# सार्वजनिक आयोजनों में बच्चों का चंचल व्यवहार और सकारात्मक परवरिश का नजरिया

> औपचारिक कार्यक्रमों में बच्चों की चंचलता को डांटने या फोन थमाने के बजाय धैर्य और समझदारी से संभालने पर बाल विशेषज्ञ जोर दे रहे हैं।

**Type:** article · **Category:** पेरेंटिंग · **Published:** 2026-10-29 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/parenting/sarvajanika-ayojanon-men-bachchon-ka-chnchala-vyavahara-aura-sakaratmaka-paravarisha-ka-najariya-53227 · **Language:** Hindi
**Tags:** पैरेंटिंग, बाल विकास, सकारात्मक परवरिश, अंबानी परिवार, रिलायंस जियो, बच्चों की सेहत

किसी बड़े और बेहद औपचारिक सार्वजनिक कार्यक्रम में जब छोटे बच्चे मंच पर दौड़ने लगें, मेहमानों के बीच अठखेलियां करने लगें या सजावटी फूलों के बीच लेट जाएं, तो आमतौर पर अधिकांश माता-पिता घबरा जाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में बच्चों को डांटकर शांत कराने या हाथ में स्मार्टफोन थमा देने की सामान्य प्रवृत्ति देखी जाती है। इसके विपरीत, हाल ही में एक बड़े कॉर्पोरेट आयोजन के दौरान जब मंच पर भाषण चल रहा था, तब परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा बच्चों की सहज चंचलता को बिना किसी झल्लाहट या सख्ती के सामान्य रूप से स्वीकार किए जाने का दृश्य सामने आया। इस सहज दृष्टिकोण ने बाल विकास और सकारात्मक परवरिश के तौर-तरीकों पर एक नई चर्चा शुरू कर दी है।

## बच्चों की स्वाभाविक उत्सुकता और विकास की प्रक्रिया
बाल विकास विशेषज्ञों का मानना है कि बचपन का मूल स्वभाव ही खोजबीन और लगातार सक्रिय रहना है। बच्चे अपने आसपास की दुनिया को देखकर, चीजों को छूकर और नए स्थानों पर घूम-फिरकर ही समझते हैं। जब किसी गंभीर या औपचारिक माहौल में बच्चों पर जरूरत से ज्यादा बंदिशें थोपी जाती हैं, तो उनके भीतर चिड़चिड़ापन और जिद बढ़ने की संभावना अधिक रहती है।

बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. विजय वर्मा के अनुसार, बच्चों को जबरन हर बात पर रोकना और टोकना उनके स्वाभाविक विकास के लिए उचित नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि बच्चे गलतियों और अपने अनुभवों से ही सीखते हैं। ऐसे में उन्हें अपनी ऊर्जा को सकारात्मक रूप से व्यक्त करने का अवसर मिलना चाहिए, न कि हर कदम पर डांट या डर का सामना करना पड़े।

## डिजिटल स्क्रीन का सहारा लेने की प्रवृत्ति पर चिंता
आजकल अधिकांश सार्वजनिक स्थलों, पारिवारिक आयोजनों या रेस्तरां में यह आम बात हो गई है कि जैसे ही कोई बच्चा शरारत शुरू करता है, माता-पिता उसे चुप कराने के लिए तुरंत मोबाइल फोन पकड़ा देते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह तात्कालिक राहत तो दे सकता है, लेकिन किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।

बच्चों का शारीरिक रूप से सक्रिय रहना उनके शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक विकास दोनों के लिए बुनियादी आवश्यकता है। जब बच्चों को लंबे समय तक स्क्रीन के सामने बैठा दिया जाता है, तो उनका प्राकृतिक सामाजिक संपर्क और शारीरिक हलचल बाधित होती है। अनुशासन के नाम पर बच्चों पर चिल्लाना, उन पर हाथ उठाना या स्क्रीन को डिजिटल झुनझुने की तरह इस्तेमाल करना परवरिश की दृष्टि से सही कदम नहीं माना जा सकता।

## औपचारिक माहौल में धैर्य और समझदारी की जरूरत
लंबी औपचारिक बैठकों या बड़े समारोहों में बच्चे अक्सर जल्दी ऊब जाते हैं। जब उनके पास करने के लिए कुछ नहीं होता, तो वे अपने स्तर पर खेलने की जगह तलाशने लगते हैं। ऐसे समय में परिजनों की परीक्षा होती है कि वे बच्चे की मानसिक स्थिति को कितनी गहराई से समझते हैं।

बच्चों को सख्त कायदों में बांधकर डराने के बजाय उनके साथ गरिमापूर्ण और शांत व्यवहार रखना चाहिए। संपन्नता या आधुनिक साधनों के बीच रहने वाले परिवारों में भी जब बच्चों के भीतर बचपन की स्वाभाविक मासूमियत और बेबाकी बनी रहती है, तो यह दर्शाता है कि सहजता किसी भी बाहरी साधन से अधिक महत्वपूर्ण है।

