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  "title": "उत्तराखंड की घटना से 2029 तक की सियासत, दलितों के मुद्दे पर कांग्रेस की क्या है बड़ी रणनीति",
  "summary": "कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के अपमान के आरोप को पार्टी अब आगामी विधानसभा और 2029 के आम चुनावों के लिए मुख्य मुद्दा बना रही है।",
  "content": "संसद के मानसून सत्र के संपन्न हुए पंद्रह दिन से ज्यादा का वक्त बीत चुका है, लेकिन इस सत्र के समापन के दिन उपजी एक राजनीतिक घटना अब धीरे-धीरे जोर पकड़ती जा रही है। सत्र के अंतिम दिन कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने उत्तराखंड की भारतीय जनता पार्टी सरकार पर तीखा प्रहार किया था। उनका मुख्य आरोप था कि हल्द्वानी में उनकी एक जनसभा के ठीक बाद राज्य की सत्तारूढ़ सरकार द्वारा कथित तौर पर शुद्धीकरण कराया गया था। मल्लिकार्जुन खरगे ने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि इस तरह के कृत्य के पीछे उनकी दलित पहचान मुख्य वजह थी।\n\nशुरुआती दौर में इस प्रकरण पर कांग्रेस पार्टी की तरफ से आक्रामकता थोड़ी कम दिखाई दी थी। घटना के तुरंत बाद मल्लिकार्जुन खरगे के साथ सोनिया गांधी ने राज्यसभा के सभापति से मुलाकात की थी और इस पूरे मामले को लेकर एक औपचारिक शिकायत भी दर्ज कराई थी। हालांकि, इसके बाद कुछ दिनों तक पार्टी का रुख ठंडा नजर आया, जिसे लेकर खुद पार्टी के भीतर भी नाराजगी देखने को मिली।\n\nकुछ दिनों बाद जब कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई, तो अंदरखाने की खबरों के अनुसार मल्लिकार्जुन खरगे ने अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के सुस्त रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई थी। उन्होंने खुलकर कहा कि संगठन के बहुत कम नेताओं ने इस गंभीर मसले को प्रमुखता से उठाया और आक्रामक रुख अपनाया। इस आंतरिक समीक्षा के करीब एक हफ्ते बाद राहुल गांधी ने एक महत्वपूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया, जिसके बाद कांग्रेस ने इस पूरे मामले को देश भर में एक बड़े अभियान के रूप में उठाना शुरू कर दिया।\n\nविश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस का यह नया राजनीतिक दांव सिर्फ मल्लिकार्जुन खरगे के समर्थन या उनके सम्मान तक ही सीमित नहीं है। पार्टी की सुदूरगामी नजरें आगामी उत्तर प्रदेश और पंजाब के विधानसभा चुनावों के साथ-साथ सीधे तौर पर 2029 के लोकसभा चुनाव पर टिकी हुई हैं। रणनीतिकार इस बात को भली-भांति समझते हैं कि देश की कुल आबादी में दलित मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 16 प्रतिशत है। यदि विशेष राज्यों की बात करें, तो उत्तर प्रदेश में यह अनुपात करीब 20 प्रतिशत है, जबकि पंजाब में अनुसूचित जाति की आबादी का यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 32 प्रतिशत तक पहुंच जाता है।\n\nराहुल गांधी और उनके रणनीतिकारों का राजनीतिक आकलन यह कहता है कि 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान उठाया गया ‘संविधान खतरे में है’ वाला चुनावी नारा काफी सफल रहा था। उस अभियान के माध्यम से कांग्रेस और उसके तमाम सहयोगी दल एक बड़े दलित मतदाता वर्ग को अपने पाले में खींचने में कामयाब रहे थे। इसके चुनावी परिणाम भी देखने को मिले थे, जहां सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी अपने दम पर बहुमत के जादुई आंकड़े को छूने से चूक गई थी।\n\nअब कांग्रेस ठीक उसी सफल फॉर्मूले की तर्ज पर उत्तराखंड की इस घटना को एक बड़े राष्ट्रीय राजनीतिक नैरेटिव में बदलने का प्रयास कर रही है। पार्टी की मंशा है कि ‘संविधान खतरे में है’ की तर्ज पर अब ‘दलित खतरे में हैं’ के विचार को घर-घर तक पहुंचाया जाए। इस सोची-समझी रणनीति का मुख्य उद्देश्य आगामी राज्य विधानसभा चुनावों के दौरान दलित वोटों को अपने पक्ष में एकजुट करना है और फिर साल 2029 के संसदीय चुनावों में इसका दीर्घकालिक लाभ उठाना है।