शिशु की रंगत निखारने के लिए तेल और बेसन की मालिश से बचें, अमृता हॉस्पिटल की शिशु रोग विशेषज्ञ ने बताए घरेलू नुस्खों के खतरे नवजात शिशु के जन्म के बाद माता-पिता अक्सर रंगत निखारने, पीलिया में धूप दिखाने और बच्चे को गोद लेने से जुड़ी भ्रांतियों से परेशान रहते हैं। अमृता हॉस्पिटल फरीदाबाद की नवजात शिशु विशेषज्ञ डॉ. प्राची सिंह ने इन पारंपरिक आदतों के वैज्ञानिक पहलुओं और आवश्यक सावधानियों की विस्तृत जानकारी साझा की है। नवजात शिशु के घर में आगमन के बाद माता-पिता और परिजनों के मन में शिशु की देखभाल को लेकर तमाम तरह की शंकाएं और सवाल उठते हैं। बच्चा यदि बार-बार रोता है, दूध पीते समय सो जाता है या उसकी त्वचा का रंग गहरा दिखाई देता है, तो परिवार के बड़े-बुजुर्ग अक्सर अपने पुराने घरेलू नुस्खे आजमाने की सलाह देते हैं। हालांकि, अमृता हॉस्पिटल फरीदाबाद की नवजात शिशु विशेषज्ञ डॉ. प्राची सिंह के अनुसार, पारंपरिक रूप से अपनाए जाने वाले हर देसी नुस्खे का नवजात की नाजुक त्वचा और सेहत पर अनुकूल प्रभाव पड़े, यह जरूरी नहीं है। कई बार ये पारंपरिक तरीके बच्चे के लिए गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं खड़ी कर देते हैं। घरेलू नुस्खों से त्वचा का रंग बदलने का भ्रम और मालिश के खतरे भारतीय घरों में नवजात शिशु का रंग निखारने के लिए तेल को त्वचा पर जोर-जोर से रगड़ना, बेसन का उबटन लगाना या आटे की लोई से मालिश करना बहुत आम माना जाता है। लेकिन चिकित्सा विज्ञान के दृष्टिकोण से यह तरीका बेहद नुकसानदेह साबित हो सकता है। नवजात शिशु विशेषज्ञ डॉ. प्राची सिंह स्पष्ट करती हैं कि किसी भी प्रकार के तेल, बेसन या अन्य घरेलू पदार्थों को बच्चे की त्वचा पर रगड़कर लगाने से परहेज करना चाहिए। नवजात की त्वचा अत्यंत पतली और संवेदनशील होती है, जिस पर तेज मालिश करने से लाल चकत्ते, खरोंच, जलन और एलर्जी जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। त्वचा की बाहरी परत क्षतिग्रस्त होने के बाद बच्चे के शरीर में हानिकारक बैक्टीरिया और इंफेक्शन फैलने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त, माता-पिता को यह समझना होगा कि किसी भी घरेलू सामग्री के प्रयोग से शिशु के प्राकृतिक रंग में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता। बच्चा जन्म के समय जो प्राकृतिक रंगत लेकर पैदा होता है, वही उसका वास्तविक और स्थायी रंग होता है। इसलिए रंग निखारने के नाम पर बच्चे की त्वचा के साथ किसी भी तरह का प्रयोग करना उसके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। नवजात को गोद में रखने से आदत बिगड़ने की गलतफहमी अक्सर घरों में यह सलाह दी जाती है कि नवजात शिशु को ज्यादा देर तक गोद में नहीं रखना चाहिए, वरना उसकी आदत बिगड़ जाएगी और वह हमेशा गोद में रहने की जिद करेगा। डॉ. प्राची सिंह इस धारणा को पूरी तरह से निराधार बताती हैं। उनका कहना है कि जन्म के बाद शुरुआती दिनों में बच्चे को गोद में लेना बिल्कुल स्वाभाविक और जरूरी प्रक्रिया है। शिशु नौ महीने तक मां के गर्भ के सुरक्षित और गर्म माहौल में रहता है। बाहर आने के बाद उसे नए वातावरण में ढलने के लिए मां के शारीरिक स्पर्श, गर्माहट और स्नेह की सख्त जरूरत होती है। गोद में उठाने से नवजात बच्चे को सुरक्षा का अहसास होता है और वह अपने माता-पिता के करीब महसूस करता है। इससे उसके मानसिक और भावनात्मक विकास में