दतिया उपचुनाव में नरोत्तम मिश्रा को टिकट न देकर बीजेपी ने क्यों लिया बड़ा राजनीतिक जोखिम? दतिया विधानसभा उपचुनाव में नरोत्तम मिश्रा को टिकट न देने का बीजेपी का फैसला राज्य की अंदरूनी राजनीति, सत्ता संतुलन और जमीनी फीडबैक के बड़े रणनीतिक बदलाव की ओर इशारा करता है। मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर होने वाले आगामी उपचुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) द्वारा अपने वरिष्ठ नेता और पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को टिकट न दिए जाने के फैसले ने राज्य के राजनीतिक गलियारों में एक बड़ी बहस छेड़ दी है। हालांकि सत्ताधारी दल की ओर से इस निर्णय को लेकर कोई भी आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया है, लेकिन पार्टी के भीतर चल रहे घटनाक्रम और रणनीतिक समीकरण इस बात की ओर इशारा करते हैं कि यह कदम राज्य की राजनीतिक संरचना को संतुलित रखने के लिए बहुत सोच-समझकर उठाया गया है। सत्ता के नए केंद्र के उभार को रोकने की रणनीति इस बड़े राजनीतिक फैसले के पीछे मध्य प्रदेश शासन के भीतर सत्ता संतुलन बनाए रखने की एक गहरी चिंता छिपी हुई है। राजनीतिक विश्लेषकों और बीजेपी के अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि यदि नरोत्तम मिश्रा को उपचुनाव में उतारा जाता और वे जीत दर्ज करने में सफल हो जाते, तो राज्य की राजनीति में उनकी वापसी बेहद धमाकेदार होती। इस संभावित जीत से उनका कद तेजी से बढ़ता, जिससे वे राज्य में एक समानांतर सत्ता केंद्र के रूप में उभर सकते थे। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली मौजूदा सरकार में पहले से ही कैलाश विजयवर्गीय और प्रह्लाद पटेल जैसे कई बड़े और अनुभवी नेता शामिल हैं, जिनका अपना मजबूत क्षेत्रीय और राजनीतिक प्रभाव है। ऐसे में नरोत्तम मिश्रा की विधानसभा में वापसी से सत्ता और संगठन के भीतर गुटबाजी बढ़ने और एक नया ताकतवर धड़ा बनने की पूरी आशंका थी, जिसे पार्टी का शीर्ष नेतृत्व टालना चाहता था। आंतरिक सर्वे की रिपोर्ट और पारिवारिक समीकरण इस बड़े फैसले के पीछे केवल राजनीतिक समीकरण ही नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत पर आधारित कड़े आंकड़े भी शामिल थे। बीजेपी नेतृत्व ने दतिया विधानसभा सीट पर मतदाताओं के मूड को भांपने के लिए विस्तृत आंतरिक सर्वे कराए थे। इस सर्वे की रिपोर्ट से जो परिणाम सामने आए, वे पूर्व गृह मंत्री के खेमे के लिए बिल्कुल भी उत्साहजनक नहीं थे। सर्वे में नरोत्तम मिश्रा और उनके बेटे सुकर्ण मिश्रा दोनों की चुनावी स्थिति का आकलन किया गया था, जिसमें यह बात साफ होकर आई कि दतिया सीट पर इन दोनों में से किसी भी उम्मीदवार के लिए जीत की राह आसान नहीं होने वाली है। बेहद कड़े मुकाबले वाले इस उपचुनाव में पार्टी किसी भी ऐसे उम्मीदवार पर दांव नहीं लगाना चाहती थी जिसकी जमीनी पकड़ कमजोर पड़ चुकी हो। यही वजह रही कि पार्टी ने व्यक्तिगत रसूख के बजाय व्यावहारिक चुनावी समीकरणों को प्राथमिकता दी। साल 2023 के विधानसभा चुनाव की हार का साया बीजेपी के इस सख्त फैसले की जड़ें साल 2023 के अंत में हुए विधानसभा चुनावों से जुड़ी हुई हैं। उस चुनाव के दौरान जहां एक तरफ पूरी बीजेपी मध्य प्रदेश में प्रचंड बहुमत के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज कर रही थी, वहीं दूसरी तरफ दतिया सीट से नरोत्तम मिश्रा को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था। यह हार इसलिए भी अधिक चौंकाने वाली थी क्योंकि नरोत्तम मिश्रा तत्कालीन सरकार के मुख्य प्रवक्ता थे और उनके पास गृह विभाग जैसी बेहद महत्वपूर्ण जिम्मेदारी थी। कांग्रेस प्रत्याशी के हाथों उनकी पराजय ने राज्य की पूरी राजनीतिक व्यवस्था को हिलाकर रख दिया था। चुनाव के बाद पार्टी द्वारा किए गए सूक्ष्म विश्लेषण में यह बात सामने आई कि विकास कार्यों की अनदेखी और जनता से संपर्क में आई कमी के चलते स्थानीय मतदाता उनसे दूर हो गए थे। संगठन का मानना है कि दतिया की जनता में नरोत्तम मिश्रा को लेकर जो नाराजगी साल 2023 में देखी गई थी, वह अभी तक पूरी तरह से शांत नहीं हुई है। ऐसे संवेदनशील माहौल में उन्हें दोबारा चुनावी मैदान में उतारना एक बड़ा खतरा साबित हो सकता था। