ब्रिक्स में डॉ. ब्रह्मा चेलानी ने खोला चीन का कच्चा चिट्ठा, भारत के खिलाफ आर्थिक चालबाजियों और सप्लाई चेन ब्लॉक करने का खुलासा अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ डॉ. ब्रह्मा चेलानी ने ब्रिक्स के न्यू दिल्ली डिक्लेरेशन के बीच चीन के दोहरे मापदंडों को उजागर किया है, जो एक तरफ पश्चिमी प्रतिबंधों का विरोध करता है और दूसरी तरफ भारत की आर्थिक प्रगति में रोड़े अटकाता है। ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में जारी किए गए न्यू दिल्ली डिक्लेरेशन ने वैश्विक राजनीति के गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। इस बीच, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जाने-माने विशेषज्ञ डॉ. ब्रह्मा चेलानी ने ब्रिक्स समूह के आधिकारिक बयानों और उसके सबसे शक्तिशाली सदस्य के वास्तविक व्यवहार के बीच के बड़े विरोधाभास को उजागर किया है। डॉ. चेलानी का मानना है कि जहां एक तरफ ब्रिक्स के मंच से पश्चिमी देशों द्वारा लगाए जाने वाले आर्थिक प्रतिबंधों के खिलाफ बड़ी-बड़ी बातें की जा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ चीन पर्दे के पीछे से एक बेहद खतरनाक खेल खेल रहा है। भारत को एक प्रमुख वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनने से रोकने के लिए बीजिंग ने क्रिटिकल मिनरल्स और अत्याधुनिक औद्योगिक मशीनरी की सप्लाई-चेन को जानबूझकर बाधित कर दिया है। डॉ. चेलानी के अनुसार, अमेरिका के एकतरफा फैसलों की आलोचना करने वाले ब्रिक्स देशों को चीन के इस रवैये पर भी ध्यान देना होगा, जो कागजों पर तो एकजुटता दिखाता है लेकिन हकीकत में अपने ही सहयोगियों के हितों को नुकसान पहुंचा रहा है। ब्रिक्स के वादों और जमीनी हकीकत में बड़ा फासला न्यू दिल्ली डिक्लेरेशन में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सदस्य देश अंतरराष्ट्रीय कानूनों के उल्लंघन में लगाए जाने वाले एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों की कड़ी निंदा करते हैं। यह सीधा निशाना पश्चिमी देशों और विशेष रूप से अमेरिका के वित्तीय प्रतिबंधों पर था। हालांकि, हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। ब्रिक्स का सबसे प्रभावशाली सदस्य चीन अपनी मनमानी और सप्लाई-चेन पर अपने वर्चस्व का इस्तेमाल कर खुद अपने ही साथी देशों के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है। डॉ. चेलानी ने इसे चीन और ब्रिक्स का सबसे बड़ा दोहरा मापदंड करार दिया है। उनका कहना है कि जो देश खुद आर्थिक दबाव बनाने के खिलाफ प्रस्तावों पर हस्ताक्षर कर रहा है, वही अपने सहयोगियों के खिलाफ इस हथियार का इस्तेमाल कर रहा है। यह विरोधाभास वैश्विक स्तर पर पूरे ब्रिक्स समूह की विश्वसनीयता को खतरे में डालता है। जब कोई संगठन खुद को ग्लोबल साउथ के मसीहा और पश्चिमी देशों के प्रभुत्व वाले वित्तीय सिस्टम के विकल्प के रूप में पेश करता है, तो उसके आंतरिक मूल्य भी वैसे ही होने चाहिए। अपने सबसे बड़े आर्थिक इंजन यानी चीन को भारत जैसे संस्थापक सदस्य के खिलाफ सप्लाई-चेन का इस्तेमाल करने की अनुमति देकर, यह समूह अपनी विश्वसनीयता खो रहा है। ऐसे में वैश्विक मंच पर ब्रिक्स को एक सहयोगी संगठन के बजाय बीजिंग के एकतरफा एजेंडे को बढ़ाने वाले मंच के रूप में देखा जाने लगेगा। डॉ. चेलानी का मानना