बिहार विधान परिषद चुनाव के बाद सियासत गर्म, जेडीयू से निष्कासन के बाद अनंत सिंह की नई चाल पर टिकी नजरें बिहार विधान परिषद चुनाव परिणामों के बाद एनडीए में भूचाल आ गया है। एमएलसी चुनाव में पार्टी के खिलाफ जाकर जन सुराज उम्मीदवार का समर्थन करने वाले अनंत सिंह को जेडीयू ने बाहर का रास्ता दिखा दिया है, जिससे भूमिहार राजनीति के समीकरणों पर नए सवाल खड़े हो गए हैं। बिहार विधान परिषद चुनाव के नतीजे सामने आने के बाद राज्य की राजनीति में उबाल आ गया है। इस चुनाव में एनडीए को कुल चार सीटों पर सफलता मिली तो चार सीटों पर मुंह की खानी पड़ी। हालांकि सत्ताधारी गठबंधन ने चार सीटों पर कब्जा जमाया, लेकिन यह मुकाबला उसके लिए कई मोर्चों पर बड़ा झटका साबित हुआ। कई परंपरागत सीटों पर एनडीए के उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा, जबकि आरजेडी ने महज एक सीट पर जीत दर्ज करके किसी तरह अपनी लाज बचाई। इस पूरे घटनाक्रम के बीच प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज ने विधानसभा चुनावों के बाद अब विधान परिषद में भी अपना खाता खोल लिया है। जन सुराज की तरफ से सुरेश राय ने इस चुनाव में जीत हासिल की है। इस पूरे दंगल में सबसे ज्यादा चर्चा मोकामा से आने वाले विधायक अनंत सिंह की रही, जिन्होंने एनडीए के खिलाफ जाकर जन सुराज समर्थित उम्मीदवार अनुज सिंह का खुलकर साथ दिया। अनंत सिंह की बगावत और जेडीयू का कड़ा एक्शन एमएलसी चुनाव के दौरान मोकामा विधायक का पाला बदलना जेडीयू के लिए भारी साबित हुआ। भले ही मैदान में उतरे जेडीयू प्रत्याशी नीरज कुमार अंततः चुनाव जीतने में कामयाब रहे, लेकिन अनंत सिंह की बगावत ने पार्टी नेतृत्व की मुश्किलें बढ़ा दीं। इस अनुशासनहीनता पर सख्त रुख अपनाते हुए पार्टी ने बिना देर किए बड़ा कदम उठाया। आगामी 24 अक्टूबर 2026 को जेडीयू ने अनंत सिंह और उनकी पत्नी नीलम देवी को पार्टी विरोधी गतिविधियों में संलिप्त होने के गंभीर आरोपों के चलते छह साल की लंबी अवधि के लिए बाहर कर दिया। असल विवाद पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के उस एमएलसी चुनाव को लेकर था जहां अनंत सिंह ने पार्टी लाइन से हटकर अनुज सिंह के पक्ष में जमीन तैयार की थी। जब 27 अक्टूबर को मतों की गिनती पूरी हुई और नतीजे आए तो नीरज कुमार विजयी घोषित हुए जबकि अनुज सिंह पराजित हो गए। यह टकराव केवल एक विधान परिषद सीट तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके तार पुरानी राजनीतिक रंजिश, सांगठनिक अनुशासन और भूमिहार समुदाय के भीतर वर्चस्व की जंग से जुड़े हुए थे। इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह की भूमिका भी चर्चा के केंद्र में रही है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि पार्टी से निष्कासित होने के बाद अनंत सिंह अपनी राजनीतिक ताकत और रसूख का इस्तेमाल किस नई दिशा में आगे बढ़ाएंगे। भूमिहार वोट बैंक और अनंत सिंह का प्रभाव बिहार सरकार द्वारा कराए गए जाति आधारित सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में भूमिहार जाति की कुल आबादी करीब 2.86 प्रतिशत बैठती है। इसके बावजूद कई विधानसभा क्षेत्रों में इस समुदाय की स्थानीय राजनीतिक और सामाजिक हैसियत राज्य के कुल जनसंख्या अनुपात से कहीं अधिक भारी पड़ती