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  "title": "दल बदल रोधी कानून के विलय प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट करेगा पुनर्विचार, कपिल सिब्बल की याचिका पर केंद्र को नोटिस",
  "summary": "सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की दसवीं अनुसूची में विलय प्रावधानों की व्याख्या पर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई है और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है।",
  "content": "वरिष्ठ अधिवक्ता और निर्दलीय राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल की एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सोमवार को सुनवाई करने के लिए तैयार हो गया है। इस याचिका में संविधान की दसवीं अनुसूची की वर्तमान व्याख्या पर पुनर्विचार करने की मांग की गई है, जिसके तहत सांसदों और विधायकों को दल बदल रोधी कानून के तहत अयोग्यता से बचने के लिए पार्टी विलय का रास्ता मिल जाता है। जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए स्पष्ट किया कि इस मुद्दे से जुड़े कई ऐसे संवैधानिक पहलू हैं जिन पर संसद को गहराई से विचार करने की आवश्यकता है।\n\nलोकतांत्रिक व्यवस्था और राजनीति पर पड़ता असर\nअदालत में दलील देते हुए कपिल सिब्बल ने कहा कि दसवीं अनुसूची के इस प्रावधान का देश की लोकतांत्रिक राजनीति पर बेहद व्यापक और गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि इस व्यवस्था के चलते अल्पमत वाले दल रातों-रात बहुमत में आ जाते हैं, जबकि जनमत हासिल करने वाली बहुमत वाली पार्टियां अल्पमत में धकेल दी जाती हैं। सिब्बल ने पीठ के समक्ष सवाल उठाया कि क्या देश के भीतर जिस तरह से संसद और विधानसभाओं की संरचना बदली जा रही है, वह संवैधानिक मर्यादाओं के अनुकूल है या नहीं।\n\nसुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने टिप्पणी की कि जनप्रतिनिधियों के आचरण को नियंत्रित करने के लिए बनाई गई दसवीं अनुसूची संसद द्वारा पारित की गई थी। ऐसे में इसमें सुधार या इसके लिए उपयुक्त वैधानिक ढांचा तैयार करने की प्राथमिक जिम्मेदारी भी संसद की ही है।\n\nगोवा दल-बदल मामले से जोड़ी गई याचिका\nवरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने पीठ को यह भी जानकारी दी कि गोवा के विधायकों के दल-बदल से जुड़ा इसी तरह का एक और मामला सुप्रीम कोर्ट में पहले से लंबित है। इस पर संज्ञान लेते हुए पीठ ने सिब्बल की याचिका को भी गोवा वाले मामले के साथ संबद्ध करने का आदेश दिया।\n\nसिब्बल ने यह याचिका व्यक्तिगत रूप से दायर की है। इससे पहले उन्होंने 22 जुलाई को इस पर जल्द सुनवाई का अनुरोध करते हुए सवाल उठाया था कि दसवीं अनुसूची के अनुच्छेद चार की सही और सटीक व्याख्या होना बहुत आवश्यक है। यह कानूनी याचिका ऐसे समय में आई है जब आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के कई सांसदों और प्रतिनिधियों ने दसवीं अनुसूची के विलय संबंधी प्रावधानों का सहारा लेकर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी तथा अन्य दलों का दामन थामा है।\n\nइसका आप पर असर\nभारत में: इस याचिका के फैसले से देश की राजनीति और भविष्य में होने वाले राजनीतिक दल-बदल व सरकारों की स्थिरता पर दूरगामी असर पड़ सकता है।\n\nआम जनता के लिए: चुनावी जनादेश का सम्मान सुरक्षित रखने और विधायकों-सांसदों द्वारा बिना अयोग्यता के दल बदलने पर रोक लगाने में यह मामला निर्णायक साबित हो सकता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल ने क्या याचिका दायर की है?\nकपिल सिब्बल ने संविधान की दसवीं अनुसूची (दल बदल रोधी कानून) के विलय प्रावधानों की व्याख्या पर पुनर्विचार करने के लिए याचिका दायर की है।\n\n2. कपिल सिब्बल की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कदम उठाया?\nजस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने सुनवाई के लिए सहमति जताते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है।\n\n3. दसवीं अनुसूची के अनुच्छेद चार को लेकर क्या विवाद है?\nइस प्रावधान का सहारा लेकर सांसद और विधायक किसी अन्य दल में विलय का दावा करके दल बदल के तहत होने वाली अयोग्यता से बच जाते हैं।\n\n4. अदालत ने संसद की भूमिका पर क्या कहा?\nपीठ ने टिप्पणी की कि दसवीं अनुसूची संसद द्वारा बनाई गई थी, इसलिए इसमें सुधार और व्यवस्था तैयार करने का दायित्व संसद का ही है।",
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  "category": "राजनीति",
  "publishedAt": "2026-07-27",
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    "सुप्रीम कोर्ट",
    "कपिल सिब्बल",
    "दसवीं अनुसूची",
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  "site": "TrendKia"
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