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  "type": "article",
  "title": "दिल्ली शिखर सम्मेलन के बाद निरुपमा राव का विश्लेषण, 2027 में चीन की अगुवाई में होगी ब्रिक्स की असली परीक्षा",
  "summary": "दिल्ली शिखर सम्मेलन के बाद पूर्व विदेश सचिव निरुपमा राव ने ब्रिक्स के भविष्य का विश्लेषण किया है, जिसमें उन्होंने 2027 में चीन की अध्यक्षता के दौरान आने वाली बड़ी चुनौतियों से आगाह किया है।",
  "content": "हाल ही में दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने तेजी से बदलते वैश्विक परिदृश्य और बिखरती हुई दुनिया के बीच भारत की विदेश नीति की दिशा और उसकी रणनीतिक प्राथमिकताओं को बेहद स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है। दुनिया भर में महाशक्तियों के बीच बदलते संतुलन के इस दौर में, भारत ने इस मंच के माध्यम से अपनी संतुलित और दूरदर्शी कूटनीति का परिचय दिया है। भारत की पूर्व विदेश सचिव निरुपमा राव ने 13 सितंबर 2026 को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा किए गए अपने एक विस्तृत और गंभीर विश्लेषण में इस बात पर जोर दिया कि नई दिल्ली इस समूह को एक ऐसे महत्वपूर्ण गैर-पश्चिमी मंच के रूप में देखती है, जहां ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों की आवाज को बुलंद किया जा सके। हालांकि, भारत इस बात के पूरी तरह खिलाफ है कि इस मंच को एक स्पष्ट रूप से पश्चिम-विरोधी या अमेरिका-विरोधी गठबंधन में तब्दील होने दिया जाए। निरुपमा राव के अनुसार, भारत का मुख्य उद्देश्य व्यवस्था को ध्वस्त करना नहीं बल्कि उसमें सुधार करना है। लेकिन इस कूटनीति की असली और सबसे बड़ी परीक्षा साल 2027 में होने वाली है, जब चीन इस संगठन की अध्यक्षता संभालेगा।\n\nसुधार लेकिन बिना किसी टकराव के: भारत का रणनीतिक दृष्टिकोण\nनिरुपमा राव के विश्लेषण के मुताबिक, वैश्विक मंचों पर भारत का प्राथमिक लक्ष्य वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को पूरी तरह से नष्ट करना नहीं, बल्कि समय के साथ उसमें जरूरी और व्यावहारिक सुधार लाना है। नई दिल्ली एक ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की वकालत करती है जो अधिक प्रतिनिधित्व वाली हो, जिसमें विकासशील और गरीब देशों को अधिक आर्थिक सुरक्षा मिले और जहां किसी भी देश पर अनुचित आर्थिक दबाव न डाला जा सके। इसके साथ ही, भारत अपने राष्ट्रीय हितों को लेकर भी पूरी तरह सतर्क है। भारत भली-भांति जानता है कि देश के आर्थिक विकास और तकनीकी प्रगति के लिए पश्चिमी देशों के बाजार, वहां से आने वाली पूंजी, निवेश और आधुनिक तकनीक तक निर्बाध पहुंच बनाए रखना बेहद जरूरी है। इसलिए, पश्चिमी देशों के साथ अपने मजबूत आर्थिक और कूटनीतिक संबंधों को दांव पर लगाकर किसी भी पश्चिम-विरोधी धड़े का हिस्सा बनना भारत की विदेश नीति के अनुकूल नहीं है।\n\n \nयही वजह थी कि दिल्ली शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि ब्रिक्स समूह किसी के खिलाफ नहीं है। निरुपमा राव ने उल्लेख किया कि भारतीय राजनयिकों ने पर्दे के पीछे रहकर यह सुनिश्चित करने के लिए कड़ा प्रयास किया कि यह सम्मेलन किसी भी तरह से अमेरिका-विरोधी या पश्चिम-विरोधी बयानबाजी का अखाड़ा न बनने पाए। भारत के इसी संतुलित रुख का नतीजा था कि शिखर सम्मेलन के दौरान न तो किसी साझा ब्रिक्स मुद्रा यानी कॉमन करेंसी जैसी किसी बड़ी या क्रांतिकारी घोषणा को आगे बढ़ाया गया और न ही अचानक डॉलर के इस्तेमाल को पूरी तरह बंद करने यानी डी-डॉलराइजेशन का कोई आक्रामक और आघाती एजेंडा पेश किया गया। भारत ने बड़ी ही चतुराई से चर्चा को व्यावहारिक मुद्दों पर केंद्रित रखा।