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  "type": "article",
  "title": "ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के जरिए वैश्विक कूटनीति में भारत का कद बढ़ाने और चीन के साथ बराबरी से बात करने पर सलमान खुर्शीद का जोर",
  "summary": "भारत में आयोजित हो रहे ब्रिक्स सम्मेलन को वैश्विक कूटनीति का बड़ा अवसर बताते हुए पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने बहुध्रुवीय व्यवस्था, चीन के साथ पारदर्शिता और राष्ट्रीय एकजुटता की वकालत की है।",
  "content": "वैश्विक मंचों पर बढ़ते ध्रुवीकरण और आर्थिक अनिश्चितता के दौर में भारत में आयोजित हो रहा ब्रिक्स शिखर सम्मेलन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। पूर्व विदेश मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद ने बहुध्रुवीय दुनिया के निर्माण में इस आयोजन की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि ब्रिक्स केवल एक पारंपरिक मंच नहीं है, बल्कि यह एक वैकल्पिक वैश्विक व्यवस्था की नींव रखने की क्षमता रखता है। उन्होंने जोर दिया कि भारत की विदेश नीति ऐतिहासिक रूप से गुटनिरपेक्षता के सिद्धांतों पर आधारित रही है, जिससे देश को किसी भी एक वैश्विक गुट की तरफ झुके बिना इस अंतरराष्ट्रीय मंच का स्वाभाविक नेतृत्व करने का अनूठा अवसर प्राप्त होता है। दुनिया भर के प्रमुख देश इस सम्मेलन पर अपनी नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि यह मंच आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय व्यापार, उत्पादन श्रृंखलाओं और आपूर्ति तंत्र के पुनर्गठन में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।\n\nवैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और बहुध्रुवीय व्यवस्था में भारत का नेतृत्व\nअंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिदृश्य में आए हालिया बदलावों को देखते हुए ब्रिक्स मंच की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। वैश्विक उत्पादन केंद्रों, आपूर्ति श्रृंखलाओं और व्यापारिक समझौतों के दृष्टिकोण से ब्रिक्स देशों का समूह एक सशक्त विकल्प पेश करता है। सलमान खुर्शीद के अनुसार, जब दुनिया के विभिन्न देश परस्पर विरोधी दिशाओं में आगे बढ़ रहे हों, तब भारत के पास यह क्षमता है कि वह सभी पक्षों को एक साझा मंच पर लाने का प्रयास करे। भारत की स्थापित विदेश नीति का मूल आधार स्वतंत्रता और संतुलन रहा है। गुटनिरपेक्षता की यही विरासत भारत को यह सामर्थ्य प्रदान करती है कि वह किसी भी बाहरी दबाव के बिना वैश्विक दक्षिण के विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को सामने रख सके। वैश्विक अर्थव्यवस्था को अधिक समावेशी और संतुलित बनाने के लिए ब्रिक्स के माध्यम से एक व्यावहारिक ढांचा तैयार किया जा सकता है, जो दुनिया के विभिन्न हिस्सों के बीच आर्थिक सहयोग को नई दिशा देगा।\n\nपश्चिम एशिया में कूटनीतिक संतुलन: ईरान और संयुक्त अरब अमीरात को एक मंच पर लाना\nपश्चिम एशिया में बढ़ते भूराजनीतिक तनाव और क्षेत्रीय समीकरणों के संदर्भ में भारत का रुख बेहद संवेदनशील और दूरदर्शी होना आवश्यक है। इस क्षेत्र में एक ओर ईरान और दूसरी ओर संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश हैं, जिनके राजनीतिक और रणनीतिक दृष्टिकोण में भिन्नता देखने को मिलती है। पूर्व विदेश मंत्री ने कहा कि ब्रिक्स सम्मेलन के माध्यम से भारत के पास यह अवसर है कि वह इन विरोधी रुख वाले देशों को एक साथ लाकर उनके बीच आम सहमति बनाने की दिशा में काम करे। इससे पहले शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के मंच पर भी भारत ने इसी तरह की संतुलित पहल करने का प्रयास किया था। भारत की कूटनीतिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह किसी एक पक्ष की ओर झुकाव प्रदर्शित किए बिना एक निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभाए। यदि भारत इस बहुपक्षीय मंच पर मध्य पूर्व के देशों के बीच संवाद और सहमति बनाने में सफल होता है, तो यह वैश्विक मंच पर देश की कूटनीतिक क्षमता और प्रभावशीलता की एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगी।