# बैलट पेपर वापसी के खतरे, उत्तर प्रदेश और बिहार में हालिया एमएलसी चुनावों की डरावनी तस्वीरें

> उत्तर प्रदेश और बिहार के एमएलसी चुनावों में मतपत्रों की वापसी के साथ ही हिंसा और बूथ कैप्चरिंग की पुरानी यादें ताजा हो गई हैं।

**Type:** article · **Category:** राजनीति · **Published:** 2026-10-24 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/politics/bailata-pepara-vapasi-ke-khatare-uttar-pradesh-aura-bihar-men-haliya-mlc-chunavon-ki-daravani-tasviren-51300 · **Language:** Hindi
**Tags:** उत्तर प्रदेश, बिहार, एमएलसी चुनाव, बैलट पेपर, बूथ कैप्चरिंग, रजत शर्मा, चुनाव आयोग

उत्तर प्रदेश और बिहार के हालिया एमएलसी चुनावों के दौरान व्यापक पैमाने पर बूथ कैप्चरिंग, धांधली और हिंसक झड़पों की घटनाएं सामने आई हैं, जिसके बाद मतपत्रों के दौर की कमियों पर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। इन चुनावों में आम जनता मतदान नहीं करती है बल्कि शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के प्रतिनिधि चुने जाते हैं, और इनमें इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। ठप्पे वाली पर्चियों के जरिए हुए इस मतदान ने देश को उस पुरानी व्यवस्था की याद दिला दी है जिसमें बाहुबलियों का दबदबा हुआ करता था।

 मतपत्रों की इस वापसी के साथ ही राजनीति से जुड़े पुराने जख्म और अराजकता का दौर भी लौट आया है। मतदान केंद्रों के बाहर से आपसी भिड़ंत और मारपीट की तस्वीरें सामने आई हैं, जिससे उन लोगों को जमीनी हकीकत का अंदाजा हो गया है जो लगातार बैलेट पेपर से चुनाव करवाने की मांग उठाते रहे हैं। कैमरा की नजर में कैद हुई इन वारदातों ने यह साफ कर दिया कि मतपत्र के माध्यम से किस तरह बूथों पर कब्जा जमाया जाता है। हालांकि, जानकारों का यह भी मानना है कि मौजूदा घटनाएं उस दौर के मुकाबले बेहद कम हैं जब कानून-व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं हुआ करती थी।

 पुराने दिनों को याद करें तो ऐसे कई दौर देखे गए हैं जब मतदान के दिन दर्जनों हथियारबंद लोग गाड़ियों में सवार होकर आते थे। वे हवा में गोलियां चलाकर मतदाताओं में खौफ पैदा कर देते थे, जिसके बाद चुनाव ड्यूटी पर तैनात कर्मचारी और इक्का-दुक्का पुलिसकर्मी भी छिपने को मजबूर हो जाते थे। ये बंदूकधारी सीधे मतपत्रों पर कब्जा जमाकर अपनी पसंद के ठप्पे लगाते थे और कुछ ही घंटों में पूरी प्रक्रिया को अपने पक्ष में मोड़ लेते थे। उस समय न तो हर हाथ में मोबाइल फोन होता था और न ही कैमरे, जिसके चलते इन आपराधिक कृत्यों के पुख्ता सबूत जुटाना बेहद मुश्किल काम हुआ करता था।

 उत्तर प्रदेश और बिहार के कई इलाकों में दबंगों द्वारा एक ही दिन में कई-कई बूथों को अपने कब्जे में लेने के किस्से आम हुआ करते थे। कभी-कभार किसी अखबार का फोटो जर्नलिस्ट ऐसी किसी घटना को कैमरे में कैद कर लेता था, और जब अगले दिन वह तस्वीर छपती थी तो वह एक सनसनीखेज खुलासा बन जाती थी, जिसके बाद उस खास बूथ पर दोबारा मतदान करवाना पड़ता था। जिन लोगों ने केवल इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का दौर ही देखा है, वे शायद इस कल्पना भी नहीं कर सकते कि किस प्रकार बाहुबली जबरन मतदान को प्रभावित करते थे।

 इस तरह की बूथ कैप्चरिंग और चुनावी लूट ने ही भारतीय राजनीति में अपराधियों और माफियाओं का दखल तेजी से बढ़ाया था। स्थिति यहां तक पहुंच गई कि बूथ कब्जाने वाले ये बाहुबली खुद ही राजनीतिक मैदान में उतरकर चुनाव लड़ने लगे। आज से लगभग 30 साल पहले जब पूरी तरह से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का चलन शुरू हुआ, तब जाकर इस वोट माफिया के असर पर धीरे-धीरे लगाम लग सकी। जो लोग आज फिर से पुरानी व्यवस्था यानी मतपत्रों के जरिए चुनाव कराने की वकालत करते हैं, वे अनजाने में ही सही, देश को उसी भयावह अतीत की तरफ धकेलने का काम कर रहे हैं।

 

