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  "type": "article",
  "title": "आइसलैंड में एपीजे अब्दुल कलाम के सम्मान की पुरानी याद ने ब्रिक्स शाकाहारी भोजन विवाद पर विपक्ष को किया खामोश",
  "summary": "ब्रिक्स समिट के गाला डिनर में पूरी तरह शाकाहारी भोजन परोसने पर छिड़े विवाद के बीच, आइसलैंड के पूर्व राष्ट्रपति ग्रिम्सन ने साल 2005 में डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के दौरे की याद दिलाकर इस बहस को शांत कर दिया है।",
  "content": "ब्रिक्स (BRICS) समिट के शानदार गाला डिनर में जब मेहमानों के सामने पूरी तरह से शाकाहारी भोजन परोसा गया, तो इंटरनेट पर एक नई बहस छिड़ गई। इस फैसले को लेकर सोशल मीडिया पर लोगों के बीच तीखी नोकझोंक शुरू हो गई। विपक्षी दलों ने तुरंत इस मुद्दे को लपक लिया और सरकार की आलोचना शुरू कर दी। विपक्ष का मुख्य तर्क यह था कि चूंकि भारत की एक बहुत बड़ी आबादी मांसाहारी भोजन करती है, इसलिए वैश्विक नेताओं के सामने केवल शाकाहारी खाना परोसना देश की वास्तविक सांस्कृतिक और खान-पान की विविधता को नहीं दर्शाता है। आलोचकों ने सवाल उठाया कि इस अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की विविधता को दिखाने के बजाय केवल एक ही प्रकार के भोजन को क्यों पेश किया गया।\n\n \n\nआइसलैंड से आया एक अप्रत्याशित जवाब\n\nजब यह राजनीतिक विवाद लगातार तूल पकड़ रहा था, तभी उत्तरी यूरोप से आए एक पुराने ऐतिहासिक संस्मरण ने पूरी बहस को अचानक शांत कर दिया। आइसलैंड के पूर्व राष्ट्रपति ओलाफुर रागनर ग्रिम्सन ने साल 2005 की एक बेहद महत्वपूर्ण घटना को याद करते हुए इस कूटनीतिक चर्चा में प्रवेश किया। ग्रिम्सन ने बताया कि जब भारत के महान वैज्ञानिक और तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम आइसलैंड की आधिकारिक यात्रा पर आए थे, तब वहां की सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया था। आइसलैंड एक ऐसा देश है जहां का मुख्य भोजन समुद्री खाद्य पदार्थों और मांस पर आधारित है। इसके बावजूद, डॉ. कलाम के शाकाहारी जीवन और उनकी सादगी का सम्मान करने के लिए आइसलैंड की सरकार ने अपने राजकीय रात्रिभोज के पूरे मेन्यू को पूरी तरह से शाकाहारी बना दिया था। ग्रिम्सन के इस खुलासे ने स्पष्ट कर दिया कि कूटनीति में भोजन का चयन किसी घरेलू खान-पान की सूची से नहीं, बल्कि आपसी सम्मान और गरिमा से तय होता है।\n\n \n\nसांस्कृतिक कूटनीति के दो मुख्य पहलू\n\nआइसलैंड के पूर्व राष्ट्रपति के इस संस्मरण से यह साफ होता है कि वैश्विक स्तर पर भोजन केवल भूख मिटाने का जरिया नहीं है, बल्कि यह एक बेहद परिष्कृत कूटनीतिक हथियार भी है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर परोसा जाने वाला खाना हमेशा एक सोची-समझी कूटनीति का हिस्सा होता है। ग्रिम्सन की बातों से भोजन से जुड़ी कूटनीति के दो अलग-अलग रूपों को समझा जा सकता है\n\n  - मेहमान-केंद्रित कूटनीति: यह व्यवस्था साल 2005 में आइसलैंड ने डॉ. कलाम के लिए अपनाई थी। इसमें मेजबान देश अपने मेहमान की आदतों, संस्कृति और पसंद का सम्मान करने के लिए अपनी पारंपरिक खान-पान की शैलियों में बदलाव करता है। एक ऐसे देश में जहां मछली और मांस मुख्य भोजन हैं, वहां कलाम साहब के लिए शाकाहारी भोजन की व्यवस्था करना उनके प्रति गहरे आदर का प्रतीक था।