\n\nआतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई और व्यापक वैश्विक चुनौतियां\nअंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर सलमान खुर्शीद ने स्पष्ट किया कि आतंकवाद किसी एक देश तक सीमित समस्या नहीं है, बल्कि यह पूरी मानव सभ्यता और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए एक गंभीर चुनौती है। आतंकवाद से उत्पन्न खतरों से मुकाबला करना और इसे जड़ से उखाड़ फेंकना पूरे विश्व का सामूहिक दायित्व है। भारत ने हमेशा हर अंतरराष्ट्रीय मंच से आतंकवाद के खिलाफ सख्त और निर्णायक संदेश देने का रुख अपनाया है। हालांकि, इसके साथ ही उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि वैश्विक वार्ता केवल सुरक्षा और आतंकवाद के मुद्दों तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए। आज के समय में दुनिया के सामने जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर पर्यावरणीय संकट और वैश्विक अर्थव्यवस्था में आ रही मंदी तथा उतार-चढ़ाव जैसी बड़ी चुनौतियां भी खड़ी हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इन सभी विषयों पर एक साथ ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है ताकि विकासशील देशों की आर्थिक स्थिरता और पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए दीर्घकालिक समाधान तलाशे जा सकें।\n\nअमेरिकी टैरिफ नीतियों और डोनाल्ड ट्रंप के रुख पर भारत की आत्मनिर्भरता\nअमेरिका की बदलती आर्थिक नीतियों और डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित व्यापारिक प्रतिबंधों या टैरिफ नीतियों के बीच अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक माहौल में अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है। सलमान खुर्शीद ने इस बात पर बल दिया कि जब भी भारत की राष्ट्रीय अस्मिता, स्वाभिमान और आर्थिक हितों का विषय आता है, तब देश को अपनी नीतियों पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान भी भारत को इसी आत्मविश्वास और स्पष्टता के साथ वैश्विक मंच पर अपनी बात रखनी होगी। अंतरराष्ट्रीय दबावों के बावजूद, भारत को अपने घरेलू उद्योगों, व्यापारिक स्वतंत्रता और आर्थिक संप्रभुता की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध रहना होगा। ब्रिक्स जैसे मजबूत आर्थिक मंच का उपयोग करते हुए भारत दुनिया को यह संदेश दे सकता है कि वह अपनी राष्ट्रीय गरिमा से समझौता किए बिना निष्पक्ष और पारदर्शी अंतरराष्ट्रीय व्यापार का समर्थन करता है।\n\nवास्तविक नियंत्रण रेखा पर पारदर्शिता और चीन के साथ बराबरी का संबंध\nचीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा को लेकर सीमावर्ती क्षेत्रों के हालात पर गंभीर चर्चा होना स्वाभाविक है। वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर घटी घटनाओं के बाद दोनों देशों के रिश्तों में आए खिंचाव के संदर्भ में सलमान खुर्शीद ने कहा कि पड़ोसी देशों के बीच बेहतर संबंध होना आवश्यक है, लेकिन इसके लिए पारस्परिक विश्वास पहली शर्त है। सीमा पर होने वाली गतिविधियां ही दोनों देशों के बीच भरोसे पर सवाल खड़ा करती हैं। उन्होंने केंद्र सरकार को सलाह दी कि एलएसी की वास्तविक स्थिति के बारे में देश की जनता और राजनीतिक दलों को पूरी पारदर्शिता के साथ सच बताया जाना चाहिए। चीन के साथ वार्ता में पूरा देश अपनी सरकार का समर्थन करने को तैयार है, लेकिन इसके लिए यह आवश्यक है कि स्थिति की पूरी जानकारी स्पष्ट रूप से साझा की जाए। इसके साथ ही, चीन की बढ़ती आर्थिक शक्ति को देखते हुए भारत को अपने घरेलू आर्थिक तंत्र को अत्यधिक मजबूत करना होगा ताकि जब दोनों देशों के शीर्ष नेता आपस में बैठें, तो भारत एक कनिष्ठ साझेदार या 'छोटा भाई' नजर न आए। भारत की सैन्य क्षमता चीन की किसी भी चुनौती का उत्तर देने के लिए पूरी तरह सक्षम है, लेकिन कूटनीतिक टेबल पर बराबरी का दर्जा हासिल करने के लिए आर्थिक मजबूती और पारदर्शिता दोनों अत्यंत आवश्यक हैं।\n\nवैश्विक मंचों पर राष्ट्रीय एकसुरता का महत्व\nकिसी भी देश की विदेश नीति की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके भीतर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर कितनी एकजुटता है। सलमान खुर्शीद ने निष्कर्ष के रूप में कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत तभी प्रभावशाली ढंग से अपनी बात रख सकता है, जब देश के भीतर सभी घटक एक सुर में बात करें। यदि देश आंतरिक रूप से विभाजित नजर आएगा, तो वैश्विक पटल पर भारत की बात का प्रभाव कम हो सकता है। किसी भी राष्ट्रीय संकट या कूटनीतिक अवसर के समय स्पष्ट, खुली और संकोचहीन चर्चा के माध्यम से सर्वसम्मति का निर्माण करना अनिवार्य है। जब पूरा देश एक मजबूत और एकीकृत आवाज के साथ खड़ा होता है, तभी वैश्विक चुनौतियों का समाधान निकाला जा सकता है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के हितों की रक्षा की जा सकती है।