मदद मिलती है। इस बात की चिंता करना बिल्कुल व्यर्थ है कि ज्यादा प्यार देने या गोद में रखने से बच्चे का स्वभाव बिगड़ जाएगा। माता-पिता को बिना किसी संकोच के अपने शिशु को आवश्यकतानुसार गोद में लेना चाहिए और उसे सुरक्षित महसूस कराना चाहिए। पीलिया में धूप दिखाने का मिथक और डिहाइड्रेशन का खतरा नवजात शिशुओं में जन्म के कुछ दिनों बाद पीलिया (जॉन्डिस) की समस्या देखने को मिलना एक आम बात है। लेकिन इसे ठीक करने के लिए बच्चे को सुबह की धूप में रखने का नुस्खा एक बहुत बड़ा मिथक है। डॉ. प्राची सिंह के अनुसार, केवल धूप में रखने से पीलिया का इलाज नहीं हो सकता और न ही इससे यह पता लगाया जा सकता है कि शरीर में पीलिया का स्तर घट रहा है या बढ़ रहा है। पीलिया की सही स्थिति और उसकी गंभीरता का आंकलन केवल योग्य डॉक्टर द्वारा खून की जांच के जरिए ही संभव है। बच्चे को लंबे समय तक तेज या सीधी धूप में रखने से उसके शरीर का तापमान अत्यधिक बढ़ सकता है, जिससे ओवरहीटिंग और डिहाइड्रेशन (पानी की कमी) जैसी गंभीर स्थितियां पैदा हो सकती हैं। यदि पीलिया का स्तर जरूरत से ज्यादा बढ़ जाए और उसका सही समय पर इलाज न किया जाए, तो यह बिलीरुबिन बच्चे के दिमाग तक पहुंचकर स्थायी न्यूरोलॉजिकल नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए पीलिया के लक्षण दिखाई देने पर घरेलू नुस्खों में समय गंवाने के बजाय तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए। दूध पीते समय बार-बार सोने और सुस्ती के छिपे संकेत स्तनपान या दूध पीते-पीते नवजात शिशु का सो जाना कई बार एक सामान्य प्रक्रिया होती है, क्योंकि दूध पीने में बच्चे की काफी ऊर्जा खर्च होती है। लेकिन यदि शिशु केवल दो-तीन घूंट दूध पीकर तुरंत सो जाता है और परिजनों द्वारा जगाने के प्रयास के बाद भी ठीक से उठ नहीं पाता, तो इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। डॉ. प्राची सिंह चेतावनी देती हैं कि बच्चे में लगातार बनी रहने वाली यह सुस्ती किसी छिपी हुई बीमारी का संकेत हो सकती है। शिशु का सुस्त होना और ठीक से दूध न पी पाना शरीर में ब्लड शुगर का स्तर अत्यधिक कम होने (हाइपोग्लाइसीमिया) या किसी अंदरूनी इंफेक्शन के कारण हो सकता है। नवजात बच्चों में शुगर का स्तर तेजी से गिरता है, जो उनके स्वास्थ्य के लिए घातक हो सकता है। यदि माता-पिता को लगे कि बच्चे ने पर्याप्त मात्रा में दूध नहीं पिया है और वह असामान्य रूप से सुस्त दिख रहा है, तो बिना देर किए तत्काल डॉक्टर को दिखाना चाहिए। एनआईसीयू (NICU) में भर्ती की जरूरत और वास्तविक स्थितियां कई माता-पिता के मन में यह डर रहता है कि अस्पताल में जन्म लेते ही हर बच्चे को एनआईसीयू (Neonatal Intensive Care Unit) में भर्ती कर दिया जाता है। डॉ. प्राची सिंह इस डर को खारिज करते हुए बताती हैं कि हर नवजात को एनआईसीयू में रखने की आवश्यकता नहीं होती। यदि बच्चा अपनी पूरी समय सीमा (फुल-टर्म) पर पैदा हुआ है, जन्म के तुरंत बाद अच्छी तरह से रोया है और उसकी शारीरिक स्थितियां सामान्य हैं, तो उसे तुरंत मां के पास ही रखा जाता है। एनआईसीयू में केवल उन्हीं शिशुओं को ले जाया जाता है जिन्हें विशेष चिकित्सकीय निगरानी की जरूरत होती है। इनमें समय से पहले जन्मे (प्री-मैच्योर) बच्चे, जन्म के समय बहुत कम वजन वाले शिशु या जिन्हें सांस लेने में तकलीफ हो रही हो, वे शामिल हैं। इसके अलावा, डिलीवरी के समय यदि किसी