\n - मेजबान-केंद्रित कूटनीति: इसका प्रदर्शन भारत ने BRICS समिट के दौरान किया। इस कूटनीति के तहत मेजबान देश दुनिया के सामने अपनी प्राचीन विरासत, मूल्यों और कृषि परंपराओं को गर्व के साथ प्रस्तुत करता है। भारत ने इस मंच का उपयोग दुनिया भर से आए नेताओं को अपनी प्राचीन शाकाहारी परंपरा और वसुधैव कुटुंबकम के विचार से परिचित कराने के लिए किया।\n\n \n\nसॉफ्ट पावर और पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली का संदेश\n\nआज के डिजिटल और सोशल मीडिया के दौर में छोटी-छोटी बातों पर विवाद होना आम बात हो गई है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि BRICS समिट में शाकाहारी भोजन परोसने का फैसला भारत की सांस्कृतिक सॉफ्ट पावर को दुनिया के सामने प्रदर्शित करने की एक सोची-समझी रणनीति थी। आज पूरी दुनिया में स्वास्थ्य, शुद्ध खान-पान और पर्यावरण संरक्षण को लेकर गंभीर चर्चाएं हो रही हैं। भारतीय शाकाहारी व्यंजन, जिनमें श्री अन्न यानी मिलेट्स, मौसमी सब्जियां और आयुर्वेद के सिद्धांतों का उपयोग किया जाता है, आज वैश्विक स्तर पर एक सेहतमंद और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प के रूप में उभर रहे हैं। ऐसे व्यंजनों को विदेशी मेहमानों के सामने पेश करके भारत ने किसी पर अपनी पसंद थोपने का प्रयास नहीं किया, बल्कि वैश्विक समुदाय को एक बेहतर और टिकाऊ जीवनशैली का विकल्प दिखाया।\n\n आखिरकार, आइसलैंड के पूर्व राष्ट्रपति के इस बयान ने घरेलू राजनीति के स्तर पर हो रही बयानबाजी और सोशल मीडिया की ट्रोलिंग को पूरी तरह से शांत कर दिया। उनके इस संस्मरण ने यह साबित कर दिया कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मेजबानी का असली मतलब केवल स्वाद नहीं, बल्कि गरिमा और कूटनीतिक संदेश होता है। इस तरह, शाकाहारी बनाम मांसाहारी भोजन का यह राजनीतिक विवाद एक बेहद गरिमापूर्ण कूटनीतिक उदाहरण के सामने पूरी तरह से फीका पड़ गया।\n\nइसका आप पर असर\nइस कूटनीतिक चर्चा से यह साफ होता है कि पारंपरिक भारतीय भोजन को वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।\n\n  - वैश्विक पहचान: भारतीय खान-पान को अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक जिम्मेदार और पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली के रूप में मान्यता मिल रही है। इसका मतलब है कि भविष्य में जैविक खेती और मिलेट्स की वैश्विक मांग तेजी से बढ़ सकती है, जिससे भारतीय उत्पादकों को सीधा फायदा होगा।\n\n  - सांस्कृतिक गौरव: विदेशी मेहमानों के सामने पारंपरिक व्यंजनों का प्रदर्शन देश के सांस्कृतिक गौरव को बढ़ाता है। इससे आम नागरिकों को अपनी प्राचीन परंपराओं और खान-पान की सादगी को गर्व से अपनाने की प्रेरणा मिलती है।