\n\nइसका आप पर असर\nब्रिक्स सम्मेलन और वैश्विक कूटनीतिक फैसलों का भारत के आम नागरिकों, कारोबारियों और अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव पड़ता है।\n\n• व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला: अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं के मजबूत होने से देश में आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता सुलभ होगी। इससे भारतीय निर्यातकों को नए वैश्विक बाजार मिलेंगे और व्यापारिक लागत में कमी आएगी।\n• घरेलू उद्योग और विनिर्माण: अमेरिका और चीन से जुड़ी व्यापारिक नीतियों में स्पष्टता आने से देश के विनिर्माताओं को राहत मिलेगी। घरेलू उद्योगों को प्रोत्साहन मिलने से स्थानीय स्तर पर नए रोजगार के अवसर पैदा होंगे।\n• राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमाई स्थिरता: चीन के साथ एलएसी पर पारदर्शिता और स्थिरता से सीमावर्ती इलाकों में शांति कायम होगी। रक्षा बजट का बेहतर उपयोग देश के बुनियादी ढांचे के विकास में किया जा सकेगा।\n• ईंधन और ऊर्जा कीमतें: पश्चिम एशिया में शांति और ईरान व यूएई के साथ बेहतर संबंधों से कच्चे तेल की आपूर्ति सुचारू रहेगी। इससे देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में स्थिरता बनी रहेगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nभारत में आयोजित हो रहे ब्रिक्स सम्मेलन के पीछे वैश्विक आर्थिक समीकरण, हालिया सीमा विवाद और बदलती अमेरिकी व्यापार नीतियां मुख्य कारण हैं।\n\n• वैश्विक ध्रुवीकरण और नए विकल्प: पश्चिमी देशों और अन्य वैश्विक शक्तियों के बीच बढ़ते तनाव के कारण ब्रिक्स जैसे बहुध्रुवीय मंचों की मांग बढ़ी है। विकासशील देश अपनी आर्थिक सुरक्षा के लिए एक वैकल्पिक वैश्विक व्यवस्था की तलाश कर रहे हैं।\n• एलएसी पर सैन्य तनाव और आगामी दौरा: पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सैन्य गतिरोध के बाद चीनी राष्ट्रपति की भारत यात्रा हो रही है। इस पृष्ठभूमि में द्विपक्षीय संबंधों और सीमा पर विश्वास बहाली की मांग जोर पकड़ रही है।\n• अमेरिकी टैरिफ और व्यापारिक अनिश्चितता: अमेरिकी चुनाव और डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित व्यापार नीतियों से वैश्विक बाजारों में व्यापार युद्ध की आशंका है। इससे बचने के लिए ब्रिक्स देश अपनी साझा रणनीतियों को मजबूत करने में जुटे हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. ब्रिक्स सम्मेलन में भारत की मुख्य भूमिका क्या है?\nभारत इस बहुध्रुवीय मंच के जरिए विकासशील देशों का नेतृत्व कर सकता है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार व आपूर्ति श्रृंखला में वैकल्पिक व्यवस्था बना सकता है।\n\n2. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की यात्रा को लेकर सलमान खुर्शीद ने क्या कहा?\nउन्होंने कहा कि एलएसी पर हालात को लेकर सरकार को देश के सामने पारदर्शिता बरतनी चाहिए और चीन के साथ बराबरी के स्तर पर बातचीत करनी चाहिए।\n\n3. पश्चिम एशिया के मुद्दे पर भारत क्या कदम उठा सकता है?\nभारत ब्रिक्स के मंच का उपयोग ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे विरोधी रुख वाले देशों को एक साथ लाकर साझा सहमति बनाने के लिए कर सकता है।\n\n4. अमेरिकी टैरिफ नीतियों पर सलमान खुर्शीद का क्या रुख है?\nउन्होंने कहा कि ट्रंप की टैरिफ नीतियों के बावजूद भारत को अपनी अस्मिता, आत्मविश्वास और स्वाभिमान के साथ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी बात रखनी चाहिए।\n\n5. विदेश नीति में सफलता के लिए क्या आवश्यक बताया गया है?\nसलमान खुर्शीद ने जोर दिया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता के लिए देश के भीतर राजनीतिक दलों और नेताओं का एक आवाज में बोलना जरूरी है।",
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  "category": "राजनीति",
  "publishedAt": "2026-09-09",
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