चुनावी विफलताएं छिपाने के लिए संवैधानिक मर्यादाएं गिरा रही मुख्य विपक्षी जमात, शिवराज सिंह चौहान ने साधा तीखा निशाना केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नई दिल्ली में पत्रकार वार्ता के दौरान विपक्ष की रीति-नीति पर प्रहार करते हुए कहा कि जनादेश खोने के बाद हताश दल अब स्वायत्त निकायों की साख पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है। नई दिल्ली में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कांग्रेस नेतृत्व और राहुल गांधी पर तीखा राजनीतिक हमला किया। उन्होंने दो टूक शब्दों में रेखांकित किया कि मतपेटियों से लगातार खारिज होने के बाद मुख्य विपक्षी दल अपनी आंतरिक कमजोरियों को स्वीकार करने के बजाय स्वायत्त संवैधानिक संस्थाओं को निशाना बनाने की नकारात्मक परिपाटी चला रहा है। चौहान के मुताबिक, मतदाताओं के बीच वैचारिक आधार और जनसमर्थन खो चुकी यह पार्टी अब पूरी तरह स्वतंत्र शक्ति नहीं रही, बल्कि अन्य क्षेत्रीय संगठनों की बैसाखियों पर टिकी एक निर्भर संरचना बनकर रह गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि चुनावी पराजयों के पीछे निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक व्यवस्थाओं का हाथ नहीं है, बल्कि दिशाहीन रणनीतिकार और विचारशून्य नीतियां इसके असली कारण हैं। चुनावी शिकस्त और आंदोलन के सहारे खीझ मिटाने की रणनीति चौहान ने पूर्वोत्तर और उत्तर भारत के विभिन्न चुनावी घटनाक्रमों का विस्तार से उल्लेख करते हुए रेखांकित किया कि असम, त्रिपुरा, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के रण में विपक्षी खेमे का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जब भी जनता इस दल को सत्ता से बेदखल करती है, तब अपनी हार पर आत्ममंथन करने के स्थान पर सड़कों पर आंदोलन खड़े करके कुंठा बाहर निकाली जाती है। लगातार मिलने वाली पराजयों का ठीकरा उन स्वायत्त निकायों के मत्थे मढ़ दिया जाता है, जो भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला हैं। चौहान ने कहा कि जनविश्वास से पूरी तरह विमुख हो चुकी यह पार्टी अब जमीनी स्तर पर जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने की क्षमता खो चुकी है। संगठनात्मक अंतर्कलह और क्षेत्रीय घटकों पर बढ़ती निर्भरता विपक्षी संगठन के भीतर मची अंदरूनी खींचतान की चर्चा करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कई प्रमुख राज्यों की प्रशासनिक एवं संगठनात्मक उठापटक का ब्योरा दिया। उन्होंने पंजाब की संगठनात्मक इकाइयों में अध्यक्ष बदलने के घटनाक्रम का हवाला दिया और साथ ही कर्नाटक के शीर्ष नेतृत्व में सिद्धारमैया तथा डीके शिवकुमार के मध्य चल रहे वर्चस्व के संघर्ष को सामने रखा। उन्होंने विश्लेषण किया कि गिने-चुने प्रांतों को यदि छोड़ दिया जाए, तो अधिकांश राज्यों में यह दल अपने ही गठबंधन सहयोगियों के सामने अत्यंत कमजोर और लाचार पायदान पर खड़ा नजर आता है। उन्होंने तंज कसा कि अपने बूते चुनाव जीतने की ताकत गंवा चुकी यह राजनीतिक शक्ति अब सहयोगी दलों के कंधों पर सवार होकर केवल अस्तित्व बचाने का प्रयास कर रही है। रणनीतिक दिशाहीनता और भारतीय राज्य व्यवस्था पर सवाल राहुल गांधी के राजनीतिक रुख की तीखी आलोचना करते हुए चौहान ने कहा कि संगठन के पास न तो कोई स्पष्ट भविष्यगामी रूपरेखा है और न ही कोई सुसंगत नीतिगत