\n\nवैचारिक नारों की जगह व्यावहारिक सहयोग पर जोर\nवैचारिक और राजनीतिक टकराव से हटकर, दिल्ली शिखर सम्मेलन का मुख्य ध्यान उन व्यावहारिक सहयोग के क्षेत्रों पर रहा जो विकासशील देशों के सामने मौजूद वास्तविक चुनौतियों का समाधान कर सकते हैं। सम्मेलन के दौरान सदस्य देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में द्विपक्षीय व्यापार के भुगतान को बढ़ावा देने, सीमा पार भुगतान प्रणाली को अधिक तेज और सस्ता बनाने, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को अधिक मजबूत और लचीला बनाने जैसे मुद्दों पर गहन चर्चा हुई। इसके अलावा, भारत की ओर से डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के अपने सफल मॉडलों को साझा करने, वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा को मजबूत करने, तथा खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने जैसे विषयों पर ध्यान केंद्रित किया गया।\n\nसाथ ही, भारत ने UN, IMF और विश्व बैंक जैसी वैश्विक वित्तीय और राजनीतिक संस्थाओं में व्यापक और ऐतिहासिक सुधारों की वकालत की। इस प्रकार, भारत ने इस बात का सफल प्रदर्शन किया कि बिना किसी देश से दुश्मनी मोल लिए या बिना किसी पश्चिमी देश के खिलाफ मोर्चा खोले भी ग्लोबल साउथ के देशों के लिए रचनात्मक और सकारात्मक कार्य किए जा सकते हैं।\n\nपश्चिम एशिया के मतभेदों के बीच आम सहमति: एक बड़ी कूटनीतिक जीत\nनिरुपमा राव ने अपने विश्लेषण में दिल्ली शिखर सम्मेलन की एक और बड़ी सफलता का जिक्र किया, जो कि न्यू दिल्ली डिक्लेरेशन यानी नई दिल्ली घोषणापत्र पर सभी सदस्य देशों के बीच सर्वसम्मति बनाना था। पश्चिम एशिया के जटिल भू-राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए यह सहमति बेहद महत्वपूर्ण थी, क्योंकि हाल ही में शामिल हुए दो महत्वपूर्ण देशों, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच क्षेत्रीय हितों को लेकर स्पष्ट मतभेद और प्रतिस्पर्धा जगजाहिर है। इन दोनों देशों के अलग-अलग रणनीतिक दृष्टिकोणों के बावजूद कूटनीतिक प्रयासों के जरिए उन्हें एक साझा मंच पर लाना और घोषणापत्र पर राजी करना भारत की बड़ी उपलब्धि थी।\n\nहालांकि, सभी पक्षों को स्वीकार्य बनाने के लिए इस घोषणापत्र की भाषा को काफी सामान्य, व्यापक और संतुलित रखना पड़ा। निरुपमा राव के अनुसार, यह बात ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकत और उसकी सीमाओं दोनों को उजागर करती है। एक तरफ जहां यह दिखाता है कि यह मंच अत्यधिक विपरीत विचारधाराओं और परस्पर विरोधी हितों वाले देशों को भी एक मेज पर बिठाकर बातचीत जारी रखने और व्यापक सिद्धांतों पर सहमति बनाने की क्षमता रखता है। वहीं दूसरी तरफ, यह इसकी सीमा को भी दर्शाता है कि जब सदस्य देशों के बीच सीधे और गहरे राष्ट्रीय हितों का टकराव होता है, तो किसी सामूहिक कार्रवाई को अंजाम देने या किसी देश की जवाबदेही तय करने में यह समूह काफी हद तक लाचार नजर आता है।