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  "type": "article",
  "title": "राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के सभी छंदों पर संसद के कानून और कांग्रेस के दो स्टैंजा प्रस्ताव पर छिड़ी सियासी जंग, जानिए 1937 के निर्णय का पूरा इतिहास",
  "summary": "संसद द्वारा वंदे मातरम् के सभी छह छंदों को अनिवार्य बनाने वाले कानून के बाद कांग्रेस ने वर्किंग कमेटी में केवल दो छंद गाने का प्रस्ताव पास किया है। गृह मंत्री अमित शाह ने इस फैसले को तुष्टीकरण और 1937 के इतिहास का दोहराव बताते हुए तीखा हमला बोला है।",
  "content": "संसद के हालिया मानसून सत्र में पारित उस नए कानून के बाद देश के राजनीतिक गलियारों में एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है, जिसमें राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के सभी छह छंदों का गायन अनिवार्य बना दिया गया था। इस नए विधायी प्रावधान के ठीक विपरीत, कांग्रेस कार्य समिति ने अपनी औपचारिक बैठक में एक विशेष प्रस्ताव पारित कर यह स्पष्ट कर दिया है कि पार्टी के किसी भी आधिकारिक या संगठनात्मक कार्यक्रम में पूरे छह छंदों के बजाय केवल शुरुआती दो छंद ही गाए जाएंगे। अपने इस कदम के समर्थन में कांग्रेस नेतृत्व द्वारा वर्ष 1937 के ऐतिहासिक कांग्रेस अधिवेशन के प्रस्ताव का हवाला दिए जाने के बाद सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और मुख्य विपक्षी दल के बीच वैचारिक और राजनीतिक टकराव चरम पर पहुंच गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्षी दल के इस रुख पर अत्यंत कड़ा प्रहार करते हुए इसे न केवल संसदीय मर्यादा और कानून का उल्लंघन बताया है, बल्कि इसे तुष्टीकरण की पराकाष्ठा और देश को विभाजित करने वाली सोच का हिस्सा करार दिया है।\n\nतमिलनाडु से अमित शाह का कांग्रेस पर सीधा प्रहार\nइस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में गृह मंत्री अमित शाह का वह वक्तव्य है जो उन्होंने तमिलनाडु के महाबलीपुरम में दिया। वहां आयोजित साउथ जोनल काउंसिल की महत्वपूर्ण बैठक की शुरुआत से पूर्व गृह मंत्री अमित शाह मीडिया के समक्ष आए और उन्होंने राष्ट्रगीत के मुद्दे पर कांग्रेस की नीति और नीयत पर गंभीर सवाल खड़े किए। गृह मंत्री ने कहा कि वे राष्ट्रगीत को लेकर कांग्रेस पार्टी का यह वर्तमान रवैया देखकर पूरी तरह स्तब्ध हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि मुस्लिम वोट बैंक के राजनीतिक गणित को साधने के उद्देश्य से कांग्रेस ने संसद द्वारा बाकायदा कानून बनाकर पारित किए गए फैसले को मानने से साफ इनकार कर दिया है और पूरे राष्ट्रगीत के गायन से पीछे हट गई है।\n\nइतिहास के पन्नों को पलटते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने यह भी दावा किया कि वर्ष 1937 में भी कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के भारी राजनीतिक दबाव के आगे घुटने टेकते हुए वंदे मातरम् के टुकड़े किए थे। अमित शाह के अनुसार, 1937 का वही ऐतिहासिक समझौता आगे चलकर 1947 में भारत के भौगोलिक विभाजन की नींव साबित हुआ था। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि इतने दशक बीत जाने के बाद भी कांग्रेस की न तो नीयत में कोई बदलाव आया है और न ही उसकी नीति बदली है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस के इस देशविरोधी चरित्र और तुष्टीकरण के रवैये को देश की जनता के सामने पूरी प्रखरता के साथ उजागर करने का काम करेगी।