\n\n  - पर्यटन को बढ़ावा: भारत के समृद्ध भोजन को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने से पर्यटन क्षेत्र को भी बल मिलता है। विदेशी पर्यटकों में भारतीय व्यंजनों को चखने की उत्सुकता बढ़ेगी, जिससे स्थानीय खाद्य उद्योगों को नए अवसर मिलेंगे।\n\n  - स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता: इस विवाद ने आयुर्वेद और सस्टेनेबल डाइट पर वैश्विक ध्यान आकर्षित किया है। पाठक अपने दैनिक जीवन में अधिक स्वस्थ और पारंपरिक खाद्य पदार्थों को शामिल करने के लिए प्रेरित हो सकते हैं, जिससे लंबी अवधि में उनके स्वास्थ्य में सुधार होगा।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह बहस इसलिए शुरू हुई क्योंकि ब्रिक्स (BRICS) समिट के गाला डिनर में पूरी तरह से शाकाहारी मेन्यू रखा गया था, जिससे भारतीय राजनीति में विविधता को लेकर सवाल खड़े हो गए।\n\n  - विपक्ष का विरोध: राजनीतिक विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि एक मांसाहार प्रधान देश में केवल शाकाहारी भोजन परोसना भारत की वास्तविक खाद्य विविधता को छिपाने जैसा है।\n\n  - डिजिटल युग की तेजी: सोशल मीडिया पर इस मुद्दे ने तुरंत तूल पकड़ लिया और यह कूटनीतिक चयन एक वायरल राजनीतिक बहस में बदल गया।\n\n  - आइसलैंड के पूर्व राष्ट्रपति का हस्तक्षेप: ओलाफुर रागनर ग्रिम्सन ने 2005 के कलाम साहब के दौरे की यादें साझा कीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भोजन का चयन व्यक्तिगत डाइट चार्ट के बजाय आपसी सम्मान और कूटनीतिक संदेश के आधार पर किया जाता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. ब्रिक्स समिट के डिनर को लेकर क्या विवाद था?\nविवाद तब शुरू हुआ जब समिट के गाला डिनर में 100 प्रतिशत शाकाहारी भोजन परोसा गया, जिस पर विपक्ष ने सवाल उठाया कि यह भारत की खान-पान की विविधता को नहीं दर्शाता।\n\n2. आइसलैंड के पूर्व राष्ट्रपति ने किस घटना का जिक्र किया?\nउन्होंने साल 2005 की घटना का जिक्र किया जब भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम आइसलैंड गए थे और उनके सम्मान में वहां की सरकार ने पूरा मेन्यू शाकाहारी कर दिया था।\n\n3. आइसलैंड के लिए शाकाहारी मेन्यू तैयार करना बड़ी बात क्यों थी?\nआइसलैंड एक ऐसा देश है जहां का मुख्य भोजन सी-फूड और मीट है, लेकिन डॉ. कलाम की सादगी और पसंद का सम्मान करने के लिए उन्होंने अपनी परंपराओं में बदलाव किया था।\n\n4. कूटनीति में मेहमान-केंद्रित और मेजबान-केंद्रित दृष्टिकोण क्या हैं?\nमेहमान-केंद्रित कूटनीति में मेजबान देश मेहमान की पसंद के अनुसार मेन्यू बदलता है, जबकि मेजबान-केंद्रित कूटनीति में मेजबान देश अपनी खुद की सांस्कृतिक विरासत और मूल्यों का प्रदर्शन करता है।\n\n5. भारत ने ब्रिक्स समिट में शाकाहारी भोजन क्यों परोसा?\nभारत ने अपनी सांस्कृतिक सॉफ्ट पावर को दिखाने और आयुर्वेद, मिलेट्स तथा पर्यावरण के अनुकूल पारंपरिक जीवनशैली के वैश्विक संदेश को बढ़ावा देने के लिए शाकाहारी भोजन परोसा।",
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  "category": "राजनीति",
  "publishedAt": "2026-09-13",
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