\n\nरूस से करीबी संबंध लेकिन चीन-रूस धड़े से दूरी\nशिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच हुई द्विपक्षीय मुलाकात ने भारत और रूस के बीच सदियों पुराने और मजबूत रणनीतिक संबंधों की गहराई को एक बार फिर दुनिया के सामने प्रदर्शित किया। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए कड़े प्रतिबंधों के कारण रूस की चीन पर आर्थिक निर्भरता लगातार बढ़ रही है, लेकिन इसके बावजूद भारत रूस को अपने एक अत्यंत महत्वपूर्ण ऊर्जा, रक्षा और रणनीतिक साझेदार के रूप में देखता है।\n\nभारत इस पारंपरिक रिश्ते को केवल हथियारों की खरीद तक सीमित न रखकर इसे आधुनिक विनिर्माण, औद्योगिक सहयोग और उच्च तकनीक के हस्तांतरण तक विस्तारित करना चाहता है। लेकिन, निरुपमा राव ने स्पष्ट किया कि भारत ने पश्चिमी नियमों और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था को खुली चुनौती देने वाले किसी रूसी-चीनी धड़े या वैकल्पिक व्यवस्था के विचार का समर्थन नहीं किया। भारत ने साफ संदेश दिया कि रूस के साथ उसके रणनीतिक संबंध अपनी जगह बेहद मजबूत और स्वतंत्र हैं, लेकिन भारत किसी भी ऐसे गुट का हिस्सा नहीं बनेगा जो पश्चिमी देशों के खिलाफ एक नए शीत युद्ध जैसी स्थिति पैदा करे।\n\nमोदी-शी जिनपिंग मुलाकात: मैनेज्ड स्टेबिलाइजेशन का दौर\nनिरुपमा राव ने दिल्ली सम्मेलन के सबसे महत्वपूर्ण और बहुप्रतीक्षित घटनाक्रमों में से एक प्रधानमंत्री मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई द्विपक्षीय मुलाकात को बताया। लगभग सात वर्षों के लंबे अंतराल के बाद शी जिनपिंग की भारत यात्रा ने दोनों पड़ोसी देशों के बीच रुके हुए उच्च स्तरीय राजनीतिक संवाद को फिर से सक्रिय करने के लिए एक आवश्यक मंच प्रदान किया। इस बैठक के दौरान दोनों नेताओं के बीच व्यापारिक संबंधों को बहाल करने, दोनों देशों के नागरिकों की आवाजाही को सुगम बनाने और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने पर सकारात्मक चर्चा हुई।\n\nइस बातचीत में भारत ने अपने प्रमुख आर्थिक मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाया, जिसमें चीन के साथ लगातार बढ़ता विशाल व्यापार घाटा, चीनी कच्चे माल और सप्लाई चेन पर भारत की अत्यधिक निर्भरता, तथा चीन के बाजारों में भारतीय उत्पादों के लिए सार्थक और निष्पक्ष पहुंच सुनिश्चित करने की मांग शामिल थी। प्रधानमंत्री मोदी ने पूरी दृढ़ता के साथ स्पष्ट किया कि दोनों देशों के बीच संबंधों के सामान्य होने और भविष्य में किसी भी प्रगति के लिए LAC पर पूरी तरह से शांति और स्थिरता बहाल करना तथा एक-दूसरे की रणनीतिक संवेदनशीलता का सम्मान करना अनिवार्य शर्त है।\n\nपूर्व विदेश सचिव ने आगाह किया कि इस मुलाकात को दोनों देशों के संबंधों में किसी बड़े रणनीतिक रीसेट या तत्काल सब कुछ ठीक हो जाने के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। इसे अधिक सटीक रूप से मैनेज्ड स्टेबिलाइजेशन यानी नियंत्रित स्थिरीकरण का नाम दिया जा सकता है। इसका अर्थ यह है कि दोनों देश अब एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धी सह-अस्तित्व और चुनिंदा क्षेत्रों में सहयोग की व्यावहारिक आवश्यकता को स्वीकार कर रहे हैं, लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि दोनों देशों के बीच दशकों पुराना रणनीतिक अविश्वास और सीमा विवाद अचानक समाप्त हो गया है।