जम्मू-कश्मीर में आरक्षण विवाद गहराया, उमर अब्दुल्ला और उपराज्यपाल के बीच तनातनी तेज जम्मू-कश्मीर में सरकारी नौकरियों के आरक्षण को लेकर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और उपराज्यपाल प्रशासन आमने-सामने आ गए हैं। सरकार द्वारा कोटा घटाकर 50 प्रतिशत करने का प्रस्ताव भेजे जाने के बाद भी मंजूरी न मिलने पर विवाद बढ़ता जा रहा है। जम्मू-कश्मीर में सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में मिलने वाले आरक्षण को लेकर सियासत और प्रशासनिक खींचतान अपने चरम पर है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का कहना है कि उनकी सरकार ने राज्य में कुल आरक्षण के दायरे को संशोधित कर 50 प्रतिशत तक सीमित करने का प्रस्ताव तैयार किया है। इसके लिए कैबिनेट से विधिवत प्रस्ताव पास कराने के बाद मंजूरी के वास्ते पिछले साल नवंबर में ही उपराज्यपाल के पास फाइल भेज दी गई थी। हालांकि, इस पर अब तक कोई अंतिम फैसला न आने के कारण सरकार और राजभवन के बीच गतिरोध उत्पन्न हो गया है। स्थिति यहां तक पहुंच चुकी है कि मुख्यमंत्री ने इस प्रशासनिक देरी पर नाराजगी जताते हुए सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखी है और प्रक्रिया आगे न बढ़ने पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। अनसुलझा इंतजार और सियासी चेतावनी प्रस्ताव पर लंबे समय से कोई स्पष्ट कदम न उठाए जाने से नाराज मुख्यमंत्री ने चेतावनी भरे लहजे में इस बात पर जोर दिया है कि यदि इस मामले को यूं ही लटकाए रखा गया, तो जनता का असंतोष फूट सकता है। उन्होंने कहा कि उनकी तरफ से सभी जरूरी औपचारिकताएं पूरी कर ली गई हैं और गेंद अब दूसरे पाले में है। उन्होंने यह भी आशंका जताई कि यदि युवाओं का गुस्सा बाहर आया, तो हालात संभालना मुश्किल हो जाएगा और इसके लिए वे या उनकी सरकार किसी भी रूप में जिम्मेदार नहीं होगी। उनका आरोप है कि कैबिनेट के फैसलों को दबाकर रखना या उनमें अनावश्यक देरी करना किसी भी लिहाज से उचित नहीं है, जिससे आम जनता और युवाओं के बीच बेचैनी लगातार बढ़ती जा रही है। बदला हुआ आरक्षण का गणित और नया विवाद जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे में बदलाव होने से पहले विभिन्न वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में कुल 43 प्रतिशत सीटें आरक्षित हुआ करती थीं। इन श्रेणियों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, वास्तविक नियंत्रण रेखा तथा अंतर्राष्ट्रीय सीमा के समीप रहने वाले लोग, पिछड़े क्षेत्रों के निवासी, दिव्यांगजन और पूर्व सैनिक शामिल थे। लेकिन साल 2024 में लोकसभा चुनाव से ठीक एक महीने पहले उपराज्यपाल मनोज सिन्हा द्वारा जम्मू-कश्मीर आरक्षण अधिनियम 2004 में बड़ा संशोधन किया गया। इस बदलाव के बाद कुल आरक्षण का यह आंकड़ा अचानक बढ़कर 70 प्रतिशत पर पहुंच गया। इस भारी फेरबदल के पीछे मुख्य वजह पहाड़ी समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देना था। गुर्जर-बकरवाल असंतोष और सामान्य वर्ग की मुश्किलें पहाड़ी समुदाय को अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल किए जाने के निर्णय का गुर्जर और बकरवाल समुदायों ने कड़ा विरोध किया था, क्योंकि वे खुद भी इसी श्रेणी के अंतर्गत आते हैं। गुर्जर वर्ग की नाराजगी मोल न लेने के लिए प्रशासन ने अनुसूचित जनजाति के कोटे को 10 प्रतिशत से बढ़ाकर सीधे 20 प्रतिशत कर दिया। इस दोहरे फैसले के कारण उन युवाओं के लिए भारी संकट खड़ा हो गया जो किसी भी आरक्षित दायरे में नहीं आते हैं, क्योंकि उनके लिए नौकरियों में केवल 30 प्रतिशत हिस्सेदारी ही शेष बची थी। इसी असंतुलन और अन्याय के विरोध में सामान्य श्रेणी के लोगों ने तीखी आलोचना शुरू कर दी और प्रशासन के इस कदम को पूरी तरह से अनुचित ठहराया। चुनावी वादे और राजनीतिक दलों के दांव आरक्षण के इस जटिल मुद्दे पर साल 2024 के विधानसभा चुनावों के दौरान राजनीतिक सरगर्मी काफी तेज रही थी। नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने अपने घोषणापत्रों में जनता से वादा किया था कि सरकार बनने पर वे इस पूरी आरक्षण नीति की समीक्षा करेंगे और इसमें जरूरी सुधार लाएंगे। चुनाव परिणामों और जनता की नाराजगी के नफा-नुकसान को भांपते हुए दोनों ही प्रमुख दलों ने इस कोटे को तार्किक रूप से संतुलित करने का भरोसा दिया था। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनावी एजेंडे में अग्निवीरों के लिए सरकारी नौकरियों में अतिरिक्त आरक्षण देने के साथ-साथ विभिन्न आरक्षित श्रेणियों के कर्मचारियों को प्रमोशन में भी आरक्षण का लाभ देने का वादा किया था। जम्मू और कश्मीर के बीच प्रमाण पत्रों का अंतर उमर अब्दुल्ला की सरकार को केवल विपक्षी दलों से ही नहीं, बल्कि अपने ही आंतरिक दायरे और जनता के भारी दबाव का सामना करना पड़ रहा है। इस साल फरवरी में पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के नेता सज्जाद लोन द्वारा उठाए गए एक सवाल के लिखित जवाब में सरकार ने विधानसभा के पटल पर जो आंकड़े रखे, उन्होंने सबको चौंका दिया। उन आंकड़ों के अनुसार, घाटी के मुकाबले जम्मू संभाग में आरक्षित श्रेणियों के कहीं अधिक प्रमाण पत्र जारी किए गए थे। इससे पहले अक्टूबर 2025 में मुख्यमंत्री आवास के बाहर खुद उमर की पार्टी के सांसद आगा रुहुल्लाह मेहदी ने सामान्य वर्ग के नागरिकों के साथ मिलकर धरना प्रदर्शन किया था, जिससे सरकार की मुश्किलें और ज्यादा बढ़ गई थीं। कैबिनेट सब-कमेटी की सिफारिशें और फाइल का सफर इन तमाम विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक दबाव के बीच सरकार ने हालात को संभालने के लिए एक विशेष कैबिनेट सब-कमेटी का गठन किया था। इस समिति ने गहन अध्ययन के बाद अक्टूबर 2025 में अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंप दी, जिसमें स्पष्ट रूप से सिफारिश की गई थी कि आरक्षण के कुल दायरे को वापस घटाकर 50 प्रतिशत कर देना चाहिए। मंत्रिमंडल ने इस रिपोर्ट पर मुहर लगाते हुए अगले ही महीने मंजूरी के लिए फाइल लोक भवन भेज दी। मुख्यमंत्री का कहना है कि राजभवन की ओर से इस प्रस्ताव पर कुछ आपत्तियां और सवाल उठाए गए थे, जिनका जवाब सरकार द्वारा समय पर दे दिया गया है, लेकिन उसके बाद से यह मामला पूरी तरह से ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है और इसमें कोई प्रगति नहीं हुई है। इसका आप पर असर भारत में: यह विवाद देश के अन्य राज्यों में आरक्षण की सीमाओं और राजनीतिक दलों के बीच नीतिगत संघर्षों की बहस को नया आयाम देता है। जम्मू-कश्मीर में: राज्य के युवाओं, सरकारी नौकरी के उम्मीदवारों और सामान्य वर्ग के छात्रों के भविष्य पर सीधा असर पड़ेगा, क्योंकि कोटे में बदलाव से उनके चयन के अवसर तय होते हैं। सवाल-जवाब 1. जम्मू-कश्मीर में वर्तमान में कुल सरकारी नौकरी आरक्षण कितना है? साल 2024 में हुए संशोधन के बाद जम्मू-कश्मीर में सरकारी नौकरियों में कुल आरक्षण 70 प्रतिशत कर दिया गया है। 2. उमर अब्दुल्ला सरकार ने आरक्षण को लेकर क्या सिफारिश की है? उमर अब्दुल्ला की सरकार ने आरक्षण के दायरे को घटाकर 50 प्रतिशत करने का प्रस्ताव पारित किया है। 3. आरक्षण का यह प्रस्ताव वर्तमान में किसके पास लंबित है? आरक्षण प्रस्ताव से जुड़ी फाइल मंजूरी के लिए उपराज्यपाल के पास भेजी गई है, जहां से अभी अंतिम मंजूरी मिलना बाकी है। 4. पहाड़ी समुदाय को किस कोटे के तहत शामिल किया गया है? पहाड़ी समुदाय को अनुसूचित जनजाति वर्ग के अंतर्गत शामिल किया गया है, जिसके कारण कोटे में यह बड़ा बदलाव हुआ है। https://trendkia.com/politics/jammu-kashmir-reservation-row-omar-abdullah-warns-of-youth-unrest-over-delayed-50-percent-quota-proposal-17912 TrendKia — Har trend, sabse pehle.