आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा सेंटरों की मनमानी पर ज़ोहरान ममदानी ने उठाए तीखे सवाल न्यूयॉर्क शहर के मेयर ज़ोहरान ममदानी ने डेटा सेंटरों की भारी ऊर्जा खपत, स्कूलों में जनरेटिव एआई पर रोक और बिग टेक की अपारदर्शिता को लेकर कड़े नियम लागू करने की वकालत की है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की अंधाधुंध दौड़ और जगह-जगह खड़े हो रहे विशाल डेटा सेंटरों को लेकर अब ज़मीनी सियासत में कड़ा विरोध खुलकर सामने आने लगा है। आधुनिक तकनीकी क्रांति के नाम पर आम जनता के संसाधनों पर पड़ रहे भारी दबाव को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया गया है कि पूरा जोखिम जनता उठा रही है, जबकि सारा मुनाफा केवल चुनिंदा कॉरपोरेट कंपनियों की जेब में जा रहा है। न्यू यॉर्क शहर के प्रशासन में 10 महीने पूरे होने के बाद सिटी हॉल में नीतिगत प्राथमिकताओं की समीक्षा के दौरान तकनीक के अनियंत्रित विस्तार, ऊर्जा संकट और कामकाजी परिवारों के हितों से जुड़े कई ज्वलंत मुद्दों को प्रमुखता से उठाया गया है। डेटा सेंटरों के खिलाफ देशव्यापी माहौल और भारी ऊर्जा खपत संयुक्त राज्य अमेरिका के तमाम हिस्सों में विशालकाय डेटा सेंटरों के निर्माण के खिलाफ जनता का आक्रोश लगातार तेज हो रहा है। इस विरोध की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह दलगत सीमाओं से परे जाकर एक साझा नागरिक मुद्दा बन चुका है। फ्लोरिडा के गवर्नर रॉन डिसेंटिस जैसे रिपब्लिकन नेताओं के प्रभाव वाले क्षेत्रों से लेकर न्यू यॉर्क और कैलिफोर्निया के प्रगतिशील इलाकों तक, लोग अपने पर्यावरण और बिजली के बिलों को लेकर आशंकित हैं। कैलिफोर्निया की कई नगरपालिकाओं ने तो डेटा सेंटरों के नए निर्माण पर पूरी तरह पाबंदी तक लगा दी है, जबकि न्यू यॉर्क राज्य में भी डेटा सेंटर निर्माण पर एक साल की रोक लगाने का समर्थन किया गया है। तकनीक के इस बुनियादी ढांचे को संचालित करने के लिए ऊर्जा की जो खपत होती है, वह चौंकाने वाली है। उदाहरण के लिए, चैटजीपीटी के एक शुरुआती मॉडल को प्रशिक्षित करने में ही इतनी विशाल बिजली खर्च हो गई, जितनी सैन फ्रांसिस्को जैसे पूरे महानगर को लगातार तीन दिनों तक रोशन रखने के लिए पर्याप्त होती है। जब आम नागरिक अपने घरों के बढ़ते बिजली बिलों और स्थानीय ग्रिड पर पड़ने वाले दबाव को देखते हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि समाज को इस तकनीकी दौड़ के बदले क्या हासिल हो रहा है। तकनीकी कंपनियों ने लंबे समय से ऐसा ढांचा बना रखा है जहां पर्यावरणीय खतरे और सार्वजनिक बुनियादी ढांचे का नुकसान जनता भुगतती है, जबकि वित्तीय फायदा कुछ कंपनियों के खातों तक सीमित रहता है। एआई की अपारदर्शिता और आर्थिक बुलबुले की आशंका आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को आज जिस तरह से पेश किया जा रहा है, वह वास्तविक तकनीक की बजाय किसी रहस्यमयी या दैवीय शक्ति जैसा भ्रम पैदा करता है। जनता और नीति निर्माताओं के बीच यह नैरेटिव गढ़ा गया है कि यह तकनीक इतनी पेचीदा है कि इसे