\n\nभारत की मल्टी-अलाइनमेंट रणनीति और 2027 की बड़ी चुनौती\nब्रिक्स जैसी संस्थाओं में सक्रिय भागीदारी भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और मल्टी-अलाइनमेंट यानी बहु-पक्षीय संरेखण की विदेश नीति का एक बेहतरीन उदाहरण है। जहां एक तरफ भारत इस मंच के माध्यम से चीन और रूस जैसे देशों के साथ संवाद का रास्ता खुला रखता है, वहीं दूसरी तरफ वह अमेरिका, यूरोपीय संघ के देशों, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसी प्रमुख पश्चिमी ताकतों के साथ अपने रणनीतिक और रक्षा सहयोग को लगातार मजबूत करता आ रहा है।\n\nप्रसिद्ध विदेश नीति विश्लेषक सी राजा मोहन के विचारों का हवाला देते हुए निरुपमा राव ने लिखा कि दिल्ली सम्मेलन में भारत की असली कूटनीतिक सफलता शायद यही रही कि उसने इस पूरे आयोजन को काफी बोरिंग यानी व्यावहारिक और नीति-केंद्रित बनाए रखा। इसका मतलब यह है कि भारत ने इस मंच को वैचारिक नारों, भड़काऊ भाषणों और पश्चिम-विरोधी आक्रामक बयानबाजी का मंच नहीं बनने दिया, जिससे इसकी विविधता और बहुपक्षीय उपयोगिता बनी रही।\n\nहालांकि, भारत के सामने असली और सबसे बड़ी चुनौती साल 2027 में आने वाली है, जब चीन इस समूह की अध्यक्षता करेगा। चीन निश्चित रूप से इस अवसर का उपयोग ब्रिक्स के और अधिक विस्तार, सदस्य देशों के बीच राजनीतिक तालमेल को मजबूत करने और पश्चिमी देशों की वित्तीय व्यवस्था पर वैश्विक निर्भरता को कम करने के लिए अपने एजेंडे को थोपने में कर सकता है। भारत के लिए असली परीक्षा यह होगी कि वह ग्लोबल साउथ की न्यायसंगत मांगों और वैश्विक सुधारों का समर्थन तो जारी रखे, लेकिन इसके साथ ही वह इस मंच को चीनी नेतृत्व वाले किसी नए भू-राजनीतिक धड़े या चीन के वर्चस्व वाले उपकरण में बदलने से पूरी तरह रोके रखे।\n\nइसका आप पर असर\nब्रिक्स में भारत की संतुलित रणनीति यह सुनिश्चित करती है कि देश पूर्वी और पश्चिमी दोनों महाशक्तियों के साथ मजबूत व्यापारिक संबंध बनाए रखते हुए आर्थिक रूप से सुरक्षित रहे।\n\n• व्यापार और बाजार स्थिरता: पश्चिम-विरोधी रुख का विरोध करके भारत अपने घरेलू उद्योगों के लिए पश्चिमी उपभोक्ता बाजारों को खुला रखता है। इसका मतलब है कि निर्यातकों और व्यवसायों को किसी भी जवाबी व्यापार बाधाओं या आर्थिक प्रतिबंधों का सामना नहीं करना पड़ेगा।\n• सस्ते सीमा पार लेनदेन: स्थानीय मुद्रा भुगतान प्रणालियों को बढ़ावा देने से अंतरराष्ट्रीय व्यापार और यात्रा अधिक किफायती हो जाएगी। उपभोक्ताओं और छोटे व्यवसायों को कम विनिमय शुल्क देना होगा और डॉलर पर निर्भरता कम होगी।\n• सीमा सुरक्षा में सुधार: चीन के साथ द्विपक्षीय संबंधों में आए कूटनीतिक ठहराव का सीधा असर विवादित सीमाओं पर सैन्य तनाव में कमी के रूप में दिखेगा। यह सीमावर्ती आबादी के लिए सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करेगा और सरकार को घरेलू विकास पर ध्यान केंद्रित करने में मदद करेगा।