BJP का 'पसमंदा कार्ड': अखिलेश-राहुल की चुनौती और मुस्लिम वोटों का गणित उत्तर प्रदेश में भाजपा ने पसमंदा मुसलमानों के बीच अपनी पैठ मजबूत करने के लिए एक नई रणनीति अपनाई है, जिसका लक्ष्य विपक्ष के 3 करोड़ मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाना है। TrendKia की रिपोर्ट के मुताबिक, इस कदम से राज्य की 150 सीटों पर चुनावी समीकरण बदल सकते हैं। पसमंदा रणनीति से विपक्ष में बेचैनी उत्तर प्रदेश के चुनावी माहौल में सभी पार्टियां अपने वोट बैंक को सुरक्षित करने में जुटी हैं, लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने विपक्ष के सबसे भरोसेमंद किले यानी 'मुस्लिम वोट बैंक' में सेंध लगाने की एक बड़ी तैयारी कर ली है। जब राहुल गांधी और अखिलेश यादव अपने गठबंधन के समीकरण बनाने में लगे थे, भाजपा ने जमीनी स्तर पर अपना 'पसमंदा मुस्लिम आउटरीच' अभियान शुरू कर दिया है। योगी सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री Danish Azad Ansari के नेतृत्व में भाजपा की माइनॉरिटी सेल सीधे मुस्लिम बस्तियों तक पहुंच रही है, जिससे विपक्षी खेमे की चिंताएं बढ़ गई हैं। 3 करोड़ की आबादी पर भाजपा का दांव उत्तर प्रदेश की मुस्लिम आबादी के सामाजिक आंकड़ों पर गौर करें तो यह भाजपा के लिए एक बड़ा अवसर है। राज्य में कुल मुस्लिम जनसंख्या का 80 से 85 प्रतिशत हिस्सा पसमंदा (पिछड़ा, दलित और शोषित) वर्ग से आता है। संख्या के लिहाज से यह करीब 3 करोड़ का वोट बैंक है। पारंपरिक रूप से मुस्लिम राजनीति में 'अशराफ' या अगड़े वर्ग का प्रभाव रहा है, जबकि बुनकर और कसाई जैसे मेहनत करने वाले पसमंदा वर्ग को केवल वोट के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। भाजपा का मानना है कि यदि इस वर्ग को विकास योजनाओं से सीधे जोड़ा जाए, तो विपक्ष का सेक्युलर गणित पूरी तरह बिखर सकता है। कामकाजी वर्गों पर खास फोकस भाजपा उन समुदायों से सीधे संवाद कर रही है जो मेहनत और स्वरोजगार से जुड़े हैं। इनमें शामिल हैं: • Ansari (जुलाहा): कपड़ा बुनाई के काम से जुड़े बुनकर समुदाय। • Mansuri / Dhuniya: रजाई-गद्दे बनाने और रुई धुनने वाले। • Qureshi: मीट और गोश्त के कारोबार से जुड़े। • Rain (कुंजड़े): सब्जी और फलों के विक्रेता। • Salman (हज्जाम): बाल काटने और सैलून चलाने वाले वर्ग। • अन्य दस्तकार: इनमें दर्जी, लोहार-बढ़ई, मनिहार, अलवी, घोसी और हवारी जैसे वर्ग शामिल हैं। जमीनी स्तर पर बदलाव की कोशिश TrendKia की रिपोर्ट के अनुसार, मंत्री Danish Azad Ansari स्वयं पसमंदा समाज से आते हैं, इसलिए वे रैलियों के बजाय छोटी चौपालों के जरिए लोगों से मिल रहे हैं। कार्यकर्ता वहां जाकर पूछते हैं कि क्या उन्हें मुफ्त राशन, पीएम आवास योजना का लाभ या आयुष्मान कार्ड मिला है? इन योजनाओं का लाभ धार्मिक भेदभाव के बिना मिलने से एक बड़ा वर्ग अब भाजपा की बातों को गौर से सुन रहा है। 150 सीटों का चुनावी चक्रव्यूह यह रणनीति 150 उन सीटों पर असर डालेगी जहां मुस्लिम मतदाता हार-जीत तय करते हैं। पिछले चुनावों में भाजपा ने इसी तरह के प्रयासों से पसमंदा वोटों में 8 से 10 फीसदी की सेंध लगाई थी, जिससे विपक्ष के वोट विभाजित हो गए थे। अब समाजवादी पार्टी के नेता Fakhrul Hasan Chand, कांग्रेस के पदाधिकारी और AIMIM के नेता Tahir जैसे चेहरे रक्षात्मक स्थिति में आ गए हैं। अखिलेश यादव और राहुल गांधी के लिए सबसे बड़ी चुनौती भाजपा की कल्याणकारी नीतियों के जरिए मिल रही इस चुनौती से अपने पारंपरिक वोट बैंक को बचाना है। इसका आप पर असर भारत में: सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने से राजनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव आ सकता है, जिससे मतदाताओं को अपनी स्थानीय जरूरतों पर अधिक ध्यान देने का मौका मिलेगा। उत्तर प्रदेश में: मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में विकास योजनाओं की पहुंच सीधे स्थानीय निवासियों के जीवन स्तर और आर्थिक स्थितियों को प्रभावित करेगी। सवाल-जवाब 1. यूपी में ‘पसमंदा’ मुस्लिम आबादी की कुल ताकत कितनी है? कुल मुस्लिम जनसंख्या का 80 से 85 प्रतिशत, यानी करीब 3 करोड़ लोग। 2. भाजपा की इस महा-रणनीति का नेतृत्व कौन कर रहा है? योगी सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री दानिश आज़ाद अंसारी। 3. पसमंदा समाज में मुख्य रूप से कौन-से कामकाजी वर्ग आते हैं? अंसार (बुनकर), मंसूरी (धुनिया), कुरैशी (कसाई) और राईन (सब्जी विक्रेता) जैसे पिछड़े वर्ग। 4. इस ‘पसमंदा कार्ड’ से उत्तर प्रदेश की कितनी सीटों पर सीधा असर पड़ेगा? सूबे की करीब 150 मुस्लिम-बाहुल्य और प्रभावी विधानसभा सीटों पर। 5. अखिलेश और राहुल गांधी के गठबंधन के सामने क्या बड़ी चुनौती है? अपने पारंपरिक और सबसे सुरक्षित मुस्लिम वोट बैंक को बिखरने से बचाना। https://trendkia.com/politics/bjp-ka-pasamnda-karda-akhilesha-rahula-ki-chunauti-aura-muslima-voton-ka-ganita-1843 TrendKia — Har trend, sabse pehle.