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  "title": "जंतर मंतर से उठे युवा आंदोलन पर शिवानंद तिवारी का बयान, कहा, यह मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ फूटा ज्वालामुखी है",
  "summary": "आरजेडी के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने देशभर में चल रहे युवा प्रदर्शनों को सालों से दबे असंतोष का नतीजा बताया है। उन्होंने कहा कि जंतर मंतर से शुरू हुआ यह आंदोलन अब रुकने वाला नहीं है, क्योंकि यह बेरोजगारी और सरकार की नीतियों के खिलाफ युवाओं का सीधा आक्रोश है।",
  "content": "राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने देश भर में तेजी से फैल रहे युवा आंदोलन को लेकर एक विस्तृत प्रतिक्रिया दी है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक पर अपने विचार साझा करते हुए उन्होंने इस राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन को केवल किसी तात्कालिक घटना का नतीजा मानने से इनकार किया है। इसके बजाय, उन्होंने इसे लंबे समय से दबे हुए असंतोष का ऐसा भयानक विस्फोट बताया है, जो अब सड़कों पर नजर आ रहा है। उनका मानना है कि जंतर मंतर से शुरू हुई यह चिंगारी अब एक बड़ी आग बन चुकी है, जिसमें देश के कोने-कोने से लाखों युवा और युवतियां शामिल होकर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं।\n\nसुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और आंदोलन का देशव्यापी विस्तार\n\nइस जन आंदोलन की शुरुआत की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए आरजेडी नेता ने हैरानी जताई है। उन्होंने उल्लेख किया है कि शायद ही किसी व्यक्ति ने यह अनुमान लगाया होगा कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा की गई एक टिप्पणी इतना बड़ा रूप ले लेगी। उसी टिप्पणी के बाद युवाओं ने एकजुट होकर एक मजबूत संगठन का निर्माण किया और एक बेहद जुझारू आंदोलन की नींव रखी। राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर जैसे ऐतिहासिक विरोध स्थल से उठी यह लहर अब किसी एक राज्य या शहर तक सीमित नहीं रह गई है। यह पूरे देश में फैल चुकी है और हर जगह युवाओं की भारी भीड़ इस मोर्चे में अपनी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित कर रही है। यह अचानक हुआ कोई प्रदर्शन नहीं है, बल्कि एक सुनियोजित तरीके से आगे बढ़ता हुआ राष्ट्रव्यापी अभियान बन गया है।\n\nप्रदर्शनों में युवतियों की बढ़ती भागीदारी और सुरक्षा का अहसास\n\nइस पूरे घटनाक्रम का एक बेहद खास पहलू महिलाओं की भागीदारी है, जिसे शिवानंद तिवारी ने प्रमुखता से रेखांकित किया है। उन्होंने बताया कि इस आंदोलन में बड़ी संख्या में युवतियां पूरी ऊर्जा और सक्रियता के साथ हिस्सा ले रही हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये युवतियां खुले तौर पर यह स्वीकार कर रही हैं कि इतनी भारी भीड़ के बीच वे खुद को पूरी तरह से सुरक्षित महसूस कर रही हैं। सामाजिक दृष्टिकोण से यह एक बहुत बड़ा और सकारात्मक संदेश है। अमूमन बड़े प्रदर्शनों में सुरक्षा को लेकर चिंताएं रहती हैं, लेकिन इस युवा आंदोलन ने अनुशासन और परस्पर सम्मान का एक ऐसा माहौल तैयार किया है, जहां आधी आबादी बिना किसी डर के अपने अधिकारों के लिए खड़ी है।\n\nआर्थिक असमानता, महंगाई और नीतियों पर सरकार को घेरा\n\nआंदोलन के मूल कारणों की गहराई में जाते हुए तिवारी ने केंद्र की सत्ता पर तीखा प्रहार किया है। उनका स्पष्ट मानना है कि यह गुस्सा रातों-रात पैदा नहीं हुआ है। इसके पीछे पिछले कई सालों से लगातार बढ़ रहा असंतोष है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार पर आरोप लगाया है कि उनकी नीतियां समाज के एक बड़े और गरीब वर्ग के खिलाफ हैं। जनता के बीच यह मजबूत धारणा बन चुकी है कि मौजूदा व्यवस्था में केवल बड़े उद्योगपतियों और पूंजीपति घरानों को ही प्राथमिकता दी जा रही है। इस पूंजीवादी झुकाव के कारण देश में अमीरी और गरीबी के बीच की खाई बहुत तेजी से चौड़ी हुई है। इसके अलावा, किसानों, आदिवासियों और समाज के सबसे कमजोर तबकों के हकों को लगातार नजरअंदाज किया गया है। बेतहाशा बढ़ती महंगाई और रोजगार के घटते अवसरों ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है, जिसके परिणामस्वरूप यह ज्वालामुखी फटा है।