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  "type": "article",
  "title": "मेवात में आईफोन न मिलने पर हाईटेंशन टावर पर चढ़ा युवक, जानें बच्चों में फ्रस्ट्रेशन टॉलरेंस बढ़ाना क्यों है बेहद जरूरी",
  "summary": "हरियाणा के मेवात में आईफोन की मांग पूरी न होने पर एक युवक बिजली के टावर पर चढ़ गया, जिसने बच्चों में निराशा संभालने और ना सुनने की क्षमता विकसित करने के महत्व को रेखांकित किया है.",
  "content": "माता-पिता जब बच्चों की पसंद की कोई वस्तु दिलाने से मना कर देते हैं, तो उनका मायूस होना, रोना या गुस्सा दिखाना एक सामान्य मानवीय व्यवहार माना जाता है. कई बार बच्चे अपनी बात मनवाने के लिए जिद पकड़ लेते हैं या कुछ देर नाराज रहते हैं. परेशानी तब गंभीर रूप ले लेती है जब यह नाराजगी किसी घातक और जानलेवा कदम की ओर बढ़ जाए. हरियाणा के मेवात इलाके में सामने आए एक हालिया मामले ने परिवार और समाज दोनों को सोचने पर विवश कर दिया है. मेवात के जहटाना गांव में एक युवक ने परिवार द्वारा आईफोन न दिलाए जाने पर ऐसा कदम उठा लिया, जिससे पूरे इलाके में हड़कंप मच गया.\n\nप्राप्त विवरण के अनुसार, यह युवक लगातार अपने माता-पिता से महंगा आईफोन खरीदने का दबाव बना रहा था. परिजनों ने जब उसकी यह अनुचित मांग पूरी करने में असमर्थता जताई, तो वह गुस्से से भर गया. इसी तैश में आकर वह गांव के पास से गुजर रही हाईटेंशन बिजली लाइन के ऊंचे टावर पर जा चढ़ा. युवक को बिजली के खंभे पर काफी ऊंचाई तक चढ़ते देख आसपास मौजूद ग्रामीणों के होश उड़ गए और चारों तरफ अफरा-तफरी फैल गई. स्थानीय लोगों ने बिना देर किए तुरंत पुलिस को सूचना दी. पुलिस दल ने मौके पर पहुंचकर ग्रामीणों के सहयोग से युवक को समझाने-बुझाने की लंबी कोशिश शुरू की. काफी मशक्कत और बातचीत के बाद अंततः उसे सुरक्षित नीचे उतार लिया गया, जिससे एक बड़ा हादसा टल गया.\n\nमनोविज्ञान में क्या है फ्रस्ट्रेशन टॉलरेंस?\nयह अप्रत्याशित घटना दर्शाती है कि जब इंसान की कोई ख्वाहिश पूरी नहीं होती, तो मन में पैदा होने वाले गुस्से और हताशा को सही तरीके से नियंत्रित करना कितना जरूरी होता है. व्यवहार विज्ञान और मनोविज्ञान के दायरे में इस मानसिक क्षमता को फ्रस्ट्रेशन टॉलरेंस कहा जाता है. सरल शब्दों में कहें तो इसका सीधा अर्थ यह है कि जब हमारी कोई दिली इच्छा पूरी न हो पाए या जीवन की परिस्थितियां हमारी मर्जी के खिलाफ चली जाएं, तो हम उस असफलता, निराशा और क्रोध को किस तरह सकारात्मक रूप से संभालते हैं.\n\nजीवन के सफर में हर व्यक्ति को किसी न किसी मोड़ पर असफलता या इनकार का सामना करना ही पड़ता है. बचपन के स्तर पर देखें तो जब किसी बच्चे को उसका मनपसंद खिलौना नहीं मिलता, स्क्रीन पर मोबाइल देखने का निर्धारित समय समाप्त हो जाता है या अभिभावक किसी बात के लिए मना कर देते हैं, तो उसे ठेस लगना स्वाभाविक है. लेकिन उस विशेष पल में वह अपनी तीव्र भावनाओं को किस ढंग से संभालता है, वही उसका फ्रस्ट्रेशन टॉलरेंस तय करता है.\n\nभावनाओं को समझने की प्रक्रिया और चेतावनी संकेत\nबच्चों के भीतर अपनी भावनाओं को गहराई से समझने और उन्हें नियंत्रित करने की मानसिक क्षमता एक दिन में विकसित नहीं होती, बल्कि यह धीरे-धीरे उम्र के साथ बढ़ती है. यही वजह है कि बच्चों से हमेशा परिपक्व और तुरंत समझदारी भरे व्यवहार की उम्मीद रखना व्यावहारिक नहीं है. इसके बावजूद, यदि कोई बच्चा सामान्य सी बात पर असामान्य रूप से हिंसक गुस्सा दिखाने लगे, खुद को शारीरिक चोट पहुंचाने की धमकी दे, दूसरों को नुकसान पहुंचाए या किसी खतरनाक रास्ते पर निकल पड़े, तो ऐसे व्यवहार को कतई नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.