बच्चे को कुछ समय के लिए अतिरिक्त ऑक्सीजन सपोर्ट की आवश्यकता पड़ती है, तो भी उसे थोड़ी देर के लिए ऑब्जर्वेशन में रखा जा सकता है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि बच्चा गंभीर रूप से बीमार है। डॉक्टर निगरानी पूरी होने के तुरंत बाद बच्चे को मां की गोद में सौंप देते हैं। इसका आप पर असर नवजात शिशु की देखभाल में वैज्ञानिक सलाह अपनाने से बच्चे की नाजुक त्वचा, मस्तिष्क और समग्र स्वास्थ्य को होने वाले गंभीर जोखिमों से बचाया जा सकता है। • त्वचा की सुरक्षा: तेल, बेसन या आटे की तेज मालिश बंद करने से बच्चे की संवेदनशील त्वचा पर खरोंच, जलन और बैक्टीरिया इंफेक्शन का खतरा समाप्त हो जाता है। माता-पिता को बच्चे के प्राकृतिक रंग को स्वीकार कर केवल डॉक्टर द्वारा सुझाई गई माइल्ड मॉइस्चराइजर क्रीम का ही प्रयोग करना चाहिए। • पीलिया की सही जांच: धूप में रखने का मिथक छोड़कर समय पर क्लिनिकल जांच कराने से बिलीरुबिन के स्तर का सटीक पता चलता है। इससे पीलिया के दिमाग तक पहुंचने जैसे जानलेवा न्यूरोलॉजिकल खतरों को रोका जा सकता है। • संक्रमण और शुगर की पहचान: दूध पीते समय बच्चे की सुस्ती पर तुरंत डॉक्टर की सलाह लेने से लो ब्लड शुगर या अंदरूनी इंफेक्शन की समय पर पहचान हो जाती है। माता-पिता बच्चे के दूध पीने के समय और नींद के पैटर्न पर सख्त निगरानी रखें। • मानसिक सुरक्षा और जुड़ाव: गोद लेने से आदत बिगड़ने का डर छोड़कर शिशु को पर्याप्त स्पर्श और गर्माहट दें। इससे नवजात में सुरक्षा की भावना मजबूत होती है और उसका शारीरिक विकास बेहतर होता है। • अस्पताल की भ्रांतियां दूर: एनआईसीयू में भर्ती के कारणों को समझने से परिजनों को बेवजह का तनाव नहीं होता। डिलीवरी के दौरान ऑक्सीजन या अल्पकालिक निगरानी को गंभीर बीमारी मानकर परेशान होने से बचें। सवाल-जवाब 1. क्या बेसन या तेल की मालिश से नवजात शिशु का रंग गोरा हो सकता है? नहीं, शिशु का रंग प्राकृतिक होता है जो जन्म के समय से तय रहता है। रगड़कर मालिश करने या बेसन लगाने से त्वचा पर खरोंच, जलन और इंफेक्शन का खतरा बढ़ता है। 2. क्या ज्यादा गोद में लेने से बच्चे की आदत खराब हो जाती है? बिलकुल नहीं। गर्भाशय से बाहर आने के बाद नवजात को मां के स्पर्श, गर्माहट और सुरक्षा की जरूरत होती है, जिससे उसकी आदत बिगड़ने का कोई खतरा नहीं रहता। 3. क्या नवजात के पीलिया में धूप दिखाना असरदार इलाज है? यह एक मिथक है। धूप में रखने से पीलिया का सटीक स्तर पता नहीं चलता और बच्चे को ओवरहीटिंग या डिहाइड्रेशन हो सकता है, इसलिए तुरंत डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। 4. दूध पीते-पीते बच्चे का बार-बार सो जाना कब चिंताजनक होता है? यदि बच्चा थोड़ा सा दूध पीकर सो जाए और जगाने पर भी न उठे, तो यह इंफेक्शन या लो ब्लड शुगर का संकेत हो सकता है, जिसके लिए तुरंत चिकित्सकीय सलाह जरूरी है। 5. क्या हर नवजात बच्चे को जन्म के बाद एनआईसीयू (NICU) में भर्ती करना पड़ता है? नहीं, समय पर जन्मे और सामान्य रूप से रोने वाले बच्चों को मां के पास ही रखा जाता है। एनआईसीयू की जरूरत केवल प्री-मैच्योर, कम वजन या सांस की तकलीफ वाले बच्चों को होती है। https://trendkia.com/parenting/shishu-ki-rngata-nikharane-ke-lie-tela-aura-besana-ki-malisha-se-bachen-amrita-hospital-ki-shishu-roga-visheshajna-ne-batae-gharel-26082 TrendKia — Har trend, sabse pehle.