या का रूप ले लेती है। • पक्षपातपूर्ण रवैया: बिना पूरी बात सुने किसी एक का पक्ष लेने से दूसरे बच्चे में उपेक्षित होने की भावना घर कर जाती है। • अतिरिक्त दबाव: बड़े बच्चे पर जरूरत से ज्यादा जिम्मेदारियां डालने से उसके मन में खीझ पैदा होती है, जिससे रिश्ते प्रभावित होते हैं। सवाल-जवाब 1. भाई-बहनों के बीच झगड़े आम क्यों माने जाते हैं? खिलौनों, रिमोट और माता-पिता के ध्यान को लेकर बच्चों के बीच मतभेद होना सामान्य विकास का हिस्सा है। 2. बच्चों की तुलना करने से क्या नुकसान होता है? इससे बच्चों के मन में हीनभावना और अपने भाई-बहन के प्रति जलन पैदा हो सकती है। 3. क्या माता-पिता को हर झगड़े में तुरंत फैसला सुनाना चाहिए? नहीं, बिना पूरी बात सुने फैसला सुनाने से बच्चे खुद से समस्या सुलझाना नहीं सीख पाते हैं। 4. बड़े बच्चे पर ज्यादा जिम्मेदारी डालने का क्या असर होता है? इससे बड़ा बच्चा खुद को उपेक्षित महसूस करने लगता है और उसके मन में तनाव बढ़ सकता है। https://trendkia.com/parenting/how-parental-habits-can-fuel-sibling-rivalry-and-create-lifelong-distance-53304 TrendKia — Har trend, sabse pehle.