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव सरकार की साख का सवाल इस उपचुनाव के मायने केवल एक विधानसभा सीट को जीतने तक सीमित नहीं हैं। दतिया सीट के नतीजों को सीधे तौर पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार के कामकाज और संगठन की चुनावी रणनीति के लिटमस टेस्ट के रूप में देखा जा रहा है। यदि नरोत्तम मिश्रा जैसे बड़े कद के नेता को उम्मीदवार बनाने के बाद बीजेपी को इस उपचुनाव में पराजय का सामना करना पड़ता, तो इससे यादव सरकार की छवि को भारी नुकसान पहुंचता। यही कारण है कि प्रदेश संगठन ने तय किया कि उम्मीदवार के चयन में केवल और केवल जीत की संभावना को ही एकमात्र आधार बनाया जाए, चाहे इसके लिए शिवराज सिंह चौहान सरकार में बेहद ताकतवर रहे पूर्व गृह मंत्री को ही क्यों न दरकिनार करना पड़े। डॉ. मोहन यादव के कार्यकाल में मध्य प्रदेश के बदलते राजनीतिक परिदृश्य में, बीजेपी एक ऐसे नए शासन मॉडल को पेश करने के लिए उत्सुक है जो पूरी तरह से जमीनी फीडबैक के प्रति संवेदनशील हो। पुराने पावर स्ट्रक्चर से आगे बढ़ना पार्टी के क्रमिक विकास का एक हिस्सा माना जा रहा है। ऐसे में दतिया को लेकर लिया गया यह निर्णय राज्य के तमाम क्षेत्रीय क्षत्रपों के लिए एक कड़ा संदेश है कि अब केवल पुरानी वरिष्ठता के दम पर उपचुनावों में टिकट की गारंटी नहीं पाई जा सकती। इसका आप पर असर • मध्य प्रदेश में: इस निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि राज्य बीजेपी में अब पुराने क्षत्रपों के बजाय जमीनी स्तर पर जीत दर्ज करने वाले और नए चेहरों को अधिक प्राथमिकता दी जाएगी। • दतिया में: स्थानीय मतदाताओं को अब उपचुनाव में एक नया चेहरा देखने को मिलेगा, जिससे क्षेत्र की पारंपरिक राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में नया मोड़ आएगा। सवाल-जवाब 1. बीजेपी ने दतिया उपचुनाव में नरोत्तम मिश्रा को टिकट क्यों नहीं दिया? आंतरिक सर्वे में उनकी कमजोर स्थिति, नए सत्ता केंद्र के उभार को रोकने की पार्टी की नीति और 2023 की हार के बाद स्थानीय नाराजगी पूरी तरह समाप्त न होने के कारण उन्हें टिकट नहीं दिया गया। 2. क्या नरोत्तम मिश्रा के बेटे सुकर्ण मिश्रा को दतिया से टिकट मिलने की संभावना थी? पार्टी के आंतरिक सर्वे में सुकर्ण मिश्रा की स्थिति भी मजबूत नहीं पाई गई थी, जिसके कारण संगठन ने उन्हें भी उम्मीदवार नहीं बनाने का फैसला किया। 3. साल 2023 के विधानसभा चुनाव में नरोत्तम मिश्रा का प्रदर्शन कैसा रहा था? 2023 के चुनावों में जहां मध्य प्रदेश में बीजेपी की बड़ी जीत हुई थी, वहीं नरोत्तम मिश्रा को दतिया विधानसभा सीट से हार का सामना करना पड़ा था। 4. नरोत्तम मिश्रा की वापसी से मध्य प्रदेश बीजेपी में क्या प्रभाव पड़ सकता था? उनकी वापसी से राज्य में एक नया राजनीतिक शक्ति केंद्र बन सकता था, जिससे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार और संगठन के भीतर का मौजूदा शक्ति संतुलन प्रभावित होने की संभावना थी। https://trendkia.com/politics/datiya-upachunava-men-narottam-mishra-ko-tikata-na-dekara-bjp-ne-kyon-liya-bara-rajanitika-jokhima-6835 TrendKia — Har trend, sabse pehle.