केवल इसे बनाने वालों के भरोसे ही छोड़ देना चाहिए। यह बिल्कुल वही तर्क है जो वर्ष 2008 में फेसबुक जैसी सोशल मीडिया कंपनियों ने खुद को विनियमित करने की मांग करते हुए दिया था। परंतु हकीकत यह है कि इन बड़ी तकनीकी कंपनियों के कामकाज में अत्यधिक गोपनीयता है, जिससे यह आंकना लगभग असंभव हो जाता है कि इंटरनेट पर की जाने वाली एक साधारण खोज या क्वेरी की वास्तविक सामाजिक और पर्यावरणीय लागत क्या है। मौजूदा आर्थिक परिदृश्य में एआई उद्योग की स्थिति की तुलना उस दौर के हाउसिंग बुलबुले से की जा रही है जिसने वैश्विक मंदी को जन्म दिया था। कई तकनीकी कंपनियों के मुनाफे के अनुमानों में भारी विरोधाभास है और वे अपने अत्यधिक ऊंचे मूल्यांकन को सही ठहराने के लिए रोज़ाना अरबों डॉलर पानी की तरह बहा रही हैं। तकनीकी जगत के प्रमुख चेहरों, जैसे सैम ऑल्टमैन, पर आंख मूंदकर भरोसा करने की बजाय अब उनकी जवाबदेही तय करने की मांग जोर पकड़ रही है। केंद्र सरकार की ओर से व्यापक संघीय कानूनों के अभाव के चलते स्थानीय स्तर पर नगर निगमों और राज्यों को खुद आगे आकर कड़े कदम उठाने पड़ रहे हैं। स्कूलों और रीयल एस्टेट में सख्त पाबंदियां न्यू यॉर्क शहर के स्तर पर तकनीकी दुष्प्रभावों को रोकने के लिए कई व्यावहारिक नियम लागू किए गए हैं। इनमें सबसे अहम कदम सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था में उठाया गया है, जिसके तहत 2के यानी दो वर्ष के बच्चों से लेकर आठवीं कक्षा तक के छात्रों के लिए जनरेटिव एआई के उपयोग पर पूर्ण रोक लगाई गई है। इस प्रतिबंध का मुख्य उद्देश्य बच्चों को स्वाभाविक रूप से सीखने, गलतियां करने और अनुभव से समझ विकसित करने का सुरक्षित माहौल देना है। जिस प्रकार किसी दवा कंपनी को कक्षा के विज्ञान पाठ्यक्रम को तय करने की छूट नहीं दी जा सकती, उसी प्रकार तकनीकी कंपनियों को भी बच्चों को अपने मुनाफा कमाने वाले उत्पादों का परीक्षण माध्यम बनाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोज़मर्रा की नागरिक समस्याओं को हल करने के लिए उपभोक्ता एवं श्रमिक संरक्षण विभाग ने भी सक्रियता दिखाई है। शहर के अत्यधिक महंगे रीयल एस्टेट बाजार में दलालों द्वारा किराएदारों को लुभाने के लिए एआई से बनी अपार्टमेंटों की भ्रामक तस्वीरों का उपयोग करने पर रोक लगा दी गई है। इसके अतिरिक्त, सरकारी और निजी सेवाओं में उपभोक्ताओं को घंटों उलझाए रखने वाले स्वचालित चैटबॉट्स के चक्रव्यूह को सीमित करने के नियम भी बनाए गए हैं। तकनीक के लापरवाह इस्तेमाल ने कई बार घातक परिणाम दिए हैं, जिनमें पुराना डेटा इस्तेमाल करने के कारण सरकारी स्तर पर अंतरराष्ट्रीय विवाद और स्कूलों पर हमलों जैसी घटनाएं शामिल रही हैं। कामकाजी परिवारों के लिए किफायती जीवन की पहल तकनीक के सामाजिक प्रभावों के साथ-साथ कामकाजी वर्ग के जीवन को आसान बनाना किसी भी शासन की मूल प्राथमिकता होनी चाहिए। न्यू यॉर्क शहर में जीवनयापन की लागत बेहद अधिक है और बच्चों की देखभाल यानी चाइल्डकेयर परिवारों का दूसरा सबसे बड़ा खर्च है। कई परिवारों को अपने बच्चों को सस्ते