\n\nकांग्रेस कार्य समिति का फैसला और शीर्ष नेताओं का तर्क\nसंसद के मानसून सत्र के दौरान जब सरकार ने विधेयक पेश कर राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के सभी छह स्टैंजा को अनिवार्य किया था, उसके बाद कांग्रेस आलाकमान ने शुरुआत में एक अनौपचारिक निर्देश जारी कर अपने कार्यकर्ताओं को केवल दो स्टैंजा गाने की हिदायत दी थी। हालांकि, स्थिति तब और गंभीर हो गई जब कांग्रेस कार्य समिति (CWC) की उच्चस्तरीय बैठक में इस संबंध में एक बाकायदा प्रस्ताव पारित कर दिया गया। इस पारित प्रस्ताव में कहा गया कि कांग्रेस 1937 के ऐतिहासिक अधिवेशन में स्वीकृत रिजोल्यूशन पर ही कायम रहेगी, जिसके तहत वंदे मातरम् के पहले दो छंदों को ही आधिकारिक मान्यता प्रदान की गई थी।\n\nकांग्रेस नेतृत्व ने इस फैसले के बचाव में कई ऐतिहासिक दलीलें प्रस्तुत की हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता केसी वेणुगोपाल और अन्य प्रवक्ताओं ने सवाल उठाया कि जिस 1937 की बैठक में दो छंदों वाला प्रस्ताव पारित हुआ था, उसमें महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, सरदार वल्लभभाई पटेल और गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर जैसे महान राष्ट्रनायक स्वयं उपस्थित थे। कांग्रेस नेताओं ने पूछा कि क्या इन सभी महान विभूतियों को भी देशविरोधी या तुष्टीकरण का पक्षधर माना जाएगा? उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि 1937 में यह निर्णय गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की प्रत्यक्ष सलाह पर ही लिया गया था। केसी वेणुगोपाल ने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी को राष्ट्रगीत से कोई वास्तविक प्रेम नहीं है, बल्कि वह इसके नाम पर समाज में नफरत के बीज बोना चाहती है, इसलिए कांग्रेस किसी भी सूरत में सत्ताधारी दल के राजनीतिक दबाव के सामने नहीं झुकेगी।\n\n1937 का ऐतिहासिक वर्किंग कमेटी प्रस्ताव क्या था?\nकांग्रेस द्वारा बार-बार 1937 के जिस प्रस्ताव का जिक्र किया जा रहा है, उसका ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और पाठ्य विवरण समझना अत्यंत आवश्यक है। वर्ष 1937 में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में पारित हुए प्रस्ताव के मूल दस्तावेज के अनुसार, यह स्पष्ट किया गया था कि वंदे मातरम् का गायन कभी भी भारत के किसी भी समुदाय या वर्ग को चुनौती देने के लिए नहीं किया गया और न ही इसका उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना था। उस प्रस्ताव में उल्लेख किया गया था कि गीत के पहले दो छंदों में ऐसी कोई भी बात शामिल नहीं है जिस पर किसी व्यक्ति या समूह को किसी प्रकार की आपत्ति हो सके।\n\nहालांकि, 1937 के प्रस्ताव में आगे यह स्वीकार किया गया था कि गीत के शेष चार छंदों में कुछ ऐसी धार्मिक शब्दावली, संदर्भ और वैचारिक प्रतीक मौजूद हैं, जिन पर भारत के अन्य धार्मिक समुदायों को सैद्धांतिक आपत्तियां हो सकती हैं। उस समय कांग्रेस कार्य समिति के भीतर मौजूद कई मुस्लिम नेताओं ने इन उत्तरवर्ती छंदों की विषय-वस्तु पर अपनी आपत्तियां दर्ज कराई थीं। कार्य समिति ने विचार-विमर्श के बाद उन आपत्तियों को तर्कसंगत और वैध माना था। इसी निष्कर्ष के आधार पर समिति ने यह सिफारिश जारी की थी कि जहां कहीं भी राष्ट्रीय आयोजनों या सार्वजनिक सभाओं में वंदे मातरम् का गायन किया जाए, वहां सर्वसम्मति बनाए रखने के लिए केवल इसके पहले दो छंद ही गाए जाने चाहिए।\n\nमहात्मा गांधी, नेहरू और सुभाष चंद्र बोस के बीच पत्राचार\nऐतिहासिक अभिलेख दर्शाते हैं कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वंदे मातरम् को लेकर मुख्य विरोध मुस्लिम लीग की ओर से आ रहा था, और इसके नेता मोहम्मद अली जिन्ना ने इस विषय को एक बहुत बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया था। जिन्ना के इसी निरंतर दबाव के बीच 1937 में कांग्रेस को यह प्रस्ताव पारित करना पड़ा था, लेकिन पार्टी के भीतर कई वरिष्ठ नेता इस निर्णय से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे। इस असंतोष का प्रमाण 18 नवंबर 1937 को महात्मा गांधी द्वारा पंडित जवाहरलाल नेहरू को लिखे गए एक पत्र से मिलता है।