\n\nअमेरिकन एकेडमी ऑफ चाइल्ड एंड अडोलेसेंट साइकियाट्री के अनुसार, बच्चों में बार-बार दिखने वाले तीव्र और अनियंत्रित भावनात्मक उबाल के पीछे कई गहरे मनोवैज्ञानिक कारण हो सकते हैं. यदि ऐसे लक्षण बार-बार सामने आ रहे हों, तो परिवार को बिना किसी झिझक के बाल मनोचिकित्सक या विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए ताकि स्थिति बेकाबू न हो.\n\nबच्चों को इनकार और ‘ना’ स्वीकार करना कैसे सिखाएं?\nबच्चों के स्वस्थ मानसिक विकास के लिए उन्हें बचपन से ही इनकार को सहजता से स्वीकार करने की आदत डालना बेहद आवश्यक है. इसके लिए अभिभावक निम्नलिखित व्यावहारिक तौर-तरीकों को अपनी परवरिश का हिस्सा बना सकते हैं\n\n• हर जिद के आगे न झुकें: बच्चों से गहरा स्नेह रखना और उनकी हर अनुचित मांग को तुरंत स्वीकार कर लेना दो बिल्कुल अलग पहलू हैं. यदि बच्चा किसी बहुत महंगे फोन या गैर-जरूरी चीज की मांग कर रहा है, तो उसे शांत रहकर समझाएं कि वर्तमान में इसकी कोई आवश्यकता नहीं है. बच्चे के रोने, चिल्लाने या गुस्सा दिखाने के दबाव में आकर अपने सही फैसले से पीछे न हटें.\n• उनकी भावनाओं का सम्मान करें: जब बच्चा अपनी बात न माने जाने पर दुखी हो, तो उसे डांटकर या यह कहकर चुप न कराएं कि इसमें बुरा मानने वाली क्या बात है. इसके बजाय उससे सहानुभूतिपूर्वक कहें कि आप उसकी निराशा को अच्छी तरह समझ रहे हैं, लेकिन परिस्थितियों के कारण अभी यह वस्तु दिलाना संभव नहीं है. इससे बच्चा महसूस करता है कि उसकी बात सुनी गई है.\n• धैर्य और इंतजार की आदत डालें: नई पीढ़ी में तुरंत सब कुछ पा लेने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है. इसलिए बच्चों को समझाएं कि जीवन में हर चीज तुरंत नहीं मिल सकती. उन्हें किसी खिलौने या खास तोहफे को पाने के लिए कुछ समय तक प्रतीक्षा करने का अभ्यास कराएं, जिससे उनमें स्वाभाविक रूप से धैर्य रखने का गुण विकसित होगा.\n• गलतियों और असफलता से सीखने का मौका दें: अभिभावकों को हर छोटी-बड़ी मुश्किल में खुद कूदकर बच्चे की राह आसान करने की आदत से बचना चाहिए. यदि बच्चा किसी खेल में हार जाता है या पढ़ाई का कोई काम बिगाड़ लेता है, तो उस असफलता को उसे खुद महसूस करने दें और उसे दोबारा प्रयास करने के लिए प्रेरित करें.\n• स्वयं सकारात्मक व्यवहार का उदाहरण बनें: बच्चे बड़ों के उपदेशों से ज्यादा उनके दैनिक आचरण से सीखते हैं. यदि माता-पिता खुद छोटी-छोटी परेशानियों पर चीखते-चिल्लाते हैं या गुस्से में सामान पटकते हैं, तो बच्चा भी उसी आक्रामक व्यवहार की नकल करेगा. इसलिए विपरीत परिस्थितियों में खुद शांत रहकर मिसाल पेश करना जरूरी है.\n\nभावनाओं को दबाना नहीं, संतुलन बनाना सिखाएं\nपालकों को यह बात भली-भांति समझनी चाहिए कि बच्चों को ‘ना’ सुनना सिखाने का उद्देश्य उनकी आंतरिक भावनाओं को दबाना या उनकी खुशियों पर पाबंदी लगाना कतई नहीं है. उन्हें यह एहसास कराना जरूरी है कि किसी बात पर असहमत या नाराज होना मानवीय है, लेकिन उस गुस्से की आड़ में खुद को या दूसरों को खतरे में डालना पूरी तरह अस्वीकार्य है. माता-पिता का सच्चा स्नेह, अटूट धैर्य और स्पष्ट सीमाएं बच्चों को यह सिखाने में सबसे अहम भूमिका निभाती हैं कि जीवन में हर इच्छा पूरी न होने के बावजूद कैसे मानसिक रूप से संतुलित और खुशहाल रहा जा सकता है.\n\nइसका आप पर असर\nयह घटना परिवारों को यह समझने के लिए सचेत करती है कि बच्चों की हर जिद मानना उनके मानसिक विकास के लिए जोखिम भरा हो सकता है.\n\n• भारत में: देश भर के अभिभावकों को नई पीढ़ी में बढ़ती अधीरता और महंगी डिजिटल वस्तुओं के प्रति तीव्र आकर्षण को समय रहते पहचानना होगा. बच्चों की हर अवांछित मांग पूरी करने के बजाय उन्हें शुरुआती उम्र से ही सीमित साधनों में संतुष्ट रहने और धैर्य रखने का पाठ पढ़ाना अनिवार्य है.