डेकेयर में भेजने के लिए तड़के चार बजे दूसरे राज्यों तक गाड़ी चलाकर जाना पड़ता था और इसके बावजूद उन्हें प्रति माह 2,300 डॉलर तक चुकाने पड़ते थे। इस संकट को दूर करने के लिए गवर्नर कैथी होचुल के साथ समन्वय बनाकर प्रशासन के आठवें दिन ही 1.2 अरब डॉलर का बजट सुनिश्चित किया गया, जिससे दो साल के बच्चों के लिए मुफ्त और सार्वभौमिक 2के कार्यक्रम शुरू हुआ। यह कार्यक्रम कामकाजी माता-पिताओं को सालाना 20,000 डॉलर से अधिक की सीधी बचत कराता है, जिसे वे अपने घर खरीदने या अन्य जरूरी जरूरतों में लगा सकते हैं। वर्तमान में 2,000 बच्चों से शुरू हुआ यह दायरा अगले वर्ष 12,000 बच्चों तक पहुंचाया जाएगा, जिसका विस्तार ब्रोंक्स और स्टेटन आइलैंड सहित पूरे शहर में किया जाना तय है। राजनीति का वास्तविक अर्थ भाषणों की बजाय कामकाजी वर्ग के हाथ में वास्तविक आर्थिक राहत पहुंचाना है। राजनीतिक विरोधियों द्वारा इस कल्याणकारी योजना को आलसी माता-पिताओं को दी जाने वाली रेवड़ी बताना अनुचित है, क्योंकि महानगरों में माता-पिता पहले से ही अत्यधिक तनाव और आर्थिक दबाव के बीच अपने बच्चों का पालन-पोषण कर रहे हैं। निगरानी तकनीक और सार्वजनिक निजता की सुरक्षा शहर के प्रमुख सार्वजनिक स्थलों और मनोरंजन केंद्रों पर निगरानी तकनीकों के बेजा इस्तेमाल ने भी गंभीर चिंताएं पैदा की हैं। मैडिसन स्क्वायर गार्डन और रेडियो सिटी म्यूजिक हॉल जैसे स्थानों पर फेशियल रिकॉग्निशन तकनीक का व्यापक प्रयोग किया जा रहा है। इस तकनीक के जरिए आम नागरिकों, दर्शकों और अपने पेशेवर काम के कारण निशाना बनाई गई वकीलों तक को सार्वजनिक कार्यक्रमों में प्रवेश करने से रोका गया। किसी भी निजी कारोबारी या नागरिक को आम जनता पर इस स्तर की अनियंत्रित निगरानी शक्ति का इस्तेमाल करने की छूट नहीं दी जानी चाहिए। इस तानाशाही निगरानी व्यवस्था पर अंकुश लगाने के लिए नगर परिषद की सदस्य शाहना हनीफ ने महत्वपूर्ण कानूनी विधेयक पेश किया है। एआई तकनीक की वजह से डीपफेक वीडियो और फर्जी राजनीतिक बहसों की बाढ़ आ गई है, जिससे लोकतांत्रिक संस्थाओं और सच्चाई पर से जनता का विश्वास तेजी से घट रहा है। आम लोगों के सामने अब यह तय करना मुश्किल हो रहा है कि इंटरनेट पर क्या असली है और क्या कृत्रिम रूप से गढ़ा गया झूठ। लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती के लिए आवश्यक है कि तकनीक को कॉरपोरेट मुनाफे का औजार बनने से रोका जाए और जनहित को ही नीतियों के केंद्र में रखा जाए। इसका आप पर असर डेटा सेंटरों के विस्तार और एआई नियमों का सीधा असर आम नागरिकों के घरेलू बिजली खर्च, बच्चों की स्कूली पढ़ाई और किराए के मकानों पर पड़ेगा। • बिजली बिलों पर असर: भारी मात्रा में ऊर्जा खींचने वाले डेटा सेंटरों के कारण ग्रिड पर भारी दबाव बढ़ रहा है। अगर इन पर सख्त नियामक अंकुश नहीं लगा तो आम उपभोक्ताओं के बिजली बिलों में सीधी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। • स्कूली शिक्षा में बदलाव: प्राथमिक और मिडिल स्कूलों में जनरेटिव एआई के इस्तेमाल पर लगी रोक से बच्चों का ध्यान