## सकारात्मक परवरिश के तीन प्रमुख सबक
इस पूरे संदर्भ से सामान्य परिवारों के लिए कुछ बुनियादी बातें उभरकर सामने आती हैं

- **नासमझी को स्वीकार करें:** बच्चों के चंचल व्यवहार को अनुशासनहीनता मानने के बजाय उनकी स्वाभाविक उम्र का हिस्सा समझें और बेवजह तनाव पैदा न करें।
- **धैर्य का परिचय दें:** भीड़भाड़ वाले माहौल में बच्चे अशांत हों तो अपना आपा खोने के बजाय शांत रहकर स्थिति को संभालें।
- **स्क्रीन की निर्भरता घटाएं:** शोर या जिद शांत कराने के लिए डिजिटल उपकरणों का उपयोग बंद करें और बच्चों को वास्तविक खेलों में व्यस्त रहने दें।

परवरिश कोई एक दिन का काम नहीं है, बल्कि यह निरंतर समझ और धैर्य के साथ सीखने का सफर है। किसी भी सार्वजनिक स्थान पर बच्चों को भयभीत करने के स्थान पर प्रेम और सहजता से संभालना बच्चों के आत्मविश्वास को मजबूत करता है।

## इसका आप पर असर
सार्वजनिक स्थलों पर बच्चों के व्यवहार को संभालने का यह उदाहरण आम माता-पिता के दैनिक जीवन और बच्चों की मानसिक सेहत पर सीधा असर डालता है।

- **पारिवारिक व्यवहार में:** सामाजिक कार्यक्रमों में बच्चों की सामान्य शरारत पर गुस्सा करने या डांटने की आदत छोड़नी होगी। इससे बच्चे सार्वजनिक जगहों पर झिझकने के बजाय आत्मविश्वास के साथ सामाजिक मेलजोल सीखते हैं।
- **स्क्रीन की आदत पर:** बच्चों को शांत रखने के लिए फोन थमाने का शॉर्टकट बंद करना चाहिए। ऐसा करने से बच्चों में स्क्रीन की लत घटती है और उनका शारीरिक विकास बेहतर होता है।
- **धैर्य और तनाव प्रबंधन:** भीड़ में बच्चों के ऊबने पर खुद शांत रहना माता-पिता के मानसिक तनाव को कम करता है। स्थिति को सहजता से लेने पर परिवार में अनावश्यक कलह और शर्मिंदगी की भावना खत्म होती है।
- **बच्चों के सीखने की प्रक्रिया:** बच्चों को थोड़ा खुलकर खेलने और गलतियां करने की अनुमति देनी चाहिए। इससे उनकी नई चीजें सीखने की उत्सुकता बढ़ती है और वे जिद्दी बनने से बचते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
यह चर्चा इसलिए शुरू हुई क्योंकि रिलायंस जियो के एक बड़े औपचारिक कार्यक्रम के दौरान मंच पर भाषण के बीच छोटे बच्चे बेफिक्र होकर खेल रहे थे और पूरे परिवार ने इसे सहजता से संभाला।

- **औपचारिक माहौल में बच्चों की बोरियत:** लंबे भाषणों और औपचारिक आयोजनों में बच्चों के पास मनोरंजन का कोई साधन नहीं होता, जिससे वे स्वाभाविक रूप से इधर-उधर दौड़ने लगते हैं।
- **परिवार का शांत रवैया:** परिजनों ने बच्चों को डांटने या मंच से भगाने के बजाय अत्यंत शांति से स्थिति को संभाला, जो सामान्य भारतीय परिवारों के सख्त रवैये से अलग दिखा।
- **बाल विशेषज्ञों की सलाह:** वीडियो चर्चा में आने के बाद डॉ. विजय वर्मा जैसे विशेषज्ञों ने समझाया कि बच्चों को बंदिशों और मोबाइल स्क्रीन से दूर रखकर प्यार से संभालना उनके संपूर्ण विकास के लिए अनिवार्य है।

## सवाल-जवाब

### 1. यह पूरा मामला किस कार्यक्रम से जुड़ा है?
यह पूरा मामला रिलायंस जियो के एक बड़े औपचारिक आयोजन के दौरान का है, जहां मंच पर भाषण के वक्त छोटे बच्चे खेलते दिखाई दिए।

### 2. सार्वजनिक जगहों पर बच्चे असहज क्यों हो जाते हैं?
औपचारिक कार्यक्रमों में लंबे समय तक बैठने से बच्चे ऊब जाते हैं और अपनी ऊर्जा निकालने के लिए इधर-उधर दौड़ने लगते हैं।

### 3. बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. विजय वर्मा ने बच्चों को रोकने-टोकने पर क्या कहा?
डॉ. विजय वर्मा के अनुसार बच्चों को बार-बार रोकना-टोकना ठीक नहीं है, क्योंकि वे चीजों को देखकर और तलाशकर ही स्वाभाविक रूप से सीखते हैं।

### 4. बच्चों को शांत करने के लिए मोबाइल फोन देना क्यों गलत माना गया है?
मोबाइल फोन देना समस्या का स्थायी उपाय नहीं है और यह बच्चों के आवश्यक शारीरिक और मानसिक विकास को बाधित करता है।

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