ढांचा बचा है। उन्होंने राहुल गांधी के उस पुराने वक्तव्य को उद्धृत किया जिसमें उन्होंने स्वीकार किया था कि उनका संघर्ष भारतीय जनता पार्टी के विरुद्ध न होकर सीधे भारतीय राज्य के विरुद्ध है। चौहान ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा कि राष्ट्र को विखंडित करने वाली ताकतों के साथ विपक्षी नेतृत्व का खड़ा होना बेहद चिंताजनक है। इसके साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देशव्यापी लोकप्रियता और विकासवादी राजनीति को यह खेमा मानसिक रूप से स्वीकार नहीं कर पा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय की मर्यादा और मुख्य न्यायाधीश से भेंट की प्रक्रिया विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' ब्लॉक और राहुल गांधी द्वारा सर्वोच्च न्यायालय की ओर मार्च निकालने तथा भारत के मुख्य न्यायाधीश से तत्काल भेंट की मांग पर भी केंद्रीय मंत्री ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने स्पष्ट रूप से स्मरण कराया कि देश के मुख्य न्यायाधीश से मिलने के लिए विधिक और तयशुदा प्रोटोकॉल मौजूद होता है, जिसका सम्मान हर नागरिक और सार्वजनिक प्रतिनिधि को करना चाहिए। राजधानी के जंतर-मंतर पर किए जा रहे धरना-प्रदर्शनों के संदर्भ में चौहान ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति और विरोध प्रदर्शन का अधिकार सभी को हासिल है, परंतु इस अधिकार की आड़ में आम नागरिकों की दिनचर्या को बंधक बनाना या जनजीवन को संकट में डालना कतई स्वीकार्य नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने सार्वजनिक सुविधाओं और आम जनता की सहूलियत को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात कही। संविधान की सर्वोच्चता और विश्वसनीयता पर प्रश्न अपने वक्तव्य के अंतिम चरण में चौहान ने याद दिलाया कि समूचा गणराज्य केवल और केवल संविधान के स्थापित नियमों से संचालित होता है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका और अन्य स्वायत्त अंगों के प्रति नकारात्मक तथा टकरावपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना किसी भी जिम्मेदार संगठन को शोभा नहीं देता। राहुल गांधी के बयानों की प्रमाणिकता पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि उनके बयानों का कोई ठोस भरोसा नहीं किया जा सकता। केंद्रीय मंत्री ने निष्कर्ष देते हुए कहा कि विपक्षी दल की इस दुर्दशा के लिए किसी बाहरी कारक को दोष देने के बजाय उसकी स्वयं की नीतियां और नेतृत्व पूरी तरह जिम्मेदार हैं। इस तल्ख बयानबाजी के उपरांत दोनों राष्ट्रीय दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का यह द्वंद्व और अधिक गहराने के आसार बन गए हैं। इसका आप पर असर केंद्रीय मंत्री के इस बयान से देश की दोनों प्रमुख राजनीतिक शक्तियों के बीच टकराव और तीव्र होने के आसार हैं। • आम जनता पर प्रभाव: राजनीतिक दलों के बीच धरने और विरोध प्रदर्शनों की वजह से राजधानी के प्रमुख मार्गों पर यातायात बाधित होने की संभावना बनी रहती है। यात्रियों और दैनिक कामगारों को प्रदर्शन वाले इलाकों में यात्रा से पहले यातायात सलाह पर नजर रखनी चाहिए। • संवैधानिक संस्थाओं की साख: राजनीतिक बहसों में चुनाव आयोग और न्यायपालिका को बार-बार खींचे जाने से जनता के बीच संस्थागत निष्पक्षता की चर्चा तेज होती है। मतदाता इन आरोपों और उनके बचाव