है। मोकामा, बेगूसराय, लखीसराय, मुंगेर और पटना के ग्रामीण व शहरी हिस्सों में भूमिहार मतदाताओं का प्रभाव हमेशा से बेहद खास माना जाता रहा है। अनंत सिंह के राजनीतिक वजन और ताकत को मापने के लिए उनके पुराने चुनावी सफर पर नजर डालना जरूरी हो जाता है। उन्होंने अपने राजनीतिक करियर के दौरान अलग-अलग समय पर जेडीयू, निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर और आरजेडी के चुनाव चिह्न पर मोकामा से जीत हासिल की है। उनके इस सियासी इतिहास से साफ संकेत मिलता है कि उनका व्यक्तिगत जनाधार और पकड़ किसी एक खास दल की सीमाओं तक सीमित नहीं रही है। चुनावी इतिहास और जेडीयू के लिए बढ़ी चिंता साल 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान उन्होंने जेडीयू के टिकट पर ही मोकामा सीट पर शानदार जीत दर्ज की थी और अपनी प्रतिद्वंद्वी आरजेडी प्रत्याशी वीणा देवी को 28,206 मतों के भारी अंतर से हराया था। इससे पहले के दो चुनावों की बात करें तो उन्होंने साल 2015 में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में और साल 2020 में आरजेडी के टिकट पर भी अपनी जीत का परचम लहराया था। यही राजनीतिक पृष्ठभूमि जेडीयू के लिए मौजूदा विवाद को बेहद संवेदनशील और चिंताजनक बनाती है। पार्टी से निष्कासन के बाद वह अपने साथ जुड़े समर्थकों को किस राजनीतिक रास्ते पर ले जाते हैं, यह आने वाले समय के चुनावों की दिशा तय कर सकता है। हालांकि यह मान लेना पूरी तरह भूल होगी कि उनके व्यक्तिगत समर्थकों का दायरा और पूरे भूमिहार समुदाय का वोट बैंक एक ही चीज है। सात जिलों में क्या बिगड़ सकता है एनडीए का चुनावी गणित अनंत सिंह की बगावत का दायरा और प्रभाव किन-किन विधानसभा व लोकसभा क्षेत्रों तक फैल सकता है, इसका आकलन करने के लिए भूमिहार मतदाताओं की मौजूदगी और स्थानीय सियासी समीकरणों को अलग-अलग परखना होगा। मोकामा उनका मुख्य राजनीतिक और भौगोलिक गढ़ माना जाता है। इसके अलावा बाढ़ और उसके आसपास के इलाकों में भी इस समुदाय के वोटर बड़ी भूमिका निभाते हैं। वहां पार्टी से दूरी बनाने का क्या असर होगा, यह स्थानीय उम्मीदवारों के व्यवहार पर निर्भर करेगा। बेगूसराय और नवादा जैसे इलाकों में भूमिहार उम्मीदवारों के बीच की आपसी प्रतिद्वंद्वी राजनीति लगातार चर्चा में बनी रहती है। इन क्षेत्रों में एनडीए के पुराने वफादार मतदाताओं के बीच किसी स्थापित स्थानीय नेता की बगावत का असर पड़ना असंभव नहीं है, हालांकि अनंत सिंह की सीधी पहुंच का दायरा कितना है, यह जांच का विषय है। लखीसराय और उसके आसपास के बेल्ट में भी इस जाति के उम्मीदवारों का दबदबा रहा है। मुंगेर लोकसभा क्षेत्र जेडीयू के कद्दावर नेता ललन सिंह का मुख्य संसदीय क्षेत्र है। साल 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान भी भूमिहार वोटों को साधने के लिए अनंत सिंह को सक्रिय करने की चर्चाएं खूब उड़ी थीं। ऐसे में दोनों बड़े नेताओं के बीच की वर्तमान खटास का राजनीतिक महत्व और अधिक बढ़ जाता है। पारंपरिक वोट बैंक में सेंधमारी की आशंका नालंदा को हमेशा से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का सबसे सुरक्षित और मजबूत राजनीतिक किला माना जाता रहा है, लेकिन वहां भी भूमिहार जाति की अच्छी खासी आबादी है और यह देखना होगा कि अनंत सिंह का वहां