\n\nउस पत्र में महात्मा गांधी ने नेहरू को अवगत कराया था कि वंदे मातरम् को लेकर जारी विवाद अभी समाप्त नहीं हुआ है और बंगाल के अनेक वरिष्ठ कांग्रेसजन कार्य समिति के इस फैसले से बेहद आहत और असंतुष्ट हैं। गांधी जी ने लिखा कि सुभाष चंद्र बोस इस निर्णय से पैदा हुए व्यापक असंतोष और नाराजगी को दूर करने के लिए निरंतर प्रयास कर रहे हैं। पंडित नेहरू ने भी स्थिति को स्पष्ट करते हुए नेताजी सुभाष चंद्र बोस को एक विस्तृत पत्र लिखा था। नेहरू ने अपने पत्र में लिखा कि वंदे मातरम् की पृष्ठभूमि और उसके कुछ छंदों में हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख होने के कारण मुस्लिम समुदाय सहज महसूस नहीं करता है। नेहरू ने तर्क दिया था कि मुस्लिम समाज की इन्हीं संवेदनाओं को ध्यान में रखते हुए गीत के अंतिम चार छंदों को राष्ट्रीय बैठकों से हटाने का विचार स्वीकार किया गया था।\n\n1896 से 1927 तक मुस्लिम कांग्रेस अध्यक्षों द्वारा पूरा गायन\nवर्तमान विवाद के बीच एक अत्यंत दिलचस्प और महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य यह भी सामने आता है कि स्वतंत्रता से पूर्व कांग्रेस के कई शीर्ष मुस्लिम नेताओं ने स्वयं पूरे वंदे मातरम् का ससम्मान गायन किया था। इतिहास के पन्नों के अनुसार, वर्ष 1896 में जब कांग्रेस का कलकत्ता अधिवेशन हुआ था, तब रहमतुल्लाह (रहीमतुल्ला एम सयानी) पार्टी के अध्यक्ष थे और उन्होंने उस मंच से पूरा वंदे मातरम् गाया था। इसके बाद 1913 के करांची अधिवेशन में नवाब सैयद मोहम्मद बहादुर ने अध्यक्ष पद पर रहते हुए पूरे छह छंदों का पाठ किया था।\n\nइसी प्रकार, वर्ष 1918 के बॉम्बे अधिवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष सैयद हसन इमाम ने संपूर्ण राष्ट्रगीत का गायन किया था। 1920 के ऐतिहासिक नागपुर अधिवेशन के दौरान महान स्वतंत्रता सेनानी और विद्वान मौलाना अबुल कलाम आजाद ने अध्यक्षीय मंच से पूरे वंदे मातरम् का गायन किया था। वहीं वर्ष 1927 के मद्रास अधिवेशन में अध्यक्ष एम ए अंसारी ने भी वंदे मातरम् के पूरे छह के छह स्टैंजा गाए थे। ये सभी नेता अपने समय के उच्च कोटि के इस्लामिक विद्वान और राष्ट्रीय स्तर के जननेता थे, लेकिन इनमें से किसी ने भी कभी संपूर्ण राष्ट्रगीत का विरोध नहीं किया था।\n\nमुस्लिम लीग का प्रस्ताव और 11 दिनों के भीतर बदला फैसला\nघटनाक्रम का एक अन्य ऐतिहासिक मोड़ 17 अक्टूबर 1937 को देखने को मिला, जब लखनऊ में मुस्लिम लीग का वार्षिक अधिवेशन आयोजित किया गया था। उस अधिवेशन में मुस्लिम लीग ने औपचारिक रूप से एक प्रस्ताव पारित करके वंदे मातरम् के गायन का पूर्ण विरोध किया। इसके तत्काल बाद मोहम्मद अली जिन्ना ने कांग्रेस नेतृत्व पर अपना राजनीतिक दबाव बढ़ा दिया। मुस्लिम लीग के प्रस्ताव के ठीक 11 दिन बाद, यानी 28 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में कार्य समिति ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए केवल दो छंद गाने की नीति पर मोहर लगा दी।\n\nभारतीय जनता पार्टी के नेता इसी 11 दिनों के घटनाक्रम को रेखांकित करते हुए आरोप लगा रहे हैं कि उस दौर में भी कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के सांप्रदायिक दबाव के आगे घुटने टेक दिए थे और राष्ट्रगीत के साथ समझौता किया था। भाजपा का कहना है कि आज भी कांग्रेस उसी पुरानी वोट बैंक की राजनीति के तहत राष्ट्रगीत के पूर्ण गायन का विरोध कर रही है।\n\nनिशिकांत दुबे, इमरान मसूद और जीतन राम मांझी के तीखे बयान\nइस पूरे मामले पर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं की ओर से तीखी प्रतिक्रियाएं आई हैं। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने कांग्रेस पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि कांग्रेस पार्टी 1937 में भी जिन्ना की मांगों के आगे झुक गई थी और आज भी वह जिन्ना की ही विभाजनकारी विचारधारा पर चल रही है। उन्होंने कांग्रेस को जिन्ना की असली राजनीतिक वारिस करार दिया।\n\nदूसरी ओर, कांग्रेस नेता इमरान मसूद ने अपनी पार्टी के रुख का बचाव करते हुए कहा कि वंदे मातरम् का देश के ऐतिहासिक विभाजन से कोई लेना-देना नहीं था। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत में टू नेशन थ्योरी (द्वि-राष्ट्र सिद्धांत) की अवधारणा सबसे पहले वीर सावरकर ने पेश की थी, इसलिए भाजपा को इतिहास को मरोड़कर पेश नहीं करना चाहिए। इस बीच, केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने भी सोशल मीडिया पर एक कड़ा संदेश साझा किया, जिसमें उन्होंने चेतावनी दी कि राष्ट्रगीत के टुकड़े-टुकड़े करने की सोच रखने वालों को देश की जनता करारा जवाब देगी।\n\nइसका आप पर असर\nभारत में: संसद द्वारा पारित कानून के तहत राष्ट्रीय और आधिकारिक आयोजनों में वंदे मातरम् के सभी छह छंदों का गायन अनिवार्य रहेगा, जबकि राजनीतिक दलों के कार्यक्रमों में इसके अलग-अलग छंदों को लेकर वैचारिक बहस देखने को मिलेगी।\n\nराजनीतिक क्षेत्र में: यह घटनाक्रम चुनावी बहसों में तुष्टीकरण और ऐतिहासिक फैसलों की समीक्षा से जुड़े मुद्दों को केंद्र में ला सकता है, जिससे आम नागरिकों के बीच राष्ट्रगीत के संवैधानिक और ऐतिहासिक पहलुओं पर चर्चा बढ़ेगी।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. कांग्रेस ने वंदे मातरम् को लेकर क्या नया फैसला किया है?\nकांग्रेस कार्य समिति (CWC) ने एक प्रस्ताव पारित कर पार्टी के कार्यक्रमों में पूरे छह छंदों के बजाय केवल पहले दो छंद (स्टैंजा) ही गाने का निर्णय लिया है, जिसके लिए उन्होंने 1937 के पार्टी प्रस्ताव का हवाला दिया है।\n\n2. गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के इस फैसले पर क्या आरोप लगाए?\nगृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि कांग्रेस मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति के लिए संसद के कानून का उल्लंघन कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि 1937 में भी मुस्लिम लीग के दबाव में राष्ट्रगीत के टुकड़े किए गए थे, जिससे देश के विभाजन की नींव पड़ी थी।\n\n3. 1937 के कांग्रेस अधिवेशन का वंदे मातरम् प्रस्ताव क्या था?\n1937 के प्रस्ताव में कहा गया था कि पहले दो छंदों में कोई आपत्तिजनक बात नहीं है, लेकिन बाकी चार छंदों में ऐसी धार्मिक शब्दावली और प्रतीक हैं जिन पर अन्य धर्मों के लोगों को आपत्ति हो सकती है, इसलिए राष्ट्रीय सभाओं में केवल पहले दो छंद ही गाए जाने चाहिए।\n\n4. क्या स्वतंत्रता से पहले मुस्लिम नेताओं ने पूरा वंदे मातरम् गाया था?\nहां, 1896 में रहमतुल्लाह, 1913 में नवाब सैयद मोहम्मद बहादुर, 1918 में सैयद हसन इमाम, 1920 में मौलाना अबुल कलाम आजाद और 1927 में एम ए अंसारी जैसे प्रमुख मुस्लिम कांग्रेस अध्यक्षों ने पूरा वंदे मातरम् गाया था।\n\n5. संसद द्वारा वंदे मातरम् पर क्या नया कानून बनाया गया है?\nसंसद के मानसून सत्र में पारित कानून के तहत राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के सभी छह छंदों का गायन अनिवार्य बनाया गया है।\n\n6. कांग्रेस नेताओं ने अपने फैसले का बचाव किस प्रकार किया है?\nकेसी वेणुगोपाल और अन्य नेताओं ने तर्क दिया कि 1937 का प्रस्ताव गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर पास हुआ था और उस बैठक में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस और सरदार पटेल मौजूद थे।",
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  "publishedAt": "2026-08-21",
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