के आधार पर विभिन्न दलों की राजनीतिक विश्वसनीयता का आकलन करते हैं। • गठबंधन राजनीति पर असर: विपक्षी खेमे के क्षेत्रीय दलों पर निर्भर होने के आरोपों से गठबंधन के भीतर सीटों के बंटवारे और नेतृत्व की वार्ताओं में खींचतान बढ़ सकती है। प्रांतीय चुनावों में क्षेत्रीय दल अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए इन बहसों का इस्तेमाल कर सकते हैं। • आगामी चुनावी नैरेटिव: सत्तापक्ष द्वारा विपक्ष को संस्था-विरोधी बताने की रणनीति से चुनावी रैलियों में विकास बनाम विश्वसनीयता का मुद्दा हावी रहेगा। मतदाताओं को दोनों खेमों की ओर से संस्थागत मर्यादाओं और संविधान के नाम पर तीखी दलीलें सुनने को मिलेंगी। ऐसा क्यों हुआ यह तल्ख बयानबाजी विपक्षी दलों द्वारा शीर्ष अदालत की ओर प्रस्तावित मार्च और चुनाव आयोग पर उठाए गए सवालों के प्रत्युत्तर में सामने आई। • सीजेआई से भेंट का प्रयास: विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' ब्लॉक और राहुल गांधी ने मुख्य न्यायाधीश से मिलने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च की योजना बनाई थी। केंद्रीय मंत्री ने इसे तय कानूनी नियमों और शिष्टाचार का उल्लंघन बताते हुए यह प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई। • लगातार चुनावी पराजयों की पृष्ठभूमि: सत्तापक्ष का मानना है कि असम, त्रिपुरा, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में हार के बाद विपक्ष अपनी खीझ स्वायत्त निकायों पर उतार रहा है। इसी क्रम में विपक्ष के तर्कों को सार्वजनिक रूप से काटने के लिए यह हमला बोला गया। • आंतरिक कलह का सार्वजनिक प्रदर्शन: कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद की खींचतान और पंजाब कांग्रेस के संगठनात्मक फेरबदल ने सत्तापक्ष को विपक्ष की आंतरिक कमजोरी पर प्रहार करने का सीधा मौका दिया। • पूर्व बयानों का संदर्भ: राहुल गांधी द्वारा भारतीय राज्य व्यवस्था को लेकर दिए गए पूर्ववर्ती बयानों को आधार बनाकर सरकार ने विपक्ष पर व्यवस्था-विरोधी होने का राजनीतिक आरोप जड़ा। सवाल-जवाब 1. केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कांग्रेस पर मुख्य आरोप क्या लगाया? उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस चुनावी हार का दोष संवैधानिक संस्थाओं पर मढ़ती है और अन्य दलों के सहारे चलने वाली एक परजीवी पार्टी बन चुकी है। 2. शिवराज सिंह चौहान ने किन राज्यों के चुनाव परिणामों का उल्लेख किया? उन्होंने असम, त्रिपुरा, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के चुनावों का हवाला देते हुए विपक्षी दल की लगातार हार का जिक्र किया। 3. कांग्रेस के भीतर किन राज्यों की गुटबाजी पर सवाल उठाए गए? उन्होंने पंजाब में प्रदेश अध्यक्ष बदलने और कर्नाटक में सिद्धारमैया व डीके शिवकुमार के बीच नेतृत्व को लेकर चल रही रार का उल्लेख किया। 4. सीजेआई से मुलाकात और विरोध प्रदर्शन को लेकर केंद्रीय मंत्री ने क्या कहा? उन्होंने कहा कि मुख्य न्यायाधीश से मिलने की एक तय प्रक्रिया होती है और विरोध के नाम पर आम जनता को परेशानी में डालना उचित नहीं है। https://trendkia.com/politics/chunavi-viphalataen-chhipane-ke-lie-snvaidhanika-maryadaen-gira-rahi-mukhya-vipakshi-jamata-shivraj-singh-chouhan-ne-sadha-tikha-n-46872 TrendKia — Har trend, sabse pehle.