कितना स्वतंत्र प्रभाव है। नवादा लोकसभा क्षेत्र में भी इस समुदाय का ऐतिहासिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व रहा है। हालांकि वहां उनकी बगावत का कितना असर पड़ेगा, यह पूरी तरह स्थानीय नेतृत्व और दूसरे जातीय गठजोड़ पर निर्भर करेगा। जहानाबाद और उससे सटे इलाकों में भी भूमिहारों की राजनीतिक उपस्थिति हमेशा से मजबूत रही है, हालांकि वहां उनके निजी प्रभाव की सीमाएं आने वाले दिनों में ही स्पष्ट होंगी। इन जिलों के अलावा शेखपुरा के बरबीघा, पटना के बिक्रम और मध्य बिहार के कई अन्य निर्वाचन क्षेत्रों में भी इस जाति के नेताओं के बीच मुकाबले खासे चर्चित रहे हैं। इसका आप पर असर बिहार विधान परिषद चुनाव परिणामों और राजनीतिक उठापटक का सीधा असर राज्य के चुनावी समीकरणों और एनडीए की रणनीति पर पड़ेगा। • बिहार में: भूमिहार बहुल क्षेत्रों में राजनीतिक दलों के बीच वोटों के ध्रुवीकरण और नए गठजोड़ देखने को मिल सकते हैं। आगामी चुनावों में क्षेत्रीय क्षत्रपों की भूमिका और अधिक अहम हो जाएगी। • मोकामा और आसपास के क्षेत्रों में: स्थानीय स्तर पर राजनीतिक वफादारियों में बदलाव आ सकता है जिससे स्थानीय चुनाव परिणामों पर सीधा असर पड़ेगा। मतदाताओं के बीच नए नेतृत्व को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। ऐसा क्यों हुआ एमएलसी चुनाव के दौरान पार्टी अनुशासन तोड़ने के आरोप में जेडीयू द्वारा की गई कार्रवाई और पुरानी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता इस घटनाक्रम के मुख्य कारण रहे हैं। • पार्टी लाइन के खिलाफ जाना: अनंत सिंह ने आधिकारिक एनडीए उम्मीदवार के खिलाफ जाकर जन सुराज के प्रत्याशी का समर्थन किया था। • अनुशासनहीनता पर कार्रवाई: पार्टी ने इसे गंभीर विरोधी गतिविधि मानते हुए छह साल के लिए निष्कासन का कदम उठाया। • जातीय और राजनीतिक वर्चस्व: भूमिहार समुदाय के भीतर अपने राजनीतिक प्रभाव को बनाए रखने और प्रदर्शित करने की होड़ ने इस विवाद को और हवा दी। सवाल-जवाब 1. जेडीयू ने अनंत सिंह और उनकी पत्नी को क्यों निकाला? अनंत सिंह ने विधान परिषद चुनाव में पार्टी उम्मीदवार के खिलाफ जाकर जन सुराज के उम्मीदवार का समर्थन किया था, जिसे पार्टी विरोधी गतिविधि माना गया। 2. बिहार विधान परिषद चुनाव में किन दलों को सीटें मिलीं? इस चुनाव में एनडीए ने चार सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि आरजेडी को एक सीट मिली और जन सुराज ने भी अपना खाता खोला। 3. अनंत सिंह ने किस उम्मीदवार का समर्थन किया था? उन्होंने पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के एमएलसी चुनाव में जन सुराज के उम्मीदवार अनुज सिंह का समर्थन किया था। 4. बिहार में भूमिहार जाति की आबादी कितने प्रतिशत है? बिहार सरकार के जाति आधारित सर्वेक्षण के अनुसार राज्य में भूमिहार जाति की हिस्सेदारी करीब 2.86 प्रतिशत है। 5. मोकामा सीट से अनंत सिंह का चुनावी इतिहास क्या रहा है? उन्होंने अलग-अलग समय पर जेडीयू, निर्दलीय और आरजेडी के टिकट पर मोकामा विधानसभा सीट से जीत दर्ज की है। https://trendkia.com/politics/bihar-vidhana-parishada-chunava-ke-bada-siyasata-garma-jdu-se-nishkasana-ke-bada-anant-singh-ki-nai-chala-para-tiki-najaren-52637 TrendKia — Har trend, sabse pehle.