\n• मेवात और हरियाणा में: स्थानीय परिवारों और ग्रामीण समुदायों के लिए यह घटना किशोरों के बदलते व्यवहार और संवाद की कमी को दूर करने की एक स्पष्ट चेतावनी है. माता-पिता को बच्चों से लगातार आत्मीय संवाद बनाए रखना चाहिए ताकि असंतोष गहराने पर वे आत्मघाती कदमों की ओर न बढ़ें.\n• पालकों और अभिभावकों के लिए: माता-पिता को यह नियम दृढ़ता से अपनाना चाहिए कि केवल रोने या जिद करने पर अपना सही निर्णय न बदलें. बच्चों को अपनी सीमाओं और आर्थिक प्राथमिकताओं के बारे में शांत भाव से समझाएं ताकि वे ना सुनने के अभ्यस्त बन सकें.\n• बच्चों और युवाओं के लिए: युवाओं को यह समझना आवश्यक है कि भौतिक वस्तुएं या महंगे गैजेट्स व्यक्तिगत जीवन और सुरक्षा से बढ़कर नहीं हैं. किसी इच्छा के पूरा न होने पर परिवार से नाराज होकर खतरनाक कदम उठाना खुद की जान को खतरे में डालता है.\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह घटना युवाओं में इच्छा पूरी न होने पर उपजी तीव्र निराशा और उसे संभालने की असमर्थता का प्रत्यक्ष परिणाम है.\n\n• तात्कालिक मांग पूरी न होना: युवक द्वारा आईफोन खरीदने की जिद को परिवार ने जब स्वीकार नहीं किया, तो अत्यधिक क्रोध में उसने यह जानलेवा कदम उठाया. अपने मनमुताबिक परिणाम न मिलने पर वह अपनी उत्तेजना पर काबू नहीं रख सका.\n• फ्रस्ट्रेशन टॉलरेंस की गंभीर कमी: कई किशोरों में जीवन की असफलताओं या ना सुनने की मानसिक क्षमता पूरी तरह विकसित नहीं होती. जब किसी इच्छा पर अचानक रोक लगती है, तो वे संतुलित सोचने के बजाय भावनात्मक उफान में खुद को जोखिम में डाल देते हैं.\n• गैजेट्स का सामाजिक आकर्षण: महंगे स्मार्टफोन और आधुनिक जीवनशैली को लेकर युवाओं में सामाजिक दबाव और दिखावे की ललक तेजी से बढ़ रही है. जब वास्तविक आर्थिक स्थिति इस दिखावे की इजाजत नहीं देती, तो युवाओं में गहरा तनाव और हताशा जन्म लेती है.\n• विशेषज्ञों की राय और आगे की राह: अमेरिकन एकेडमी ऑफ चाइल्ड एंड अडोलेसेंट साइकियाट्री के अनुसार लगातार दिखने वाले तीव्र गुस्से के पीछे कई छिपे मानसिक पहलू हो सकते हैं. ऐसे मामलों में परिवार को समय रहते विशेषज्ञ की मदद लेनी चाहिए ताकि भविष्य में गंभीर घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके.\n\nसवाल-जवाब\n\n1. हरियाणा के मेवात में युवक हाईटेंशन बिजली के टावर पर क्यों चढ़ गया था?\nयुवक अपने माता-पिता से आईफोन खरीदने की जिद कर रहा था, जिसे परिजनों द्वारा पूरा न करने पर वह नाराज होकर टावर पर चढ़ गया.\n\n2. यह घटना मेवात के किस गांव की है और युवक को कैसे नीचे उतारा गया?\nयह घटना मेवात के जहटाना गांव की है, जहां पुलिस और ग्रामीणों ने काफी समझाइश और मशक्कत के बाद युवक को सुरक्षित नीचे उतारा.\n\n3. मनोविज्ञान में 'फ्रस्ट्रेशन टॉलरेंस' का क्या अर्थ है?\nइसका अर्थ यह है कि जब हमारी कोई इच्छा पूरी न हो या काम मनमुताबिक न हो, तो हम उस असफलता, निराशा और गुस्से को किस तरह संतुलित रूप से संभालते हैं.\n\n4. बच्चों के व्यवहार में किन संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए?\nयदि बच्चा छोटी बातों पर जरूरत से ज्यादा गुस्सा करता है, खुद को या दूसरों को चोट पहुंचाने की धमकी देता है या खतरनाक कदम उठाता है, तो इसे अनदेखा नहीं करना चाहिए.\n\n5. माता-पिता बच्चों को 'ना' सुनना कैसे सिखा सकते हैं?\nबच्चों की हर जिद के आगे न झुकें, उनकी भावनाओं को समझें, उन्हें इंतजार करने और गलतियों से सीखने दें तथा स्वयं शांत व्यवहार का उदाहरण पेश करें.",
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