\n• वस्तुओं की कम कीमतें: शिखर सम्मेलन में चर्चा की गई मजबूत और विविध वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं कच्चे माल की अचानक होने वाली कमी को रोकेंगी। इससे घरेलू मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखने और उपभोक्ताओं के लिए रोजमर्रा की चीजों की कीमतों को स्थिर रखने में मदद मिलेगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nनिरुपमा राव का यह रणनीतिक विश्लेषण दिल्ली ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के नतीजों और वैश्विक शक्तियों के साथ अपने संबंधों को लेकर भारत द्वारा लिए गए महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक निर्णयों से प्रेरित था।\n\n• बदलते वैश्विक शक्ति समीकरण: पश्चिमी गठबंधनों और चीन-रूस धड़े के बीच बढ़ते तनाव ने भारत पर अपनी कूटनीतिक स्थिति स्पष्ट करने का भारी दबाव डाला। भारत ने एक पश्चिम-विरोधी मोर्चे में शामिल होने के बजाय मौजूदा व्यवस्था के भीतर रहकर सुधार का मध्यम मार्ग चुना।\n• 2027 में चीनी अध्यक्षता का दबाव: साल 2027 में चीन द्वारा इस समूह का नेतृत्व संभाले जाने की योजना इस रणनीतिक मूल्यांकन का एक बड़ा कारण है। बीजिंग द्वारा इस मंच का उपयोग अपने आर्थिक एजेंडे को थोपने के लिए किए जाने की संभावना है, जो भारत के बहुपक्षीय दृष्टिकोण को चुनौती देता है।\n• सीमा विवाद और आर्थिक चिंताएं: भारत और चीन के बीच सीमा पर लंबे समय से जारी गतिरोध ने दोनों देशों को एक पूर्ण रणनीतिक रीसेट के बजाय 'नियंत्रित स्थिरीकरण' खोजने के लिए मजबूर किया। द्विपक्षीय दौरों में लगभग सात साल के अंतराल के बाद व्यापार घाटे और सुरक्षा चिंताओं को प्रबंधित करने के लिए सीधा राजनीतिक संवाद आवश्यक हो गया था।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. निरुपमा राव के अनुसार ब्रिक्स में भारत का प्राथमिक लक्ष्य क्या है?\nभारत का लक्ष्य मौजूदा वैश्विक व्यवस्था को तोड़े बिना उसमें सुधार करना और ग्लोबल साउथ को सशक्त बनाना है, न कि किसी पश्चिम-विरोधी गठबंधन का हिस्सा बनना।\n\n2. निरुपमा राव ने मोदी-शी मुलाकात को 'मैनेज्ड स्टेबिलाइजेशन' क्यों कहा है?\nउन्होंने इसे 'नियंत्रित स्थिरीकरण' कहा है क्योंकि दोनों देश प्रतिस्पर्धी सह-अस्तित्व और चुनिंदा सहयोग की आवश्यकता को तो स्वीकार कर रहे हैं, लेकिन उनके बीच रणनीतिक अविश्वास और सीमा विवाद अभी भी बना हुआ है।\n\n3. न्यू दिल्ली डिक्लेरेशन को एक बड़ी कूटनीतिक सफलता क्यों माना जा रहा है?\nपश्चिम एशिया में विशेष रूप से नए सदस्य देशों ईरान और यूएई के बीच स्पष्ट रणनीतिक मतभेदों के बावजूद घोषणापत्र पर आम सहमति बनाना एक बड़ी सफलता थी।\n\n4. साल 2027 में चीन की ब्रिक्स अध्यक्षता को भारत के लिए बड़ी परीक्षा क्यों माना जा रहा है?\nचीन इस मंच का उपयोग अपने राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने और पश्चिमी वित्तीय प्रणालियों को चुनौती देने के लिए कर सकता है, जिससे भारत के संतुलित और बहुपक्षीय दृष्टिकोण के लिए चुनौती खड़ी होगी।\n\n5. भारत ने शिखर सम्मेलन को पश्चिम-विरोधी मंच बनने से कैसे रोका?\nभारत ने किसी आक्रामक 'डी-डॉलराइजेशन' या साझा मुद्रा के एजेंडे के बजाय स्थानीय मुद्राओं में भुगतान, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे व्यावहारिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित रखा।",
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  "category": "राजनीति",
  "publishedAt": "2026-09-13",
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