पारंपरिक रचनात्मकता पर रहेगा। अभिभावकों को अब अपने बच्चों के होमवर्क और सीखने की प्रक्रिया में तकनीकी कंपनियों के हस्तक्षेप से मुक्ति मिलेगी। • किराएदारों के लिए राहत: रीयल एस्टेट में एआई निर्मित फर्जी फ्लैट तस्वीरों पर पाबंदी से मकान ढूंढ रहे लोगों को धोखा नहीं मिलेगा। किराएदार अब केवल वास्तविक कमरों और फ्लैटों की तस्वीरों के आधार पर ही सुरक्षित निर्णय ले सकेंगे। • चाइल्डकेयर पर बचत: दो साल के बच्चों के लिए मुफ्त डेकेयर का दायरा बढ़ने से परिवारों को हर महीने हजारों डॉलर का सीधा फायदा होगा। यह आर्थिक राहत कामकाजी परिवारों को महंगाई के बीच अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए बचत करने का मौका देगी। ऐसा क्यों हुआ डेटा सेंटरों के अनियंत्रित विस्तार, अत्यधिक बिजली खपत और स्थानीय संसाधनों पर पड़ रहे दबाव के कारण यह कड़ा विरोध पैदा हुआ है। • अत्यधिक ऊर्जा की मांग: उन्नत एआई मॉडलों को प्रशिक्षित करने और चलाने में भारी मात्रा में बिजली खर्च होती है। एक ही मॉडल को तैयार करने में सैन फ्रांसिस्को जैसे पूरे शहर की तीन दिनों की बिजली के बराबर ऊर्जा खर्च होने से ग्रिड संकट पैदा हो रहा है। • कॉरपोरेट लाभ बनाम जनता का जोखिम: तकनीकी कंपनियों ने भारी मुनाफे के लिए सार्वजनिक बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल किया जबकि पर्यावरणीय और वित्तीय जोखिम जनता पर छोड़ दिया। इस असंतुलन ने देश भर में आम नागरिकों और स्थानीय निकायों को लामबंद कर दिया है। • संघीय कानूनों का अभाव: केंद्र सरकार की ओर से एआई के अनियंत्रित प्रसार और डेटा सेंटर प्रदूषण को लेकर सख्त राष्ट्रीय नियमों की कमी रही है। इस नीतिगत शून्यता के कारण स्थानीय नगर पालिकाओं और राज्यों को अपनी जनता की सुरक्षा के लिए खुद प्रतिबंध लगाने पड़े हैं। सवाल-जवाब 1. डेटा सेंटरों के निर्माण का विरोध क्यों हो रहा है? डेटा सेंटर अत्यधिक बिजली और संसाधनों की खपत करते हैं, जिससे स्थानीय ग्रिड पर दबाव पड़ता है और आम जनता के बिजली बिल बढ़ते हैं। 2. न्यू यॉर्क के स्कूलों में एआई पर क्या पाबंदी लगाई गई है? 2के से लेकर आठवीं कक्षा तक के छात्रों के लिए स्कूलों में जनरेटिव एआई के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है। 3. रीयल एस्टेट में एआई के उपयोग को लेकर क्या नियम बना है? मकान दलालों पर अपार्टमेंटों की एआई-जनरेटेड फर्जी तस्वीरें विज्ञापनों में इस्तेमाल करने पर रोक लगा दी गई है। 4. यूनिवर्सल 2के कार्यक्रम से परिवारों को क्या आर्थिक लाभ मिला है? इस कार्यक्रम की बदौलत परिवारों को प्रति माह 2,300 डॉलर की बचत हो रही है, जो सालाना 20,000 डॉलर से अधिक बैठती है। 5. मैडिसन स्क्वायर गार्डन में निगरानी तकनीक को लेकर क्या विवाद है? वहां दर्शकों पर अनियंत्रित फेशियल रिकॉग्निशन तकनीक का उपयोग किया जा रहा था, जिसके खिलाफ नगर परिषद में कानून लाया गया है। https://trendkia.com/politics/ai-aura-data-centers-ki-manamani-para-zohran-mamdani-ne-uthae-tikhe-savala-55721 TrendKia — Har trend, sabse pehle.