है कि इसी आंतरिक दोहरेपन के कारण ब्रिक्स के बड़े-बड़े दावे अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों की नजरों में खोखले साबित होते हैं। सप्लाई-चेन को हथियार बनाने की चीनी रणनीति डॉ. ब्रह्मा चेलानी के विश्लेषण के अनुसार, चीन खुद को पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का विरोधी दिखाता है, लेकिन वह खुद अवैध तरीकों से दूसरे देशों पर आर्थिक दबाव बनाने का काम करता है। रेयर अर्थ, क्रिटिकल मिनरल्स, मैन्युफैक्चरिंग इक्विपमेंट्स और महत्वपूर्ण औद्योगिक उपकरणों के निर्यात पर अचानक प्रतिबंध लगाना या नए कड़े नियम थोपना बीजिंग की पुरानी रणनीति रही है। चीन का यह रवैया एकतरफा आर्थिक दबाव का ही एक रूप है, जो न केवल खुले व्यापार के सिद्धांतों को कमजोर करता है बल्कि वैश्विक सप्लाई-चेन को भी पूरी तरह से अस्त-व्यस्त कर देता है। भारत के मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की राह में रोड़े पिछले कुछ समय में बीजिंग ने औपचारिक नियमों और अनौपचारिक प्रशासनिक हथकंडों का सहारा लेकर सीधे तौर पर भारत को निशाना बनाया है। चीन ने भारत भेजे जाने वाले महत्वपूर्ण मैन्युफैक्चरिंग उपकरणों, कच्चे माल और तकनीकी विशेषज्ञता के हस्तांतरण पर कई तरह की पाबंदियां लगा दी हैं। इसका सीधा नुकसान उन भारतीय उद्योगों को हो रहा है जो उत्पादन के लिए चीनी मशीनरी और कलपुर्जों पर निर्भर हैं। चीन की इस चालबाजी के पीछे मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत वैश्विक बाजार में उसके सामने एक मजबूत मैन्युफैक्चरिंग विकल्प के रूप में खड़ा न हो सके। भारत के विकास और आर्थिक प्रगति के लिहाज से इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। आज के समय में जब पूरी दुनिया चीन प्लस वन रणनीति के तहत चीन के अलावा अन्य देशों में अपने मैन्युफैक्चरिंग हब तलाश रही है, तब भारतीय फैक्ट्रियों के लिए कच्चे माल और उन्नत मशीनरी की उपलब्धता बेहद जरूरी है। इस अहम कड़ी को काटकर बीजिंग का इरादा भारतीय उद्योगों को हमेशा के लिए चीनी तैयार उत्पादों पर निर्भर बनाए रखना है, ताकि भारत अपनी स्वदेशी विनिर्माण क्षमताओं का विकास न कर सके। यह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि चीन, भारत के औद्योगिक विकास को ग्लोबल साउथ के साझा विकास के रूप में नहीं, बल्कि अपने आर्थिक वर्चस्व के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में देखता है। कागजी एकजुटता और आपसी अविश्वास पश्चिमी देशों के संरक्षणवाद और प्रतिबंधों पर उपदेश देना ब्रिक्स के लिए बेहद आसान काम है, लेकिन जब अपने ही मंच के भीतर की बात आती है, तो स्थिति अलग हो जाती है। चीन ब्रिक्स के भीतर ही भारत जैसे अपने सहयोगी देशों के खिलाफ नॉन-टैरिफ बैरियर्स और मार्केट-एक्सेस पर पाबंदियां लागू कर रहा है। डॉ. ब्रह्मा चेलानी का यह गहन विश्लेषण स्पष्ट करता है कि ब्रिक्स की एकजुटता केवल आधिकारिक दस्तावेजों तक ही सीमित है। व्यावहारिक धरातल पर चीन अपनी आर्थिक चौधराहट बनाए रखने के लिए किसी भी हद तक जाने और अपने ही साझेदारों की राह में रोड़े अटकाने से पीछे नहीं उठ रहा है। इसका आप पर असर इस भू-राजनीतिक टकराव का सीधा असर भारतीय उपभोक्ताओं और विनिर्माण क्षेत्र पर पड़ेगा। • भारतीय उद्योगों और रोजगार पर: चीन द्वारा क्रिटिकल मिनरल्स और मशीनरी