## वोट चोरी के आरोपों और विरोध प्रदर्शनों की हकीकत
 दूसरी तरफ, मतपत्र से चुनाव कराने की मांग करने वाले कुछ संगठन और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग उठाने वाले लोग हाल ही में सड़कों पर उतरे थे। हालांकि इन विरोध प्रदर्शनों में जुटने वाली भीड़ बेहद सीमित रही और इनमें मुख्य रूप से वामपंथी दलों के कार्यकर्ता ही नजर आए। 'वोट चोरी' के नाम पर बड़ा जन आंदोलन खड़ा करने के प्रयास विफल हो रहे हैं क्योंकि आम जनता इसमें कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखा रही है।

 इस उदासीनता के पीछे मुख्य रूप से दो बड़ी वजहें समझ आती हैं। पहली यह कि मतदाता सूची में नाम जुड़वाने या कटने का मसला अब आम आदमी की रोजमर्रा की भावना से नहीं जुड़ पा रहा है, बल्कि यह सिर्फ राजनीतिक दलों तक सीमित होकर रह गया है। दूसरी वजह यह है कि चुनाव आयोग ने भी हालिया विवादों के बाद अपनी कार्यशैली में सुधार किया है, जिससे अब सूचियों में नाम दर्ज कराना काफी आसान हो गया है। जिन नागरिकों के नाम कट गए थे, उनसे चुनाव आयोग खुद संपर्क कर रहा है ताकि उनकी शिकायत दूर हो सके।

 प्रशासनिक स्तर पर चुनाव प्रक्रिया की पुरानी खामियों को काफी हद तक दूर कर लिया गया है। यही कारण है कि देश के असली मतदाता, जो अपने मत की ताकत से सरकारें बनाते हैं, वे 'वोट चोरी' के इस नारे को कोई खास वजन या महत्व नहीं देते हैं। अधिक जानकारी के लिए दर्शक आज की बात कार्यक्रम का प्रसारण देख सकते हैं।

## इसका आप पर असर
मतपत्रों की वापसी और चुनावों में होने वाली हिंसा का सीधा असर लोकतांत्रिक व्यवस्था और प्रशासनिक सुरक्षा पर पड़ता है।

- **भारत में:** बैलट पेपर आधारित चुनावों में हिंसा और धांधली की वापसी से पूरे देश की राजनीतिक व्यवस्था में चिंता बढ़ गई है। यह स्थिति चुनावी सुधारों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करती है।

- **उत्तर प्रदेश और बिहार में:** उत्तर प्रदेश और बिहार के स्थानीय चुनावों में इस तरह की झड़पें और बूथ कैप्चरिंग आम नागरिकों और स्थानीय उम्मीदवारों के बीच सुरक्षा का गंभीर संकट पैदा करती हैं। इससे क्षेत्रीय स्तर पर कानून-व्यवस्था की स्थिति पर भी भारी दबाव पड़ता है।

## ऐसा क्यों हुआ
पारंपरिक मतपत्रों के इस्तेमाल और चुनावों में होने वाली धांधली के पीछे कई ऐतिहासिक और प्रशासनिक कारण जुड़े हुए हैं।

- **ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:** दशकों पहले ईवीएम के आने से पहले सीमित निगरानी और मैन्युअल वोटिंग के कारण आपराधिक तत्वों के लिए बूथ कैप्चरिंग करना आसान हुआ करता था।

- **चुनावी प्रक्रिया:** कुछ विशिष्ट स्नातक और शिक्षक एमएलसी चुनावों में तकनीकी मशीनों के बजाय पर्ची व्यवस्था का उपयोग किया जाना पुराने विवादों को फिर से हवा दे देता है।

- **राजनीतिक प्रभाव:** अतीत में चुनाव लूटने वाले कई तत्व बाद में खुद राजनीतिक दलों का हिस्सा बन गए, जिससे इस संस्कृति को बढ़ावा मिला।

## सवाल-जवाब

### 1. उत्तर प्रदेश और बिहार में हाल ही में कौन से चुनाव हुए हैं?
उत्तर प्रदेश और बिहार में हाल ही में एमएलसी यानी विधान परिषद के चुनाव संपन्न हुए हैं।

### 2. इन चुनावों में किस तरीके से मतदान कराया गया था?
इन चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के बजाय पर्ची पर ठप्पा लगाकर मत डाले गए थे।

### 3. क्या इन चुनावों में आम जनता ने वोट दिया था?
नहीं, इन चुनावों में आम जनता ने मतदान नहीं किया बल्कि स्नातक और शिक्षक एमएलसी चुने गए।

### 4. ईवीएम का इस्तेमाल शुरू होने से पहले क्या समस्याएं थीं?
ईवीएम से पहले बंदूकधारियों द्वारा बूथ कैप्चरिंग और मतपत्र लूटने की घटनाएं आम हुआ करती थीं।

### 5. वोट चोरी के खिलाफ हालिया प्रदर्शनों में कौन शामिल हुआ था?
इन विरोध प्रदर्शनों में बहुत कम लोग आए और ज्यादातर लोग वामपंथी संगठनों से जुड़े थे।

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