\n\nएकतरफा संवाद और मीडिया के जरिए भ्रम फैलाने की राजनीति\n\nसत्ता पक्ष की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए तिवारी ने कहा है कि सरकार एक गहरी गलतफहमी का शिकार हो गई थी। सत्ताधीशों को लगने लगा था कि वे युवाओं की वास्तविक समस्याओं को सुने बिना, केवल अपने मन की बात थोपकर जनता को हमेशा के लिए अपने नियंत्रण में रख सकते हैं। मुख्यधारा की मीडिया को सरकार ने अपने प्रचार का एक बड़ा हथियार बना लिया था, ताकि आम जनता को एक खास तरह के सम्मोहन में बांधकर रखा जा सके। सरकार सोचती थी कि वह जो भी फैसला लेगी, जनता उसे खामोशी से मान लेगी। लेकिन सड़कों पर उमड़े युवाओं के इस भारी हुजूम ने उस भ्रम को पूरी तरह से तोड़ दिया है। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि लोकतंत्र में जब असंतोष अपनी चरम सीमा पर पहुंचता है, तो जनता अपनी बात मनवाने का रास्ता खुद तलाश लेती है।\n\nराजनीतिक दलों में होड़ और बिना नेता का ऐतिहासिक उभार\n\nजैसे-जैसे आंदोलन जोर पकड़ रहा है, राजनीतिक परिदृश्य में भी हलचल तेज हो गई है। शिवानंद तिवारी के अनुसार, अब यह प्रदर्शन किसी भी सूरत में रुकने वाला नहीं है। देश के लगभग सभी राजनीतिक दल इस युवा उभार के साथ खुद को जोड़ने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। राजनेताओं के बीच एक अजीब सी प्रतिस्पर्धा चल रही है कि कौन इस आंदोलन के सबसे करीब नजर आता है। हर दल अपने-अपने तरीके से युवाओं का हितैषी बनने का प्रयास कर रहा है। हालांकि, इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता इसका नेतृत्वविहीन होना है। तिवारी ने इसकी तुलना साल 1974 के ऐतिहासिक छात्र आंदोलन से की है, लेकिन एक बड़े अंतर के साथ। उस दौर में एक सर्वमान्य नेता हुआ करता था, जबकि आज कोई एक चेहरा इस भीड़ का नेतृत्व नहीं कर रहा है। अलग-अलग मंचों पर कई चेहरे नजर आ रहे हैं। प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने भी इन युवाओं की मांगों का समर्थन करते हुए अनशन किया है। फिर भी, यह आंदोलन किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि सड़कों पर उतरे उन लाखों युवाओं का है जो अपने भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं।\n\nकेंद्रीय मंत्री के इस्तीफे की मांग और आगे का संघर्ष\n\nआंदोलन के भविष्य को लेकर शिवानंद तिवारी का आकलन काफी स्पष्ट है। उनका मानना है कि जब तक युवाओं की मुख्य मांगें नहीं मान ली जातीं, तब तक इस जनसैलाब के शांत होने की कोई उम्मीद नहीं है। इन प्रमुख मांगों में से एक सबसे बड़ी मांग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर है। युवा वर्ग शिक्षा व्यवस्था और रोजगार के मुद्दों पर जवाबदेही की मांग कर रहा है। तिवारी ने यह भी अंदेशा जताया है कि शायद केंद्रीय मंत्री के इस्तीफे के बाद भी यह आक्रोश पूरी तरह से शांत न हो। सालों से दबा हुआ यह गुस्सा अब एक ऐसी दिशा में बढ़ चला है, जहां से बिना किसी ठोस बदलाव के वापसी असंभव प्रतीत होती है।\n\nइसका आप पर असर\n• पूरे देश में: इस राष्ट्रव्यापी आंदोलन के कारण राजनीतिक माहौल गरमा गया है, जिससे आने वाले समय में रोजगार और शिक्षा नीतियों पर सरकार को कड़े कदम उठाने पड़ सकते हैं।\n• युवाओं के लिए: जो युवा लंबे समय से बेरोजगारी और परीक्षाओं में हो रही धांधली से परेशान हैं, उनके लिए यह एकजुटता एक बड़े बदलाव का रास्ता खोल सकती है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. शिवानंद तिवारी ने युवा आंदोलन के बारे में क्या कहा है?\nउन्होंने इसे बेरोजगारी और महंगाई जैसी समस्याओं से उपजे लंबे असंतोष का ज्वालामुखी विस्फोट बताया है।\n\n2. यह आंदोलन कहां से शुरू हुआ था?\nइस बड़े आंदोलन की शुरुआत राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर से हुई थी।\n\n3. किस घटना ने इस प्रदर्शन को भड़काया?\nसुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की एक टिप्पणी के बाद युवाओं ने एकजुट होकर यह आंदोलन शुरू किया।\n\n4. युवाओं की प्रमुख मांग क्या है?\nप्रदर्शनकारी युवाओं की एक बड़ी मांग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा है।\n\n5. इस आंदोलन में महिलाओं की स्थिति पर क्या कहा गया है?\nबड़ी संख्या में युवतियां इसमें भाग ले रही हैं और भारी भीड़ के बीच भी खुद को पूरी तरह सुरक्षित महसूस कर रही हैं।",
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  "publishedAt": "2026-07-23",
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