रोके जाने से भारतीय इलेक्ट्रॉनिक और ऑटोमोबाइल उद्योगों में उत्पादन की रफ्तार धीमी हो सकती है। इसके कारण आने वाले समय में नए रोजगार के अवसरों में कमी आ सकती है और स्थानीय उद्योगों को कच्चे माल के लिए अन्य देशों पर निर्भर होना पड़ेगा। • महंगाई और उत्पाद की कीमतों पर: सप्लाई चेन बाधित होने के कारण भारत में बनने वाली कई तकनीकी वस्तुएं, स्मार्टफोन और इलेक्ट्रिक वाहन महंगे हो सकते हैं। उपभोक्ताओं को इन उत्पादों को खरीदने के लिए अधिक जेब ढीली करनी पड़ सकती है क्योंकि कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ जाएगी। ऐसा क्यों हुआ चीन द्वारा भारत के खिलाफ इस तरह के कड़े कदम उठाने के पीछे उसका अपना आर्थिक और रणनीतिक वर्चस्व बनाए रखने का इरादा है। • वैश्विक बाजार में एकाधिकार बनाए रखना: चीन लंबे समय से दुनिया की मैन्युफैक्चरिंग महाशक्ति रहा है और वह इस दबदबे को खोना नहीं चाहता। भारत को एक बड़े औद्योगिक विकल्प के रूप में उभरने से रोककर वह अपने बाजार एकाधिकार को सुरक्षित रखना चाहता है। • भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता: सीमा विवाद और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की बढ़ती साख के कारण दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा है। इसी प्रतिद्वंद्विता के तहत चीन अपनी आर्थिक ताकत को एक रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। • कागजी प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन: ब्रिक्स जैसे बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग की घोषणाओं के बावजूद, चीन हमेशा अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है। इसी नीति के तहत वह अपने सहयोगियों के खिलाफ भी गुप्त व्यापार प्रतिबंध लगाने से नहीं कतराता। सवाल-जवाब 1. ब्रिक्स के न्यू दिल्ली डिक्लेरेशन में क्या घोषणा की गई थी? इस डिक्लेरेशन में अंतरराष्ट्रीय कानूनों के खिलाफ लगाए जाने वाले एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों की कड़े शब्दों में निंदा की गई थी, जो मुख्य रूप से पश्चिमी देशों की नीतियों के खिलाफ था। 2. डॉ. ब्रह्मा चेलानी ने चीन पर क्या गंभीर आरोप लगाए हैं? डॉ. चेलानी ने आरोप लगाया कि चीन एक तरफ तो प्रतिबंधों की निंदा करने वाले बयानों पर हस्ताक्षर करता है, लेकिन दूसरी तरफ वह खुद अवैध तरीकों से भारत जैसे अपने सहयोगी देशों पर आर्थिक दबाव और सप्लाई-चेन प्रतिबंध लगाता है। 3. चीन भारत को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनने से कैसे रोक रहा है? चीन ने औपचारिक और अनौपचारिक प्रशासनिक तरीकों का इस्तेमाल करके भारत को भेजे जाने वाले क्रिटिकल मिनरल्स, कच्चे माल, विनिर्माण उपकरणों और तकनीकी विशेषज्ञता के निर्यात पर पाबंदियां लगाई हैं। 4. ब्रिक्स की आंतरिक एकजुटता को लेकर क्या सवाल उठे हैं? डॉ. चेलानी के विश्लेषण के अनुसार, ब्रिक्स की एकजुटता केवल कागजों तक सीमित है क्योंकि चीन समूह के भीतर ही भारत जैसे भागीदारों के खिलाफ नॉन-टैरिफ बैरियर्स और बाजार पहुंच पर प्रतिबंध लगा रहा है। https://trendkia.com/politics/brics-men-dr-brahma-chellaney-ne-khola-china-ka-kachcha-chittha-india-ke-khilapha-arthika-chalabajiyon-aura-saplai-chena-bloka-kar-31914 TrendKia — Har trend, sabse pehle.