\n\nहालांकि, कांग्रेस के मार्ग में सबसे बड़ी व्यावहारिक चुनौती यह है कि देश का दलित मतदाता कभी भी किसी एक राजनीतिक दल के पाले में पूरी तरह लामबंद नहीं रहा है। इस वर्ग के वोटों को लेकर हमेशा से कई राजनीतिक दलों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिलता रहा है। बहुजन समाज पार्टी अभी भी दलित राजनीति में एक अहम और प्रभावशाली भूमिका निभाती है। इसके अलावा, चंद्रशेखर आजाद की पार्टी भी लगातार दलित बस्तियों के बीच अपना राजनीतिक आधार मजबूत करने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है।\n\nदूसरी तरफ, भारतीय जनता पार्टी के पास भी कांग्रेस के इस नए नैरेटिव का मुकाबला करने के लिए अपनी एक सोची-समझी रणनीति मौजूद है। भाजपा की तरफ से लगातार यह संदेश देने का प्रयास किया जाता है कि दलितों को केवल एक साधारण वोट बैंक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। पार्टी का यह दावा रहता है कि केंद्र सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का सीधा और पारदर्शी लाभ समाज के दलित और वंचित वर्गों तक बिना किसी बाधा के पहुंच रहा है।\n\nदूसरी ओर, पंजाब का पुराना राजनीतिक इतिहास भी कांग्रेस पार्टी के लिए एक बड़ा सबक पेश करता है। साल 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने एक बड़ा दांव चलते हुए दलित चेहरे चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाया था ताकि दलित मतदाताओं को पूरी तरह पार्टी के साथ जोड़ा जा सके। इसके बावजूद, पार्टी उस चुनाव में शानदार जीत हासिल करने में असफल रही थी और उसे निराशा हाथ लगी थी।\n\nइन तमाम राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए यह साफ है कि कांग्रेस के लिए ‘दलित खतरे में हैं’ का मुद्दा सैद्धांतिक रूप से भले ही असरदार साबित हो, लेकिन इसे जमीन पर चुनावी समर्थन में तब्दील करना बेहद कठिन चुनौती होगी। फिलहाल मल्लिकार्जुन खरगे इस पूरे अभियान के सबसे प्रमुख चेहरे के रूप में सामने आए हैं और उत्तराखंड की घटना को इस मुहिम के शुरुआती आधार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन कांग्रेस का अंतिम लक्ष्य इससे कहीं अधिक बड़ा है, जो उत्तर प्रदेश और पंजाब से होते हुए सीधे 2029 के राष्ट्रीय राजनीतिक क्षितिज तक जाता है।\n\nइसका आप पर असर\nकांग्रेस द्वारा उठाए गए इस नए राजनीतिक मुद्दे का असर देश की चुनावी राजनीति और क्षेत्रीय समीकरणों पर सीधा पड़ सकता है।\n\n• भारत में: राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक दल दलित मतदाताओं को अपने पाले में लाने के लिए अपनी रणनीतियों को तेज करेंगे। इससे आगामी चुनावों में सामाजिक न्याय और पहचान की राजनीति का मुद्दा और अधिक मुखर हो जाएगा।\n• उत्तर प्रदेश और पंजाब में: इन दोनों राज्यों में क्षेत्रीय दलों और राष्ट्रीय पार्टियों के बीच दलित वोट बैंक पर कब्जे की होड़ और अधिक तीव्र हो जाएगी। स्थानीय मतदाताओं को लुभाने के लिए राजनीतिक दलों द्वारा नई कल्याणकारी घोषणाएं और अभियान चलाए जा सकते हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. मल्लिकार्जुन खरगे ने उत्तराखंड सरकार पर क्या आरोप लगाया था?\nमल्लिकार्जुन खरगे ने आरोप लगाया था कि हल्द्वानी में उनकी रैली के बाद उत्तराखंड सरकार ने उनकी दलित पहचान के कारण शुद्धीकरण कराया था।\n\n2. संसद के सत्र के बाद कांग्रेस नेताओं ने क्या कदम उठाया था?\nमल्लिकार्जुन खरगे और सोनिया गांधी ने राज्यसभा के सभापति से मुलाकात कर इस घटना की औपचारिक शिकायत दर्ज कराई थी।\n\n3. कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में क्या हुआ था?\nइस बैठक में मल्लिकार्जुन खरगे ने अपनी पार्टी के नेताओं द्वारा इस मुद्दे को गंभीरता से न उठाए जाने पर नाराजगी व्यक्त की थी।\n\n4. कांग्रेस इस मुद्दे के जरिए किन चुनावों को साधना चाहती है?\nकांग्रेस की नजर उत्तर प्रदेश और पंजाब के आगामी विधानसभा चुनावों के साथ-साथ 2029 के लोकसभा चुनाव पर है।\n\n5. देश और राज्यों में दलित आबादी का अनुपात कितना है?\nदेश की कुल आबादी में दलितों की हिस्सेदारी करीब 16 प्रतिशत है, जबकि उत्तर प्रदेश में 20 प्रतिशत और पंजाब में करीब 32 प्रतिशत है।",
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  "category": "राजनीति",
  "publishedAt": "2026-09-01",
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